जिंदगी के आइने में धूल की परत जम गई है
बहती उम्र की गति भी थम गई है ।
प्रति ध्वनी करते पर्वत , तुम्हारी अनुपस्थिति दर्ज करा रहे हैं
बरसते मेघ,भोर के उड़ते पंछी, वो , व्यवहार नही दर्शा रहे हैं ।
तुम्हारी झील सी आँखों मे एक बार देखना चाहता हूँ
समय का समंदर , चाहत का शहर
भावों का बाज़ार , प्रीत की लहर
उन्मुक्त घुमते थे जहाँ , दुनिया से बेखबर
तभी वक्त ले गया हमें , जाने कहाँ किधर किधर
जाने कहाँ कहाँ किस देश मैं, वैभव के परिवेश में
तृष्णा के सैलाब में , इर्ष्या और द्वेष में
जब होश आया , अपने को अकेला पाया ।
जमाने भर की भीड थी , साथ न था अपना भी साया
तुम से बिछड़ कर , कहाँ से कहाँ चला आया ।
आज अपने आप से , मैं बहुत सर्मिन्दा हूँ
जिन्दगी जिन्दगी सी नही है पर जिन्दा हूँ ।
और जिन्दा है मेरे अंदर का एक कवि
जो अंकुरित हुआ था तुम्हारे मिलने पर
गुलशन ज्यो महके फूलों के खिलने पर ।
जो कभी कलम की शक्ल में , कागज पर दौड़ जाता है ।
निर्जन वन में भी जिन्दगी के गीत गाता है
नाउम्मीदी के घने सैलाब में आशाओं के पुष्प उगाता है ।
तुम कहाँ हो तुम्हारा हाथ अपने हाथ में लेकर
एक बार जी भरकर रो लेना चाहता हूँ
आंसुओ से वक्त के धूल की परत , को धो लेना चाहता हूँ
तुम्हारे कंधे पर सर रख कर , थोडा सो लेना चाहता हूँ
वक्त ने पहरे बिठाये होंगे तुम्हारे इर्द गिर्द जरुर
फिर भी एक बार , तुम्हारा हो लेना चाहता हूँ
जब तक तुम नहीं मिलते , खोजूंगा निरंतर इस जन्म तक
इस जन्म ही नहीं , बल्कि जन्मो, जन्मो तक
पूछूंगा तरासे गए से ,पत्थरों से महलों के खंडहरों से
पेड़, पौधों से, जंगलों से , गाँव गांव से और शहरों से
हम फिर मिलेंगे कहीं दूर , बहुत दूर, छितिज़ के उस पार
संकुचित समाज से ऊपर , जहाँ हो चाहत का सँसार ।
शरीरों के बन्धनों से मुक्त ,जैविक सोच से परे
छल कपट दिखावे से हटकर जैसे कुंदन से खरे ।
हम फिर मिलेंगे , हम फिर मिलेंगे ।
भाववन सिंह रावत (दिल्ली)

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