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Monday, September 26, 2022

आछरी (भाग 1)


सभी लेखक एवं पाठक बन्धुओं को मेरा नमस्कार ।

मेरी कहानी (वृतान्त)कुछ अलग हट कर है ,इस लिए इसकी पृष्ठभूमि पर जाना अति आवश्यक है।ये कहानी आज के समय के अनुरुप सही ना लगे लेकिन हमारे समय मे ये कथाएं काफी प्रचलित थी । अर्थात लगभाग पचास वर्ष पूर्व जब दूर  दराज के गाँव विकाश  से वंचित थे, घने औऱ विशाल जंगल हुआ करते थे,तब ऎसी कहानियों का  बहुत महत्व होता था । ये कहानी पहाड़ से संबंधित है ,शायद आपने 'आछरी ' नाम नही सुना होगा,  ये नाम  पहाड़ी है ।आछरी का अर्थ वहां पर परीयों के लिए प्रयोग किया जाता है,कयोंकि जिसने भी उन्हें देखा हैं ,उनका स्वरूप परियों जैसा बताया है ।यधपि मेरा इस तरह किसी से कभी साक्षत्कार नही हुआ , पर लोगों से और अपने पूर्वजों से  ये वृतान्त अवश्य सुना है ।

"आछरी" पहाड़ में भूत प्रेत देवताओँ और आत्माओं की श्रेणी में  रखी गई हैं । कही कहीं  कुछ लोग उन्हें देव तुल्य भी मानते हैं और सम्मान के साथ उनको पूजते भी हैं । और कई जगहोँ पर उनके मंदिर भी स्थापित किए गए हैं जिनकी समय समय पर आज भी  पूजा अर्चना की जाती है । जिसने भी उनके स्वरूप को देखा है , उनकेअनुशार आछरियाँ लंबी पतली और अक्शर सफेद वस्त्रों में दिखाई पड़ती है।और एक स्थिर आकार नही रखती, और लहराते स्वरूप में दिखती हैं।मान्यता है कि वह रोज सुबह अर्ध रात्रि के पश्चात अपने दल बल के साथ पहाड़ की चोटी से गंगा स्नान के लिए उतरती है ,और अधिकतर  फूलों के मौसम  में और रात्री मेँ उनको देखा जा सकता  है । उसके साथ कई तरह के प्रेत भी चलते है।और एक ढोल और नगाड़ा भी होता है,जो उसके दल के आने का सूचक होता है ।माना जाता है कि ढोल और नगाड़ा अलग अलग प्रवर्ति के होते हैं ढोल की धुन का अर्थ लगाया जाता है कि (अबाटे के बाट) इसका अर्थ होता हैं कि जो रास्ते से अलग हैं वो रास्ते पर आ जाय,ताकि आछरी उसे अपने साथ ले जाए,और नगाड़े की धुन का अर्थ ये लगाया जाता है कि (बाटे के अबॉट) इसका अर्थ होता है कि जो रास्ते मे है वो अलग रास्ते पर चले जाए,ताकि वह बच सकें। जिसको भी आछरी अपने साथ ले जाती हैं तो फिर वह कहीं मिलता नही है नदी के किनारे उसके वस्त्र अवश्य मिल जाते हैं ,कहा जाता है कि एक बार एक गांव की कूछ महिलाएं जंगल मे घास काटने गई थी तो उन्हे  एक मधुर  गीत की आवाज़ सुनाई पडी , आवाज बड़ी सुरीली थी,एक महिला उस आवाज के पीछे चल पड़ी ,और बहुत दूर निकल गई। साथ आई महिलाओं के बहुत खोजने पर भी  उसका पता नही चल सका ,चार पांच दिन बाद वह वापस आई तो उसकी आवाज नही निकल रही थी ।उसके गले से आवाज भर्रा कर आ रही थी,कहते हैं कि आछरी  ने उसकी आवाज हर ली थी । यहाँ पर यह मानते है कि जहाँ उजाला होता है आछरी वहीं पहुंचती है।अंधेरे में या अँधेरे घर मे वह नहीं जाती , इसी संदर्भ में बहुत बहुत से व्रतांत मिलते हैं ।यहां पर पात्रों के नाम काल्पनिक हैं।

शेष  (आछरी भाग 2) में........।

                   भगवान सिंह रावत  (दिल्ली )

                        (स्वरचित)




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