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Thursday, November 24, 2022

हम फिर मिलेंगे

 जिंदगी के आइने में धूल की परत जम गई है 

बहती उम्र की गति भी थम गई है ।

प्रति ध्वनी करते पर्वत , तुम्हारी अनुपस्थिति दर्ज करा रहे हैं 

बरसते मेघ,भोर के उड़ते पंछी, वो , व्यवहार नही दर्शा रहे हैं ।

तुम्हारी झील सी आँखों मे एक बार देखना चाहता हूँ 

समय का समंदर , चाहत का शहर 

भावों का बाज़ार , प्रीत की लहर 

उन्मुक्त घुमते थे जहाँ , दुनिया से बेखबर 

तभी वक्त ले गया हमें , जाने कहाँ किधर किधर

जाने कहाँ कहाँ किस देश मैं,  वैभव के परिवेश में 

तृष्णा के सैलाब में , इर्ष्या और द्वेष में 

जब  होश आया , अपने को अकेला  पाया  ।

जमाने भर की भीड थी , साथ न था अपना भी साया 

तुम से बिछड़ कर , कहाँ से कहाँ चला आया ।

आज अपने आप से , मैं बहुत सर्मिन्दा हूँ 

जिन्दगी जिन्दगी सी नही है पर जिन्दा हूँ ।

और जिन्दा है मेरे अंदर का एक कवि 

जो अंकुरित हुआ था तुम्हारे मिलने पर

गुलशन ज्यो महके फूलों के खिलने पर ।

जो कभी कलम की शक्ल में , कागज पर दौड़ जाता है ।

निर्जन वन में भी जिन्दगी के गीत गाता है

नाउम्मीदी के घने सैलाब में आशाओं के पुष्प उगाता है ।

तुम कहाँ हो तुम्हारा हाथ अपने हाथ में लेकर 

एक बार जी भरकर  रो लेना चाहता हूँ 

आंसुओ से वक्त के धूल की परत , को धो लेना चाहता हूँ 

तुम्हारे कंधे पर सर रख कर , थोडा सो लेना चाहता हूँ

वक्त ने पहरे बिठाये होंगे तुम्हारे इर्द गिर्द जरुर

फिर भी एक बार , तुम्हारा हो लेना चाहता हूँ

जब तक तुम नहीं मिलते , खोजूंगा निरंतर इस जन्म तक 

इस जन्म ही नहीं , बल्कि जन्मो, जन्मो तक 

पूछूंगा तरासे गए से ,पत्थरों  से महलों के खंडहरों से

पेड़, पौधों से, जंगलों से , गाँव गांव से और शहरों से

हम फिर मिलेंगे कहीं दूर , बहुत दूर, छितिज़ के उस पार 

संकुचित समाज से ऊपर , जहाँ हो चाहत का सँसार ।

शरीरों के बन्धनों से मुक्त ,जैविक  सोच से परे 

छल कपट दिखावे से हटकर जैसे कुंदन से खरे ।

हम फिर मिलेंगे , हम फिर मिलेंगे ।

                भाववन सिंह रावत  (दिल्ली)



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