दुर्गा तेज कदमोँ से चल कर किले की तरफ बढ़ रही थी कि अचानक उसे पिछले पखवाड़े की की याद हो आई उस कड़क आवाज वाले पहरेदार की, कहीं आज भी ना अकड़ जाए ,आज अगर उसने एक बार भी टोका तो कह दूंगी हुकम से साफ साफ , मैं नहीं आने वाली अब यहां रोज रोज इसकी डपट सुनो , हुँ......। फिर चाहे हुकम जो भो कहे , अरे बात करने का भी कोई ढंग होता है कि नही , ये क्या की खरखराती आवाज में एक दम दूसरे को डरा दिया , ऐसा कहीं होता है भला , हुकम को बुरा लगे तो लगे , मैंने कोई गलत तो नही कहा ,दुर्गा जैसे खुद से ही प्रश्न पूछ रही थी और खुद से ही जवाब दे रही थी वह अक्सर इसी तरह खुद ही सवाल जवाबों का ताना बाना बुनती रहती थी और कभी कभी तो वह मन की व्यथा को इतना आवेशित कर देती थी कि उसका आवेश बाहर छलक जाता था अर्थात वह अकेले में मुह से भी बोलने लग जाती थी , और अपने हाथों को मन की व्यथा के अनुरूप सांकेतिक मुद्रा में परिचालित करने लगती थी ।
कुछ देर बाद जब उसे इस बात का अहसास होता तो उसे अपने ऊपर ही हंसी आजाती और फिर वह ग्लानि भी महसूस करती ।
आज भी उसके साथ यही हुआ ,उसे अपने ऊपर बहुत गुस्सा आया , तभी उसने अपने को किले के बड़े फारक के पास खडा पाया ,दुर्गा रुकी उसने देखा वह बड़ी मूछों वाला पहरे दार उसे ना रोकते हुए अंदर जाने का इशारा कर रहा था ।
वह झटसे किले में प्रवेश कर गई , और सिर का बोझा सामने बने चबूतरे पर रखते हुए ,सुमेर सिंह का इंतजार करने लगी ,पहले भी वह अक्सर ऐसा ही किया करती थी ,सुमेर सिंह हथियारों का निरिक्षण करता और दुर्गा वापस आ जाती थी । "आज उस अकड़ू ने रोका नहीं" , उसने मन में सोचा ,"डपट दिया होगा हुकम ने , बाद में कहा होगा खबरदार जो आज के बाद इसे रोका ", मेरे सामने नहीं कहा होगा बेज्जती ना हो इस लिए अरे वो नही जानता हुकम कितने अच्छे आदमी हैं वह फिर मन ही मन कुलांचे भरने लगी , " एक डांट में एक दम सीधा हो गया तभी तो आज चुप चाप आने दिया " और उसके मुह से निकल पड़ा " इनकी यही सजा है " । औरआवेश में दुर्गा की एक उंगली भी बाहर दरबान की तरफ उठी , तभी अचानक वह सकते में आगई , पीछे से किसी ने उसे पुकारा "दुर्गा " उसने मुड़कर देखा सामने सुमेर सिंह मुश्कराता खड़ा था , उसकी उंगली अभी भी बाहर दरबान की तरफ उठी थी , " क्या हुआ दुर्गा किसको सजा दे रही हो " ,उसका बोझ खोलते हुए सामान देखता सुमेर सिंह बोला , " अरे खम्मा खणी हुकम वो बस ..... । यूँ ही...। " उसे अपने आप पर ग्लानि होने लगी , " आप कब आये हुकुम ? "
"जब तुम किसी को सजा सुना रही थी " सुमेर मुश्कराता उसकी तरफ देर तक देखता हुआ बोला , दुर्गा की नजरें सुमेर सिंह से मिली और फिर झुक गई वह ग्लानि से भर उठी , " माफ करना हुकुम ऐसे ही मुह से निकल गया " ।
" जानता हूँ " सुमेर फिर मुस्कुराया " सोचना कम करो , लो थोड़ा पानी पियो " सुमेर ने मटके में से एक कुल्हड़ पानी का उसे दिया और कहा " दिमाग ठंडा रखा करो " ,दुर्गा अवाक सी चुप चाप खड़ी रह गई ,उससे ना कुछ कहते बन रहा था ना करते ,तब सुमेर सिंह ने उसका हाथ पकड़ा और कुल्हड़ हाथ मे थमा दिया, हाथ का स्पर्श पाकर दुर्गा के शरीर मे एक लहर सी दौड़ गई तब दुर्गा ने कुल्हड़ लेकर पानी पिया और एक नजर सुमेर सिंह को देखा दोनों की नजरें मिली फिर दुर्गा ने नजर झुका ली और कहा " तो चालूं क्या हुकुम ? " ।
सुमेर सिंह ने गर्दन हिला कर सहमति दी ।
दुर्गा का चेहरा लाल हो गया , वह नजर नही उठा पा रही थी , उसने देखा सुमेर सिंह अब खामोश था चेहरे पर वही सादगी जैसे कह रहा हो " ठीक है अब जाओ " ।
दुर्गा किले से चल पड़ी , मगर उसे ऐसा लगा जैसे वह कुछ वहां छोड़ आईं हो , उसकी चाल में वो तेजी नही थी , चेहरे की वो चंचलता जाने कहाँ गायब हो गई थी , उसकी जगह एक खामोशी ने लेली थी ।
हुकुम का वो चेहरा बार बार उसके मष्तिस्क पर उभर जाता था ,वो मुश्कराता चेहरा , आज तो वो हुकुम के चेहरे की तरफ नजर भी उठा कर ठीक से देख भी नही सकी थी , मानो पलकों पर किसी ने बोझ रख दिया हो , क्या हो गया है उसे ,क्या जादू हो गया है कोई ?, हुकम का चेहरा दिमाग मे आते ही उसके चेहरे पर भारीपन क्यों आ गया था ,वह इधर उधर नजर चुराने लगी थी जैसे , अचानक उसे जैसे लज्जा आने लगी हो , ऐसा क्यूं होता है , जैसे मैं अपने बस में नहीं हूं , जैसे मेरा तन मन किसी और के बस में हो गया हो , अपने मन पर जैसे मेरा कोई अधिकार ना रह गया हो , कुछ सोचो तो हुकुम का चेहरा सामने आजाये , जैसे मैं मैं ना होकर हुकुम हो गई हूँ , ऐसा पहले तो नहीं हुआ कभी ,कितनी ही बार आ चुकी हूं यहां ।
उसने मन ही मन फैसला किया अब वह हथियार देने नही आएगी , हुकम के सामने जाने की उसकी हिम्मत नही पड़ रही थी , वह भारी कदमों से चल कर घर आई और अपने काम मे लग गई ।
जारी है ........। तेरे इश्क़ में (भाग 3)
भगवान सिंह रावत (दिल्ली)

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