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Friday, September 23, 2022

यादों की परछाइयां (भाग 1)


 सड़क के किनारे खुले  ढाबे में बैठा ,उस स्कूल को देख रहा था । पांचवी तक का , अच्छा , सीमेंट का पक्का बना  हुआ । बच्चे बैंचों पर बैठे पढ़ रहे थे । सबने यूनिफार्म पहनी थी , टीचर उन्हें ब्लॉक बोर्ड पर लिखते हुए पढा रहह था । थोड़ी दूर पर चार दिवारी थी । उसके बाद एक पीपल का पुराना पेड़ था ,और सामने कु छ दूरी पर  जूनियर हाई स्कूल था ,और फिर इण्टर कॉलेज था । सड़क के कुछ दूर मोड़ पर पोलिटेक्निक इंसिट्यूट था ।और यहां स्कूल के सामने बड़ी सी  मार्किट खुली थी ।जो कि परचून की दुकान के अलावा रेस्टोरेंट  और इलेक्ट्रिक और बार्बर शॉप,और  साइबर कैफे वगेरह वगेरह ,ये शृंखला लगभग पूरे एक किलोमीटर से भी ज्यादा लंबी   थी । सब कूछ बदला हुआ सा लग रहा था । पूरे बीस साल बाद आया था मैं यहां,  इस लिये किसी के पहचानने का कोई मतलब नही रह जाता । यूँ तो मैं जानता था कि वक्त  की धूल दुनिया में हर किसी की पहचान पर सपनी छाप छोड  जाती है ।और वो भी बीस  साल, एक चेहरे को बदलने के लिए बहुत थे ।फिरभी दिल चाह रहा था कि कोई मुझे पहचाने ,और मैं किसी को पहचानू । लेकिन ये मेरा कोरा भ्रम था ,लेकिन जो मैं देख रहा था वह कतई भ्रम नही था । यादों की वो परछाइयां आज भी मेरे दिलो दिमाग पर  छाई हुई थी ।आज से ठीक बीस साल पहले इसी स्कूल में कुछ बच्चे एक लंबी सी दरी पर बैठ कर पढ़ रहे हैं ।मास्टर जी कुर्सी पर विराज मांन हैं ।स्कूल में दो कमरे हैं , एक छोटा कमराऔर है ।जो किचन में बदला गया है ।कुल पच्चीस तीस बच्चे हैं ।एक से पांच कक्षा तक ,सभी एक साथ बैठे हैं । एक दुसरी  दरी मास्टर साहब के दूसरी ओर बिछी है जिसपर गिनती की सात लड़कियां बैठी थी । सामने रंग से दीवार पर लिखा था " बेसिक पाठशाला "।पत्थरो की दीवार से बनी चार दिवारी के बाद एक पीपल का घना पुराना पेड था।पेड़ के  थोड़ी दूर पर चार कमरों का बना जूनियर हाई स्कूल था ।जिसके आस पास रास्ते के दूसरी तरफ एक चाय की दुकान थी,और एक दो और राशन पानी की दुकाने थी ।चारों तरफ़ घने पेड़ों की वज़ह से हरियाली थी ।स्कूल और दुकानों के एक रास्ता था जो दुसरे गाँव की तरफ़ जाता था।

" अरे बच्चों ,शोर नही " "कक्षा चार से इंद्रमणि खड़े हो जाओ 

तुम दसवां पाठ  जोर से पढ़ो , सब  विद्यार्ती ध्यान से सुनो '"।मास्टर जी के कहने पर लड़का जोर जोर से   किताब में से   अध्याय पढ़ने  लगा । सब बच्चों का ध्यान किताब पर था । मास्टर जी चहलकदमी करने लगे । बच्चों की यूनिफार्म के नाम पर कुछ नही था ,सब अपने घर के कपड़े पहन कर आये थे ।किसी बच्चे की कमीज का पल्लू लटक रहा था तो किसी ने कमीज के बटन ऊपर नीचे लगा रखे थे।मास्टर साहब का बहुत खौफ़ हुआ करता था ,इस लिए सब चुप चाप अनुशासन में रहते थे ।तभी दो बच्चे एक बाल्टी में पानी भर कर लाते नजर आए ।उन दो बच्चों ने बाल्टी में डंडा फसा कर कंधे पर  रखा हुआ था । वह पानी लेकर आये औऱ किचन के पास रख दिया । मास्टर जी बोले "अरे खेम सिंह तू किचन में काम देख ,और पवन तू आकर यहां बैठ जा " । मास्टर जी के अनुसार खेम सिंह अपने काम में लग गया । उस ज़माने में इसी तरह मास्टर के सारे काम छात्रों को करने पड़ते थे । और पवन बैठ गया । बच्चों में एक मै भी हुँ ।चुप चाप एक कोने में बैठा ,किताब में ध्यान लगाएं हुए  ",किशन " ।

दोपहर के एक बजे किसी बच्चे ने घंटी बजाई और छुट्टी की घोषणा होने पर सब बच्चे हल्ला मचाते हुये खड़े हो गये ।कुछ बच्चे स्कूल के बाएं तरफ और कुछ दांयें  अपने गांव की तरफ चल पड़े । किसन भी अपना बास्ता उठा कर चलने को हुआ,"चल किशन आजा "पास में खड़ी कमलेश बोली ।"हाँ चल" और वो दोनों स्कूल के बाईं तरफ उस पकडण्डी पर चल पड़े , जिस पर वो दोनों साथ साथ आते जाते थे ।थोड़ी दूर पर ही कमलेश का गांव था ।किशन का गांव उसके बाद पड़ता था । अगले दिन किशन आकर दरी पर चुप चाप आकर बैठ गया  । "अरे किशन खाली हाथ आया है ,लकड़ी नही लाया "खड़ा होजा"  मास्टर जी बोले "जी गुरु जी आज भूल गया "और मास्टर जी ने दंड स्वरूप दो फूटे कस कर उसके हाथ पर दे मारे ।किशन हाथ झाड़ता हुआ  पीड़ा को रोकते हुए बैठ गया ।मास्टर जी वही स्कूल में निवास करते थे ।खाना पीना वही होता था ।इसलिए सारा सामान छात्रों से जुटाया जाता था ।कोरा राशन दूध  दाल चावल नइ शब्जी वगैरा वगेरा ।एक लकडी का डंडा भी हर छात्र को लाना अनिवार्य था, मास्टर सरकारी होता था,मगर  गांव के लोग बहुत पुराने समय से श्रध्दा स्वरूप अनाज मास्टर जी के यहां दे दिया करते थे ,परन्तु अब  हर माह  ले कर आने का नियम बनाया गया था ।जिसके पालन न होने पर बच्चों को दंडित किया जाता था  । पानी थोडी दूर था तो दो लड़के बाल्टी में पानी ले आते थे । दोपहर में जब छुट्टी हुई तो घर जाते हुए किशन और कमलेश एक चीड के  घने  पेड़ के पास रुक गए ,जहां वो दोनों  अक्सर रुकते थे,वहां पर पूरा जंगल चीड के पेड़ों से ढका था ।थोड़ा सुस्ता कर फिर जाते थे । और कुछ देर बात चीत करते थे ।

" किशन ,मास्टर जी ने तुम्हे क्यों मारा "कमलेश बोली अरे वो में आज लकड़ी लाना भूल गया था ।  ओहो.....ये गुरु जी भी बहुत बुरे हैं , मुझे बताते मैं तुम्हे घर से दे देती ।कमलेश किशन के हाथ पकड़ते  बोली । "सुबह में देर  हो गई ना , तुम्हे कहां से बताता । दूसरा हाथ भी तो देखो ना वह बोला ।कमलेश हाथ झटकते बोली " धत  पागल "और दोनों हंस पड़े और दोनों घर की तरफ चल पड़े । इसी तरह की हंसी मजाक आपस मे चलती रहती थी । 

अभी स्कूल में हाफ टाइम हुआ है ।बच्चे अपना अपना खाना खा रहे है । 

"किशन , रोटी लाया है ना"कमलेश बोली ।

"हाँ चल उस पत्थर पर बैठते है " किशन बोला ।मैं तो रोटी के साथ गुड़ लाया हूँ ।तेरे पास क्या है ? "कल रात बाबा खेत से  सीताफल तोड़ कर लाये थे ।वही लाई हूं " फिर दोनों स्कूल की चार दिवारी के पास एक बड़े पत्थर पर बैठ गए और खाना खाने लगे । दोनो की उम्र नौ या दस के लग भग होगी ।दोनो का आपस मे लगाव जरूर था ।मगर दोनो झगड़ते भी थे ।कुट्टी भी होती थी । एक बार गलती से किशन की स्याही की बोतल अचानक देखेने दिखाने के चक्कर मे पट्ट से गिर गई और फ़ूट गई । अब क्या था किशन नाराज हो गया ।"पगली कहीं की ये क्या कर दिया ,अब घर जाकर दादा जी हुक्के के नैचे से पिटाई करेंगे "।अरे तू मेरी बोतल ले ले कमलेश बोली।" हट  दादा जी पूछेंगे तो क्या कहूंगा " दोनो स्कूल आगये उस दिन दोनो कुछ ना बोले  दोनो अलग ही रहे ।  कमलेश भी बिफ़र पड़ी और घर जाते हुए बोली जा तेरी मेरी कट्टी ।और दांत में नाखून फंसा कर उसकी तरफ उछालते कट्टी की रस्म पूरी की ।ये प्रक्रिया उसने दो तीन बार की ।इसी तरह कट्टी  होती थी बच्चों में ।और फिर दोनों अलग अलग हो गए ।दो तीन दिन दोनो ने आपस मे बात भी नही की ।दोनों एक दूसरे को काट खाने वाली नजरों से देखते रहे । अगले दिन मास्टर साहब कुर्सी पर बैठे हाजरी ले रहे है ।"चन्दर सिंह"एक लड़का  खड़ा होकर "उपस्थित गुरु जी"

"ज्योत सिंह"  "उपस्थित गुरु जी " दूसरा लड़का बोला ।

"उमेद सिंह" 'उपस्थित गुरु जी"

"कुंदन सिंह" "उपस्थित गुरु जी"

"किशन सिंह".........."किशन सिंह"मास्टर जी जोर से बोले ।

तभी एक लड़का खड़ा होकर बोला " गुरु जी किशन आज नही आया " क्यों नही आया  गुरु जी बोले ।

गुरु जी उसे बुखार है ।ठीक है बैठ जाओ । और मास्टर साहब और बच्चों की हाजरी लेने लगे ।

कामकेश के कानों में आवाज सुनाई दी " वह नही आया और उसे बुखार है "।पहले कमलेश ने ज्यादा ध्यान नही दिया, पर थोड़ी देर बाद वह सोंचने लगी ,क्या हुआ होगा किशन को ,क्या सचमुच उसे बुखार है ? उसके दिमाग  से कट्टी वाली बात हट गई ।उसने मास्टर जी के जाने के बाद तुरंत उस लड़के से पुछा , किशन को बुखार कैसे आ गया ? कल तो वह ठीक था । अरे कल उसका और  कर्ण सिंह का  पानी लाने का नंबर था । तो पानी से भीग गया । गीले कपड़ों में ही घर गया था । ठंड लग गई शायद लड़का बोला ।ओह..... ये बात है कमलेश के मुह से निकला ।और वह वापस आकर बैठ गई ।  अपने आप को कोसने लगी । किस समय उसने कट्टी की किशन से ।बिचारा बीमार हो गया ।अपने आप को कोसने लगी ।अगले दिन भी किशन को कमलेश की नजरें ढूंढती रही ,मगर किशन नही दिखा, उसे उत्सुकता होने लगी ।क्या इतना ज्यादा बीमार हो गया कि आज भी नही आ सका ।वह उसके साथी से पूछना चाहती थी ,मगर वह टाल गई ,पता नही क्या समझेगा ।वह कहेगा कल ही बताया था बुखार है । किसी के प्रति हमदर्दी भी दिखाना  लोगों को चुभता है । वह विषाद से भर उठी । जब तीसरे दिन वह स्कूल पहुंची तो उसकी नजर किशन की क्लास पेर पड़ी ,उसे अचानक किशन दिखा , तब वह आस्वस्त हुई ।चलो अब ठीक है ,अंतर्मन से आवाज आई ।मगर वह चुप चाप बैठा था । बीमार था ना इसलिए सुस्त है,कमलेश मानो अपने आप से कह रही थी ।जब हाफ टाइम हुआ तो कमलेश किशन के पास आई ,और कुछ सकुचाते बोली "किशन कैसी है तबियत " 

किशन ने नजर उठाकर देखा "अभी तो कुछ ठीक हूं "किशन बोला

 "बुखार तो नही है ना"कमलेश बोली ।

"रोटी खायेगा ना"

हाँ  और फिर कमलेश उसका हाथ पकड़ कर उसी जगह ले गई जहां वह रोज बैठते थे ।कमलेश अपने हाथ से उसे खिलाने लगी ।

"मगर हमारी तो कट्टी है"

"हट पागल ऐसे में कही कट्टी होती है"

"चुप चाप खा नही तो कमजोर हो जाएगा " ।और दोनो खाना  खाने लगे ।

दोपहर की छुटी के बाद जब वह उस चीड़ के घने पेड़ के पास बैठे तो । कमलेश ने पेड़ के तने पर छीली हुई जगह पर उसे दिखाया ,किशन ने देखा वहां किशन लिखा था । 

"चल अब तू भी मेरा नाम यहां पर लिख दे"

जब भी हम में से कोई अकेला होगा ना तो यहां पर बैठ कर लगेगा जैसे मेरे साथ है। पिछले दो दिन से मैं यही बैठती हूं 

तब मुझे अकेलापन नही लगता ।अपने प्रति इतनी हमदर्दी देख  कर किशन भाव व्हिभोर हो गया ,और जाने क्या हुआ,किशन रुआंसा हो गया ।कमलेश ने देखा तो बोली " ,अरे क्या हुआ"और उसको अपने  करीब खींच कर उसके कन्धे पेर हाथ से सहलाया  ।चुप हो जा, रोता क्यों है ,? वह सुबक सुबक कर रोने लगा ।बहुत देर तक कमलेश उसका कंधा  पकड़ कर चुप कराती रही । "आज से तेरी मेरी कट्टी खत्म ।दोनो खिल खिला कर  हंस पड़े और फिर दोनों घर को चल पड़े।अब दोनो की दोस्ती पहले से पक्की हो गई थी । अब स्कल आते हुए भी कमलेश किशन का इंतजार करती रहती थी,दोनो साथ साथ स्कूलआते जाते थे ।

शेष अगले भाग में.......।

                  भगवान सिंह रावत (स्वरचित)

                          दिल्ली 


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