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Sunday, November 13, 2022

डर

 


               
सत्य घटना पर आधारित इस कहानी के पात्रों के नाम , स्थान अवश्य बदले हुए हैं ,लेकिन कहानी  का हर शब्द चीख चीख कर सच की गवाही दे रहा है । बात आज से चालीस साल पुरानी है । मैं और मेरा दोस्त नीरज दीपावली की छुट्टियाँ में तीन दिन की और छुट्टी लेकर एक हफ़्ते के लिए गांव जाने को तैयार हो गए । रात को दस बजे की रोडवेज़ की बस दिल्ली से पकड़ कर उत्तरांचल अपने गांव को रवाना हुए । पांच बजे सुबह हम लोग ऋषिकेश पहुंचे ,वहां से हमने गाड़ी बदली,और टिहरी की बस में रवाना हो गए ।उस जमाने मे परिवहन व्यवस्था इतनी सुलभ नही थी , आज की अपेक्षा  कहीं दूर की यात्रा में दुगने से भी ज्यादा समय लगता था ।
दो बजे नियत समय पर बस टिहरी पहुंच गई ,वहां से हमे गाँव के लिए बस पकड़नी थी ,जो हमे पाँच बजे तक गाँव के पास उतार देती ,मगर वह बस किसी कारणवश लेट हो गई ।  इंतजार करते करते शाम के पांच बजे गए । हमे अब यकीन हो गया कि हमे गाँव के पास पहुंचते पहुंचते रात हो जाएगी । सर्दी के मौसम में अंधेरा जल्दी हो जाता है ।
हमने बस पकड़ी ,ठीक सात बजे हम गाँव के नजदीक पहुंचे ,आगे का रास्ता पैदल का था घना जंगल और पहाड़ की चढ़ाई ,और उस पर रात का अंधेरा ,अकेला होता तो मैं कभी रात में नहींचलता , टिहरी में ही किसी होटल में रुक जाता मगर हम दो थे ,इस लिए हमने चलने का निश्चय किया था ।
बातचीत करते करते चलते रहेंगे ,ये सोच कर हमने अपना सामान उठाया और चल पड़े ,मेरे पास एक सूटकेस था जबकि  मेरे दोस्त  नीरज के पास सूटकेस और एक थैला भी था ।जंगली जानवरों का भय यहां अक्सर रहता है ,ये सुनने को मिलता था कि लकड़बग्गा आज फलां की बकरी  चपट कर गया किसी के कुत्ते को खा गया ,वगेरह वगेरह ।जब आदमी ऐसी परिस्तिथि में होता है तो ना याद आने वाली बातें भी याद आ जाती है ।और उस जमाने मे भूत प्रेतों की अधिक मान्यताएं होती थी । लोगों के द्वारा बताई गई आप बीती की घटनाएं इसी समय याद आती है । हम कड़ा मन करके चले जा रहे थे ,नीरज बोला " यार गोविंद तू डर तो नही रहा ना " ? मैंने कहा " अरे डरना कैसा जो डरता है उसी को ये सब दिखते हैं , तू भगवान का नाम ले और चलता रह " अपने डर को छिपाते मैंने कहा , "हाँ यहीं तो मैं कह रहा हूँ भूत भात कुछ नहीं होता " में समझ गया वह भी अपना डर छुपा रहा है , भूत के किस्से और घटनाएं बताने वालों में एक यह भी था । मगर इस समय ये बात कहने का कोई समय नहीं था ।आदमी कितना ही निडर क्यों ना हो , थोडे से डर की आशंका उसके मन मे अवस्य होती है । हम अपना डर छिपाए अपने आप को निडर घोषित करते चले जा रहे थे ।अंधेरे सन्नाटे में हमारी पदचाप और बात चीत दूर दूर तक सुनाई पड़ रही थी । जरा सी कहीं से आहट होती तो हम चौंक पड़ते , और एक दूसरे को डरपोक बताने का नाटक करते ,  मेरे मन मे आया कि इससे तो अच्छा था टिहरी में किसी होटल में रुक जाते , सुबह आराम से आते , मगर एक दिन की छुट्टी बेकार हो जाती ,खैर अब आ ही गये तो घर तो पहुंचना ही है , मैंने अपनी सुविधा के लिए एक डंडा चाय वाले कि दुकान से ले लिया था ,शायद इसकी जरूरत पड़ जाय ।बीच बीच मे कुछ जंगली जानवरों की आवाजें हल्की हल्की आती थी मगर सामने कोई अब तक नही आया । चलते चलते नीरज अचानक रुक गया ,ऐसे जैसे बस को ब्रेक लगता हो । मैंने पूछा तो नीरज बोला "प्रकाश देख तो वहां पर कौन बैठा है "
"कहां पर " मैंने कहा "अरे वो देख उस दीवार के बड़े पत्थर पर"मैंने देखा सचमुच दूर से ऐसा लगता था जैसे कोई बैठा हो , दिन के समय कोई राहगीर चलते चलते थक जाते तो उस जगह बैठ जाते थे , वहां पर एक छोटा पेड़ भी था ,जिसकी छांव में बैठ कर आने जाने वाले थोड़ी देर आराम करते थे , गाँव की स्त्रियां जब दूर जंगल से लकड़ियां या घास लेकर आती थी तो यहां पर बैठ कर थोड़ी देर विश्राम करती थी ।ठीक उसी जगह पर मैंने देखा एक आदमी घुटने में मुँह दे कर बैठ था ,उसे इस तरह बैठा देख कर एक बार तो हमारे होश उड़ गए ,वह हम से पचास मीटर की दूरी पर था ,क्या उसे हमारी आवाज सुनाई नही पड़ी ,हम तो जोर जोर से बातें कर रहे थे ।नीरज डर कर मेरे पीछे हो गया। , डर से या फिर हिम्मत से मेरे हाथ की पकड़ डंडे पर मजबूत हो गई । मैं चिल्लाया "कौन है वहां पर " कोई जवाब नहीं आया , तो हमारे होश हवा हो गए , तब एक पत्थर उठा कर मैंने हल्के से उसकी तरफ उछाला ताकि  पत्थर की आवाज से उसे हमारा आभास हो सके । तब उस आदमी ने जोर से हंसते हुए अपना मुह ऊपर किया , "डर गए क्या " वह बोला ।"अरे भाई कौन हो तुम "मैंने कहा "तुमने तो डरा ही दिया था "मैंने अपने को संयत करते हुए कहा । नीरज के चेहरे पर पसीना आ गया था । हम नजदीक आये तो देखा वह एक पचास पचपन साल का दुबला पतला आदमी था ,फिर वह खींसे निपोरता बोला "डरो मत देखो मैं तो अकेला हूं ,तुम तो दो हो 'तब नीरज अपने डर को छिपाता हुआ बोला " हम डर कहां रहे थे ", " हमने सोचा कोई चोर है " । चलो अब साथ चलते हैं ,वह लाठी के सहारे खड़ा हुआ ,और बोला मैं पटुडी गांव का हूँ ,पटुडी गांव हमारे गांव धारकोट से बाद में पड़ता था ,तो क्या ये आदमी वहां तक अकेले ही जायेगा ? हमे आश्चर्य हुआ , पर ये समय ये सब सोचने का नही था । हम एक साथी के मिल जाने से काफी  आस्वस्त हुए , एक उम्र दराज आदमी के मिलने से अब वह पहले जैसा डर नही रह गया था ,अब हम बेफिक्र हो कर चल रहे थे । हम दोनो पच्चीस छब्बीस साल के और वह वृद्ध आदमी हम से दुगनी उम्र का था, हम लोग बातें करते करते चल रहे थे तो उसने हमें भूतो की बातें बताई , " भूत ऐसे नही दिखते जैसा आदमी सोचता है ,भूत अलग अलग रूप में दिखता है , कभी कभी आदमी सोचता है कि भूत नही है पर भूत उसके साथ ही  विधमान रहता है " ।वगेरह वगेरह । उसकी अजीब बातें दिलचस्प भी थी और डराने वाली भी , खैर बात करते करते उसने हमारे गांव के एक दी आदमियों के नाम बताए और कहा कि वह हमारे जानने वाले हैं , तब हमें पूरा यकीन हो गया कि वह सींवाली गांव का है । थोड़ी देर बाद हम लोग अपने गांव की सरहद में पहुंच गए । आठ बजे चुके थे , उसने अपना नाम श्याम सिंह बताया था । जब हमारे गांव का रास्ता अलग हुआ तो  तो मैंने कहा  " अच्छा श्याम सिंह जी  आप आराम से जाइये ,हमारा तो गांव आ गया है "। तब वह बोला ठीक है मैं चलता हूँ ,और वह बे झिझक आगे रास्ते पर चल  पड़ा और अंधेरे में गायब हो गया ,  मैंने देखा उसका व्यवहार ऐसा था जैसे उसके लिए रात का अंधेरा कोई अहमियत ना रखता हो । मुझे वह बहुत बहादुर और हिम्मत वाला आदमी लगा । हमने ईश्वर का धन्यवाद किया ,कि हमे एक साथी और मिल गया था । रास्ते के थोड़ा ऊपर एक छोटी दुकान थी ,जो रात आठ नौ बजे तक खुली रहती थी ,लोग दीपू चाचा की दुकान पर देर तक गप शप्प किया करते थे , हम दुकान पर पहुंचे तो देखा दीपू चाचा के अलावा दो आदमी वहां और बैठे थे । रामा रूमी के बाद चाचा बोले "अरे प्रकाश,नीरज तुम अकेले ही आ रहे हो क्या ? "
मैने कहा "हाँ चाचा हमारे साथ एक आदमी और था"
"कौन था तुम्हारे साथ " दीपू चाचा बोले ,तब मैंने कहा कि पटुडी गांव का कोई श्याम सिंह था ,अभी तो गया है उस तरफ । दीपू चाचा ने कहा रात को इस तरह मत आया करो ,टिहरी में रुक जाते ,चलो ठीक है में भी दुकान बंद कर रहा हूँ ,टाइम हो गया है।और सब उठ कर चलने लगे । हम भी अपने घर आ गए । सुबह नाहा धो कर मैं दीवाली का सामान लेने जाने लगा तो नीरज को आवाज दे कर आने का कहा ,हम दोनो दुकान पर पहुंचे तो दुकान पर दीपू चाचा बैठे थे । तब उन्होंने बताया कि तुम्हे रात को पैदल इस तरह नही आना चाहिए ,"पर चाचा हमे तो कोई दिक्कत नही हुई" ,। मैने कहा । "और अगर कुछ हो जाता तो चाचा बोले मैंने तुम्हें रात में नही बताया , तुम जिस श्याम सिंह  की बात कर रहे थे ,जिसके साथ तुम लोग आधा घंटे तक चलते रहे ,जानते हो उसे मेरे हुए चार महीने हो गए हैं , आये दिन वह रात को लोगों के साथ इसी तरह चलता है"। "क्या " मेरे मुह से जैसे चीख़ निकल गई ,और पैरों तले जमीन खिसक गई ।नीरज तो जैसे बेहोस  सा हो गया । उसका मुह खुला का खुला रह गया ।  "हे भगवान तो क्या वह असल मे भूत था " ?
" हाँ वो वही था ,तुम्हारी किस्मत अच्छी थी कि तुम्हे कुछ हुआ नही "।उस दिन मैं समझा कि डर क्या होता है,वो जो हमने कल रात महसूस किया या वो जिसका अहसास हमे अब हो रहा था ।उस दिन के बाद हम कभी रात को उस समय उस रास्ते नही चले ,बाद में कभी अगर दिन में भी उस जगह चलना पड़ता तो शरीर में डर  की एक लहर सी दौड़ जाती थी ।

                             भगवान सिंह रावत  ( दिल्ली )
                                  

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