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Monday, October 17, 2022

मैं अपना फर्ज निभाउंगा

 


                                                                                
अपना फर्ज निभाउंगा

तुम राज करो इन महलों में मैं गलियारों में जाऊंगा,
तुम्हे लालसा बैभव की मै अपना फर्ज निभाउंगा ।
शर्तों से लिपटी प्रीत से जो मैंने अनुराग बढ़ाया,
प्रेम का कुछ अहसास नहीं बस एकाकीपन पाया ।
प्रेम के पावन उत्सव में भी थी तृष्णा की छाया ,
मधुर प्रेम की कटुता को मैं कभी भूल ना पाऊंगा ।
तुम्हे लालसा बैभव की  मैं अपना फर्ज निभाउंगा ।
रंग महल में रमे रहो मखमल को गले लगाओगे ,
दास दासियों के घेरे में अपना हुक्म चलाओगे ,
दर्पण के सम्मुख जाकर तुम बार बार इतराओगे ,
मेरा क्या मैं तो सुख दुख में सबका हाथ बटाउँगा ।
तुम्हे लालसा बैभव की मै अपना फर्ज निभाउंगा ।
वक्त है कम, काम बहुत है इन उजड़े गलियारों में ,
सत्य अकेला खड़ा धरा पर झूठ है पहरेदारों में ,
दुष्ट आज भी घुड़सवार है नेक चले अंगारों में ।
मानवता के घायल पग पर मैं तो महरम लगाऊंगा ।
तुम्हे लालसा  बैभव की में  अपना फर्ज  निभाउंगा ।

चकाचौंध की उस दुनिया मे इठलाना , इतराना ,
स्वर्ण रजत और मोती माणिक इन पर प्यार लुटाना ,
जब जब चीखेंगे गलियारे तुम हर्षोल्लास मानाना ,
मानवता की सेवा मे मैं तो सारी उम्र बिताऊंगा ।
तुम्हे लालसा बैभव की मैं अपना फ़र्ज़ निभाउंगा ।
तुम राज करो इन महलों में मै गलियारों में जाऊँगा ,
तुम्हे लालस बैभव की में अपना फर्ज निभाउंगा ।
                   भगवान सिंह रावत (स्वरचित)


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