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Tuesday, September 13, 2022

खामोशी


 घर के आगे कुर्सी  लगाकअपने विचारों का मंथन करता  जाने कितना समय बीत गया ।पता तब चला जब पुष्पा कोअपने घर के आगे बैठे देखा। वह भी गमसुम सी बैठी थी ,उदास सा चेहरा लिए फर्श पर उंगलियों से कुछ टेढ़ी मेढ़ी आकृति बनाती चुप चाप ।

मै समझ गया जो विचारों का मंथन मेरे मन में चल रहा था वही  ध्वंद  उसके मन मे भी  चल रहा था।मैं फिर से विचारों के सैलाब में खो गया।बचपन से किशोर अवस्था मे भागती जिंदगी ।स्कूल से आते जाते ,हाथ  पकड़ कर,साथ साथ स्कूल का काम करते, साथ साथ खेलते,कभी शरारत करते कभी रूठते कभी एक दूसरे को मनाते।  एक बार पुष्पा को खेल प्रतियोगिता में  एक मैडल मिला।  सबसे पहले वह  मेरे पास आई, "राजीव देखो तो ,अच्छा है ना"वह बहुत खुश थी। मैंने भी खुशी जाहिर की।  "बहुत खुबशुरत है " । समय पंख लग कर तेजी से उड़ रहा था। कब हम दोनों ने बचपन से जवानी की दहलीज पर कदम रखे पता ही न चला।वो लोग  और हमारा परिवार अलग अलग राज्यों से थे। दिल्ली में पड़ोस में रहते थे। वो लोग राजस्थान के थे ,और में पहाड़ से था । और रिश्तेदारों  के साथ उनके पडोस में रहता था।धीरे धीरे हमारी चुल बुलाहट खामोशी मे बदल गई।हम दोनो प्रेम के अथाह सागर में  डूब चुके थे।   हमारा अमर प्रेम  शब्दों और इजहार का मोहताज नही था।   मेरे द्वारा बताई गई बातों का अनुसरण करना।और उसके द्वारा कहे गए हर निर्देश को सरआंखों पर रखना अब नियति बन गई थी।हम दोनों का प्रेम भी अजीब था  हम जानते सब कुछ थे। मगर  इजहार कभी नही किया। एक दूसरे पर जान छिडकते थे। मगर मुह से कभी कहा नही।एक खामोसी  थी  एक अहसास था। तभी एक घटना घट गई।मेरे परिवार में मेरे विवाह की बाते होने लगी।मैंने अपना निर्णय सबको बताया जब तक मेरी ट्रेनिंग पूरी नही होती मैं ये सब नही चाहता। और बाद में अपने पसंद से करूंगा, अभी तो कतई नही।गांव से ये फैसला आया शादी तुम जब चाहे तब करना अभी तो हम खोज बीन कर रहे हैं,ऐसी लड़की जो हमारी जमीन जायदाद को चला सके।जो हमारी संस्कृति की हो । हमारी परंपरा  को समझ सके।और गांव के वातावरण में पली बढ़ी हो।परिवार का ये फैसला सुन कर मैं सन्न राह गया। एक तरफ माता पिता की इच्छाओं का सैलाब था,दूसरी तरफ पुष्पा का खामोश प्रेम था।एक तरफ परिवार और समाज  की रूढ़िवादी परम्पराओं का बोझ था,तो दूसरी तरफ उन्मुक्त  प्रेम  का सपना था। मैं बहुत बड़े द्वंद्व में था।पुष्पा को कैसे बताऊं ये बात,  मगर आधिक दिनों तक ये बात छुपी न रह सकी।गॉंव से बाबू जी आये और उन्होंने वही बात मुझे बताई। बेटा तुम्हारी माँ अब काम के बोझ से टूट चुकी है। उसे कोई साथ देने वाला चाहिए। उसने जो सपने देखे हैं उसे पूरा करने का समय आ गया है।मैंने कुछ संतोष जनक जवाब नही दिया। फिर आस पड़ोस के लोग भी उनसे मिले। और बात वहां तक पहुंच ही गई। तब एक दिन पुष्पा मुझ से मिली और उसने कहा।"राजीव तुम्हारे बाबू जी आये थे ? गांव से,सुना है तुम्हारी शादी की तैयारी कर रहे हैं वो लोग" मुबारक हो । मुझ से कुछ बोलते नही बन पड़ा ।पर मैंने देखा हल्की सी मुश्कान के पीछे की पीड़ा को ।जो स्पष्ट मुखरित हो  रही थी ।"अरे नही ऐसी बात नही है, वो तो पूछने आये थे बस "

मैंने झूठ बोल दिया। "ये तो खुशी की बात है"

वह बोली और चली गई। मन मे अंधेरा छाने लगा था। तभी एक घटना और घटी,  उसके पिता का ट्रान्सफर उनके पुस्तैनी शहर  में हो गया ।और वो भी राजस्थान जाने की तैयारी करने लगे ।वो लोग कुल तीन प्राणी थे। ऐसा नही था कि वह मेरी दुविधा नही समझती थी ।वह जानती थी कि मैं अपने परिवार के फैसले से खुश नही हूँ ।मगर उसने इस बात का अपने व्यवहार पर कोई असर नही आने दिया।आज शाम की गाड़ी से वे लोग अपने शहर चले जायेंगे। मैं कुर्सी पर बैठा बैठाअपनी उधेड़बुन में लगा था। अब सब कुछ खत्म हो जाएगा। क्या हस्र होगा हमारे प्रेम का ? हम कभी मिल नही पाएंगे ?विचारों के उतार चढ़ाव अपने चरम पर थे ।पुष्पा अभी भी वहीं पर बैठी थी। मन रुंआसा हो चला था। तब मैं वहां  से उठा और अपने रूम के अंदर चला आया ।और बैठ गया ।कुछ देर बाद मैंने देखा तो मैं अवाक रह गया ।दरवाजे पर पुष्पा खड़ी थी।वह धीरे धीरे पास आई ,और बोली "राजीव हम लोग शाम को जा रहे हैं,सोचा तुमसे मिल तो लूँ "मेरे सब्र का बांध टूट गया,सारा विषाद मेरी आँखों से बूंद बनकर बहने लगा ।एक पल के लिए वह खामोश रही । फिर उसने मेरे दोनो हाथ पकड़ कर अपने हाथ मे लिए ।और बोली "राजीव,तुम इतने कमजोर  बन जाओगे ,ऐसा मैं नही समझती थी" मैं प्रश्नवाचक सा उसकी तरफ देखता रहा "हाँ राजीव इतने कमजोर न बनो ,हमारा प्रेम कोई  दुनिया की  रीत  का मोहतज नही,हमारा प्रेम दुनिया के बंधनों में बंधकर  रहने वाला नही है,हमारा प्रेमआकाश की ऊंचाइयों  से भी ऊंचा है ,और सागरकी गहराईयों  से भी गहरा है" । "हमारा प्रेम खामोर्श है ।क्या हुआ जो  हम मिल नही पाएंगे ,नदी के दो किनारे मिलते नही है ,मगर  आमने सामने तो रहते हैं ,क्या हुआ जो हमारे प्रेम को नाम नही मिला , में पुष्पा के इस नए रूप को देख कर गद गद हो उठा था ।सच कहूं तो आज ही मैंने उसके हाथों का स्पर्श किया था  उसने मेरे हाथ अपने होटों तक लेजाकेर चुम लिए । "हमारा प्रेम खामोशी का पथिक  है" "तुम्हे हमारे इस खामोश प्रेम की कसम है ,अपने मन मे किसी तरह के विषाद को जगह मत दो " और वह धीरे धीरे चली गई । मेरे मन का सारा ध्वंद साफ हो चुका था ।उसकी बातें मेरे जहन में उतर चुकी थी ।मैं ही नासमझ था । आज मुझे प्रेम का सच्चा अर्थ  समझ मे आ चुका था। मैं अपने को गौरवान्वित  महसूस कर रहा था । अंतर्मन का विषाद एक नूतन  अनुभूति में बदल गया था ।

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