वक्त के कंधों पर ,ठहरी है जिंदगी ।
सुबह शाम और दुपहरी है जिंदगी ।
माया और वैभव में उलझ कर रह गई ,
शिक्षा संस्कारों की दीवारें ढह गई ,
भोग और रोग के सैलाब में लिपटी,
लगती कितनी सुनहरी है जिंदगी ।
वक्त के कंधों पर ठहरी है जिंदगी ।
वैभव की चाहत में चल पड़ी गाँव से ,
ऊंचाइयां छोड़ गई खुद अपने पांव से ,
उम्मीद के साये में सपनों को बुनती,
बेगानों जैसे शहरी है जिंदगी ।
वक्त के कंधों पर ठहरी है जिंदगी ।
उधेड़ती है सपने बार बार बुनती हैं ,
अपने पराये की आहट नही सुनती है ,
सिमट के रह गई अपने ही आस पास,
लगता है जैसे बहरी है जिंदगी ।
वक्त के कंधों पर ठहरी है जिंदगी ।
थोड़ा सा पाया और कितना खोया है,
स्वार्थ की धरती पर तृष्णा को बोया है ,
ता उम्र जिंदगी कुछ और बनी रही ,
जाने कहाँ है जो लहरी है जिंदगी ।
वक्त के कंधों पर ठहरी है जिंदगी ।
सुबह शाम और दुपहरी है जिंदगी ।
भगवान सिंह रावत (दिल्ली)

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