सच के उजाले
झूठ का अंधकार फैला है सच के उजाले कहाँ गए
बड़े ख्वाब और झूठे स्वप्न दिखाने वाले कहां गए।
रंग महल के लोग वही हैँ कुर्सी का भी वही मिजाज
नेकी घुटने टेक टेक करआज भी करती है फरियाद
बड़े बडे आकाओं का भी पहले जैसा ही रिवाज ।
गलियारों को राजभवन पंहुचाने वाले कहां गए ।
झूठ का अंधकार ........।
मेरे सीधे सादे गांव को शहरों ने लूटा है ,
जो रक्षक थे अस्मत के उन पहरों ने लूटा है ,
सच से फेर लिया मुह उन अंधे बहरों ने लूटा है ।
करुणा देख जो रो पड़े थे वो जियाले कहां गए ।
झूठ का अंधकार........,।
प्यासी धरती तड़प रही है बूंदों की अभिलाषा में
मेहनत स्वेद बहा रही है उम्मीदों की भाषा मे ,
नाता तोड़ के कर्म धरा से चला बैभव की आशा में ।
सही समय पर बरस पड़े वो बादल काले कUहां गए ।
झूठ का अंधकार ..........।
जगे चेतना मनाष की ऐसा अब कुछ करना होगा
आग पहन कर प्रतिभा को तूफानो से गुजरना होगा
पुस्तक में बंद चरित्रों को धरती पर उतरना होगा
ढूंढो इस वसुधा में पूण्य कमाने वाले कहाँ गये ।
झूठ का अंधकार फैला है सच के उजाले कहाँ गए
बड़े ख्वाब और झूठे स्वप्न दिखाने वाले कहां गए।
भगवान सिंह रावत (स्वरचित)

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