दिवान सिंह गाड़ी को लॉक कर चाबी चौकीदार को थमा कर वापस अपने घर की तरफ चल पड़ा ।आज वह थका थका सा महसूस कर रहा था ।सुबह आठ बजे से शाम के नौ बज चुके थे ।सारा दिन इधर उधर गाड़ी दौड़ाते वह टूट सा गया था । क्वाटर पर पहुंच कर वह चारपाई पर पसर गया ।
उसकी पत्नी मीना किचेन में थी,खाना बनाना छोड़ पत्नी का गिलास लेकर पहुँची और लेटे हुए दिवान सिंह को ढिया और वापस खाना बनाने में लग गई । जमीन पर आठ साल का उसका बेटा विनोद किताब लेकर पढ़ाई कर रहा था । पानी पी कर दिवान सिंह ने गिलास स्टूल पर रक्खा औऱ सोचते सोचते अतीत में खो गया ।
सीधा सादा दीवान सिंह अपने पहाड़ में गांव की पुरखों की जमीन पर खेती करता था । ठीक ही चल रही थी गाड़ी ,अगर गुलाब सिंह उसे ना बरगलाता , गुलाब सिंह उसका दूर का सम्बन्धी था । वह खुद दिल्ली में पिछले सात आठ साल से रह रहा था । हप्ते भर की छुट्टी में गाँव आकर बडी शान से रहता था,और खुले दिल से खर्च करता था । एक दिन गुलाब सिंह उसके पास बैठा बोला ,"चल यार तुझे घूम लाऊं दिल्ली , शहर में देखने को अच्छी अच्छी चीजें हैं , पालिका बाजार, लाल किला, चिड़िया घर ,बिरला मंदिर सुर भी बहुत कुछ है " तब दीवान सिंह बोला " भाई जी ,वो तो ठीक हैं , पर इतने दिन कौन रहेगा और कहाँ रहेगा वहां ये सब देखने को "
"अरे मैं हूँ ना मेरे यहाँ रहना ,अरे मैं तो कहता हूं मैं तुझे ड्राइविंग सिखा दूंगा ,फिरआराम से नौकरी करना और क्या " गुलाब सिंह ने आश्वासन दिया ।
दो तीन बार इसी तरह गुलाब सिंह ने उसे शब्ज बाग दिखाए तो दिवान सिंह के मन मे लालसा जाग उठी,पहाड़ी रोजमर्रा के जीवन के प्रति वह उदासीन हो चला था । गांव के और भी लोग शहरों में रहते है , उनके ठाट बाट देख कर उसका मन भ्रमित हो चला था ।
दिवान सिंह आखिरकार शहर जाने को तैयार हो गया ,वह दसवीं पास था बस , काम उसे कुछ आता नही था ।
अपने उज्वल भविष्य के सपने बुनता , ऊंचे ख्वाब देखता दिवान सिंह आखिर दिल्ली आ ही गया । गुलाब सिंह के घर पर दो तीन दिन रह कर वह गुलाब सिंह के कहने पर जिस जगह गुलाब सिंह बुलाता वह उसे गाड़ी चलाने की ट्रेनिंग देता , जब भी गुलाब की गाड़ी खाली होती ,वह दिवान को बुलाता और गाड़ी सिखाता ।
इस तरह दो महीने में दिवान ट्रैंड हो गया ,वह गाड़ी चलाना सीख गया ,।गुलाब सिंह ने लाइसेंस भी बनवा दिया ।
अब दिवान सिंह ड्राइवर बन चुका था ,और गाड़ी चलाने में निपुण हो गया था । पहले एक दो जगह कम वेतन पर काम करके उसने फिर एक अच्छे बड़े सेठ के घरपर नौकरी पकड़ी,वहां उसकी सेलरी ज्यादा नही तो कम भी नही थी ।पंद्रह हजार महीना । दीवान सिंह खुश हो गया ,इन दो तीन महीने वह घर बार सब भूल गया , ना ही उसे बच्चों का ध्यान आया , वह तो बस ड्राइवर बनकर ही दम लेना चाहता था ।
उसने एक अलग क़वाटर किराये पर लिया और वहां रहने लगा और झट गांव जाकर अपने बच्चों को साथ ले आया । उसे काम करते करते एक साल से ज्यादा हो गया था । सप्ताह में एक की की छुट्टी ,पंद्रह हजार सेलरी ,कभी कभी सौ दो सौ गिफ्ट भी मिल जाते थे । सुबह से शाम तक वह गाड़ी दौड़ाता फिरता था,पहले रॉय साहब को फैक्ट्री छोड़ो फिर मिसेज रॉय को क्लब,और फिर सरोज बिटिया को टेनिस ग्राउंड, और फिर सबको वापस घर छोड़ो,बारी बारी से , सबसे देर मे राय साहब फैक्ट्री से आते थे , आते आते कभी कभी आठ भी बज जाते थे ।उन्हें कोठी पर छोड़ दिवान सिंह नौ बजे घर पहुंचता था । गांव गलियारे की उसे कुछ खबर नही थी । क्या चल रहा है क्या नही ।
यहाँ पर दिवान सिंह की सैलरी तो गुजारे लायक ठीक थी मगर बचत कुछ नही थी । ऊपर से उसे फुरसत बिल्कुल नही थी , सारा समय उसका डयूटी में ही चला जाता था । शहर में आकर अब खर्चों में बढ़ोतरी होने लगी थी ।चार हजार मकान का किराया बच्चे की फीस और फिर कपड़े लत्ते ,लोक दिखावा,अच्छा दिखना अच्छा खाना , यह एक शौक बन गया था शहर में आकर ।फिर उसने देखा पैसे के लिए लोग कितना झूठ बोलते है ,छोटे से छोटा आदमी ,और बड़े से बड़ा बिजनेस मैन । हर आदमी सामने वाले को लूटना चाहता है । दिवान सिंह भी उसी राह चल पड़ा ।जैसा देश वैसा भेष , उसकी अंतरात्मा मर चुकी थी । अब वह अर्जित करने में व्यस्त हो गया । इस कारण वह चिंतित रहने लगा और कमजोर भी हो गया । किसी ने उसे बताया कि शाम को एक दो पेग लेलो सारी थकान मिट जाएगी ।दीवान सिंह ने वैसा ही किया ।वह शाम को रोज दो पेग मारता और सो जाता ।सुबह तैयार होकर ड्यूटी पर जाता दिन भर गाड़ी चलाता ,और थका मांदा घर आकर शराब पीता और सो जाता ।अब उसकी जिंदगी का यही नियम बन गया था । कभी कभी वह इस जिंदगी से खिंन्न होजाता था,ऊब जाता था मगर फिर अपने आप को एडजेस्ट कर लेता था । मगर आज जो उसके साथ हुआ उससे वह बेचैन हो गया , वह मिसेज राय को किटी पार्टी पर छोड़ कर बाहर गाड़ी में बैठा था उसे दो घंटे हो चुके थे ,तभी राय साहब का कॉल आया , उन्हें आज गाड़ी जल्दी चाहिए थी । मिसेस राय पार्टी में है दिवान बोला ,उनको खबर दो कि मुझे गाड़ी चाहिए कही जाना है ।दिवान ने चैकीदार से खबर भिजवाई मगर मिसेज राय नही आई ।फिर राय साहब का फोन आया इस बार उनकी आवाज में कठोरता थी , दिवान सिंह ने फिर संदेसा भिजवाया । थोड़ी देर बाद दान दनाती मिसेज राय बाहर आई और बोली दिवान सिंह क्या मुसीबत है तुम्हे ? "मैडम जी साहब तीन बार फोन कर चुके है ।उन्हें गाड़ी जल्दी चाहिए " ठीक है उनसे कहो आती हूँ और बड़बड़ाती हुई अंदर चली गई । फिर आधे घंटे बाद आई । राय साहब का फोन फिर आया वह गुस्से में बोले दीवान सिंह तुमने सुना नही मेम साहब को घेर छोड़ कर जल्दी आओ ।जी आया बस । दिवान सिंह दोनो तरफ से डांट खा रहा था । मैडम गाड़ी में भी बड़बड़ाती रही ,दिवान कुछ ना बोला , उसे अभी वापस भी जाना है साहब को लेने,पता नहीं देर से जाने पर वो क्या कहेंगे । वहीं हुआ आते ही राय सहाब उस पर बरस पड़े ,दिवान सिंह इतनी देर क्यों लगाई ? साहब जी वो मेडम जी.......। मैडम मैडम क्या मैने कहा था न मूझे जल्दी गाड़ी चाहिए । फिर ,? बेचारे गुप्ता जी को टेक्सी कर आना पड़ा । हद्द हो गई वह गुस्से ।में तमतमाते बोले ।
" अब चलो मुझे घर छोड़ कर गुप्ता जी भी ले जाना , बादमे छुट्टी करना ,आइए गुप्ता जी " औऱ दो दोनो गाड़ी में बैठ गए ।दिवान सिंह गाड़ी लेकर चल पड़ा , इतना अपमान उसने आज तक नही सहा था ।अंदर ही अंदर वह झुलस रहा था , मगर क्या करता ,वह नौकर जो था । वह कुछ कह न सका । राय साहब को घर छोड़ वह गुप्ता जी को उनके घर छोड़कर वापस आया और गाड़ी पार्क कर चाबी चौकी दार को देकर घर की तरफ चल पड़ा । औऱ खाट पर पसर गया ।आज घर आते उसे नौ बजे गए ।अछा होता वह गांव से न आता ,इतनी बेइज्जती उसने कभी महसूस नही की थी । सारी घटनाये उसके मष्तिस्क में घूम गई । इतना क्या सोच रहे , इतनी देर से देख राही हूँ , गुमशुन बैठे हो क्या हुआ । मीना की आवाज ने उसे चौंका ढिया ।
" ओह...। कुछ नही बस यूं ही ,अरे क्या टाइम हो गया है "साढ़े नौ बजे गए है खाना दे दूं " अभी भूख नही है मीना ,जरा बैठो तो ,उसने कुर्सी की तरफ इशारा किया । तब दिवान सिंह बोला
" मीना बस अब बहुत हो चुका ,मैंने फैसला कर लिया है अब हम अपने गांव चले जायेंगे ,ये शहर मेरे जैसे आदमियों के लिए नही बना है, यहां हर कदम पर झूठ आगे आकर कदम रोक देता है, औऱ सच छटपटा कर रह जाता है , मक्कारी अपना काम निकल लेती है और ईमानदारी मन मशोस कर रह जाती है , फरेब बाजार में खुले आम बिकता है , और इंसानियत ढूंढने पर भी नही मिलती , चेहरों पर मुखौटों का रिवाज चल पड़ा है हर कोई दिखावे के रथ पर सवार है , समय ने यहां अपने आप को सिकोड़ लिया है "। " मीना " उसने पत्नी का हाथ पकड़ कर कहा, " मेरे पास तुम लोगों के लिए भी समय नही है , यहाँ धनवान धृष्टता को अपनी हकूमत समझता है,और गरीब बेबसी को अपनी किस्मत ,मैं इस छोटे से किराये के घर को अपनी किस्मत नही बनाना चाहता , में अपनी शर्तों पर जीना चाहता हूं " , " हम अपने गाँव चले जायेंगे , वहां मैं अपनी थोड़ी सी खेती पर मेहनत करूंगा , और चैन से जीऊंगा ।हम लोगों ने रोटी पाने की दौड़ में धरती को पूजना छोड़ दिया है " मीना अपने पति के इस बदलाव को देखकर दंग रह गई ,वह आश्चर्यचकित थी और प्रसन्न भी , दिवान सिंह के विचारों का समर्थन करती वह बोली , " ठीक कहते हैं आप अपने पुरखों की जमीन पर हम खूब मेहनत करेंगे ,और वहीं अपने सपनों को साकार करेंगे , में तुम्हारा साथ दूंगी " दिवान सिंहने मीना का हाथ चूम लिया । मुझे तुम से ये ही आशा थी ।
दिवान सिंह सपरिवार गाँव आ गया ,अब उसे नए शिरे से जीना था । वह सुबह उठा हाथ मुह धो कर चौक में आया ,चारों तरफ हरियाली थी ,सामने पहाड़ पर हल्की धूप खिल गईं थी,नीचे गंगा मैया का नीला जल बह रहा था ,पँछीअपने स्वर में अलग अलग तरह से चहक रहे थे ,ये सब देख कर दिवान सिंह का मन खुशी से प्रफुल्लित हो उठा ।इतने लंबे समय बाद ऐसा विहंगम दृश्य देखने को मिला था उसे , इस तरह का अहसास उसे पहले कभी नही हुआ था ,एक झूटी दिखावे की खुशी की कितनी बड़ी कीमत चुका रहा था वह ,उसे अपने ऊपर क्रोधः आ रहा था ,पश्चाताप में उसके आँसू टपक पड़े थे , ठीक वैसे ही जैसे कोई मां से बिछड़ कर वापस लौट कर मां से लिपट कर रोता है । मगर सुबह का भूल शाम को घर आ चुका था मगर अब वह अपनी जन्म भूमि पर लौट आया था ,धरती माँ के पुत्र की वापसी हो चुकी थी , बेबसी भरी जिंदगी की आग में सोना तप कर कुंदन बन चुका था । उसे अपने अंदर एक नई ऊर्जा के सँचार का अहसास हुआ ,और अगले दिन से वह अपने पुरखों की जमीन पर मेहनत करने में जुट गया ।
भगवान सिंह रावत (स्वरचित)

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