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Thursday, December 1, 2022

वक्त के कंधों पर

 वक्त के कंधों पर ,ठहरी है जिंदगी ।

सुबह शाम और दुपहरी है जिंदगी ।

माया और वैभव में उलझ कर रह गई ,

शिक्षा संस्कारों की दीवारें ढह गई ,

भोग और रोग के सैलाब में लिपटी,

लगती कितनी सुनहरी है जिंदगी ।

वक्त के कंधों पर ठहरी है जिंदगी ।

वैभव की चाहत में चल पड़ी गाँव से ,

ऊंचाइयां छोड़ गई खुद अपने पांव से ,

उम्मीद के साये में सपनों को बुनती,

बेगानों जैसे शहरी है जिंदगी ।

वक्त के कंधों पर ठहरी है जिंदगी ।

उधेड़ती है सपने बार बार बुनती हैं ,

अपने पराये की आहट नही सुनती है ,

सिमट के रह गई अपने ही आस पास,

लगता है जैसे बहरी है जिंदगी ।

वक्त के कंधों पर ठहरी है जिंदगी ।

थोड़ा सा पाया और कितना खोया है,

स्वार्थ की धरती पर तृष्णा को बोया है ,

ता उम्र जिंदगी कुछ और बनी रही ,

जाने कहाँ है जो लहरी है जिंदगी ।

वक्त के कंधों पर ठहरी है जिंदगी ।

सुबह शाम और दुपहरी है जिंदगी ।

                           भगवान सिंह रावत (दिल्ली)



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