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Saturday, August 27, 2022

ईश्क के नाम पर

 खटाक.....खटाक......खटाक.....…। की आवाज से से आस पास की निस्तब्धता भंग हो रही थी ।रुक्मी के हाथ उस बड़े से घण पर मजबूती से  जकड़े थे ।वह घुमा घुमा कर घण लोहे की पटिया पर रखे  लोहे के  टुकड़े पर मार रही थी ।घण लोहे का आकार बदलने में मशगूल था ।सामने सफ़ेद  और काली लंबी मूछों वाला अधेड़ उम्र का घासी राम संडासी से उस लोहे के टुकड़े को पकड़े था ।घासी राम रुक्मी का बाप था। ।घासी राम बारबार उस लौहे को भट्टि मे रख देता और फिर उसे संडासी से पकड़ कर रुकमी को घण चलाने को कहता था।  काफी देर बाद घासी राम बोला  " बस.. बस.. अब हो गया छोरी ,थोड़ी देर सुस्ता ले " तब रुकमी पास पड़े खटोले पर बैठ गई।

जरा सी देर बैठी होगी कि उसे कहीं से  बारात के बाजों का स्वर सुनाई पड़ा ।उसने देखा,दूर पुराने खंडहर की तरफ से एक बारात चढ़ी चली आ रही थी ।वह ध्यान से देखने लगी। बारात नजदीक आती जा रही थी ।बारात सामने आ चूकी थी ।कुछ लोग बैंड बाजे की धुन पर  नाच रहे थे ।तभी उसका माथा ठनका , ये तो वही है मदन... हाँ मदन हीँ तो है ,जो नाच रहा है ।तो घोड़ी पर  चढ़ा ये कौन होगा ? तभी उसने घोड़ी पर बैठे दूल्हे को देखा, जो शेहरे के वजह से दिखाई नही पड़ रहा था ।तभी किसी ने दूल्हे से कुछ कहा, तो चेहरा स्पस्ट दिख गया ।

 ओह ...तो ये धीरज है,रुकमी सब समझ गई । उसकी आँखों मे यका यक क्रोध फूट पड़ा ,उसके हाथों की पकड़ घण के हत्थे पर और मजबूत होने लगी थी । मगर  बदनामी के डर से वह खामोश रही । रुक्मी की आंखों में वह सपना अचानक तैर गया ,जो उसने अंजाने में देख लिया था ।अठारह बरस की रुक्मी थोड़े पक्के रंग की जरूर थी,मगर उसका चेहरा देखने मे बहुत आकर्षक था ।शरीर भी योवन की दहलीज पर आकर सुडौल हो चुका था,मुस्कुराती तो लगता मोती  बिखर गए हों ।उन लोहारों की तीन गाड़ियां सड़क के किनारे लगी थी ।तीन गाड़ियां मतलाब तीन परिवार ।रुक्मी अपने बाबा घासी राम और अम्मा भूरी देवी के साथ रहती थी एक छोटा भाई भी था ।जो अभी छोटा था ।पास में ही एक कस्बा था ।जहां बड़े बड़े मकान थे । और थोड़ी दूर पर एक स्कूल था जो कि एक खंडहर जैसा हो चला  था ।शायद कभी यहां बच्चे पढ़ने आते  होंगे , मगर अब सिर्फकुछ दीवारें कुछ बेंच और कुछ लोहे की चद्दरें बची  थी । खंडहर के पास एक कोयले की दुकान थी । जहां कभी कभी रुक्मी कोयला लेने जाया करती थी । 

उस दिन रुकमी कोयला ले कर वापस आ रही थी,सामने ही एक अच्छी कदकाठी का युवक खड़ा था ।बोला "अरे तुम  वही लोहार हो न जो आगे मोड़ पर रहते हो "? "हाँ मैं वहीं रहती हूँ" रुक्मी बोली , तभी कहूँ कहां देखा है तुम्हे ? "एक बार आया था मैं वहां" ,वह युवक गोरा चिट्टा खूब सूरत था ।रुक्मी  रुकी और बोली "क्या काम है आपणे" "नही काम  कुछ नही है ऐसे ही पूछ लिया,गलत मत  समझना " वह बोला ।रुकमी को वह युवक भला दिखा ।जाने क्या था जो उसे बात करने पर मजबूर कर रहा था ।"क्या नाम है तुम्हारा "उसने  पूछा । रुकमी ...वह बोली । "बड़ी मेहनत करते हो  तुम लोग" "लोहे से दिन रात खेलना मजाक नही" वह बोला ।मेरा नाम धीरज हैं ,सामने बस्ती मे रहता हूँ  । काँई करे साहिब मजबूरी है ,खानदानी काम है । समझ सकता हूँ ,बड़ा दर्द है आप लोगों की जिंदगी में ।रुकमी को लगा ये कोई भला मानुष है । और दोचार इधर उधर की बाते हुई ।"चालूं साहिब ,घणा काम  पीटणा है "। रुकमी बोली ।और वापस अपने खेमे  में आ गई । 

धीरज का चेहरा उसके दिमाग से नही हट रहा था ।ऐसे लोग कहाँ  मिलते हैं आज के समय में ।इसी उधेड़ बुन में वह सो गई । तीन दिन बाद रुक्मी  उसी रास्ते बस्ती में किसी के ऑर्डर पर बनाये औजार देने गई । तभी उसे एक आवाज सुनाई पड़ी,रुक्मी ....रुको,संयोग वश वह धीरज था ।वह मुश्करा दी ।"अरे साहिब आप "  हाँ ,कब से आवाज दे रहा हूँ ।  "यहां कैसे" "सामान देने आई थी किसी का " रुकमी बोली ।अच्छा ..अच्छा..।और वह सामने  बागीचे में लकड़ी के बेंच पर बैठ गया ।रुकमी भी एक तरफ बैठ गई ।"मुश्कराती हो तो फूल झरते है "धीरज बोला ।"क्या अजाक करते हो साहिब""      

"मैं सच बोल रहा हूँ ये झूट नही है"रुक्मी को मानो विश्वास  होने लगा था ,वह फिर मुश्करा दी ।"कितनी सुंदर हो तुम,बला की खूबसूरत"धीरज बोला ।रुक्मी लाज से भर उठी,उसने नजर झुका ली । जाने क्या हो गया था उसे, ऐसा तो उसे कभी महसूस नही हुआ था ।एक अजीब तरह के अहसास की अनुभूति हो रही थी ।बात करने को कुछ मिल ही नही रहा था,बड़ी मशक्कत से उसने कुछ शब्दों को इकट्ठा कर कहा"क्या साहिब हम लोग तो गरीब हैं "।"हम कहाँ  हैं 

सुंदर तो आप हैं " "अच्छा  में  तुम्हे अछा लगता हूँ "?धीरज ने कहा । हाँ हाँ आप अच्छे हो साहिब ।आगे रुक्मी कुछ कह ना पाई और एक बार धीरज की तरफ देखा,वह धीरज की नजरों का सामना नही कर सकी और हथेली से मुह छिपा लिया ।तुमने कभी अपने आप को सीसे मे देखा है ?धीरज बोला तुम बहुत सुंदर हो । मुझे तो तुम दिल से खूबसूरत लगती हो ।रुक्मी ने अपने चेहरे से हथेली हटाई ,उसका चेहरा लाज से लाल हो गया था ।उसने बड़ी हिम्मत जुटाकर धीरज की तरफ मुस्कुराते हुए देखा ।और उठकर बोली" चालूं साहिब' और जल्दी जल्दी चल पड़ी ।

उस रात रुकमी को बहुत देर तक नींद नही आई, वह बार बार उठ कर सीसे मै अपना अक्श देखती फिर सरमा जाती और धीरज की बाते उसे याद आती ।उसे धीरज अच्छा लगा था ।उसने एक ही रात में जाने कितने सपने देख डाले थे ।अब उसे धीरज से अगले दिन मिलने की उत्सुकता होने लगी थी ।वह अक्सर सुनती ही रहती थी ,फलां लड़की को फलां लड़के से प्यार हो गया। ।वह उसे अपना दिल दे बैठी । वह लड़का किसी के प्यार में दीवाना हो गया ,वगेरा,वगेरा....।

अगले दिन वह साफ से कपड़े पहन कर शामको कोयले के लिए बाजार गई ।अपनी लोहारी पोशाक घागरा चोली और एक दुपट्टा पहन कर वह बहुत सुंदर दिख रही थी ।रुक्मी सोच रही थी क्या बात करेगी धीरज से ?कहीं आज तो शर्म के मारे फिर से मुह तो नही ढकेगी ?कुछ भी हो आज तो खुल के बात करेगी वह धीरज से और शर्माएगी तो बिल्कुल भी नही ।आपनी बातो की श्रृंखला को आपस मे जोड़ती रुक्मी दुकान से कोयला खरीद कर वापस हुई ,दस कदम ही चली थी कि किसी ने उसके कंधे पर हल्का हाथ रखा ।वह चौंकी ...कौन  ? तभी उसे धीरज का मुस्कुराता चेहरा दिखा ।"अरे साहिब आप "? वह मुड़ी और रुक गई । हल्का अंधेरा छा गया था । "आओ चलो वहां बैठते हैं "धीरज रुकमी का हाथ पकड़ कर उस पुराने स्कूल की तरफ इशारा करते बोला । रुकमी सहज ही उसके साथ चल पड़ी ।जैसे वह इस बात का इंतजार ही कर रही हो ।दोनो बेंच पर बैठ गए ।पहली बार इस उम्र में किसी पराये के हाथों का स्पर्श अपने हाथों पर पा कर वह अजीब सी अनुभूति महसूस करने लगी ।अपने शरीर मे उसे तरंगें सी महसूस होने लगी ।"रुकमी  मैं तुम्हे दिल से चाहने लगा हूँ ,तुम्हे अपनाना चाहता हूं " "तुम्हारे बगैर कुछ अच्छा नही लगता "।धीरज बोला "कैसी बात करो हो साहिब,हम ठहरे लोहार,और आप अच्छे घर के पढ़े लिखे लोग,ऐसा कैसे हो जाएगा बोलो तो"रुक्मी बोली । तभी धीरज ने रुक्मी का हाथ पकड़ कर आपने हाथ मे ले कर कहा "हम दोनो चाहेंगे तो क्यों नही होगा " ? उसने रुक्मी का हाथ चूम लिया ।रुकमी के शरीर मे एक सिहरन सी दौड़ गई ।  साहिब....और उसने  अपना शर धीरज के कंधे पर टिका दिया ।बहुत देर तक खामोशी छाई रही । "साहिब क्या तुम मुझे अपनाओगे ?, ब्याह करोगे मुझ से" रुक्मी बोली ।"हाँ हाँ ये भी कोई कहने की बात है "धीरज बोला ।"देखलो सहिब मेरी बिरादरी वालों को खबर पड़ी तो बहुत बवाल हो जावेगा ,मेरा बाबा बहुत कैड़ा है " रुक्मी बोली ।"अरे तुम घबराओ नही तुम मुझे परसों यही मिलो कोई न कोई रास्ता निकल जाएग"धीरज बोला ।फिर एक बार उसने रुकमी का हाथ फिर से चूमा।रुकमी ने भी उसके हाथ को पकड़ कर कस दिया । मानो उसने भी प्यार का इज़हार कर दिया हो ,थोड़ी देर इधर उधर की बाते हुई औऱ फिर दोनों उठ कर अपने रास्तें की तरफ चल पड़े । 

रुकमी घर आकर एक अजीब अहसास का अनुभव कर रही थी ।बार बार उसे धीरज के स्पर्श का  अहसास हो रहा था ।और वह रोमांचित हो रही थी । वह सपनों की दुनिया मे कुलांचे  भर रही थी ।तभी उसे अपने बाबा घासी राम का चेहरा सामने दिखता तो वह सिहर उठती ।धीरज कोई न कोई रास्ता जरूर निकाल लेगा ।वह मुझे बहुत प्यार जो करता है।पर वह रास्ता क्या होगा ? कहीं अगर कोई बात ना बनी तो मैं तो कही की ना रहूंगी ।कैसे जिऊंगी में अपने साहिब के बगैर ।नहीं  नही सब ठीक ही होगा । बनते बिगड़ते विचारों के बीहड़ में रुक्मी रात भर भटकती रही । और कब उसकी आंख  लगी उसे पता ही ना चला ।अगला दिन किसी तरह बीत गया,रुक्मी बेसब्री से कल का इंतजार कर रही थी ।धीरज से मिलने के लिए ,और बात करने के लिए वह बेताब  हो रही थी । 

और फिर अगला दिन आ ही गया ।हमेशा की तरह उसने थैला उठाया और चल पड़ी ।धीरज पहले से ही उसके इंतजार में टहल रहा था ।रुक्मी उसे देखते ही मुश्करा दी । धीरज ने रुकमि का हाथ पकड़ाऔर दोनों खंडहर के अंदर  एक पुराने बेंच पर बैठ गए । " यहां हमे कोई नही देखेगा अपने मन की बात आराम से कर सकते हैं 

रुक्मी...धीरज बोला । " ये दो दिन कैसे बीते हैं ,मैं तुम्हे बता  नही सकता" ।रुकमी कैसे बताती कि उसने भी ये विरह का  वक्त कैसे गुजारा है ,कैसे कैसे  एक एक पल कितने भारी लगे। साहिब....  "अब हमें भी आपसे  दूर रहना कहाँ अच्छा लगता है"। और वह धीरज के पास सरक कर उससे सट गई ।धीरज  ने भी उसे हाथ से आपनी तरफ सटा लिया ।" साहिब क्या जादू कर दिया है आपने "? बस यूं ही आप के पास बैठे रहने को मन  करता है । " साहिब....आप हमारे बाबा से जल्दी बात कीजिये  ना ,अब हम आपसे दूर नही रह सकते " रुक्मी बोली ।धीरज बोला "हाँ रुक्मी मैं भी कहाँ  तुमसे अलग रह पाऊंगा "और हाथ से रुकमी का बाजू पकड़ कर अपने से कस कर सटा लिया । दोनो प्यार की उड़ान भरने लगे ।अंधेरा उजाले को अपने आगोश में लेने को आतुर था ।हल्की ठंडी बयार चल रही थी ।

" तुम्हारे बाबा से बात तो मैं कर लूंगा रुक्मी ,पर मैंने देखा है तेरे बाबा को ,बात नही बनेगी " धीरज बोला ।" तब क्या होगा साहिब " रुकमी बोली ।"कुछ और सोचना पड़ेगा "धीरज ने कहा ।"एक ही रास्ता है,हमे यहां से भागना पड़ेगा, कहीं दूर जाकर हम अपनी दुनिया  सुरु करेगे "धीरज  ने कहा  । 

"क्या कह रहे हो साहिब "रुक्मी चौंकते हुए बोली । "मैं ऐसा  कोनी कर सकूं साहिब ,अम्मा  बाबा को छोड़ के ना रह सकूँ ,एक बार बाबा से बात तो कर  लो "रुक्मी बोली  " । "नही रुकमी तुम्हे  हमारे प्यार की खातिर ये करना पड़ेगा " ,धीरज ने उसे अपने से कस लिया । रुकमी और धीरज इस तरह आलिंगनबद्ध थे कि एक दूसरे की सांसें  स्पस्ट सुनाई पड़ रही थी ।  

"फिर हमारा और तुम्हारा प्यार एक मिशाल बन जायेगा "धीरज रुक्मी की तरफ उस पर झुकने लगा  ।रुकमी भी भावभेष  में बहने लगी ।और बहती चली गई ।उसे होश तब आया जब धीरज  प्यार के नाम पर मर्यादा को लांघने की तीव्र कोशिश में  था ।उसने अपने कपडों में उलझें धीरज के हाथ  अलग किये ।"क्या कर रहे हो सहिब ,ये सब ठीक नही "रुक्मिणी ने कहा और अलग खड़ी हो गई । धीरज फिर उसके पास आया और बोला  "रुक्मी....समझने की कोशिश करो मैं तुम्हारे बिना नही रह सकता , तुम्हारे शरीर की मुझे जरूरत है ।और रुक्मी का हाथ पकड़ कर आपनी तरफ खींच लिया ।और अपने बाहुपाश  में ले लिया,अबकी बार उसकी पकड़ ज़्यादा मजबूत थी । 

रुक्मी अब सब समझ चुकी थी । उसने अपना सारा जोर लगा कर एक झटका दिया और अलग हो कर एक जोर का धक्का धीरज को दिया । धीरज बड़ी जोर से नीचे गिरा ,और उठ ना सका । वह जोर से बोली "साहिब ये हाथ लोहे को रोज नई शक्ल में ढालते है , पीढियां बीत गई है लोहे से लड़ते लड़ते  ,तुम जैसे ढोंगियों  औऱ फरेबियों की क्या मजाल,जो इश्क के नाम पर घिनोना काम करते हो ,किसी के जज्बात से खेल कर इज्जत  इज्जत का सौदा करते हो " और जमींन पर गिरे हुए धीरज को उसने एक ठोकर पैर सेऔर मार दी। 

वह कराह उठा । अब वह सब समझ चुकी थी क्यों  साहिब बाबा से बात नही करना चाहता था । रुक्मी उसे लांघती हुई जाने लगी ।तभी सामने एक और युवक खड़ा था । "मेरा नांम मदन है, मैं धीरज का दोस्त हूँ " धीरज को गिरा कर तू चली कैसे जाएगी मेरे रहते" ये कह कर मदन उसका हाथ पकडने लगा । तभी एक जोर की आवाज हुई "चटाक" और रुक्मी का चांटा गाल पर पडते ही मदन चक्कर घिन्नी खाता जमीन पर गिरा ।

 "ऐसी वैसी समझ लिया था क्या " ? "लोहार की बेटी हूं ,पीढियां गुजर गई है हमारी लोहा पीटते पीटते "और उसके ऊपर से लांघते रुकमी आगे बढ़ गई । दिल लगाने की क्या सजा मिली थी उसे ? क्या यही होता है प्रेम का हश्र  ? कितना बड़ा धोखा किया था साहिब ने उसके साथ ?उसकी सांसे तेजी से चलने लगी थी । क्या क्या सपने देख डाले थे उसने ? उसकी आंखोंमें आंसू आ गए । उन आंसुओं में  कभी दुख झलकता था तो कभी क्रोध ।उसकी मां भूरी देवी ने बचपन मे ऐसी ऐसी कहानीयां सुनाई थी कि जो प्रेम को एक नया  आयाम देती थी । प्रेमी के लिए जान पर खेलने वाले पात्र का इतना  घिनौना स्वरूप , वह जितना सोचती उतना ही सवालों के घेरे में  फंस जाती । 

रुक्मी......ओ रुक्मी.......तभी उसे आपने बाबा घासी राम की आवाज सुनाई पड़ी ।अरे छोरी .....काँई होगो  नींद आ गई क्या  ? रुक्मी की तंद्रा टूटी उसने देखा बारात बहुत दूर जा चुकी थी ।सिर्फ बैंड बाजों की आवाज कानो में गूंज रही थी ।नींद आगी के छोरी......।घासी राम बोला । ना तो बाबा ,नींद से जाग गई हूं ।चल बजा इस पर घण घासी राम ने चिमटी से पकड़े लोहे के टुकड़े को पटिया पर रखा ।रुकमि ने घण उठाया और खटाक.....खटाक......पूरा जोर लगा कर  पटिया पर चलाने लगी । उसके हाथों में बला का जोर आ गया था । अरे छोरी .....।घणी जोर से पीट री हैं ।इत्ता जोर काइयाँ आ गियो । रुक्मी उसी तरह द्रुत गति से घण चला रही थी ।रुकमि के सिवा कोई नहीं जानता था कि ये जोर है या गुस्सा है ।



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