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Friday, December 9, 2022

अच्छाई

 


अपना काम निपटा कर मैं सड़क के किनारे बैटरी रिक्सा का इंतजार कर रहा था । सब सवारियों से लदे हुए निकले जा रहे थे,कोई खाली नही था । तभी दूर से एक बैटरी रिक्सा मुझे दिखा,मैंने हाथ से रुकने का संकेत  किया ,रिक्सा झट रुक गया ।उसमे दो सीट खाली थी । और मैंने देखा उसे एक चौबीस पच्चीस साल की लड़की चला रही थी ।ये देख कर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ ,ऐसा मैंने इस इलाके में अभी तक नही देखा था । खैर मैं सीट पर बैठ गया ।,और उस लड़की के विषय मे सोचने लगा ।मुझे बड़ी खुशी हुई ,एक महिला रिक्शा चला रही है , बड़ी हिम्मत का काम है । भले ही उसकी कोई मजबूरी रही होगी,मगर यह महिला को बराबरी का दर्जा मिलने की दिशा में एक नूतन प्रयास था । सभाएँ करने से, समितियां बनाने से , और अध्यक्ष ,सेकेट्री,या कोई पद हासिल करने से,और मीडिया में चर्चा में आने से , बेहतर कदम था यह , ऐसे अनोखे प्रयोग अगर चल निकले तो निसंदेह हमारे समाज की सोच उत्कृष्ट होगी और महिलाओं के प्रति हेय की दृष्टि रखने वालों के मुह पर तमाचे के समान होगा । उस महिला के प्रति मन मे उदारता के भाव उत्पन्न हुए ।  ऐसा प्रयास या ऐसी स्तिथि जहां भी देखता था मन एक सुखद अनुभूति से भर उठता था । तभी अचानक रिक्सा रुका,मेरी तंद्रा टूटी रिक्सा मेरे स्टैंड पर रुक गया था  ।
" चाचा जी  आपका स्टैंड आ गया है ,यहीं उतरना था ना आपको ' ? वह बोली
"अरे.... हाँ हाँ  ख्याल ही नही आया " ,और मैं उतरने लगा । किराया दस रुपये होता है, पर मुझे पता नही क्या सुझा मैंने उस लड़की से कहा  " देखो बेटी तुम मेरी बेटी जैसी हो ,बुरा मत मानना ये तुम पचास रुपये रखलो , मुझे तुम्हे ऐसा काम करते देख बड़ी खुशी हुई है ,किस बहादुरी और हिम्मत से तुमने ये काम करने का निश्चय किया है,ये तारीफ के काबिल है ,इसे अपना पारितोषिक समझो ,आज हमारे समाज को तुम्हारे जैसे बदलाव की जरूरत है " , और मैं वहां से चलने लगा ,वह मेरे वाक्य सुन कर हतप्रभ रह गई । वह बोली चाचा एक मिनट ,वह मेरे पास आई और झट मेरे पैर छू लिये । मै नही जानता उसने मेरी बातों को कितना समझा , परन्तु  उसकी आँखों मे एक चमक थी और कृतज्ञता के भाव थे । मैं वापस घर लौट आया ।  मैं  अक्सर बैटरी रिक्शा में आता जाता रहता था । इस बात को कई दिन बीत गए , एक दिन घर से निकल कर गया तो मेट्रो स्टेशन पर  उतर कर मैंने रिक्सा वाले को पैसे देने के लिए उसे पैसे देने चाहे पर मेरे पास सौ का नोट था ,वह बोला  " खुले नहीं है चाचा , खुले दो । मेरे पास खुले नहीं है " , " जाकर किसी रिक्से वाले से मांग लो खुले " , मैंने कहा । इस बात पर वह अकड़ बैठा , "मैं क्यों जाऊं ,आप जाओ " वह बोला । भरे बाजार में उससे बहस करना मैंने ठीक नही समझा ,और इधर उधर देखने लगा  किसी रिक्से वाले को , चौक के पास और रिक्से थे शायद उनके पास हो ये सोचकर में उस तरफ बढ़ा । तभी पीछे से आवाज आई रुको चाचा जी......। कौन....हो ,मैंने पूछा,एक बीस बाइस साल का युवक खड़ा था , मैं कुछ कहता इससे पहले वो युवक बोला "आपको कुछ करने की जरूरत नही है ,मैंने पैसे उसे दे दिए है "। पर आपने क्यों....,,,।
" आपको शायद ध्यान नही है ,उस दिन जब आपने उस लड़की को पचास का नोट ढिया था तो मैं रिक्से मेही बैठा था ,और आपकी बाते सुन रहा था , आपके उच्च विचारों से मैं बहुत प्रभावित हुआ था , एक अच्छाई का काम मुझे भी करने दीजिए प्लीज "
मैं  उससे जो कहता ,उसने पहले ही उसने प्लीज कह कर बात का अंत कर दिया , " ओह....थैंक्यू अगर ऐसी बात है तो  ठीक है " , मैंने उसके कंधे पर हाथ रख कर थपथपाया , " खुश रहो , इस ज्योति कोअपने अंदर जलाए रखना , इसे बुझने मत देना "। युवक  मुस्कराया और हाथ जोड़कर चला गया । में आश्चर्य चकित था ,उस लड़की का चेहरा मेरे मष्तिस्क में घूम गया । मुझे ऐसा लगा जैसे वह लड़की ही आकर ये काम कर गई हो , सच कहा है किसीने जैसा बोओगे वैसा काटोगे ,अच्छाई ,नेकी, भलाई हमेशा किसी ना किसी रूप में लौट कर आ ही जाती है , हमे कभी कभी अपने सीमित दायरे से ऊपर उठ कर भी चलना चाहिए ।
                           भगवान सिंह रावत ( दिल्ली )

Thursday, December 1, 2022

वक्त के कंधों पर

 वक्त के कंधों पर ,ठहरी है जिंदगी ।

सुबह शाम और दुपहरी है जिंदगी ।

माया और वैभव में उलझ कर रह गई ,

शिक्षा संस्कारों की दीवारें ढह गई ,

भोग और रोग के सैलाब में लिपटी,

लगती कितनी सुनहरी है जिंदगी ।

वक्त के कंधों पर ठहरी है जिंदगी ।

वैभव की चाहत में चल पड़ी गाँव से ,

ऊंचाइयां छोड़ गई खुद अपने पांव से ,

उम्मीद के साये में सपनों को बुनती,

बेगानों जैसे शहरी है जिंदगी ।

वक्त के कंधों पर ठहरी है जिंदगी ।

उधेड़ती है सपने बार बार बुनती हैं ,

अपने पराये की आहट नही सुनती है ,

सिमट के रह गई अपने ही आस पास,

लगता है जैसे बहरी है जिंदगी ।

वक्त के कंधों पर ठहरी है जिंदगी ।

थोड़ा सा पाया और कितना खोया है,

स्वार्थ की धरती पर तृष्णा को बोया है ,

ता उम्र जिंदगी कुछ और बनी रही ,

जाने कहाँ है जो लहरी है जिंदगी ।

वक्त के कंधों पर ठहरी है जिंदगी ।

सुबह शाम और दुपहरी है जिंदगी ।

                           भगवान सिंह रावत (दिल्ली)



Thursday, November 24, 2022

हम फिर मिलेंगे

 जिंदगी के आइने में धूल की परत जम गई है 

बहती उम्र की गति भी थम गई है ।

प्रति ध्वनी करते पर्वत , तुम्हारी अनुपस्थिति दर्ज करा रहे हैं 

बरसते मेघ,भोर के उड़ते पंछी, वो , व्यवहार नही दर्शा रहे हैं ।

तुम्हारी झील सी आँखों मे एक बार देखना चाहता हूँ 

समय का समंदर , चाहत का शहर 

भावों का बाज़ार , प्रीत की लहर 

उन्मुक्त घुमते थे जहाँ , दुनिया से बेखबर 

तभी वक्त ले गया हमें , जाने कहाँ किधर किधर

जाने कहाँ कहाँ किस देश मैं,  वैभव के परिवेश में 

तृष्णा के सैलाब में , इर्ष्या और द्वेष में 

जब  होश आया , अपने को अकेला  पाया  ।

जमाने भर की भीड थी , साथ न था अपना भी साया 

तुम से बिछड़ कर , कहाँ से कहाँ चला आया ।

आज अपने आप से , मैं बहुत सर्मिन्दा हूँ 

जिन्दगी जिन्दगी सी नही है पर जिन्दा हूँ ।

और जिन्दा है मेरे अंदर का एक कवि 

जो अंकुरित हुआ था तुम्हारे मिलने पर

गुलशन ज्यो महके फूलों के खिलने पर ।

जो कभी कलम की शक्ल में , कागज पर दौड़ जाता है ।

निर्जन वन में भी जिन्दगी के गीत गाता है

नाउम्मीदी के घने सैलाब में आशाओं के पुष्प उगाता है ।

तुम कहाँ हो तुम्हारा हाथ अपने हाथ में लेकर 

एक बार जी भरकर  रो लेना चाहता हूँ 

आंसुओ से वक्त के धूल की परत , को धो लेना चाहता हूँ 

तुम्हारे कंधे पर सर रख कर , थोडा सो लेना चाहता हूँ

वक्त ने पहरे बिठाये होंगे तुम्हारे इर्द गिर्द जरुर

फिर भी एक बार , तुम्हारा हो लेना चाहता हूँ

जब तक तुम नहीं मिलते , खोजूंगा निरंतर इस जन्म तक 

इस जन्म ही नहीं , बल्कि जन्मो, जन्मो तक 

पूछूंगा तरासे गए से ,पत्थरों  से महलों के खंडहरों से

पेड़, पौधों से, जंगलों से , गाँव गांव से और शहरों से

हम फिर मिलेंगे कहीं दूर , बहुत दूर, छितिज़ के उस पार 

संकुचित समाज से ऊपर , जहाँ हो चाहत का सँसार ।

शरीरों के बन्धनों से मुक्त ,जैविक  सोच से परे 

छल कपट दिखावे से हटकर जैसे कुंदन से खरे ।

हम फिर मिलेंगे , हम फिर मिलेंगे ।

                भाववन सिंह रावत  (दिल्ली)



Sunday, November 13, 2022

डर

 


               
सत्य घटना पर आधारित इस कहानी के पात्रों के नाम , स्थान अवश्य बदले हुए हैं ,लेकिन कहानी  का हर शब्द चीख चीख कर सच की गवाही दे रहा है । बात आज से चालीस साल पुरानी है । मैं और मेरा दोस्त नीरज दीपावली की छुट्टियाँ में तीन दिन की और छुट्टी लेकर एक हफ़्ते के लिए गांव जाने को तैयार हो गए । रात को दस बजे की रोडवेज़ की बस दिल्ली से पकड़ कर उत्तरांचल अपने गांव को रवाना हुए । पांच बजे सुबह हम लोग ऋषिकेश पहुंचे ,वहां से हमने गाड़ी बदली,और टिहरी की बस में रवाना हो गए ।उस जमाने मे परिवहन व्यवस्था इतनी सुलभ नही थी , आज की अपेक्षा  कहीं दूर की यात्रा में दुगने से भी ज्यादा समय लगता था ।
दो बजे नियत समय पर बस टिहरी पहुंच गई ,वहां से हमे गाँव के लिए बस पकड़नी थी ,जो हमे पाँच बजे तक गाँव के पास उतार देती ,मगर वह बस किसी कारणवश लेट हो गई ।  इंतजार करते करते शाम के पांच बजे गए । हमे अब यकीन हो गया कि हमे गाँव के पास पहुंचते पहुंचते रात हो जाएगी । सर्दी के मौसम में अंधेरा जल्दी हो जाता है ।
हमने बस पकड़ी ,ठीक सात बजे हम गाँव के नजदीक पहुंचे ,आगे का रास्ता पैदल का था घना जंगल और पहाड़ की चढ़ाई ,और उस पर रात का अंधेरा ,अकेला होता तो मैं कभी रात में नहींचलता , टिहरी में ही किसी होटल में रुक जाता मगर हम दो थे ,इस लिए हमने चलने का निश्चय किया था ।
बातचीत करते करते चलते रहेंगे ,ये सोच कर हमने अपना सामान उठाया और चल पड़े ,मेरे पास एक सूटकेस था जबकि  मेरे दोस्त  नीरज के पास सूटकेस और एक थैला भी था ।जंगली जानवरों का भय यहां अक्सर रहता है ,ये सुनने को मिलता था कि लकड़बग्गा आज फलां की बकरी  चपट कर गया किसी के कुत्ते को खा गया ,वगेरह वगेरह ।जब आदमी ऐसी परिस्तिथि में होता है तो ना याद आने वाली बातें भी याद आ जाती है ।और उस जमाने मे भूत प्रेतों की अधिक मान्यताएं होती थी । लोगों के द्वारा बताई गई आप बीती की घटनाएं इसी समय याद आती है । हम कड़ा मन करके चले जा रहे थे ,नीरज बोला " यार गोविंद तू डर तो नही रहा ना " ? मैंने कहा " अरे डरना कैसा जो डरता है उसी को ये सब दिखते हैं , तू भगवान का नाम ले और चलता रह " अपने डर को छिपाते मैंने कहा , "हाँ यहीं तो मैं कह रहा हूँ भूत भात कुछ नहीं होता " में समझ गया वह भी अपना डर छुपा रहा है , भूत के किस्से और घटनाएं बताने वालों में एक यह भी था । मगर इस समय ये बात कहने का कोई समय नहीं था ।आदमी कितना ही निडर क्यों ना हो , थोडे से डर की आशंका उसके मन मे अवस्य होती है । हम अपना डर छिपाए अपने आप को निडर घोषित करते चले जा रहे थे ।अंधेरे सन्नाटे में हमारी पदचाप और बात चीत दूर दूर तक सुनाई पड़ रही थी । जरा सी कहीं से आहट होती तो हम चौंक पड़ते , और एक दूसरे को डरपोक बताने का नाटक करते ,  मेरे मन मे आया कि इससे तो अच्छा था टिहरी में किसी होटल में रुक जाते , सुबह आराम से आते , मगर एक दिन की छुट्टी बेकार हो जाती ,खैर अब आ ही गये तो घर तो पहुंचना ही है , मैंने अपनी सुविधा के लिए एक डंडा चाय वाले कि दुकान से ले लिया था ,शायद इसकी जरूरत पड़ जाय ।बीच बीच मे कुछ जंगली जानवरों की आवाजें हल्की हल्की आती थी मगर सामने कोई अब तक नही आया । चलते चलते नीरज अचानक रुक गया ,ऐसे जैसे बस को ब्रेक लगता हो । मैंने पूछा तो नीरज बोला "प्रकाश देख तो वहां पर कौन बैठा है "
"कहां पर " मैंने कहा "अरे वो देख उस दीवार के बड़े पत्थर पर"मैंने देखा सचमुच दूर से ऐसा लगता था जैसे कोई बैठा हो , दिन के समय कोई राहगीर चलते चलते थक जाते तो उस जगह बैठ जाते थे , वहां पर एक छोटा पेड़ भी था ,जिसकी छांव में बैठ कर आने जाने वाले थोड़ी देर आराम करते थे , गाँव की स्त्रियां जब दूर जंगल से लकड़ियां या घास लेकर आती थी तो यहां पर बैठ कर थोड़ी देर विश्राम करती थी ।ठीक उसी जगह पर मैंने देखा एक आदमी घुटने में मुँह दे कर बैठ था ,उसे इस तरह बैठा देख कर एक बार तो हमारे होश उड़ गए ,वह हम से पचास मीटर की दूरी पर था ,क्या उसे हमारी आवाज सुनाई नही पड़ी ,हम तो जोर जोर से बातें कर रहे थे ।नीरज डर कर मेरे पीछे हो गया। , डर से या फिर हिम्मत से मेरे हाथ की पकड़ डंडे पर मजबूत हो गई । मैं चिल्लाया "कौन है वहां पर " कोई जवाब नहीं आया , तो हमारे होश हवा हो गए , तब एक पत्थर उठा कर मैंने हल्के से उसकी तरफ उछाला ताकि  पत्थर की आवाज से उसे हमारा आभास हो सके । तब उस आदमी ने जोर से हंसते हुए अपना मुह ऊपर किया , "डर गए क्या " वह बोला ।"अरे भाई कौन हो तुम "मैंने कहा "तुमने तो डरा ही दिया था "मैंने अपने को संयत करते हुए कहा । नीरज के चेहरे पर पसीना आ गया था । हम नजदीक आये तो देखा वह एक पचास पचपन साल का दुबला पतला आदमी था ,फिर वह खींसे निपोरता बोला "डरो मत देखो मैं तो अकेला हूं ,तुम तो दो हो 'तब नीरज अपने डर को छिपाता हुआ बोला " हम डर कहां रहे थे ", " हमने सोचा कोई चोर है " । चलो अब साथ चलते हैं ,वह लाठी के सहारे खड़ा हुआ ,और बोला मैं पटुडी गांव का हूँ ,पटुडी गांव हमारे गांव धारकोट से बाद में पड़ता था ,तो क्या ये आदमी वहां तक अकेले ही जायेगा ? हमे आश्चर्य हुआ , पर ये समय ये सब सोचने का नही था । हम एक साथी के मिल जाने से काफी  आस्वस्त हुए , एक उम्र दराज आदमी के मिलने से अब वह पहले जैसा डर नही रह गया था ,अब हम बेफिक्र हो कर चल रहे थे । हम दोनो पच्चीस छब्बीस साल के और वह वृद्ध आदमी हम से दुगनी उम्र का था, हम लोग बातें करते करते चल रहे थे तो उसने हमें भूतो की बातें बताई , " भूत ऐसे नही दिखते जैसा आदमी सोचता है ,भूत अलग अलग रूप में दिखता है , कभी कभी आदमी सोचता है कि भूत नही है पर भूत उसके साथ ही  विधमान रहता है " ।वगेरह वगेरह । उसकी अजीब बातें दिलचस्प भी थी और डराने वाली भी , खैर बात करते करते उसने हमारे गांव के एक दी आदमियों के नाम बताए और कहा कि वह हमारे जानने वाले हैं , तब हमें पूरा यकीन हो गया कि वह सींवाली गांव का है । थोड़ी देर बाद हम लोग अपने गांव की सरहद में पहुंच गए । आठ बजे चुके थे , उसने अपना नाम श्याम सिंह बताया था । जब हमारे गांव का रास्ता अलग हुआ तो  तो मैंने कहा  " अच्छा श्याम सिंह जी  आप आराम से जाइये ,हमारा तो गांव आ गया है "। तब वह बोला ठीक है मैं चलता हूँ ,और वह बे झिझक आगे रास्ते पर चल  पड़ा और अंधेरे में गायब हो गया ,  मैंने देखा उसका व्यवहार ऐसा था जैसे उसके लिए रात का अंधेरा कोई अहमियत ना रखता हो । मुझे वह बहुत बहादुर और हिम्मत वाला आदमी लगा । हमने ईश्वर का धन्यवाद किया ,कि हमे एक साथी और मिल गया था । रास्ते के थोड़ा ऊपर एक छोटी दुकान थी ,जो रात आठ नौ बजे तक खुली रहती थी ,लोग दीपू चाचा की दुकान पर देर तक गप शप्प किया करते थे , हम दुकान पर पहुंचे तो देखा दीपू चाचा के अलावा दो आदमी वहां और बैठे थे । रामा रूमी के बाद चाचा बोले "अरे प्रकाश,नीरज तुम अकेले ही आ रहे हो क्या ? "
मैने कहा "हाँ चाचा हमारे साथ एक आदमी और था"
"कौन था तुम्हारे साथ " दीपू चाचा बोले ,तब मैंने कहा कि पटुडी गांव का कोई श्याम सिंह था ,अभी तो गया है उस तरफ । दीपू चाचा ने कहा रात को इस तरह मत आया करो ,टिहरी में रुक जाते ,चलो ठीक है में भी दुकान बंद कर रहा हूँ ,टाइम हो गया है।और सब उठ कर चलने लगे । हम भी अपने घर आ गए । सुबह नाहा धो कर मैं दीवाली का सामान लेने जाने लगा तो नीरज को आवाज दे कर आने का कहा ,हम दोनो दुकान पर पहुंचे तो दुकान पर दीपू चाचा बैठे थे । तब उन्होंने बताया कि तुम्हे रात को पैदल इस तरह नही आना चाहिए ,"पर चाचा हमे तो कोई दिक्कत नही हुई" ,। मैने कहा । "और अगर कुछ हो जाता तो चाचा बोले मैंने तुम्हें रात में नही बताया , तुम जिस श्याम सिंह  की बात कर रहे थे ,जिसके साथ तुम लोग आधा घंटे तक चलते रहे ,जानते हो उसे मेरे हुए चार महीने हो गए हैं , आये दिन वह रात को लोगों के साथ इसी तरह चलता है"। "क्या " मेरे मुह से जैसे चीख़ निकल गई ,और पैरों तले जमीन खिसक गई ।नीरज तो जैसे बेहोस  सा हो गया । उसका मुह खुला का खुला रह गया ।  "हे भगवान तो क्या वह असल मे भूत था " ?
" हाँ वो वही था ,तुम्हारी किस्मत अच्छी थी कि तुम्हे कुछ हुआ नही "।उस दिन मैं समझा कि डर क्या होता है,वो जो हमने कल रात महसूस किया या वो जिसका अहसास हमे अब हो रहा था ।उस दिन के बाद हम कभी रात को उस समय उस रास्ते नही चले ,बाद में कभी अगर दिन में भी उस जगह चलना पड़ता तो शरीर में डर  की एक लहर सी दौड़ जाती थी ।

                             भगवान सिंह रावत  ( दिल्ली )
                                  

Sunday, November 6, 2022

अनजाने रिश्ते


 सुबह के आठ बजकर पैंतालीस मिनट हुए हैं । जगह ओखला औधोगिक परिसर ,शेड टाइप फैक्टरियां । एक के बाद एक फैक्टरियां लगभग किलो मीटर दूर तक ।नौ बजने में अभी समय था ।फैक्टरियों के कर्मचारी बाहर बैठ कर नौ बजने का इंतजार कर रहे थे ।फैक्टरियां मे काम नौ बजे से सुरु होता है ।

एक तीस बत्तीस साल की महिला तभी वहां से गुजरती है,शलवार कमीज में चुप चाप चलती हुई जल्दी जल्दी,एक फैक्ट्री के आगे दो चार वृद्ध व्यक्ति और पांच छै जवान बीस पच्चीस साल के युवक नौ बजने का इंतजार कर रहे थे ।तभी उनमे से एक युवक बोला अरे "अजीत ले  आगई आंखें सेक ले '।"अरे कहां "अजीत  बोला "वो आरही है ना" पहला बोला , फिर जब वह नजदीक आई तो अजीत ने एक फिल्मी गाना छेड़ने के अंदाज में गाना सुरु किया ,अकेले....अकेले....कहां जा रहे हो ।वहां पर कुछ युवक हंसने लगे । वह महिला चुप चाप चलती रही ,और आगे बढ़ गई ।और एक गारमेंट की फैक्ट्री के अंदर चली गई ।वह अपनी मशीन के पास गई और बैग एक तरफ रख कर अपने काम मे लग गई ।फैक्ट्री में और भी महिलाएं थी ।

उर्मिला नाम था उसका , ये छेडाखानी तो अब रोज का काम हो गया सुन कर अन सुना कर देती है अब वह ,किस किस को  क्या कहें , अकेली औरत को देख कर लोग जहां भी मिले फिकरे कश देते हैं ।अकेली औरत का बाहर निकलना दूभर हो गया है ।उस फैक्टरी के आगे कुछ ज्यादा ही जमघट लगा रहता है ।रोज कुछ न कुछ हल्की आवाज में कोई न कोई अपशब्द कह देता है । रोज मर्रा की तरह उर्मिला अपने काम मे लग गई ।उर्मिला की किस्मत है कि कभी कभी वो मनचले युवक वहां पर नही होते,शायद देर से आते होंगे या फिर उर्मिला जल्दी आ जाती होगी , वह कोशिस जल्दी आने की करती थी ,ताकि उन फिकरे कसने वालों से बच सके मगर हफ़्ते में दो तीन दिन  वो मिल ही जाते थे।उर्मिला अब इस तरह के उत्पीड़न की आदि हो गई थी । एक दिन ठीक उसी समय उर्मिला तेज कदमों से फैक्ट्री की तरफ बढ़ी चली जा रही थी ,उस फैक्ट्री के सामने आते ही उसकी जान सूख जाती थी,पता नही कोई क्या कह दे ।तभी वहां पर बैठे अजीत को बगल में खड़े सुदेश ने कहा "अरे यार अजीत हिसाब किताब आ गया देख" ,अजीत ने देखा तो शायराना अंदाज में  बोला  "जाने वाले आजा तेरी याद सताए " पास में बैठे एक वृद्ध युवक ने कहा 

"अरे बावलों तम रोज इसी हरकतें करो हो ,इस्ते का फायदा , काऊ दिन जाके ढंग से वासे बात क्यों ना कर लेते " तभी दूसरा बोला  "अरे चाचा ठीक कहवे है, जाके वा से बात करणी चहिये  तोये " ।

उर्मिला के कान में ये बातें तीर सी चुभ रही थी ,वह तेज कदमों से चलने लगी,"हराम जादे ,पता नही मुझे क्या समझते है "।वह अपमान का घूंट पीकर रुवांसी सी हो गई थी ।

शाम को वापस घर की तरफ आते उर्मिला को उस फैक्ट्री के पास अजीत को खड़ा पाया । तो वे एक दम चौंक गईं, अब शाम को भी ये लोग बाज नही आएंगे ।शाम को आज तक कोई नही मिलता था सब अपने घर जा चुके होते थे ।वह अनदेखा कर उसके बगल से गुजरकर निकली ।,तब वह बोला "मैडम जी " वह सीधी चलती रही ,वह भी पीछे चलने लगा ",मैंने कहा मैडम जी सुनो तो " अजीत बोला वह कुछ सोच कर रुक गई ,"क्या बात है बोलो " "में ये पूछ रहा था आप कौनसी फैक्ट्री में काम करती है "। उरमिला ने कहा "क्यों वहां पर भी छेड खानी करोगे क्या " अजित बोला "अरे नही ये बात नही वैसे ही पूछ रहा हूँ" ,  "ऐसे ही क्यों "उर्मिला बोली । "वो इसलिए कि आप इतनी मेहनत करती हैं ,रोज सुबह सुबह फैक्ट्री जाती हैं , आपके घर मे और कोई काम करने वाला नही है क्या '। अजित  बोला " हाँ है घर मे , पर इससे तुम्हे क्या मतलब "उर्मिला बोली ।

अजित को बात करने का सूत्र मिल गया था ,बात आगे बढ़ाते वह बोला " देखिए आप बुरा मत मानिए "बुरा नही मांन रही हूं ,अनजान लोगों से इतनी घनिष्टता कौन दिखाता है" वह बोली

अब बात में अजीत को  मजा आने लगा था ।आप कहाँ पर रहती हैं ।वह बोला "हरकेश नजर में रहती हूं ना "उर्मिला  ने बताया । " वहां से थोड़ी दूर नेहरू प्लेस में तो मैं भी रहता हूँ  कभी आइए न " अजीत ने कहा "जरूर आऊंगी " उर्मिला बोली चलते चलते काफी दूर आ गए थे । अजीत को एकाऐक विश्वास नही हुआ,कि एक मुलाकात में उर्मिला ऐसा कह देगी , थोड़ी देर इधर उधर की बाते हुईं ,फिर दोनों अचानक रुक गए । यहां से एक रास्ता नेहरू प्लेस की और जाता था और  एक हरकेश नगर को , तब अजीत बोला "अच्छा अब चलते हैं ,आपसे मिल कर अच्छा लगा कल मिलोगी क्या " दोनो रुक गए ।अजीत इतना सानिध्य पाकर खुश हो रहा था।"ठीक है मिल जाऊँगी ,मेरा घर पास में ही है " उर्मिला बोली ।"अच्छा आएंगे आपके घर कभी "अपने मन के उफनते आवेश को दबाता अजीत  बोला,

"अरे चलिए ना अभी चाय पी कर आ जाना "उर्मिला के स्वर में मुशकुराहट और आग्रह दोनो थे । अजीत का मन बल्लियों उछल गया ,उसकी खुशी का ठिकाना न रहा ।उसे मन की मुराद मिल गई थी "चलो फिर आज आपके हाथ की चाय भी पी लेते हैं" और दोनों चल पड़े ।अजीत ने सोचा शायद अभी इसके घर पर कोई नही रहता होगा, कोई चीज इतनी आसानी से मिल जाती है तब कितनी खुशी होती  है वैसा ही हाल अजीत का था । थोड़ी दूर जाकर हरकेश नगर बस्ती आई। एक पुराने से मकान में पाँच छै कमरे थे । उनमें एक कमरे में दोनों चले गए ।कमरे में जाते ही अजीत ने देखा तो आश्चर्य से भर गया ।एक खाट पर एक बीमार सा व्यक्ति लेटा  था ,पास में एक बूढ़ी महिला बैठी  थी । जिसकी गोद एक दो साल का एक बच्चा खेल रहा था ।आते ही उर्मिला बोली आओ साहब और तब उर्मिला उस बूढीऔरत की तरफ इशारा कर बोली ये मेरी सास हैं ,और ये चारपाई पर लेटे मेरे पति हैं बीमार हैं,बस चारपाई पर पड़े रहते है ।तब उसने बुढ़ी महिला को कहा मा जी ये हमारी फैक्ट्री में सुपरवाईजर हैं ।उरमिला ने झुठ बोल दिया ,यहां हरकेध नजर में इनको कोई काम था तो यहां आ गए ।उसने एक पुरानी सी कुर्सी अजित की तरफ सरका कर कहा आप बैठो में चाय बनाती हूँ ।और कमरे में ही बनी छोटी किचन में जाकर चाय बनाने लगी ।तब तक अजीत बैठा  एक अजीब अन्तर्ध्वन्द  में  फंसा सोच में डूब रहा ।क्या सोचा था उसने और क्या देखने को मिल रहा है । स्टूल आगे कर उर्मिला चाय उसे देते,दूसरे स्टूल पर पर बैठते बोली,"बस साहब यही है अपनी छोटी सी जिंदगी ।ये किराये का कमरा है ,हम चारों लोग यहां रहते है , तीन साल पहले मेरा ब्याह हुआ था ,मेरे पति उसी फैक्टरी मे काम करते थ जहां मैं काम करती हूँ , कुछ दिन हंसी खुसी बीत गए,एक लड़का भी हुआ ,फिर अचानक इनको लकवा मार गया,एक हाथ और एक पैर बिल्कुल सुन्न पड गए हैं ,बहुत इलाज कराया मगर कुछ फायदा नही हुआ ,फैक्ट्री के मालिक ने मुझ पर दया कर काम पर रख लिया ।अब माजी की , बच्चे की और इनकी जिम्मेवारी मेरी है,इनकी दवाई भी चल रही है,फैक्टरी से आकर खाना बनाती हूँ सुबह सबके लिए बनाकर जाती हूँ किसी तरह गुजारा चल रही है बस " । उर्मिला उसका और अपना चाय का कप उठा कर किचन में चली गई ।अजीत सोच में पड़ गया ,वह आत्मग्लानि से भर उठा ,धिक्कार है...धिक्कार...... है तेरे लिए अजीत ,जैसे उसके अंदर से एक आवाज आई , तेरी भी तो एक छोटी बहन है कुसुम ,अगर उसके साथ शादी केबाद ऐसा हो जाए तो ....तब तुझे कैसा  लगेगा ।नही.... नही...उसका जमीर उसे धिक्कारने लगा ,उसकी आत्मा जाग उठी , बेचारी उर्मिला इतनी विवशताओं में जीने को मजबूर है ।फिर भी अपने धर्म का पालन कितनी सादकी से निभा रही है ।और हम ....हम तो कितने तुच्छ है  कितने बौने हैं ,कितने नीच हैं कितने गंदे हैं ।अपने आप को जाने कितनी गालियां दे डाली उसने ,अब उसे उर्मिला की जगह उसकी बहन कुसुम  नजर आने लगी थी,मानो कुसुम उसी फैक्ट्री के रास्ते जा रही हो ,और लोग उसे छेड़ रहे हो  और वह देख रहा हो ।नही.....नही....उसने अपनी आंखों पर हाथ रख दिये और फिर चेहरा हथेलियों में छुपा लिया ।तभी उर्मिला की आवाज आई क्या हुआ साहब ....।वह चौंका , "नही कुछ नही,में चलता हूँ " ,और वह उठने लगा "क्या तबियत ठीक नहीं " ? उर्मिला बोली "नही ऐसी बात नही,मुझे कुछ काम याद आ गया है "अजीत ने जबाब ढिया । वह चलने लगा तो उर्मिला उसके साथ बाहर आई ,मकान के बाहर आकर अचानक अजीत रुका  और उर्मिला की तरफ देख कर बोला ,मुझे माफ़ कर दो उर्मिला जी ,और हाथ जोड़कर बोला " मुझे नही मालूम था कि जिंदगी का एक पहलू ऐसा भी होगा , आप इतनी मुश्किलों में जीवन के मूल्यों को इतनी सहजता से निभा रही हैं,वह प्रशंसा के काबिल है,आप जीवन के प्रति इतना संघर्ष कर रही हैंऔर ये समाज आपको बजाय सराहना करने के प्रताड़ित कर रहा है । हम आपके समक्ष पैर की धूल के समान है ", " फिर रुआंसा होकर बोला हम सब आपकी क्षमा के भी काबिल नही है ,आप मेरी छोटी बहन कुसुम जैसी है ,आज से मैं आपका भाई जैसा हूँ आपको कोई आते जाते कुछ नही कहेगा अब,आप निसंकोच और बेफिक्र हो कर  चलना ,और इस भाई से जो भी मदद बन पड़ेगी ,में अवश्य करूंगा " ।यह कर उसकी आँखों से आंसु पश्चाताप बन कर बहने लगे ,उससे कुछ कहते ना बन पड़ा , उसकी आत्मा ने उसे झकझोर कर रख दिया था । उर्मिला इस बदलाव को देख कर चकित हो गई थी , वह उसे हकीकत दिखाने को यहां लाई थी ,पर इतना परिवर्तन देख कर वह गदगद हो उठी ,और बोली  "भैया आपने इतना समझ  लिया ,मेरे लिए इतना ही बहुत है " , तब अजीत ने अपना एक हाथ उठा कर उर्मिला के सिर पर रखा और वहां से चल पड़ा,उर्मिला भी नम आंखों से बहुत देर तक उसे जाते देखती रही ।उसने देखा अजीत बार बार रुमाल से अपनी आंखें पोंछ रहा था । एक अनजाने अजनबी से  रिश्ते का अहसास इतना सुखद होगा  उसे पता ना था  । कितने भावुक होते हैं ऐसे रिश्ते ,तब वह वापस कमरे की तरफ बढ़ी ,और काम मे लग गई ।

Monday, October 24, 2022

स्पर्श (भाग 2)

 


दीपावली के पश्चात दो तीन दिन तक त्योहारों की खूब धूम धाम रही ,अचानक शुमना की तबियत एक दिन खराब हो गई ।
सूरत सिंह ने  देखा उसे बुखार था ,उसने जीरे का पानी उबाल कर शुमना को दिया , थोड़ा आराम हुआ ,पर रात को फिर दुबारा बुखार चढ़ गया । तब सूरत सिंह ने दुकान से बुखार की गोली मंगवाई ,और शुमना को देकर कहा ,चुप चाप रजाई ओढ़ लो , पसीना आएगा तो बुखार टूट जाएगा ।
कमली भी स्कूल नही जा सकी , जैसे तैसे घर का काम निपटाती रही , और माँ की देखभाल भी करती रही।अगले दिन सुबह बुखार टूट गया , दोपहर के बाद शाम होते होते फिर शुमना का बदन टूटने लगा औऱ फिर  बुखार चढ़ गया ।
सूरत सिंह परेशान हो गया । डॉक्टर यहां से मिलो दूर है ,एक वैध जी हैं वो भी दूसरे गांव में रहते हैं,बुखार की गोलियां असर नही कर रही है ,अब क्या होगा ।तभी अगले दिन सूबह जीतू वहां पहुंचा ।"अरे चाचा क्या हुआ "? जीतू बोला , "अरे तेरी चाची को पिछले चार दिन से बुखार है बार बार उतर कर चढ़ जाता है,समझ नही आता क्या करूँ " । डॉक्टर तक ये जा नही सकेंगी इतनी दूर है । सवांली गांव से शहर पांच मील दूर है ।
"अरे चाचा वो अपना मंगलु है ना,उसके पास है इस बुखार की दवा ,अभी कुछ दिन पहले रुकमा मौसी को भी ऐसा ही हुआ था,तब उसकी दवाई से ही ठीक हुई थी वो ऎसी दवाई बनाता है"। "हाँ यार ये ठीक रहेगा "।सूरत सिंह बोला ।
उसने तुरंत कमली को आवाज दे कर बुलाया और मंगलु के पास जाकर दवाई लाने को कहा । कमली तुरंत गाँव के दूसरे छोर पर रहने वाले मंगलू के घर की तरफ चल पड़ी ।वह सोचती जा रही थी माँ और बाबा तो कहते थे कि इनसे दूरी बनाकर रखनी चाहिए , फिर बाबा ने तो दीवाली में मंगलु के हाथ से बोतल झट से पकड़ ली थी , क्या बोतल से कुछ नही होता  ? ऐसा कैसे होता है ? क्या नही छूना और क्या छूना है वह असमंजस में पड़ गई उसका  मन भ्रांतियों के जाल में उलझ कर राह गया ,उसने देखा सामने मंगलु दास का घर है । उसने बाहर से कुंडी खटखटाई ,बाहर आने पर उसने मंगलू दास को सारी बात बताई ,मंगलु दास उसे वहीं पर रुकने को कह कर अंदर चला गया ।और थोड़ी देर में वापस आया ।उसके हाथ मे एक छोटी सीसी थी ," ले बेटी लेजा ये ही बची है,और फिर एक दो दिन में बनाऊंगा , जंगल से बूटी लानी होगी " मंगलु दास ने सीसी कमली के हाथ मे देने को हाथ बढ़ाया ,कमली सोचमे पड गई उसे झट मां की बात याद आई,इनसे दूरी बनाकर रखो ,कमली न अपना हाथ वापस खींच लिया । मगर फिर बाबा का वह दारू की बोतल लेकर कमीज के अंदर खोंस लेने वाला दृश्य ध्यान में आया ," लो बेटी " मंगलू ने कहा,उसने फिर हाथ आगे बढ़ाया । कमली के मन मे एक ध्वंद पैदा हो गया,वह असमंजस की स्तिथि में थी,उसने हाथ आगे बढ़ाया ,सीसी को पकड़ा ही था कि  मन से आवाज आई ,"नही कमली नही ये सीसी अछूत हो जाएगी " "अरे कमली लेले सीसी तेरी मां की तबियत ठीक हो जाएगी ,"  "नही कमली नही ,हम लोग श्रवण हैं ,ये परंपरा  हमारे पुरखों से चल रही है," कमली एक अजीब से अन्तर्ध्वन्ध में फंस गई थी ,वह झल्ला उठी और उसने अपना हाथ वापस खिंच लिया ,मंगलु कमली के हाथ मे सीसी थमा चुका था ,फिर वही हुआ कामकी के हाथ से सीसी छूट कर नीचे गिर पड़ी  और सीसी टुट गई और सारी दावा बिखर गई ।"अरे कमली......ये क्या किया ओह अब क्या होगा नई दवा बनाने में तो दो दिन लग जाएंगे " ।
कमली भी हतप्रभ हो गई ,वह रुवांसी हो गई ।अचानक उसका ध्यान उसकी मां पर गया ।वह झट उल्टे पैरों घर की तरफ भागी ।दौड़ कर वह घर पहुंची,सब उसका इंतजार कर रहे थे वह बाबा से लिपट कर रोने लगी ",बाबा....बाबा...सीसी टूट गई'।
"कैसे ".....सूरत सिंह ने पूछा ,बाबा आपने ही तो कहा था ये लोग छोटी जात के हैं जिनसे दूरी बना कर रखनी चाहिए ,और और.....।वह जोर जोर से रोने लगी "।सूरत सिंह  सारा माजरा समझ गया। । "अच्छा चल चुप होजा" ,उसने कमली को चुप कराया ,तब सूरत सिंह ने जीतू को मंधार गांव वैध को बुलाने भेजा, शाम हो गई पेर जीतू लौट कर नही आया, शुमना की तबियत और बिगड़ने लगी ।
जीतू अब तक क्यों नही लौटा सूरत सिंह बहुत परेशान हो गया ,तभी एक दूसरे गाँव का व्यक्ति वहाँ आया और बोला ,"सूरत सिंह आप हैं क्या" ?" हाँ में ही  हूँ  क्या बात है" उस व्यक्ति ने कहा कि मैं  मंधार गांव का सेवा दास हूँ, और मुझे जीतू जी ने भेजा है और कहा है कि वैध जी दूसरे गांव गए है सुबह आएंगे मैं सुबह उन्हें लेकर ही आऊंगा ।ओह....सूरत  सिंह के मुह से निक्ला । फिर सूरत सिंहअवाक रह गया,जब कमरे से आती एक पड़ोस  की औरत ने बाहर आकर बताया कि शुमना अब नही रही । उसकी मृत्यु हो चुकी है ,सूरत सिंह के ऊपर मानो वज्रपात हो गया ।उसके हाथ पैर  एक बार को जैसे ठंडे पैड गए । वह उठ कर शुमना के पास गया ,और निर्जीव शुमना का हाथ अपने हाथ मे ले कर फफक फफक कर बच्चों की तरह रो पड़ा ,वह शुमना को जीजान से चाहता था , कमली भी पास में ही शुमना के पैरों की तरफ बैठ कर सुबकने लगी ।तब आस पास के लोग जमा हो गए ।सबने उनको चुप कराया और अंतिम संस्कार की तैयारी करने लगे ।
सूरत सिंह क्रिया कर्म पर  एक तरफ खामोश बैठा है,कमली उसके बगल में उदास बैठी है ।अडोस पड़ोस के दो तीन लोग और बैठे है ,सब शुमना की मौत पर दुख प्रकट कर उसे सांत्वना दे रहे हैं । तभी कमली रुवांसी होकर बाबा का हाथ पकड़ कर बोली
"बाबा ये सब मेरे कारण हुआ है ",और रोने लगी ।सूरत सिंह बोला "ना बेटी इसमें तुम्हारा कोई दोष नही है ,असल मे दोषी तो मैं हूँ, और मैं ही क्यों हम सब दोषी हैं, हम सब लोग झूटी और सडी गली पुरानी परम्पराओं को बे वजह आज भी मान्यता दे रहे है , मनुष्य ने अपनी सुगमता के लिए खुद मनुष्य को ही अलग अलग टुकड़ों में बांट दिया है, में तुम्हे अगर ये सब नही बताता तो तुम् ये सब नही करती,इस जात पांत की और ऊंच नीच की ब्यवस्था ने मुझसे मेरी शुमना को छीन लिया है,इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकाई है मैंने ,ना जाने हम लोगों के इस भेद भाव के कारण हमारे समाज मे कितनी क्षति होती है और हमे पता भी नही चलता , ।इस देश के पिछड़े पन का यह भी  एक कारण है" । सब लाग चूपचाप सूरत सिंह की बातों को सुन रहे थे ।
उसे अपने अंदर एक नई चेतना का संचार होता महसूस हुआ ।अस्पर्शता समाज के प्रति कितना बड़ा अपराध है वह समझ चुका था , उसका अंतर्मन जाग चुका था । कमली भी बाबा के चेहरे पर ये बदलाव देख कर  अचंभित थी ।सूरत सिंह ने तब  समाज मे छुआ छूत की बंदिशों को तोड़ने का  एक नया अभियान  चलाया ।शुमना को श्रद्धांजलि स्वरूप
यह एक नया आयाम था ।
                            समाप्त ।
                    भगवान सिंह रावत (स्वरचित)

स्पर्श (भाग 1)

 




सभी रचनाकारों को और पाठक बंधुओं को  मेरा प्रणाम !
मेरी इस रचना को पढ़ने से पहले आपको आज से   लगभग पचास साल पीछे जाना होगा ।उस समय का व्यक्ति किस धारणा में जीता होगा , उस समय संचार ,परिवहन,उच्चस्तरीय शिक्षा,के माध्यमों का बहुत आभाव था, साथ ही समाज मे पुरानी परम्पराओं की पकड़ थी । आज स्थिति काफी बदल चुकी है। हमने पीछे क्या छोड़ा है,नई पीढ़ियाँ के इस पूरानी परम्पराओं के प्रति नए विचार क्या हैं  पौरणिक परंपराएं और नए विचार जब किसी मोड पर टकराते हैं तो क्या स्थिति उत्पन्न होती है , इस कहानी में इसी तरह का चित्रण  है ।

सूरत सिंह ने , देखा दोपहर होने को थी ।उसने जल्दी जल्दी बैलों को हांकना  चाहा, मगर खेत अभी बाकी था।धूप भी शिर पर चढ आई थी । किसी तरह उसने पूरा खेत जोत डाला।
और हल और जुआ (हल चलाते समय बेलो के कंधे पर रखा जाता है) कन्धे पर उठा, बैलों को घर की तरफ हड़का कर खेत से चल पड़ा ।
"कमला की माँ ' अरे जरा बैलों को बांध"और हल जुआ एक तरफ पटक कर चारपाई पर बैठ सुस्ताने लगा । " पूरा खेत कर आये " बेलों को पानी पिलाते  हुए  सुमना बोली। 'हाँ हो गया' पूरा दिन खत्म हो जाता है इस खेत पर "।
"अरे कमला अभी तक नही आई स्कूल से"खाना खाते हुए सूरत सिंह बोला ।"आ जायेगी ...चार बजे तक आती है ना" शुमना लोटे में पानी र्देते बोली ।
सुबह सात बजे जब सूरत  बैलो का न्यार पानी दे रहा था, तो उसे ढोल नगाड़े की आवाज आई,तो सूरत रसोई में काम करती शुमना से बोला "अरे शुमना  आज क्या है भई, गाँव मे,ढोल की आवाज आ रही है" पाइप  से चूल्हा फूंकती शुमना बोली " आज  संग्रान्द (संक्रांति) है ना इस लिए" । "लो इनको भी  जब देखो मांगने का मौका मिल जाता है ।इन औजियों की भी मौज है"  ( औजी -गांव में जो लोग छोटी जात के होते है,वह लोग ढोल बजाना,बॉल काटना ,कपड़े सिलना, और छोटे मोटे और भी कई तरह के काम करते हैं,जिसके बदले उन्हें समय समय पर ठाकुरों के घरों से अनाज और खाना पीना मिल जाता है) "अरे कमली को उठाओ स्कूल नही जाना क्या उसे"
"बाबा में कबसे उठी हूं आज छुट्टी है ,आज नही जाना स्कूल"
नौ साल की कमली चौक में उछलती बोली ।"अच्छा चलो  ये ठीक है,खेत चलोगी मेरे साथ " ? सूरत बोला
"हाँ बाबा चलूंगी"खुश होती कमली बोली ।
तभी ढोल की आवाज नजदीक सुनाई पड़ी ,और उनके चौक पर एक ढोल वाला,एक नागाड़े वाला और एक  औरत जिसके सिर पर एक टोकरा रखा था, जिसमे माँगा हुआ कुछ अनाज था । उनमे एक मंगलू दास ढोल की आवाज कम करता हाथ जोड़ कर प्रणाम करते बोला "जय हो ठाकुर महाराज की" सूरत बोला "कैसा है रे मंगलू " ?
" ठीक हूँ साब कृपा है आप लोगों की "
तभी शुमना एक सूप में भरकर  अनाज ले कर आई और उनके साथ वाली औरत को इशारा करती बोली "ये ले, टोकरी पहले नीचे रख "और उससे  एक निश्चित दूरी   बनाते हुए उसकी टोकरी में अनाज उंडेल दीया । उस औरत ने  आभार  प्रकट किया ।और वो दूसरे घरों की तरफ चलने लगे ।   कमली  ये सब देख रही थी । फिर कुछ देर बाद सूरत सिंह बैलों को हड़काता खेत पर चल पड़ा ।साथमे कमली भी थी । सूरत सिंह कुछ देर हल चला कर सुस्ताने बैठा,और बीड़ी पीने लगा । तब कमली बोली "बाबा जी  ये जो औजी हैं, ये लोग कौन होते हैं,"  "कयूं क्या हुआ सूरत ने पूछा " । "मैंने देखा है लोग उनसे दूर रहते है,मां जी ने भी उनकी कितनी दूर से अनाज ढिया ","उनको छूने से क्या होता है "। "हमारे स्कूल में भी दो औजियों के बच्चे पढ़ने जाते हैं उनसे भी सब दूर हटकर  चलते है" ,कमली अपने सरल स्वभाव से बोली ।
तब सूरत थोड़ा कड़क स्वभाव से बोला "हां बेटा हम लोग श्रवण है ,और वे लोग छोटी जात के हैं हम लोगों को उनसे दूरी बनाकर रखनी पड़ती है,वो हमारे किसी भी बर्तन या किसी चीज को छू ले तो वो चीज अछूत हो जाती है,उसे फर धो कर साफ करना पड़ता है ,और वो हमारे घर में दहलीज से बाहर ही रहते है "। "ऐसा क्यों है बाबा"
"अरे बस है तो है ,पहले से ये सब चलता आ रहा है हमारे बाप दादा ये करते आये है तुम अभी बच्चे हो ,कुछ जानते नही हो , तू बहस बहुत करती है "। कमली के कोमल स्वभाव को सूरत ने   क्रूरता के  आवरण से ढक दिया,कमली सहम कर चुप हो गई ।और कूछ न बोली ।
"बेटा कमली देख तो ये क्या है " ? क्या हैं मां ?शुमना के हाथ मे नई फ्रॉक देख कर कमली खुश होते बोली"ये कब लाये बाबा ....बाजार तो गए नही कितने दिन से " ?
"अरे ये बाजार से नही लाये ,मंगलू औजी है ना उसने सिली है,पहन तो जरा " । कमली ने आसमानी रंग की फ्राक पहनी, उसे बहुत पसंद आई । तभी कमली भ्रांतिचित हो कर बोली," माजी बाबा तो कह रहे थे कि इनसे दूरी रखनी पड़ती है,ये हमारी चीज को हाथ नही लगाते ।चीज अछूत हो जाती है ,फिर ये......।
"अरे वो सब ठीक है ये तो कपड़ा है ,इसमें ऐसा नही होता। ले इसे पहन कर जा स्कूल । औऱ हाँ तू बहस बहुत करती है,तुझे जैसे  बोलें वैसा करा कर " शुमना बोली । बाबा और माँ  से औजियों के लिए एक सी प्रतिक्रिया  देख असमंजस सी हो कर कमली फ्रॉक पहन स्कूल चली गई ।
गाँव मे दीवाली की चहल पहल, आते जाते दिखते लोग,दुकान पर लोगों की भीड़  बता रही थी कि लोग आज कितने प्रसन्न हैं । "चलो बाबा  बहुत देर हो गई । दुकान में पटाखे नही बचेंगे बाद में "। " अरे चलो गुड़िया रानी चलो " सूरत बोला ।औऱ दोनो घर से निकल पड़े । दुकान पर भीड़ काफी थी , सूरत बाहर बेंच पर बैठ गया । एक और आदमी जीतू वहां पहले ही बैठा था ,"और जीतू कैसा है रे तू" ? सूरत बोला  "बस चाचा सब ठीक है ' ।
जीतू ने उत्तर दिया ।"दीवाली कैसे मन रहे हो अबकी बार"सूरत बोला "बस चाचा  एक रिश्तेदार आया है घर पर शाम को बैठेंगे,दीवाली मानेगी"जीतू बोला "बहुत खूबअरे मिल तो जाएगी पीने कोआज यहां" सूरत ने आहिस्ते से कहा ।"अरे चाचा मिलेगी क्यों नही ,मंगलू जिंदाबाद"जीतू बोला । "अच्छा अब मंगलू भी कच्ची तोड़ने लगा है"सूरत बोला ।
"हाँ काफी दिन हो गए "।"ये रहा उसका छोरा बुला लूँ मंगलू को '
"हाँ बुला यार आज तो चाहिए ही"
एक  गंदी सी कमीज पहने एक लड़का पंद्रह साल का कुछ बच्चों में खेल रहा था । "अरे कालू ओ कालू इधर आ " ।
"जा जरा अपने बाप को बुला कर ले आ ,कहना सुरतु चाचा ने बुलाया है ' । कालू सरपट भागता  चला गया । थोड़ी देर बाद मंगलू आया "जय हो ठाकुरों और हाथ जोड़ कर बोला "महाराज  हुकम ' तब सुरतु बोला "अरे हुकम क्या एक बोतल चाहिए ,जुगाड़ कर"
"👌साब मिल तो जाएगी  पर नगद होगी ,त्योहार का दिन है ना "
"हाँ ठीक है  मिल जाएगी" ,मंगलू बोला । "ये ले " सुरतु ने बगल के खीसे से एक नोट लिकाल कर मंगलू को थमाया । मंगलू रुपये को माथे से लगा बोला ।
"थोड़ी देर रुको ठाकुरो लाता हूँ "। कमली  एक ओर बैठी चुप चाप सब देख रही थी  बाबा क्या।मंगा रहे हैं उस औजी से,औऱ बाबा ने ये क्या किया ,मंगलु को हात में रुपया पकड़ाया । उसके मन मे फिर अन्तर्ध्वन्ध चलने लगा ,तभी वहां से उसका ध्यान हटा , वह जमीन पर कंचे खेलते बच्चों को देखने में मस्त हो गई । तभी उसे बाबा की आवाज आई "कमली आजा ले ले अपनी पसंद के पटाखे "।कमली ने कुछ फुलझड़ियां कुछ चकरियाँ और कुछ पटाखे खरीदे,,सुरतु ने कुछ और घर का सामान खरीदा ,दुकान से बाहर आये तो सामने मंगलु खड़ा था सुरतु ने इधर उधर देखा और झट मंगलु के हाथ से कागज में लिपटी बोतल लेकर कुरते के अंदर कर पाजामे में खोंस दी ।और बोला " कमली चल बेटा चल घर चल बहुत देर हो गई " ।
कमली देख चुकी थी ।ये क्या हो सकता है ।जो बाबा ने कमीज में छिपाया है , घर पहुंचकर कमली ने चुपके से देखा बाबा ने दूसरे कमरे में जाकर वह सामान निकाला ,और कागज हटाया ,फिर उसे गौर से देखा और प्रसन्नचित होकर अलमारी में रख दी । ओह..... तो ये दारू की बोतल है , कमली समझ गई थी । कमली सोच में पड़ गई , उसका मन फिर ऊहापोह के जंजाल में फंस गया । ये क्या माँ तो इनसे दूर रहने को कहती है , और बाबा बोतल हाथ से ले रहे हैं । कमली असमंजस में पड़ गई । वह कुछ निर्णय नही ले सकी ।और इधर उधर के काम मे व्यस्त हो गई ।
शाम को छः बजे चुके हैं दीवाली की तैयारियां जोरों पर थी,रह रह कर पटाखों की आवाज सुनाई पड़ रही थी । सुमना पकवान बना चुकी तो उसने कमली को आवाज दी ।
"कमली.... ओ कमली .....। इधर आ बेटा बाबा को ये पकवान दे आ ,पूजा कर लेंगे और लक्ष्मी माता को भोग लगाएंगे  "। कमली ने प्लेट में पकवान बाबा को दिए ।और दोनों घरमे बने मँदिर में  पूजा करने बैठे,कुछ देर बाद शुमना भी आ गई ।तीनो ने पूजा समाप्त की और गांव में अखाड़े की दीवाली देखने की तैयारी में लग गए ।कमली तैयार हो चुकी तो वह बाबा के कमरे मे बाबा को बुलाने गई ।तब उसने देखा बाबा बोतल से गिलास में भट कर दारू के घूंट लगा रहे थे ," चलो बाबा अखाड़े में ,सब लोग आ गए होंगे,ढोल की आवाज सुनाई पड़ रही है "।
"हां हां चलते है अभी ,बस थोड़ी देर में "सूरत बोला
सूरत ने गिलास में से आखिरी घूंट भरा और उठ खड़ा हुआ ।
सवांली गांव में आज धुम मची थी । दो सौ परीवारों का ये गांव अपनी सांस्कृतिक त्योहारों को ,अपनी पौराणिक धरोहर को  भली भांति  जीवित  रखने के लिए  मशहूर था ।
गांव की दीवाली सब लोग अपने पटाखे ले कर अखाड़े में पहुंचे हुए है ।एक जगह पर आग का कुंड बना है ।जिसमे आग जल रही है "ढोल और नगारा बजने लगे है "लोग अपने भैलु (पहाड़ में भैलु का मतलब होता है कुछ लकड़ियों को छोटा गठर बना कर फिर उसे सांकल से बंधा जाता है और  आग से जला कर फिर घूमाया जाता है )   जलाने लगे थे ,और फिर एक साथ दस पंद्रह भैलु घूमते हुए नजर आते है ।अंधेरे में दूर से बड़ा मन मोहक दृश्य लगता है ।पटाखों की आवाज भी साथ साथ आती है,लग भाग एक घंटे तक ये सब चलता है । फिर सुरु होता है गीतों का और पारंपरिक  नृत्यों का दौर ,झुमैलो ,चाँचरी नृत्य ,गांव की स्त्रियां एक दूसरे के कंधे में हाथ डाल कर गीत गाती हुई गोल गोल घूमती है,ओर एक ताल पर  पैरों को गति देती है । इधर दूसरी तरफ पुरुषों की टोली भी पारंपरिक गीत गाती है ,बड़ा  मनमोहक दृश्य होता है । लग भाग दो घंटे तक ये सब चलता है  । कमली  भी अपनी सहेलियों से मिल  कर बहुत प्रसन्न होती है ।
और फिर लग भाग मध्य रात्रि तक लोग वापस घर आते हैं ।
शेष अगले भाग में......।  स्पर्श  भाग 2

Monday, October 17, 2022

मैं अपना फर्ज निभाउंगा

 


                                                                                
अपना फर्ज निभाउंगा

तुम राज करो इन महलों में मैं गलियारों में जाऊंगा,
तुम्हे लालसा बैभव की मै अपना फर्ज निभाउंगा ।
शर्तों से लिपटी प्रीत से जो मैंने अनुराग बढ़ाया,
प्रेम का कुछ अहसास नहीं बस एकाकीपन पाया ।
प्रेम के पावन उत्सव में भी थी तृष्णा की छाया ,
मधुर प्रेम की कटुता को मैं कभी भूल ना पाऊंगा ।
तुम्हे लालसा बैभव की  मैं अपना फर्ज निभाउंगा ।
रंग महल में रमे रहो मखमल को गले लगाओगे ,
दास दासियों के घेरे में अपना हुक्म चलाओगे ,
दर्पण के सम्मुख जाकर तुम बार बार इतराओगे ,
मेरा क्या मैं तो सुख दुख में सबका हाथ बटाउँगा ।
तुम्हे लालसा बैभव की मै अपना फर्ज निभाउंगा ।
वक्त है कम, काम बहुत है इन उजड़े गलियारों में ,
सत्य अकेला खड़ा धरा पर झूठ है पहरेदारों में ,
दुष्ट आज भी घुड़सवार है नेक चले अंगारों में ।
मानवता के घायल पग पर मैं तो महरम लगाऊंगा ।
तुम्हे लालसा  बैभव की में  अपना फर्ज  निभाउंगा ।

चकाचौंध की उस दुनिया मे इठलाना , इतराना ,
स्वर्ण रजत और मोती माणिक इन पर प्यार लुटाना ,
जब जब चीखेंगे गलियारे तुम हर्षोल्लास मानाना ,
मानवता की सेवा मे मैं तो सारी उम्र बिताऊंगा ।
तुम्हे लालसा बैभव की मैं अपना फ़र्ज़ निभाउंगा ।
तुम राज करो इन महलों में मै गलियारों में जाऊँगा ,
तुम्हे लालस बैभव की में अपना फर्ज निभाउंगा ।
                   भगवान सिंह रावत (स्वरचित)


Sunday, October 9, 2022

वापसी

 दिवान सिंह गाड़ी को लॉक कर चाबी चौकीदार को थमा कर वापस अपने घर की तरफ चल पड़ा ।आज वह थका थका सा महसूस कर रहा था ।सुबह आठ बजे से शाम के नौ  बज चुके थे ।सारा दिन इधर उधर गाड़ी दौड़ाते वह टूट सा गया था । क्वाटर पर पहुंच कर वह चारपाई पर पसर गया । 

उसकी पत्नी  मीना किचेन में थी,खाना बनाना छोड़ पत्नी का गिलास लेकर पहुँची और लेटे हुए  दिवान सिंह को ढिया और वापस खाना बनाने में लग गई । जमीन पर आठ साल का उसका बेटा विनोद किताब लेकर पढ़ाई कर रहा था । पानी पी कर दिवान सिंह  ने गिलास स्टूल पर रक्खा औऱ सोचते सोचते  अतीत में खो गया ।

 सीधा सादा दीवान सिंह  अपने पहाड़ में गांव की पुरखों की जमीन पर खेती करता था । ठीक ही चल रही थी गाड़ी ,अगर  गुलाब सिंह उसे ना बरगलाता , गुलाब सिंह उसका दूर का सम्बन्धी था । वह खुद दिल्ली में पिछले सात आठ साल से रह रहा था । हप्ते भर की छुट्टी में गाँव आकर बडी शान से रहता था,और खुले दिल से खर्च करता था । एक दिन गुलाब सिंह उसके पास बैठा बोला ,"चल यार तुझे घूम लाऊं दिल्ली , शहर में देखने को अच्छी अच्छी चीजें हैं , पालिका बाजार, लाल किला, चिड़िया घर ,बिरला मंदिर सुर भी बहुत कुछ है " तब दीवान सिंह बोला  " भाई जी ,वो तो ठीक हैं  , पर इतने दिन कौन रहेगा और  कहाँ रहेगा वहां ये सब देखने को "

"अरे मैं हूँ ना मेरे यहाँ रहना ,अरे मैं तो कहता हूं  मैं तुझे ड्राइविंग सिखा दूंगा ,फिरआराम से नौकरी करना और क्या " गुलाब सिंह ने आश्वासन दिया ।

दो तीन बार इसी तरह गुलाब सिंह ने उसे शब्ज बाग दिखाए तो दिवान सिंह के मन मे लालसा जाग उठी,पहाड़ी रोजमर्रा के जीवन के प्रति वह उदासीन हो चला था । गांव के और भी लोग शहरों में रहते है , उनके ठाट बाट देख कर उसका मन भ्रमित  हो चला था ।

दिवान  सिंह  आखिरकार शहर जाने को तैयार हो गया ,वह दसवीं पास था बस , काम उसे कुछ आता नही था । 

अपने उज्वल भविष्य के सपने बुनता , ऊंचे ख्वाब देखता दिवान सिंह आखिर दिल्ली आ ही गया । गुलाब सिंह के घर पर दो तीन दिन रह कर  वह गुलाब सिंह के कहने पर जिस जगह गुलाब सिंह बुलाता वह उसे गाड़ी चलाने की ट्रेनिंग देता , जब भी गुलाब की गाड़ी खाली होती ,वह दिवान को बुलाता और गाड़ी सिखाता ।

इस तरह दो महीने में दिवान ट्रैंड हो गया ,वह गाड़ी चलाना सीख गया ,।गुलाब सिंह ने लाइसेंस भी बनवा दिया ।

अब दिवान सिंह ड्राइवर बन चुका था ,और गाड़ी चलाने में निपुण हो गया था । पहले एक दो जगह कम वेतन पर काम करके उसने फिर एक अच्छे बड़े सेठ के घरपर नौकरी पकड़ी,वहां उसकी सेलरी ज्यादा नही तो कम भी नही थी ।पंद्रह हजार महीना । दीवान सिंह खुश हो गया ,इन दो तीन महीने वह घर बार सब भूल गया , ना ही उसे बच्चों का ध्यान आया , वह तो बस ड्राइवर बनकर ही दम लेना चाहता था ।

उसने एक अलग क़वाटर किराये पर लिया और वहां रहने लगा और झट गांव जाकर अपने बच्चों को साथ ले आया ।  उसे काम करते करते एक साल से ज्यादा हो गया था । सप्ताह में एक की की छुट्टी ,पंद्रह हजार सेलरी ,कभी कभी सौ दो सौ गिफ्ट भी मिल जाते थे । सुबह से शाम तक वह गाड़ी दौड़ाता फिरता था,पहले  रॉय साहब को  फैक्ट्री छोड़ो फिर मिसेज रॉय को क्लब,और फिर सरोज बिटिया को  टेनिस ग्राउंड, और फिर सबको वापस घर छोड़ो,बारी बारी से , सबसे देर मे राय साहब फैक्ट्री से आते थे , आते आते कभी कभी आठ  भी बज जाते थे ।उन्हें कोठी पर छोड़ दिवान सिंह नौ बजे घर पहुंचता था । गांव गलियारे की उसे कुछ खबर नही थी । क्या चल रहा है क्या नही ।

यहाँ पर दिवान सिंह की सैलरी तो गुजारे लायक ठीक थी  मगर बचत कुछ नही थी । ऊपर से उसे फुरसत बिल्कुल नही थी , सारा समय उसका डयूटी में ही चला जाता था । शहर में आकर अब खर्चों में बढ़ोतरी होने लगी थी ।चार हजार मकान का किराया बच्चे की फीस  और फिर कपड़े लत्ते ,लोक दिखावा,अच्छा दिखना अच्छा खाना , यह एक शौक बन गया था शहर में आकर ।फिर  उसने देखा पैसे के लिए लोग कितना झूठ बोलते है ,छोटे से छोटा आदमी ,और बड़े से बड़ा बिजनेस मैन । हर आदमी सामने  वाले को लूटना चाहता है । दिवान सिंह भी उसी राह चल पड़ा ।जैसा देश वैसा भेष , उसकी अंतरात्मा मर चुकी थी ।  अब वह अर्जित करने में व्यस्त हो गया । इस कारण वह चिंतित रहने लगा और कमजोर भी हो गया । किसी ने उसे बताया कि शाम को एक दो पेग लेलो सारी थकान मिट जाएगी ।दीवान सिंह ने वैसा ही किया ।वह शाम को रोज दो पेग मारता और सो जाता ।सुबह तैयार होकर ड्यूटी पर जाता दिन भर गाड़ी चलाता ,और थका मांदा घर आकर शराब पीता और सो जाता ।अब उसकी जिंदगी का यही नियम बन गया था । कभी कभी वह इस जिंदगी से खिंन्न होजाता था,ऊब जाता था मगर फिर अपने आप को एडजेस्ट कर लेता था । मगर आज जो उसके साथ हुआ उससे वह बेचैन हो गया , वह मिसेज राय को किटी पार्टी पर छोड़ कर बाहर गाड़ी में बैठा था उसे दो घंटे हो चुके थे ,तभी राय साहब का कॉल आया , उन्हें आज गाड़ी जल्दी चाहिए थी । मिसेस राय पार्टी में है दिवान बोला ,उनको खबर दो कि मुझे गाड़ी चाहिए  कही जाना  है ।दिवान ने चैकीदार से खबर भिजवाई मगर मिसेज राय नही आई ।फिर राय साहब का फोन आया इस बार उनकी आवाज में कठोरता थी , दिवान सिंह ने फिर संदेसा भिजवाया । थोड़ी देर बाद दान दनाती मिसेज राय बाहर आई और बोली दिवान सिंह क्या मुसीबत है तुम्हे ? "मैडम जी साहब तीन बार फोन कर चुके है ।उन्हें गाड़ी जल्दी चाहिए " ठीक है उनसे कहो आती हूँ और बड़बड़ाती हुई अंदर चली गई । फिर आधे घंटे बाद आई । राय साहब का फोन फिर आया वह गुस्से में बोले दीवान सिंह तुमने  सुना नही मेम साहब को घेर छोड़ कर जल्दी आओ ।जी आया बस । दिवान सिंह दोनो तरफ से डांट खा रहा था । मैडम गाड़ी में भी बड़बड़ाती रही ,दिवान कुछ ना बोला , उसे अभी वापस भी जाना है साहब को लेने,पता नहीं देर से जाने पर वो क्या कहेंगे । वहीं हुआ आते ही राय सहाब उस पर  बरस पड़े ,दिवान सिंह इतनी देर क्यों लगाई  ? साहब जी वो मेडम जी.......। मैडम  मैडम क्या मैने कहा था न मूझे जल्दी गाड़ी चाहिए । फिर ,? बेचारे गुप्ता जी को टेक्सी कर आना पड़ा  । हद्द हो गई वह गुस्से ।में तमतमाते बोले ।

" अब चलो मुझे घर छोड़ कर गुप्ता जी भी ले जाना , बादमे छुट्टी करना ,आइए गुप्ता जी " औऱ दो दोनो गाड़ी में बैठ गए ।दिवान सिंह  गाड़ी लेकर चल पड़ा , इतना अपमान उसने आज तक नही सहा था ।अंदर ही अंदर वह झुलस रहा था  , मगर क्या करता ,वह नौकर जो था । वह कुछ कह न सका । राय साहब को घर छोड़ वह गुप्ता जी को उनके घर छोड़कर वापस आया और गाड़ी पार्क कर चाबी चौकी दार को देकर घर की तरफ चल पड़ा । औऱ खाट पर पसर गया ।आज घर आते उसे नौ बजे गए ।अछा होता वह गांव से न आता ,इतनी बेइज्जती उसने कभी महसूस नही की थी । सारी घटनाये उसके मष्तिस्क में घूम गई । इतना क्या सोच रहे , इतनी देर से देख राही हूँ , गुमशुन बैठे हो क्या हुआ । मीना की आवाज ने उसे चौंका ढिया ।

" ओह...। कुछ नही बस यूं ही ,अरे क्या टाइम हो गया है "साढ़े नौ बजे गए है खाना दे दूं " अभी भूख नही है मीना ,जरा बैठो तो ,उसने कुर्सी की तरफ इशारा किया । तब दिवान सिंह बोला

" मीना बस अब बहुत हो चुका ,मैंने फैसला कर लिया है अब हम अपने गांव चले जायेंगे ,ये शहर मेरे जैसे आदमियों के लिए नही बना है, यहां हर कदम पर झूठ आगे आकर कदम रोक देता है, औऱ सच छटपटा कर रह जाता है ,  मक्कारी अपना काम निकल लेती है और ईमानदारी मन मशोस कर रह जाती है , फरेब बाजार में खुले आम बिकता है , और इंसानियत  ढूंढने पर भी नही मिलती , चेहरों पर मुखौटों का रिवाज चल पड़ा है हर कोई दिखावे  के रथ पर सवार है , समय ने यहां अपने आप को सिकोड़ लिया है "। " मीना " उसने पत्नी का हाथ पकड़ कर कहा, " मेरे पास तुम लोगों के लिए भी समय नही है , यहाँ धनवान  धृष्टता को अपनी हकूमत समझता है,और गरीब बेबसी को अपनी किस्मत ,मैं इस छोटे से किराये के घर को अपनी किस्मत नही बनाना चाहता , में अपनी शर्तों पर जीना चाहता हूं " , " हम अपने गाँव चले जायेंगे , वहां मैं अपनी थोड़ी सी खेती पर मेहनत करूंगा , और चैन से जीऊंगा   ।हम लोगों ने  रोटी पाने की दौड़ में धरती को पूजना छोड़ दिया है " मीना  अपने पति के इस बदलाव को देखकर दंग रह गई ,वह आश्चर्यचकित थी और प्रसन्न भी , दिवान सिंह के विचारों का समर्थन करती वह बोली , " ठीक कहते हैं आप अपने पुरखों की जमीन पर हम खूब मेहनत करेंगे ,और वहीं अपने सपनों को साकार करेंगे , में तुम्हारा साथ दूंगी "  दिवान सिंहने मीना का हाथ चूम लिया । मुझे तुम से ये ही आशा थी ।

दिवान सिंह सपरिवार गाँव आ गया ,अब उसे नए शिरे से जीना था । वह सुबह उठा हाथ मुह धो कर चौक में आया ,चारों तरफ हरियाली थी ,सामने पहाड़ पर हल्की धूप खिल गईं थी,नीचे गंगा मैया का नीला जल बह रहा था ,पँछीअपने स्वर में अलग अलग  तरह से चहक रहे थे ,ये सब देख कर दिवान सिंह  का मन खुशी से प्रफुल्लित हो उठा ।इतने लंबे समय बाद ऐसा विहंगम दृश्य  देखने को मिला था उसे , इस तरह का अहसास उसे पहले कभी नही हुआ था ,एक झूटी दिखावे की खुशी की कितनी बड़ी कीमत चुका रहा था वह ,उसे अपने ऊपर क्रोधः  आ रहा था ,पश्चाताप  में उसके आँसू टपक पड़े थे , ठीक वैसे ही जैसे कोई मां से बिछड़ कर वापस लौट कर मां से लिपट कर रोता है । मगर सुबह का भूल शाम को घर आ चुका था मगर अब वह अपनी जन्म भूमि पर लौट आया था ,धरती माँ के पुत्र की वापसी हो चुकी थी , बेबसी भरी जिंदगी की आग में सोना तप कर कुंदन बन चुका था ।   उसे अपने  अंदर एक नई ऊर्जा के सँचार का अहसास हुआ ,और अगले दिन से वह अपने पुरखों की जमीन पर मेहनत करने में जुट गया ।

                  भगवान सिंह रावत (स्वरचित)

 


Wednesday, October 5, 2022

सच के उजाले

 सच के उजाले 


झूठ का अंधकार फैला है सच के उजाले कहाँ गए

बड़े ख्वाब और झूठे स्वप्न दिखाने वाले कहां गए।

रंग महल के लोग वही हैँ कुर्सी का भी वही मिजाज

नेकी घुटने टेक टेक करआज भी करती है फरियाद

बड़े बडे आकाओं  का  भी पहले जैसा ही रिवाज ।

गलियारों को राजभवन पंहुचाने वाले कहां गए ।

झूठ का अंधकार ........।

मेरे सीधे सादे गांव को शहरों ने लूटा है ,

जो रक्षक थे अस्मत के उन पहरों ने लूटा है ,

सच से फेर लिया मुह उन अंधे बहरों ने लूटा है ।

 करुणा देख जो रो पड़े थे वो जियाले कहां गए ।

झूठ का अंधकार........,।

प्यासी धरती तड़प रही है बूंदों की अभिलाषा में

मेहनत स्वेद बहा रही है  उम्मीदों की भाषा मे ,

नाता तोड़ के कर्म धरा से चला बैभव की आशा में ।

सही समय पर बरस पड़े वो बादल काले कUहां गए ।

झूठ का अंधकार ..........।

जगे चेतना मनाष की ऐसा अब कुछ करना होगा

आग पहन कर प्रतिभा को तूफानो से गुजरना होगा

पुस्तक में बंद चरित्रों को धरती पर उतरना होगा 

ढूंढो इस वसुधा में पूण्य कमाने वाले कहाँ गये ।

झूठ का अंधकार फैला है सच के उजाले कहाँ गए

बड़े ख्वाब और झूठे स्वप्न दिखाने वाले कहां गए।


                       भगवान सिंह रावत (स्वरचित)


Monday, September 26, 2022

आछरी (भाग 2)

 रात का समय ,हीरा सिंह खाना खाकर  अभी निबटा था ।समय का कुछ अनुमान लगाना कठिन था।उसकी पत्नी और बच्चे सो चुके थे । नींद ना आने की वजह से हीरा ने किवाड भेड दिए ,लैंप जला छोड़ थोड़ी दूर पर कल्याण सिंह के घर की ओर हुक्का पीने चला गया।खाना खाने के बाद हुक्का पीने की आदत जो थी उसे,चलो थोड़ी गपशप भी ही जाएगी।ये सोच कर वो घर से चल पड़ा।उसका घर गांव के सबसे छोर पर था, उसके घर से दूसरे घर की दूरी लगभग दो सौ मीटर  थी।पहाड़ में गांव के घरों में अक्शर काफी दूरियां होती है।वह कल्याण के घर पर आकर बैठा । यहां से हीरा का घर नही दिखता था बीच मे एक खेतों का बड़ा मोड़ पड़ जाता था ।कल्याण हुक्का पी ही रहा था।"आ हीरा बैठ" खाना हो गया ? कल्याण बोला",हाँ 'हीरा ने जवाब दिया।वह दोनों खेत खलियान के विषय मे बात करने लगे । "फ़सल की कटाई कब से सुरु कर रहे हो"कल्याण बोला,"अभी हफ्ते बाद देखेगे" हीरा ने कहा ।तभी कल्याण की नजर दूर एक जगह पर टिक गई । "अरे हीरा क्या टाइम है अभी " ? कल्याण बोला  , "पता नही यार, क्यों क्या हुआ "  हीरा ने कहा  । "अरे देख दूर उस पहाड़ी से एक उजाला इस तरफ आता दिखाई पड़ रहा है "कल्याण बोला , " अरे कोई दूसरे गांव का राह चल रहा होगा ' हीरा ने बात को हल्के में लेकर कहा । " अरे नही हीरा ये उजाला किसी राहगीर का नाही हो सकता वह तो पकडण्डी पर एक दम सीधा चल रहा है ।गाड़ी के जैसा " अपनी बात पर जोर देते कल्याण बोला । तब हीरा ने गौर से देखा । " हाँ  यार वह कोई आदमी तो नही लगता " । हीरा ने उस का समर्थन करते कहा   "फिरतो वही है तुझे ढोल नगाड़े की आवाज आ रही है क्या " ? कल्याण बोला सुन ध्यानसे 

हीरा कान लगा कर सुनने लगा । " अरे आ रही है हल्की सी ,पक्का आछरी ही है " 'हीरा ने झट खड़े होते हुए कहा  ।इस बीच वह रोशनी नजदीक आ गई थी । तभी हीरा सिंह को अपने घर का ख्याल आया ।ओह.... वह तो किवाड भेड कर आ गया था बस ।उसकी पत्नी और बच्चे तो सो रहे होंगे । में तो लैंप जला छोड कर आया था । हे भगवान अब क्या होगा ।क्या मैं  तब तक वहां पहुंच पाऊंगा ? उस उजाले  से पहले ? इस बीच रोशनी काफी तीव्र गति से बढ़ती चली आ रही थी।हीरा ने तेजी से अपने कदम घर की ओर बढ़ाये  ।रोशनी उसके घर के लगभग पास आ चुकी थी ।रास्ता ही वही था ।लगभग दौड़ता सा वह हांफने लगा ,आज तो गए कामसे, वह डर के मारे कांपने लगा था।पर उसने हिम्मत नही हारी ।नंगे पैर भागते हुए उसके पैर भी जगह जगह से छिल गए ।अब वह अपने घर के चौक के पास आगया था।और रोशनी उससे लगभग बीस बाइस मीटर दूर थी ।वह लगभग हवा की तरह घर की सिढिया लांघता जोर से दरवाजे को धक्का दे कर अंदर पहुंचा।और झट एक हाथ से लैंप की बत्ती को मसल डाला उसका हाथ भी झुलस गया । डर के मारे अभी भी उसकी धड़कने तेजी से चल रही थी । रोशनी चौक के अंदर आ चुकी थी। हीरा ने देखा वह एक नही दो थी । दरवाजे के पास आकर उन दोनों की आवाज साफ सुनाई पड़ रही थी । हीरा का डर के मारे दिल बैठा जा रहा था ।आज तो बच्चे और मैं सब गए।आज बचना मुश्किल हैं।तभी उसे आवाज सुनाई पड़ी ।"दीदी चलो न अंदर"उनमे से एक नए कहा ।

"अरे चल छोड़ आज रहने दे " दुसरी बोली ," नही दीदी चल ना मुझे अंदर जाना है"। पहले वाली आवाज़ आईं " रहने दे ना "  दूसरी बोली "नहीं चल अब आही  गए हैं तो चल"   पहली वाली की आवाज आई ,ये वार्ता लाप सुन हीरा का कलेजा काँप उठा ,डर के आगे हिम्मत दम  तोड़ चुकी थींऔर तब बेहोशी ने उसे अपने आगोश में ले लिया। सुबह जब उसने अपने मुह पर पानी के छींटे महसूस किए तो वह झट से उठ बैठा , उसे रात का सारा माजरा  समझ आ गया । "क्या हो गया था तुम्हे " , उसकी पत्नी ने पूछा ,उसकी पत्नी जाकर एक पडोशी को भी बुला लाई थी । बच्चे भी गुमशुम बैठे उसे ताक रहे थे । वह जिंदा है और सब ठीक है,तब  जाकर उसकी सांस में सांस आई ।वह कुछ ना बोला उन्हें रात की बात बताना उसने ठीक नही समझा । कहीं ये लोग डर ना जाये । "अरे कुछ नही शायद चक्कर आ गया था,।कुछ नही में ठीक हूँ।  मुझे कुछ नही हुआ है " । वह उठा और मुह हाथ धो कर धूप,दिया  जलाने लगा और कुल देवता के साथ आछरी  की  भी पूजा अर्चना की ।तब जा कर उसका मन शांत हुआ ।उसके पश्चात उसने कभी वह गलती नही की जो कल उससे अकस्मात हो गई थी ।

                         भगवान सिंह रावत (स्वरचित)     



आछरी (भाग 1)


सभी लेखक एवं पाठक बन्धुओं को मेरा नमस्कार ।

मेरी कहानी (वृतान्त)कुछ अलग हट कर है ,इस लिए इसकी पृष्ठभूमि पर जाना अति आवश्यक है।ये कहानी आज के समय के अनुरुप सही ना लगे लेकिन हमारे समय मे ये कथाएं काफी प्रचलित थी । अर्थात लगभाग पचास वर्ष पूर्व जब दूर  दराज के गाँव विकाश  से वंचित थे, घने औऱ विशाल जंगल हुआ करते थे,तब ऎसी कहानियों का  बहुत महत्व होता था । ये कहानी पहाड़ से संबंधित है ,शायद आपने 'आछरी ' नाम नही सुना होगा,  ये नाम  पहाड़ी है ।आछरी का अर्थ वहां पर परीयों के लिए प्रयोग किया जाता है,कयोंकि जिसने भी उन्हें देखा हैं ,उनका स्वरूप परियों जैसा बताया है ।यधपि मेरा इस तरह किसी से कभी साक्षत्कार नही हुआ , पर लोगों से और अपने पूर्वजों से  ये वृतान्त अवश्य सुना है ।

"आछरी" पहाड़ में भूत प्रेत देवताओँ और आत्माओं की श्रेणी में  रखी गई हैं । कही कहीं  कुछ लोग उन्हें देव तुल्य भी मानते हैं और सम्मान के साथ उनको पूजते भी हैं । और कई जगहोँ पर उनके मंदिर भी स्थापित किए गए हैं जिनकी समय समय पर आज भी  पूजा अर्चना की जाती है । जिसने भी उनके स्वरूप को देखा है , उनकेअनुशार आछरियाँ लंबी पतली और अक्शर सफेद वस्त्रों में दिखाई पड़ती है।और एक स्थिर आकार नही रखती, और लहराते स्वरूप में दिखती हैं।मान्यता है कि वह रोज सुबह अर्ध रात्रि के पश्चात अपने दल बल के साथ पहाड़ की चोटी से गंगा स्नान के लिए उतरती है ,और अधिकतर  फूलों के मौसम  में और रात्री मेँ उनको देखा जा सकता  है । उसके साथ कई तरह के प्रेत भी चलते है।और एक ढोल और नगाड़ा भी होता है,जो उसके दल के आने का सूचक होता है ।माना जाता है कि ढोल और नगाड़ा अलग अलग प्रवर्ति के होते हैं ढोल की धुन का अर्थ लगाया जाता है कि (अबाटे के बाट) इसका अर्थ होता हैं कि जो रास्ते से अलग हैं वो रास्ते पर आ जाय,ताकि आछरी उसे अपने साथ ले जाए,और नगाड़े की धुन का अर्थ ये लगाया जाता है कि (बाटे के अबॉट) इसका अर्थ होता है कि जो रास्ते मे है वो अलग रास्ते पर चले जाए,ताकि वह बच सकें। जिसको भी आछरी अपने साथ ले जाती हैं तो फिर वह कहीं मिलता नही है नदी के किनारे उसके वस्त्र अवश्य मिल जाते हैं ,कहा जाता है कि एक बार एक गांव की कूछ महिलाएं जंगल मे घास काटने गई थी तो उन्हे  एक मधुर  गीत की आवाज़ सुनाई पडी , आवाज बड़ी सुरीली थी,एक महिला उस आवाज के पीछे चल पड़ी ,और बहुत दूर निकल गई। साथ आई महिलाओं के बहुत खोजने पर भी  उसका पता नही चल सका ,चार पांच दिन बाद वह वापस आई तो उसकी आवाज नही निकल रही थी ।उसके गले से आवाज भर्रा कर आ रही थी,कहते हैं कि आछरी  ने उसकी आवाज हर ली थी । यहाँ पर यह मानते है कि जहाँ उजाला होता है आछरी वहीं पहुंचती है।अंधेरे में या अँधेरे घर मे वह नहीं जाती , इसी संदर्भ में बहुत बहुत से व्रतांत मिलते हैं ।यहां पर पात्रों के नाम काल्पनिक हैं।

शेष  (आछरी भाग 2) में........।

                   भगवान सिंह रावत  (दिल्ली )

                        (स्वरचित)




Friday, September 23, 2022

यादों की परछाई ( भाग 2)


 

किशन पांचवीं कक्षा में था,परिक्षये नजदीक थी ।किशन को किशन के पिता छटी कक्ष में वहां नही पढ़ाना चाहते थे,वो उसे अपने साथ दिल्ली के जाना चाहते थे। ये बात किशन के दादा जी ने उसे बताई थी । ।पांचवी  के बाद सामने जूनियर हाई स्कूल में सब बच्चों को शिफ्ट होना पड़ता था । एक दिन घर आते कमलेश ने कहा "सब अगले साल से तो हमे सामने वाले नए स्कूल में जाना होगी न किशन"
"हाँ जाना तो है मगर मेरे घर वाले कहते हैं कि अब तू अगले साल से दिल्ली जाएगा पढ़ने"
क्या....….।कमलेश के मुह से निकला ।सच मे .…
"हाँ मुझे अब छटी से वहीं पढ़ना है "
कमलेश के चेहरे पर  कुछ उदासी के भाव उभरे जिनको किशन भी पढ़ ना सका।क्या हुआ तू क्यों चुप चाप हो गई।"कुछ नही " कमलेश बोली । तीन चार दिन बाद परीक्षा थी ।दोनो अब भी साथ साथ आते जाते थे ।किशन छुट्टियों में गांव आने की बात करता था । और कमलेश को मिलने का वादा भी करता था ।परीक्षाएँ हुई ।रिज़ल्ट भी आया दोनो पास हो गए ।और स्कूल  कि छुटियाँ पड़  गई ।आज स्कूल में इस साल का आखिरी दिन था।दोनो वापर घर की तरफ आ रहे थे।दोनो चीड के उस घने पेड़ के पास बैठ गए जहां वो रोज बैठते थे ।चीड के पेड़ से साँय सांय की हवा चल रही थी । दोनो  आपस मे बातें कर रहे थे ।"किशन अब तो तू दिल्ली जाएगा तो मुझे ये पेड़ जिस पर हमने अपने नाम लिखें हैं ये रास्ते ये पकडंडियाँ ये स्कूल याद करेगा "भ्रांतिचित भाव से कमलेश बोली ।
"हाँ कम्मू मुझे ये सब बहुत याद आएंगे " उसने एक बार पेड़ पर उस जगह नजर डाली जिस पर दोनों के नाम लिखे थे ।
"अभी तो बस मुझे दिल्ली जाकर पढ़ने की बड़ी इच्छा  है"
मैं खूब पढ़ना चाहता हूं बहुत बहुत । वह उत्कंठित भाव से बोला। कमलेश के चेहरे पर फिर से कुछ गमगीन से भाव उभरे ,मगर किशन तो बस शहर जाने को उत्सुक होने की वजह से कुछ भी समझ ना सका ।अपने गांव  से कमलेश किशन को बहुत देर तक  विषादयुक्त भाव से जाते देखती रही।
किशन अब अपने पिता जी के साथ दिल्ली आ गया ।और नए स्कूल में एड्मिसन लिया ।शहर की आबोहवा उसे इतनी भाई कि वह गांव गली स्कूल पहाड़ पकडण्डी सब भूल गया,पढ़ाई के ध्यान में वह कमलेश को भी भूल गया । बस उसे याद था तो बस अपना लक्ष्य ,उसे शीर्ष तक पहुंचना था ।गर्मी की छुट्टियों में भी वह गांव नही जा सका । ठीक दो साल बाद वह चार पांच दिनों के लिए गांव आया , पुराने दोस्तों से मिला,उसने कमलेश के बारे में पूछा तो पता चला कि वह देहरा दून में अपने किसी रिश्तेदार के यहां पढ़ने चली गई है ।उस जमाने मे संचार माध्यम के नाम पर केवल एक चीज हुआ करती थी ,चिट्ठी.....। ज्यादा हुआ तो टेलीग्राम ।चिट्ठी किशन भेज नही सकता था ,पता नही कोई क्या समझ बैठे ।बदनामी का डर अलग से  । वह खिन्न हो कर राह गया । समय बीतता गया,उसका ध्यान कामलेश की तरफ से भी हट गया ।
बीच मे कई बार गांव वह गया भी मगर वह अपनी पढ़ाई और दूसरे कामो में व्यस्त रहने लगा ।
आज किशन यानी मैं पढ़ लिख कर पॉलिटेक्निक से इंजिनीयर बन गया हूँ ।और बखूबी अपने को सफल मानता हूं ।अब मेरे पास समय का इतना आभाव नही है ।चार दिन के ब्लॉक हॉलिडे के होने की वजह से गांव आया हूँ। मन के किसी कोने से एक आह्वाहन हुआ ,क्यो न पुराने स्कूल  घूम कर आऊं तो बाइक उठाई और चल पड़ा ।मष्तिस्क में कुछ धुंदली यादें उभरने लगी थी ।जिसमे कमलेश का मासूम चेहरा भी था ।शायद कही कुछ पता चले या मिल भी जाये । अब सारे गांव में सड़के थी  लोग पैदल भी सड़कों से ही आते जाते थे ।
वहां आकर देखा तो अचंम्भे में पड़ गया ।काफी देर तक बाइक पर ही बैठा उस स्कूल को देख रहा था ।उतर कर एक ढाबे में गया ।और चाय मंगवाई ।सब कुछ बदल गया था ।ना तो वो दुकाने थी, ना वो पुराना स्कूल,ना वो पकडण्डी,ना वहां चीड का घना पेड़,ना वो पुराने गुरु जी ।सब बदल गया था ।बीस साल कुछ कम भी तो नही होते।ना स्कूल में कोई किशन था और ना कोई कमलेश,वह स्कूल शहर के स्कूलों से किसी भी तरह उन्नीस नही था ।दो तीन दुकानों की जगह आज यहां किलोमीटर से लंबा बाजार था ।चीड के पेड़ों का वो जंगलभी अब घना नही लग रहा था आस पास की वो हरियाली और बड़े बड़े खेत भी अब  दुकानों और मकानो का रूप ले चुके थे  ।एक्का दुक्का पेड़ ही थे । विकाश के चक्र ने हमारी  वो पुरानी पहचान मिटा दी थी । विकाश जरूरी है मगर पुरानी सांस्क्रतिक विरासत की कीमत पर नही । अब कमलेश का चेहरा  उभर कर सामने मह्सूस होने लगा था ।एक एक कर कमलेश की  स्नेह से भरी बातें याद आने लगी थी।चाहत के वो पल मष्तिस्क के चारों ओर घूमने लगे थे ।वो कट्टी करना,औ र वो फिर से एक होना ,वो गुरु जी के पीटने पर हाथ को सहलाना,वो मेरे दिल्ली जाने की बात पर उसके चेहरे के भाव बदल जाना,ओह.... दिल रो उठा,एक टीस सी उभर गई,और अंदर से आवाज आई कमलेश...तुम कहाँ हो ।अपने आपको में कोसने लगा ।मगर अब वक्त निकल चुका था ।और वक्त लौट कर नही आ सकता । अंतर की पीड़ा को किसे बताऊं,और बता कर फायदा भी क्या ।  भ्रमित होकर मन सोच रहा था कमलेश सामने दिख जाए ,में उसे अपने बाहुपाश में लैलूं और जी भरकर उसके कंधे पर शर रख कर रोऊँ ,और   उससे माफी माँगूँ ,और कहूँ कमलेश मुझे माफ़ कर दो मैं तुम्हे समझ ना सका,अब मेरा जीवन तुम्हारे हवाले है । मगर ऐसा अब संभव नही था ,हताश मन रो उठा,पलकें जब आंसुओं का बोझ ना सह सकी तो टप टप कर गालों पर लुढ़कने लगी ।तभी आवाज आई "भाई जी" क्या हुआ बहुत देर से देख रहा हूँ।गम सुम बैठे हो । अरे आपकी आंखों में आंसू....।मैं चौंक गया, मेरी तंद्रा टूट गई,अ.. नही...तो ,शायद कुछ गिर गया है आंख में रुमाल से पोंछते हुए मैंने कहा ।सच्चे प्रेम के उभरते आवेश को  मैंने झूट के कवच से ढक लिया ।और चाय के पैसे उसे देकर वहां से बाइक पर अपने गाँव की तरफ  चल पड़ा ।
    भगवान सिंह रावत( स्वरचित)
         दिल्ली

यादों की परछाइयां (भाग 1)


 सड़क के किनारे खुले  ढाबे में बैठा ,उस स्कूल को देख रहा था । पांचवी तक का , अच्छा , सीमेंट का पक्का बना  हुआ । बच्चे बैंचों पर बैठे पढ़ रहे थे । सबने यूनिफार्म पहनी थी , टीचर उन्हें ब्लॉक बोर्ड पर लिखते हुए पढा रहह था । थोड़ी दूर पर चार दिवारी थी । उसके बाद एक पीपल का पुराना पेड़ था ,और सामने कु छ दूरी पर  जूनियर हाई स्कूल था ,और फिर इण्टर कॉलेज था । सड़क के कुछ दूर मोड़ पर पोलिटेक्निक इंसिट्यूट था ।और यहां स्कूल के सामने बड़ी सी  मार्किट खुली थी ।जो कि परचून की दुकान के अलावा रेस्टोरेंट  और इलेक्ट्रिक और बार्बर शॉप,और  साइबर कैफे वगेरह वगेरह ,ये शृंखला लगभग पूरे एक किलोमीटर से भी ज्यादा लंबी   थी । सब कूछ बदला हुआ सा लग रहा था । पूरे बीस साल बाद आया था मैं यहां,  इस लिये किसी के पहचानने का कोई मतलब नही रह जाता । यूँ तो मैं जानता था कि वक्त  की धूल दुनिया में हर किसी की पहचान पर सपनी छाप छोड  जाती है ।और वो भी बीस  साल, एक चेहरे को बदलने के लिए बहुत थे ।फिरभी दिल चाह रहा था कि कोई मुझे पहचाने ,और मैं किसी को पहचानू । लेकिन ये मेरा कोरा भ्रम था ,लेकिन जो मैं देख रहा था वह कतई भ्रम नही था । यादों की वो परछाइयां आज भी मेरे दिलो दिमाग पर  छाई हुई थी ।आज से ठीक बीस साल पहले इसी स्कूल में कुछ बच्चे एक लंबी सी दरी पर बैठ कर पढ़ रहे हैं ।मास्टर जी कुर्सी पर विराज मांन हैं ।स्कूल में दो कमरे हैं , एक छोटा कमराऔर है ।जो किचन में बदला गया है ।कुल पच्चीस तीस बच्चे हैं ।एक से पांच कक्षा तक ,सभी एक साथ बैठे हैं । एक दुसरी  दरी मास्टर साहब के दूसरी ओर बिछी है जिसपर गिनती की सात लड़कियां बैठी थी । सामने रंग से दीवार पर लिखा था " बेसिक पाठशाला "।पत्थरो की दीवार से बनी चार दिवारी के बाद एक पीपल का घना पुराना पेड था।पेड़ के  थोड़ी दूर पर चार कमरों का बना जूनियर हाई स्कूल था ।जिसके आस पास रास्ते के दूसरी तरफ एक चाय की दुकान थी,और एक दो और राशन पानी की दुकाने थी ।चारों तरफ़ घने पेड़ों की वज़ह से हरियाली थी ।स्कूल और दुकानों के एक रास्ता था जो दुसरे गाँव की तरफ़ जाता था।

" अरे बच्चों ,शोर नही " "कक्षा चार से इंद्रमणि खड़े हो जाओ 

तुम दसवां पाठ  जोर से पढ़ो , सब  विद्यार्ती ध्यान से सुनो '"।मास्टर जी के कहने पर लड़का जोर जोर से   किताब में से   अध्याय पढ़ने  लगा । सब बच्चों का ध्यान किताब पर था । मास्टर जी चहलकदमी करने लगे । बच्चों की यूनिफार्म के नाम पर कुछ नही था ,सब अपने घर के कपड़े पहन कर आये थे ।किसी बच्चे की कमीज का पल्लू लटक रहा था तो किसी ने कमीज के बटन ऊपर नीचे लगा रखे थे।मास्टर साहब का बहुत खौफ़ हुआ करता था ,इस लिए सब चुप चाप अनुशासन में रहते थे ।तभी दो बच्चे एक बाल्टी में पानी भर कर लाते नजर आए ।उन दो बच्चों ने बाल्टी में डंडा फसा कर कंधे पर  रखा हुआ था । वह पानी लेकर आये औऱ किचन के पास रख दिया । मास्टर जी बोले "अरे खेम सिंह तू किचन में काम देख ,और पवन तू आकर यहां बैठ जा " । मास्टर जी के अनुसार खेम सिंह अपने काम में लग गया । उस ज़माने में इसी तरह मास्टर के सारे काम छात्रों को करने पड़ते थे । और पवन बैठ गया । बच्चों में एक मै भी हुँ ।चुप चाप एक कोने में बैठा ,किताब में ध्यान लगाएं हुए  ",किशन " ।

दोपहर के एक बजे किसी बच्चे ने घंटी बजाई और छुट्टी की घोषणा होने पर सब बच्चे हल्ला मचाते हुये खड़े हो गये ।कुछ बच्चे स्कूल के बाएं तरफ और कुछ दांयें  अपने गांव की तरफ चल पड़े । किसन भी अपना बास्ता उठा कर चलने को हुआ,"चल किशन आजा "पास में खड़ी कमलेश बोली ।"हाँ चल" और वो दोनों स्कूल के बाईं तरफ उस पकडण्डी पर चल पड़े , जिस पर वो दोनों साथ साथ आते जाते थे ।थोड़ी दूर पर ही कमलेश का गांव था ।किशन का गांव उसके बाद पड़ता था । अगले दिन किशन आकर दरी पर चुप चाप आकर बैठ गया  । "अरे किशन खाली हाथ आया है ,लकड़ी नही लाया "खड़ा होजा"  मास्टर जी बोले "जी गुरु जी आज भूल गया "और मास्टर जी ने दंड स्वरूप दो फूटे कस कर उसके हाथ पर दे मारे ।किशन हाथ झाड़ता हुआ  पीड़ा को रोकते हुए बैठ गया ।मास्टर जी वही स्कूल में निवास करते थे ।खाना पीना वही होता था ।इसलिए सारा सामान छात्रों से जुटाया जाता था ।कोरा राशन दूध  दाल चावल नइ शब्जी वगैरा वगेरा ।एक लकडी का डंडा भी हर छात्र को लाना अनिवार्य था, मास्टर सरकारी होता था,मगर  गांव के लोग बहुत पुराने समय से श्रध्दा स्वरूप अनाज मास्टर जी के यहां दे दिया करते थे ,परन्तु अब  हर माह  ले कर आने का नियम बनाया गया था ।जिसके पालन न होने पर बच्चों को दंडित किया जाता था  । पानी थोडी दूर था तो दो लड़के बाल्टी में पानी ले आते थे । दोपहर में जब छुट्टी हुई तो घर जाते हुए किशन और कमलेश एक चीड के  घने  पेड़ के पास रुक गए ,जहां वो दोनों  अक्सर रुकते थे,वहां पर पूरा जंगल चीड के पेड़ों से ढका था ।थोड़ा सुस्ता कर फिर जाते थे । और कुछ देर बात चीत करते थे ।

" किशन ,मास्टर जी ने तुम्हे क्यों मारा "कमलेश बोली अरे वो में आज लकड़ी लाना भूल गया था ।  ओहो.....ये गुरु जी भी बहुत बुरे हैं , मुझे बताते मैं तुम्हे घर से दे देती ।कमलेश किशन के हाथ पकड़ते  बोली । "सुबह में देर  हो गई ना , तुम्हे कहां से बताता । दूसरा हाथ भी तो देखो ना वह बोला ।कमलेश हाथ झटकते बोली " धत  पागल "और दोनों हंस पड़े और दोनों घर की तरफ चल पड़े । इसी तरह की हंसी मजाक आपस मे चलती रहती थी । 

अभी स्कूल में हाफ टाइम हुआ है ।बच्चे अपना अपना खाना खा रहे है । 

"किशन , रोटी लाया है ना"कमलेश बोली ।

"हाँ चल उस पत्थर पर बैठते है " किशन बोला ।मैं तो रोटी के साथ गुड़ लाया हूँ ।तेरे पास क्या है ? "कल रात बाबा खेत से  सीताफल तोड़ कर लाये थे ।वही लाई हूं " फिर दोनों स्कूल की चार दिवारी के पास एक बड़े पत्थर पर बैठ गए और खाना खाने लगे । दोनो की उम्र नौ या दस के लग भग होगी ।दोनो का आपस मे लगाव जरूर था ।मगर दोनो झगड़ते भी थे ।कुट्टी भी होती थी । एक बार गलती से किशन की स्याही की बोतल अचानक देखेने दिखाने के चक्कर मे पट्ट से गिर गई और फ़ूट गई । अब क्या था किशन नाराज हो गया ।"पगली कहीं की ये क्या कर दिया ,अब घर जाकर दादा जी हुक्के के नैचे से पिटाई करेंगे "।अरे तू मेरी बोतल ले ले कमलेश बोली।" हट  दादा जी पूछेंगे तो क्या कहूंगा " दोनो स्कूल आगये उस दिन दोनो कुछ ना बोले  दोनो अलग ही रहे ।  कमलेश भी बिफ़र पड़ी और घर जाते हुए बोली जा तेरी मेरी कट्टी ।और दांत में नाखून फंसा कर उसकी तरफ उछालते कट्टी की रस्म पूरी की ।ये प्रक्रिया उसने दो तीन बार की ।इसी तरह कट्टी  होती थी बच्चों में ।और फिर दोनों अलग अलग हो गए ।दो तीन दिन दोनो ने आपस मे बात भी नही की ।दोनों एक दूसरे को काट खाने वाली नजरों से देखते रहे । अगले दिन मास्टर साहब कुर्सी पर बैठे हाजरी ले रहे है ।"चन्दर सिंह"एक लड़का  खड़ा होकर "उपस्थित गुरु जी"

"ज्योत सिंह"  "उपस्थित गुरु जी " दूसरा लड़का बोला ।

"उमेद सिंह" 'उपस्थित गुरु जी"

"कुंदन सिंह" "उपस्थित गुरु जी"

"किशन सिंह".........."किशन सिंह"मास्टर जी जोर से बोले ।

तभी एक लड़का खड़ा होकर बोला " गुरु जी किशन आज नही आया " क्यों नही आया  गुरु जी बोले ।

गुरु जी उसे बुखार है ।ठीक है बैठ जाओ । और मास्टर साहब और बच्चों की हाजरी लेने लगे ।

कामकेश के कानों में आवाज सुनाई दी " वह नही आया और उसे बुखार है "।पहले कमलेश ने ज्यादा ध्यान नही दिया, पर थोड़ी देर बाद वह सोंचने लगी ,क्या हुआ होगा किशन को ,क्या सचमुच उसे बुखार है ? उसके दिमाग  से कट्टी वाली बात हट गई ।उसने मास्टर जी के जाने के बाद तुरंत उस लड़के से पुछा , किशन को बुखार कैसे आ गया ? कल तो वह ठीक था । अरे कल उसका और  कर्ण सिंह का  पानी लाने का नंबर था । तो पानी से भीग गया । गीले कपड़ों में ही घर गया था । ठंड लग गई शायद लड़का बोला ।ओह..... ये बात है कमलेश के मुह से निकला ।और वह वापस आकर बैठ गई ।  अपने आप को कोसने लगी । किस समय उसने कट्टी की किशन से ।बिचारा बीमार हो गया ।अपने आप को कोसने लगी ।अगले दिन भी किशन को कमलेश की नजरें ढूंढती रही ,मगर किशन नही दिखा, उसे उत्सुकता होने लगी ।क्या इतना ज्यादा बीमार हो गया कि आज भी नही आ सका ।वह उसके साथी से पूछना चाहती थी ,मगर वह टाल गई ,पता नही क्या समझेगा ।वह कहेगा कल ही बताया था बुखार है । किसी के प्रति हमदर्दी भी दिखाना  लोगों को चुभता है । वह विषाद से भर उठी । जब तीसरे दिन वह स्कूल पहुंची तो उसकी नजर किशन की क्लास पेर पड़ी ,उसे अचानक किशन दिखा , तब वह आस्वस्त हुई ।चलो अब ठीक है ,अंतर्मन से आवाज आई ।मगर वह चुप चाप बैठा था । बीमार था ना इसलिए सुस्त है,कमलेश मानो अपने आप से कह रही थी ।जब हाफ टाइम हुआ तो कमलेश किशन के पास आई ,और कुछ सकुचाते बोली "किशन कैसी है तबियत " 

किशन ने नजर उठाकर देखा "अभी तो कुछ ठीक हूं "किशन बोला

 "बुखार तो नही है ना"कमलेश बोली ।

"रोटी खायेगा ना"

हाँ  और फिर कमलेश उसका हाथ पकड़ कर उसी जगह ले गई जहां वह रोज बैठते थे ।कमलेश अपने हाथ से उसे खिलाने लगी ।

"मगर हमारी तो कट्टी है"

"हट पागल ऐसे में कही कट्टी होती है"

"चुप चाप खा नही तो कमजोर हो जाएगा " ।और दोनो खाना  खाने लगे ।

दोपहर की छुटी के बाद जब वह उस चीड़ के घने पेड़ के पास बैठे तो । कमलेश ने पेड़ के तने पर छीली हुई जगह पर उसे दिखाया ,किशन ने देखा वहां किशन लिखा था । 

"चल अब तू भी मेरा नाम यहां पर लिख दे"

जब भी हम में से कोई अकेला होगा ना तो यहां पर बैठ कर लगेगा जैसे मेरे साथ है। पिछले दो दिन से मैं यही बैठती हूं 

तब मुझे अकेलापन नही लगता ।अपने प्रति इतनी हमदर्दी देख  कर किशन भाव व्हिभोर हो गया ,और जाने क्या हुआ,किशन रुआंसा हो गया ।कमलेश ने देखा तो बोली " ,अरे क्या हुआ"और उसको अपने  करीब खींच कर उसके कन्धे पेर हाथ से सहलाया  ।चुप हो जा, रोता क्यों है ,? वह सुबक सुबक कर रोने लगा ।बहुत देर तक कमलेश उसका कंधा  पकड़ कर चुप कराती रही । "आज से तेरी मेरी कट्टी खत्म ।दोनो खिल खिला कर  हंस पड़े और फिर दोनों घर को चल पड़े।अब दोनो की दोस्ती पहले से पक्की हो गई थी । अब स्कल आते हुए भी कमलेश किशन का इंतजार करती रहती थी,दोनो साथ साथ स्कूलआते जाते थे ।

शेष अगले भाग में.......।

                  भगवान सिंह रावत (स्वरचित)

                          दिल्ली 


Tuesday, September 13, 2022

खामोशी


 घर के आगे कुर्सी  लगाकअपने विचारों का मंथन करता  जाने कितना समय बीत गया ।पता तब चला जब पुष्पा कोअपने घर के आगे बैठे देखा। वह भी गमसुम सी बैठी थी ,उदास सा चेहरा लिए फर्श पर उंगलियों से कुछ टेढ़ी मेढ़ी आकृति बनाती चुप चाप ।

मै समझ गया जो विचारों का मंथन मेरे मन में चल रहा था वही  ध्वंद  उसके मन मे भी  चल रहा था।मैं फिर से विचारों के सैलाब में खो गया।बचपन से किशोर अवस्था मे भागती जिंदगी ।स्कूल से आते जाते ,हाथ  पकड़ कर,साथ साथ स्कूल का काम करते, साथ साथ खेलते,कभी शरारत करते कभी रूठते कभी एक दूसरे को मनाते।  एक बार पुष्पा को खेल प्रतियोगिता में  एक मैडल मिला।  सबसे पहले वह  मेरे पास आई, "राजीव देखो तो ,अच्छा है ना"वह बहुत खुश थी। मैंने भी खुशी जाहिर की।  "बहुत खुबशुरत है " । समय पंख लग कर तेजी से उड़ रहा था। कब हम दोनों ने बचपन से जवानी की दहलीज पर कदम रखे पता ही न चला।वो लोग  और हमारा परिवार अलग अलग राज्यों से थे। दिल्ली में पड़ोस में रहते थे। वो लोग राजस्थान के थे ,और में पहाड़ से था । और रिश्तेदारों  के साथ उनके पडोस में रहता था।धीरे धीरे हमारी चुल बुलाहट खामोशी मे बदल गई।हम दोनो प्रेम के अथाह सागर में  डूब चुके थे।   हमारा अमर प्रेम  शब्दों और इजहार का मोहताज नही था।   मेरे द्वारा बताई गई बातों का अनुसरण करना।और उसके द्वारा कहे गए हर निर्देश को सरआंखों पर रखना अब नियति बन गई थी।हम दोनों का प्रेम भी अजीब था  हम जानते सब कुछ थे। मगर  इजहार कभी नही किया। एक दूसरे पर जान छिडकते थे। मगर मुह से कभी कहा नही।एक खामोसी  थी  एक अहसास था। तभी एक घटना घट गई।मेरे परिवार में मेरे विवाह की बाते होने लगी।मैंने अपना निर्णय सबको बताया जब तक मेरी ट्रेनिंग पूरी नही होती मैं ये सब नही चाहता। और बाद में अपने पसंद से करूंगा, अभी तो कतई नही।गांव से ये फैसला आया शादी तुम जब चाहे तब करना अभी तो हम खोज बीन कर रहे हैं,ऐसी लड़की जो हमारी जमीन जायदाद को चला सके।जो हमारी संस्कृति की हो । हमारी परंपरा  को समझ सके।और गांव के वातावरण में पली बढ़ी हो।परिवार का ये फैसला सुन कर मैं सन्न राह गया। एक तरफ माता पिता की इच्छाओं का सैलाब था,दूसरी तरफ पुष्पा का खामोश प्रेम था।एक तरफ परिवार और समाज  की रूढ़िवादी परम्पराओं का बोझ था,तो दूसरी तरफ उन्मुक्त  प्रेम  का सपना था। मैं बहुत बड़े द्वंद्व में था।पुष्पा को कैसे बताऊं ये बात,  मगर आधिक दिनों तक ये बात छुपी न रह सकी।गॉंव से बाबू जी आये और उन्होंने वही बात मुझे बताई। बेटा तुम्हारी माँ अब काम के बोझ से टूट चुकी है। उसे कोई साथ देने वाला चाहिए। उसने जो सपने देखे हैं उसे पूरा करने का समय आ गया है।मैंने कुछ संतोष जनक जवाब नही दिया। फिर आस पड़ोस के लोग भी उनसे मिले। और बात वहां तक पहुंच ही गई। तब एक दिन पुष्पा मुझ से मिली और उसने कहा।"राजीव तुम्हारे बाबू जी आये थे ? गांव से,सुना है तुम्हारी शादी की तैयारी कर रहे हैं वो लोग" मुबारक हो । मुझ से कुछ बोलते नही बन पड़ा ।पर मैंने देखा हल्की सी मुश्कान के पीछे की पीड़ा को ।जो स्पष्ट मुखरित हो  रही थी ।"अरे नही ऐसी बात नही है, वो तो पूछने आये थे बस "

मैंने झूठ बोल दिया। "ये तो खुशी की बात है"

वह बोली और चली गई। मन मे अंधेरा छाने लगा था। तभी एक घटना और घटी,  उसके पिता का ट्रान्सफर उनके पुस्तैनी शहर  में हो गया ।और वो भी राजस्थान जाने की तैयारी करने लगे ।वो लोग कुल तीन प्राणी थे। ऐसा नही था कि वह मेरी दुविधा नही समझती थी ।वह जानती थी कि मैं अपने परिवार के फैसले से खुश नही हूँ ।मगर उसने इस बात का अपने व्यवहार पर कोई असर नही आने दिया।आज शाम की गाड़ी से वे लोग अपने शहर चले जायेंगे। मैं कुर्सी पर बैठा बैठाअपनी उधेड़बुन में लगा था। अब सब कुछ खत्म हो जाएगा। क्या हस्र होगा हमारे प्रेम का ? हम कभी मिल नही पाएंगे ?विचारों के उतार चढ़ाव अपने चरम पर थे ।पुष्पा अभी भी वहीं पर बैठी थी। मन रुंआसा हो चला था। तब मैं वहां  से उठा और अपने रूम के अंदर चला आया ।और बैठ गया ।कुछ देर बाद मैंने देखा तो मैं अवाक रह गया ।दरवाजे पर पुष्पा खड़ी थी।वह धीरे धीरे पास आई ,और बोली "राजीव हम लोग शाम को जा रहे हैं,सोचा तुमसे मिल तो लूँ "मेरे सब्र का बांध टूट गया,सारा विषाद मेरी आँखों से बूंद बनकर बहने लगा ।एक पल के लिए वह खामोश रही । फिर उसने मेरे दोनो हाथ पकड़ कर अपने हाथ मे लिए ।और बोली "राजीव,तुम इतने कमजोर  बन जाओगे ,ऐसा मैं नही समझती थी" मैं प्रश्नवाचक सा उसकी तरफ देखता रहा "हाँ राजीव इतने कमजोर न बनो ,हमारा प्रेम कोई  दुनिया की  रीत  का मोहतज नही,हमारा प्रेम दुनिया के बंधनों में बंधकर  रहने वाला नही है,हमारा प्रेमआकाश की ऊंचाइयों  से भी ऊंचा है ,और सागरकी गहराईयों  से भी गहरा है" । "हमारा प्रेम खामोर्श है ।क्या हुआ जो  हम मिल नही पाएंगे ,नदी के दो किनारे मिलते नही है ,मगर  आमने सामने तो रहते हैं ,क्या हुआ जो हमारे प्रेम को नाम नही मिला , में पुष्पा के इस नए रूप को देख कर गद गद हो उठा था ।सच कहूं तो आज ही मैंने उसके हाथों का स्पर्श किया था  उसने मेरे हाथ अपने होटों तक लेजाकेर चुम लिए । "हमारा प्रेम खामोशी का पथिक  है" "तुम्हे हमारे इस खामोश प्रेम की कसम है ,अपने मन मे किसी तरह के विषाद को जगह मत दो " और वह धीरे धीरे चली गई । मेरे मन का सारा ध्वंद साफ हो चुका था ।उसकी बातें मेरे जहन में उतर चुकी थी ।मैं ही नासमझ था । आज मुझे प्रेम का सच्चा अर्थ  समझ मे आ चुका था। मैं अपने को गौरवान्वित  महसूस कर रहा था । अंतर्मन का विषाद एक नूतन  अनुभूति में बदल गया था ।

Saturday, August 27, 2022

ईश्क के नाम पर

 खटाक.....खटाक......खटाक.....…। की आवाज से से आस पास की निस्तब्धता भंग हो रही थी ।रुक्मी के हाथ उस बड़े से घण पर मजबूती से  जकड़े थे ।वह घुमा घुमा कर घण लोहे की पटिया पर रखे  लोहे के  टुकड़े पर मार रही थी ।घण लोहे का आकार बदलने में मशगूल था ।सामने सफ़ेद  और काली लंबी मूछों वाला अधेड़ उम्र का घासी राम संडासी से उस लोहे के टुकड़े को पकड़े था ।घासी राम रुक्मी का बाप था। ।घासी राम बारबार उस लौहे को भट्टि मे रख देता और फिर उसे संडासी से पकड़ कर रुकमी को घण चलाने को कहता था।  काफी देर बाद घासी राम बोला  " बस.. बस.. अब हो गया छोरी ,थोड़ी देर सुस्ता ले " तब रुकमी पास पड़े खटोले पर बैठ गई।

जरा सी देर बैठी होगी कि उसे कहीं से  बारात के बाजों का स्वर सुनाई पड़ा ।उसने देखा,दूर पुराने खंडहर की तरफ से एक बारात चढ़ी चली आ रही थी ।वह ध्यान से देखने लगी। बारात नजदीक आती जा रही थी ।बारात सामने आ चूकी थी ।कुछ लोग बैंड बाजे की धुन पर  नाच रहे थे ।तभी उसका माथा ठनका , ये तो वही है मदन... हाँ मदन हीँ तो है ,जो नाच रहा है ।तो घोड़ी पर  चढ़ा ये कौन होगा ? तभी उसने घोड़ी पर बैठे दूल्हे को देखा, जो शेहरे के वजह से दिखाई नही पड़ रहा था ।तभी किसी ने दूल्हे से कुछ कहा, तो चेहरा स्पस्ट दिख गया ।

 ओह ...तो ये धीरज है,रुकमी सब समझ गई । उसकी आँखों मे यका यक क्रोध फूट पड़ा ,उसके हाथों की पकड़ घण के हत्थे पर और मजबूत होने लगी थी । मगर  बदनामी के डर से वह खामोश रही । रुक्मी की आंखों में वह सपना अचानक तैर गया ,जो उसने अंजाने में देख लिया था ।अठारह बरस की रुक्मी थोड़े पक्के रंग की जरूर थी,मगर उसका चेहरा देखने मे बहुत आकर्षक था ।शरीर भी योवन की दहलीज पर आकर सुडौल हो चुका था,मुस्कुराती तो लगता मोती  बिखर गए हों ।उन लोहारों की तीन गाड़ियां सड़क के किनारे लगी थी ।तीन गाड़ियां मतलाब तीन परिवार ।रुक्मी अपने बाबा घासी राम और अम्मा भूरी देवी के साथ रहती थी एक छोटा भाई भी था ।जो अभी छोटा था ।पास में ही एक कस्बा था ।जहां बड़े बड़े मकान थे । और थोड़ी दूर पर एक स्कूल था जो कि एक खंडहर जैसा हो चला  था ।शायद कभी यहां बच्चे पढ़ने आते  होंगे , मगर अब सिर्फकुछ दीवारें कुछ बेंच और कुछ लोहे की चद्दरें बची  थी । खंडहर के पास एक कोयले की दुकान थी । जहां कभी कभी रुक्मी कोयला लेने जाया करती थी । 

उस दिन रुकमी कोयला ले कर वापस आ रही थी,सामने ही एक अच्छी कदकाठी का युवक खड़ा था ।बोला "अरे तुम  वही लोहार हो न जो आगे मोड़ पर रहते हो "? "हाँ मैं वहीं रहती हूँ" रुक्मी बोली , तभी कहूँ कहां देखा है तुम्हे ? "एक बार आया था मैं वहां" ,वह युवक गोरा चिट्टा खूब सूरत था ।रुक्मी  रुकी और बोली "क्या काम है आपणे" "नही काम  कुछ नही है ऐसे ही पूछ लिया,गलत मत  समझना " वह बोला ।रुकमी को वह युवक भला दिखा ।जाने क्या था जो उसे बात करने पर मजबूर कर रहा था ।"क्या नाम है तुम्हारा "उसने  पूछा । रुकमी ...वह बोली । "बड़ी मेहनत करते हो  तुम लोग" "लोहे से दिन रात खेलना मजाक नही" वह बोला ।मेरा नाम धीरज हैं ,सामने बस्ती मे रहता हूँ  । काँई करे साहिब मजबूरी है ,खानदानी काम है । समझ सकता हूँ ,बड़ा दर्द है आप लोगों की जिंदगी में ।रुकमी को लगा ये कोई भला मानुष है । और दोचार इधर उधर की बाते हुई ।"चालूं साहिब ,घणा काम  पीटणा है "। रुकमी बोली ।और वापस अपने खेमे  में आ गई । 

धीरज का चेहरा उसके दिमाग से नही हट रहा था ।ऐसे लोग कहाँ  मिलते हैं आज के समय में ।इसी उधेड़ बुन में वह सो गई । तीन दिन बाद रुक्मी  उसी रास्ते बस्ती में किसी के ऑर्डर पर बनाये औजार देने गई । तभी उसे एक आवाज सुनाई पड़ी,रुक्मी ....रुको,संयोग वश वह धीरज था ।वह मुश्करा दी ।"अरे साहिब आप "  हाँ ,कब से आवाज दे रहा हूँ ।  "यहां कैसे" "सामान देने आई थी किसी का " रुकमी बोली ।अच्छा ..अच्छा..।और वह सामने  बागीचे में लकड़ी के बेंच पर बैठ गया ।रुकमी भी एक तरफ बैठ गई ।"मुश्कराती हो तो फूल झरते है "धीरज बोला ।"क्या अजाक करते हो साहिब""      

"मैं सच बोल रहा हूँ ये झूट नही है"रुक्मी को मानो विश्वास  होने लगा था ,वह फिर मुश्करा दी ।"कितनी सुंदर हो तुम,बला की खूबसूरत"धीरज बोला ।रुक्मी लाज से भर उठी,उसने नजर झुका ली । जाने क्या हो गया था उसे, ऐसा तो उसे कभी महसूस नही हुआ था ।एक अजीब तरह के अहसास की अनुभूति हो रही थी ।बात करने को कुछ मिल ही नही रहा था,बड़ी मशक्कत से उसने कुछ शब्दों को इकट्ठा कर कहा"क्या साहिब हम लोग तो गरीब हैं "।"हम कहाँ  हैं 

सुंदर तो आप हैं " "अच्छा  में  तुम्हे अछा लगता हूँ "?धीरज ने कहा । हाँ हाँ आप अच्छे हो साहिब ।आगे रुक्मी कुछ कह ना पाई और एक बार धीरज की तरफ देखा,वह धीरज की नजरों का सामना नही कर सकी और हथेली से मुह छिपा लिया ।तुमने कभी अपने आप को सीसे मे देखा है ?धीरज बोला तुम बहुत सुंदर हो । मुझे तो तुम दिल से खूबसूरत लगती हो ।रुक्मी ने अपने चेहरे से हथेली हटाई ,उसका चेहरा लाज से लाल हो गया था ।उसने बड़ी हिम्मत जुटाकर धीरज की तरफ मुस्कुराते हुए देखा ।और उठकर बोली" चालूं साहिब' और जल्दी जल्दी चल पड़ी ।

उस रात रुकमी को बहुत देर तक नींद नही आई, वह बार बार उठ कर सीसे मै अपना अक्श देखती फिर सरमा जाती और धीरज की बाते उसे याद आती ।उसे धीरज अच्छा लगा था ।उसने एक ही रात में जाने कितने सपने देख डाले थे ।अब उसे धीरज से अगले दिन मिलने की उत्सुकता होने लगी थी ।वह अक्सर सुनती ही रहती थी ,फलां लड़की को फलां लड़के से प्यार हो गया। ।वह उसे अपना दिल दे बैठी । वह लड़का किसी के प्यार में दीवाना हो गया ,वगेरा,वगेरा....।

अगले दिन वह साफ से कपड़े पहन कर शामको कोयले के लिए बाजार गई ।अपनी लोहारी पोशाक घागरा चोली और एक दुपट्टा पहन कर वह बहुत सुंदर दिख रही थी ।रुक्मी सोच रही थी क्या बात करेगी धीरज से ?कहीं आज तो शर्म के मारे फिर से मुह तो नही ढकेगी ?कुछ भी हो आज तो खुल के बात करेगी वह धीरज से और शर्माएगी तो बिल्कुल भी नही ।आपनी बातो की श्रृंखला को आपस मे जोड़ती रुक्मी दुकान से कोयला खरीद कर वापस हुई ,दस कदम ही चली थी कि किसी ने उसके कंधे पर हल्का हाथ रखा ।वह चौंकी ...कौन  ? तभी उसे धीरज का मुस्कुराता चेहरा दिखा ।"अरे साहिब आप "? वह मुड़ी और रुक गई । हल्का अंधेरा छा गया था । "आओ चलो वहां बैठते हैं "धीरज रुकमी का हाथ पकड़ कर उस पुराने स्कूल की तरफ इशारा करते बोला । रुकमी सहज ही उसके साथ चल पड़ी ।जैसे वह इस बात का इंतजार ही कर रही हो ।दोनो बेंच पर बैठ गए ।पहली बार इस उम्र में किसी पराये के हाथों का स्पर्श अपने हाथों पर पा कर वह अजीब सी अनुभूति महसूस करने लगी ।अपने शरीर मे उसे तरंगें सी महसूस होने लगी ।"रुकमी  मैं तुम्हे दिल से चाहने लगा हूँ ,तुम्हे अपनाना चाहता हूं " "तुम्हारे बगैर कुछ अच्छा नही लगता "।धीरज बोला "कैसी बात करो हो साहिब,हम ठहरे लोहार,और आप अच्छे घर के पढ़े लिखे लोग,ऐसा कैसे हो जाएगा बोलो तो"रुक्मी बोली । तभी धीरज ने रुक्मी का हाथ पकड़ कर आपने हाथ मे ले कर कहा "हम दोनो चाहेंगे तो क्यों नही होगा " ? उसने रुक्मी का हाथ चूम लिया ।रुकमी के शरीर मे एक सिहरन सी दौड़ गई ।  साहिब....और उसने  अपना शर धीरज के कंधे पर टिका दिया ।बहुत देर तक खामोशी छाई रही । "साहिब क्या तुम मुझे अपनाओगे ?, ब्याह करोगे मुझ से" रुक्मी बोली ।"हाँ हाँ ये भी कोई कहने की बात है "धीरज बोला ।"देखलो सहिब मेरी बिरादरी वालों को खबर पड़ी तो बहुत बवाल हो जावेगा ,मेरा बाबा बहुत कैड़ा है " रुक्मी बोली ।"अरे तुम घबराओ नही तुम मुझे परसों यही मिलो कोई न कोई रास्ता निकल जाएग"धीरज बोला ।फिर एक बार उसने रुकमी का हाथ फिर से चूमा।रुकमी ने भी उसके हाथ को पकड़ कर कस दिया । मानो उसने भी प्यार का इज़हार कर दिया हो ,थोड़ी देर इधर उधर की बाते हुई औऱ फिर दोनों उठ कर अपने रास्तें की तरफ चल पड़े । 

रुकमी घर आकर एक अजीब अहसास का अनुभव कर रही थी ।बार बार उसे धीरज के स्पर्श का  अहसास हो रहा था ।और वह रोमांचित हो रही थी । वह सपनों की दुनिया मे कुलांचे  भर रही थी ।तभी उसे अपने बाबा घासी राम का चेहरा सामने दिखता तो वह सिहर उठती ।धीरज कोई न कोई रास्ता जरूर निकाल लेगा ।वह मुझे बहुत प्यार जो करता है।पर वह रास्ता क्या होगा ? कहीं अगर कोई बात ना बनी तो मैं तो कही की ना रहूंगी ।कैसे जिऊंगी में अपने साहिब के बगैर ।नहीं  नही सब ठीक ही होगा । बनते बिगड़ते विचारों के बीहड़ में रुक्मी रात भर भटकती रही । और कब उसकी आंख  लगी उसे पता ही ना चला ।अगला दिन किसी तरह बीत गया,रुक्मी बेसब्री से कल का इंतजार कर रही थी ।धीरज से मिलने के लिए ,और बात करने के लिए वह बेताब  हो रही थी । 

और फिर अगला दिन आ ही गया ।हमेशा की तरह उसने थैला उठाया और चल पड़ी ।धीरज पहले से ही उसके इंतजार में टहल रहा था ।रुक्मी उसे देखते ही मुश्करा दी । धीरज ने रुकमि का हाथ पकड़ाऔर दोनों खंडहर के अंदर  एक पुराने बेंच पर बैठ गए । " यहां हमे कोई नही देखेगा अपने मन की बात आराम से कर सकते हैं 

रुक्मी...धीरज बोला । " ये दो दिन कैसे बीते हैं ,मैं तुम्हे बता  नही सकता" ।रुकमी कैसे बताती कि उसने भी ये विरह का  वक्त कैसे गुजारा है ,कैसे कैसे  एक एक पल कितने भारी लगे। साहिब....  "अब हमें भी आपसे  दूर रहना कहाँ अच्छा लगता है"। और वह धीरज के पास सरक कर उससे सट गई ।धीरज  ने भी उसे हाथ से आपनी तरफ सटा लिया ।" साहिब क्या जादू कर दिया है आपने "? बस यूं ही आप के पास बैठे रहने को मन  करता है । " साहिब....आप हमारे बाबा से जल्दी बात कीजिये  ना ,अब हम आपसे दूर नही रह सकते " रुक्मी बोली ।धीरज बोला "हाँ रुक्मी मैं भी कहाँ  तुमसे अलग रह पाऊंगा "और हाथ से रुकमी का बाजू पकड़ कर अपने से कस कर सटा लिया । दोनो प्यार की उड़ान भरने लगे ।अंधेरा उजाले को अपने आगोश में लेने को आतुर था ।हल्की ठंडी बयार चल रही थी ।

" तुम्हारे बाबा से बात तो मैं कर लूंगा रुक्मी ,पर मैंने देखा है तेरे बाबा को ,बात नही बनेगी " धीरज बोला ।" तब क्या होगा साहिब " रुकमी बोली ।"कुछ और सोचना पड़ेगा "धीरज ने कहा ।"एक ही रास्ता है,हमे यहां से भागना पड़ेगा, कहीं दूर जाकर हम अपनी दुनिया  सुरु करेगे "धीरज  ने कहा  । 

"क्या कह रहे हो साहिब "रुक्मी चौंकते हुए बोली । "मैं ऐसा  कोनी कर सकूं साहिब ,अम्मा  बाबा को छोड़ के ना रह सकूँ ,एक बार बाबा से बात तो कर  लो "रुक्मी बोली  " । "नही रुकमी तुम्हे  हमारे प्यार की खातिर ये करना पड़ेगा " ,धीरज ने उसे अपने से कस लिया । रुकमी और धीरज इस तरह आलिंगनबद्ध थे कि एक दूसरे की सांसें  स्पस्ट सुनाई पड़ रही थी ।  

"फिर हमारा और तुम्हारा प्यार एक मिशाल बन जायेगा "धीरज रुक्मी की तरफ उस पर झुकने लगा  ।रुकमी भी भावभेष  में बहने लगी ।और बहती चली गई ।उसे होश तब आया जब धीरज  प्यार के नाम पर मर्यादा को लांघने की तीव्र कोशिश में  था ।उसने अपने कपडों में उलझें धीरज के हाथ  अलग किये ।"क्या कर रहे हो सहिब ,ये सब ठीक नही "रुक्मिणी ने कहा और अलग खड़ी हो गई । धीरज फिर उसके पास आया और बोला  "रुक्मी....समझने की कोशिश करो मैं तुम्हारे बिना नही रह सकता , तुम्हारे शरीर की मुझे जरूरत है ।और रुक्मी का हाथ पकड़ कर आपनी तरफ खींच लिया ।और अपने बाहुपाश  में ले लिया,अबकी बार उसकी पकड़ ज़्यादा मजबूत थी । 

रुक्मी अब सब समझ चुकी थी । उसने अपना सारा जोर लगा कर एक झटका दिया और अलग हो कर एक जोर का धक्का धीरज को दिया । धीरज बड़ी जोर से नीचे गिरा ,और उठ ना सका । वह जोर से बोली "साहिब ये हाथ लोहे को रोज नई शक्ल में ढालते है , पीढियां बीत गई है लोहे से लड़ते लड़ते  ,तुम जैसे ढोंगियों  औऱ फरेबियों की क्या मजाल,जो इश्क के नाम पर घिनोना काम करते हो ,किसी के जज्बात से खेल कर इज्जत  इज्जत का सौदा करते हो " और जमींन पर गिरे हुए धीरज को उसने एक ठोकर पैर सेऔर मार दी। 

वह कराह उठा । अब वह सब समझ चुकी थी क्यों  साहिब बाबा से बात नही करना चाहता था । रुक्मी उसे लांघती हुई जाने लगी ।तभी सामने एक और युवक खड़ा था । "मेरा नांम मदन है, मैं धीरज का दोस्त हूँ " धीरज को गिरा कर तू चली कैसे जाएगी मेरे रहते" ये कह कर मदन उसका हाथ पकडने लगा । तभी एक जोर की आवाज हुई "चटाक" और रुक्मी का चांटा गाल पर पडते ही मदन चक्कर घिन्नी खाता जमीन पर गिरा ।

 "ऐसी वैसी समझ लिया था क्या " ? "लोहार की बेटी हूं ,पीढियां गुजर गई है हमारी लोहा पीटते पीटते "और उसके ऊपर से लांघते रुकमी आगे बढ़ गई । दिल लगाने की क्या सजा मिली थी उसे ? क्या यही होता है प्रेम का हश्र  ? कितना बड़ा धोखा किया था साहिब ने उसके साथ ?उसकी सांसे तेजी से चलने लगी थी । क्या क्या सपने देख डाले थे उसने ? उसकी आंखोंमें आंसू आ गए । उन आंसुओं में  कभी दुख झलकता था तो कभी क्रोध ।उसकी मां भूरी देवी ने बचपन मे ऐसी ऐसी कहानीयां सुनाई थी कि जो प्रेम को एक नया  आयाम देती थी । प्रेमी के लिए जान पर खेलने वाले पात्र का इतना  घिनौना स्वरूप , वह जितना सोचती उतना ही सवालों के घेरे में  फंस जाती । 

रुक्मी......ओ रुक्मी.......तभी उसे आपने बाबा घासी राम की आवाज सुनाई पड़ी ।अरे छोरी .....काँई होगो  नींद आ गई क्या  ? रुक्मी की तंद्रा टूटी उसने देखा बारात बहुत दूर जा चुकी थी ।सिर्फ बैंड बाजों की आवाज कानो में गूंज रही थी ।नींद आगी के छोरी......।घासी राम बोला । ना तो बाबा ,नींद से जाग गई हूं ।चल बजा इस पर घण घासी राम ने चिमटी से पकड़े लोहे के टुकड़े को पटिया पर रखा ।रुकमि ने घण उठाया और खटाक.....खटाक......पूरा जोर लगा कर  पटिया पर चलाने लगी । उसके हाथों में बला का जोर आ गया था । अरे छोरी .....।घणी जोर से पीट री हैं ।इत्ता जोर काइयाँ आ गियो । रुक्मी उसी तरह द्रुत गति से घण चला रही थी ।रुकमि के सिवा कोई नहीं जानता था कि ये जोर है या गुस्सा है ।