किशन पांचवीं कक्षा में था,परिक्षये नजदीक थी ।किशन को किशन के पिता छटी कक्ष में वहां नही पढ़ाना चाहते थे,वो उसे अपने साथ दिल्ली के जाना चाहते थे। ये बात किशन के दादा जी ने उसे बताई थी । ।पांचवी के बाद सामने जूनियर हाई स्कूल में सब बच्चों को शिफ्ट होना पड़ता था । एक दिन घर आते कमलेश ने कहा "सब अगले साल से तो हमे सामने वाले नए स्कूल में जाना होगी न किशन"
"हाँ जाना तो है मगर मेरे घर वाले कहते हैं कि अब तू अगले साल से दिल्ली जाएगा पढ़ने"
क्या....….।कमलेश के मुह से निकला ।सच मे .…
"हाँ मुझे अब छटी से वहीं पढ़ना है "
कमलेश के चेहरे पर कुछ उदासी के भाव उभरे जिनको किशन भी पढ़ ना सका।क्या हुआ तू क्यों चुप चाप हो गई।"कुछ नही " कमलेश बोली । तीन चार दिन बाद परीक्षा थी ।दोनो अब भी साथ साथ आते जाते थे ।किशन छुट्टियों में गांव आने की बात करता था । और कमलेश को मिलने का वादा भी करता था ।परीक्षाएँ हुई ।रिज़ल्ट भी आया दोनो पास हो गए ।और स्कूल कि छुटियाँ पड़ गई ।आज स्कूल में इस साल का आखिरी दिन था।दोनो वापर घर की तरफ आ रहे थे।दोनो चीड के उस घने पेड़ के पास बैठ गए जहां वो रोज बैठते थे ।चीड के पेड़ से साँय सांय की हवा चल रही थी । दोनो आपस मे बातें कर रहे थे ।"किशन अब तो तू दिल्ली जाएगा तो मुझे ये पेड़ जिस पर हमने अपने नाम लिखें हैं ये रास्ते ये पकडंडियाँ ये स्कूल याद करेगा "भ्रांतिचित भाव से कमलेश बोली ।
"हाँ कम्मू मुझे ये सब बहुत याद आएंगे " उसने एक बार पेड़ पर उस जगह नजर डाली जिस पर दोनों के नाम लिखे थे ।
"अभी तो बस मुझे दिल्ली जाकर पढ़ने की बड़ी इच्छा है"
मैं खूब पढ़ना चाहता हूं बहुत बहुत । वह उत्कंठित भाव से बोला। कमलेश के चेहरे पर फिर से कुछ गमगीन से भाव उभरे ,मगर किशन तो बस शहर जाने को उत्सुक होने की वजह से कुछ भी समझ ना सका ।अपने गांव से कमलेश किशन को बहुत देर तक विषादयुक्त भाव से जाते देखती रही।
किशन अब अपने पिता जी के साथ दिल्ली आ गया ।और नए स्कूल में एड्मिसन लिया ।शहर की आबोहवा उसे इतनी भाई कि वह गांव गली स्कूल पहाड़ पकडण्डी सब भूल गया,पढ़ाई के ध्यान में वह कमलेश को भी भूल गया । बस उसे याद था तो बस अपना लक्ष्य ,उसे शीर्ष तक पहुंचना था ।गर्मी की छुट्टियों में भी वह गांव नही जा सका । ठीक दो साल बाद वह चार पांच दिनों के लिए गांव आया , पुराने दोस्तों से मिला,उसने कमलेश के बारे में पूछा तो पता चला कि वह देहरा दून में अपने किसी रिश्तेदार के यहां पढ़ने चली गई है ।उस जमाने मे संचार माध्यम के नाम पर केवल एक चीज हुआ करती थी ,चिट्ठी.....। ज्यादा हुआ तो टेलीग्राम ।चिट्ठी किशन भेज नही सकता था ,पता नही कोई क्या समझ बैठे ।बदनामी का डर अलग से । वह खिन्न हो कर राह गया । समय बीतता गया,उसका ध्यान कामलेश की तरफ से भी हट गया ।
बीच मे कई बार गांव वह गया भी मगर वह अपनी पढ़ाई और दूसरे कामो में व्यस्त रहने लगा ।
आज किशन यानी मैं पढ़ लिख कर पॉलिटेक्निक से इंजिनीयर बन गया हूँ ।और बखूबी अपने को सफल मानता हूं ।अब मेरे पास समय का इतना आभाव नही है ।चार दिन के ब्लॉक हॉलिडे के होने की वजह से गांव आया हूँ। मन के किसी कोने से एक आह्वाहन हुआ ,क्यो न पुराने स्कूल घूम कर आऊं तो बाइक उठाई और चल पड़ा ।मष्तिस्क में कुछ धुंदली यादें उभरने लगी थी ।जिसमे कमलेश का मासूम चेहरा भी था ।शायद कही कुछ पता चले या मिल भी जाये । अब सारे गांव में सड़के थी लोग पैदल भी सड़कों से ही आते जाते थे ।
वहां आकर देखा तो अचंम्भे में पड़ गया ।काफी देर तक बाइक पर ही बैठा उस स्कूल को देख रहा था ।उतर कर एक ढाबे में गया ।और चाय मंगवाई ।सब कुछ बदल गया था ।ना तो वो दुकाने थी, ना वो पुराना स्कूल,ना वो पकडण्डी,ना वहां चीड का घना पेड़,ना वो पुराने गुरु जी ।सब बदल गया था ।बीस साल कुछ कम भी तो नही होते।ना स्कूल में कोई किशन था और ना कोई कमलेश,वह स्कूल शहर के स्कूलों से किसी भी तरह उन्नीस नही था ।दो तीन दुकानों की जगह आज यहां किलोमीटर से लंबा बाजार था ।चीड के पेड़ों का वो जंगलभी अब घना नही लग रहा था आस पास की वो हरियाली और बड़े बड़े खेत भी अब दुकानों और मकानो का रूप ले चुके थे ।एक्का दुक्का पेड़ ही थे । विकाश के चक्र ने हमारी वो पुरानी पहचान मिटा दी थी । विकाश जरूरी है मगर पुरानी सांस्क्रतिक विरासत की कीमत पर नही । अब कमलेश का चेहरा उभर कर सामने मह्सूस होने लगा था ।एक एक कर कमलेश की स्नेह से भरी बातें याद आने लगी थी।चाहत के वो पल मष्तिस्क के चारों ओर घूमने लगे थे ।वो कट्टी करना,औ र वो फिर से एक होना ,वो गुरु जी के पीटने पर हाथ को सहलाना,वो मेरे दिल्ली जाने की बात पर उसके चेहरे के भाव बदल जाना,ओह.... दिल रो उठा,एक टीस सी उभर गई,और अंदर से आवाज आई कमलेश...तुम कहाँ हो ।अपने आपको में कोसने लगा ।मगर अब वक्त निकल चुका था ।और वक्त लौट कर नही आ सकता । अंतर की पीड़ा को किसे बताऊं,और बता कर फायदा भी क्या । भ्रमित होकर मन सोच रहा था कमलेश सामने दिख जाए ,में उसे अपने बाहुपाश में लैलूं और जी भरकर उसके कंधे पर शर रख कर रोऊँ ,और उससे माफी माँगूँ ,और कहूँ कमलेश मुझे माफ़ कर दो मैं तुम्हे समझ ना सका,अब मेरा जीवन तुम्हारे हवाले है । मगर ऐसा अब संभव नही था ,हताश मन रो उठा,पलकें जब आंसुओं का बोझ ना सह सकी तो टप टप कर गालों पर लुढ़कने लगी ।तभी आवाज आई "भाई जी" क्या हुआ बहुत देर से देख रहा हूँ।गम सुम बैठे हो । अरे आपकी आंखों में आंसू....।मैं चौंक गया, मेरी तंद्रा टूट गई,अ.. नही...तो ,शायद कुछ गिर गया है आंख में रुमाल से पोंछते हुए मैंने कहा ।सच्चे प्रेम के उभरते आवेश को मैंने झूट के कवच से ढक लिया ।और चाय के पैसे उसे देकर वहां से बाइक पर अपने गाँव की तरफ चल पड़ा ।
भगवान सिंह रावत( स्वरचित)
दिल्ली
Friday, September 23, 2022
यादों की परछाई ( भाग 2)
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