अबतक आपने पढ़ा ........................।
सुमेर सिंह अकेला ही अंधेरे में उस ओर तलवार निकाल कर चल पड़ता है ,वहां शत्रु के दो सैनिकों को मौत के घाट उतार कर शिविर नष्ट कर वापस उच्च अधिकारी को सूचित करता है और आदेश के अनुशार एक शहस्त्र सेना लेकर अभियान पर निकलता है , आगे भेजे गए दो सैनिकों से धुँए का संदेश पाकर सटीक स्थिति का अवलोकन कर धनुर्धारियों को आदेश देता है ,धनुर्धारी शत्रु सेना के नायक को और आस पास के सेकड़ो सैनिकों का भयंकर तीरों की वर्षा कर संघार करते हैं, ये देखकर नायक विहीन छुपी हुई सेना पेड़ों और झाड़ियों के पीछे से बाहर नही निकलती ।
अब आ
सुमेर सिंह ने सेना को आगे बढ़ने का आदेश दिया ।
दूसरी तरफ नायक विहीन शत्रु सेना अव्यवस्थित होने लगी , और इधर उधर भागने लगी । परंतु सुमेर सिंह इस स्थिति के लिए तैयार था , पूरी एक सहस्त्र सेना ने शत्रु सेना को दोनो तरफ से घेर लिया , अब युद्ध करने के सिवाय उनके समक्ष और कोई विकल्प नही बचा था , रजपूती सेना उनके निकट पहुंच चुकी थी , हाथों में तलवार और ढाल सुसज्जित सेना शत्रु पर टूट पड़ी , टन्न टन्न और खच खच की आवाज के साथ साथ सैनिकों के हृदयविदारक क्रंदन स्वर भी घने जंगल मे उभर रहे थे , अत्यधिक वीभत्स दृश्य था।
सुमेर सिंह खुद सबसे आगे था , एक एक कर उसने कई शत्रुओं को उसने मौत के घाट उतार दिया था , लगता था जैसे उसकी तलवार की प्यास अभी बुझी नही थी , शत्रु को उसकी तलवार दिखती ही नहीं थी , बस एक हल्की सी चमक आंखों में उभरती थी और फिर एक स्वर तलवार का अपने लक्ष्य पर पहुंचने पर उभरता था " खच्च " राजपूती सेना में भी युद्ध कौशल की कोई कमी नही थी , शत्रु के वार करने से पूर्व ही शत्रु का काम तमाम कैसे करना है , ये वह अच्छी तरह समझते थे , भीषण युद्ध की विभीषिका को सहन करती शत्रु सेना अब तितर बितर होकर पलायन का मार्ग खोज रही थी , यद्यपि सेना में बहुत कम सैनिक ही शेष बचे थे । मगर राजपूती सेना इस युद्ध मे एक मानक स्थापित करना चाहती थी ,वह एक भी सैनिक को जिंदा बचकर नही जाने देना चाहती थी ।
नायक विहीन सेना अव्यवस्थित होकर दिशा हीन हो जहां रास्ता मिले वहीं भागने लगी , अगर कोई सम्मुख होता तो लड़ता अन्यथा भागने का मार्ग खोजता , इस समय राजपुती सेना से युद्ध करना आत्मघात करने के समान था ।
शत्रु की आधे से अधिक सेना धराशाई हो चुकी थी , जो कुछ सैनिक शेष बचे थे वह धीरे धीरे पलायन करने लगे , पराजित और भागते हुए शत्रु पर आघात करना , राजपूतों के नियमों और प्रतिष्ठा के विरुद्ध था , अतः कुछ समय पश्चात सुमेर सिंह के द्वारा युद्ध विराम का आदेश दिया गया ।
राजपूती सैनिकों में भी तीन चार सैनिक शहीद हुए ,कुछ गंभीर अवस्था मे घायल थे । उन्हें तुरंत उपचार के लिए लेजाया गया , और मारे गए सैनिकों को विधिवत अंतिम संस्कार के लिए ले जाया गया ।
युद्ध विराम हो चुका था , अब प्रश्न ये था कि शत्रु का मुखबिर कौन था जो इस राज्य की सेना का गुप्त भेद शत्रु को बताने को बाध्य था , उस विश्वासघाती को खोजना अत्यंत आवश्यक था ।
सुमेर सिंह ने गुप्त रूप से अपने दो अनुचर इस कार्य के लिए नियुक्त किये , और उन्हें शीघ्र ही अपने कार्य को कार्यरूप देने को कहा ।
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दुर्गा को इस बात की खबर लगी कि किले से सेना युद्ध के लिए कूच कर चुकी है तो वह थोड़ी विचलित हो गई , और सुमेर सिंह को लेकर चिंतित होने लगी , " कैसा होता होगा जब दो सेनाएं आपस मे टकराती है ? कैसे मार काट मचती होगी ? सैनिक शत्रु के खून का प्यासा हो जाता होगा और जबतक वह जिंदा है तब तक उसे बस लड़ना है और दूसरे के प्राण लेकर ही दम लेना है " ।
" उफ ......। कैसी विडंबना है ये मनुष्य ही मनुष्य के खून का प्यासा है , क्या युद्ध जरूरी है ? क्या बिना युद्ध के दुनियां में काम नही चल सकता ? क्या सब लोग प्रेम से नहीं रह सकते ? कितना ऊंचा होता है इश्क का आसमान कितना सुखद है इश्क के साये में जीवन बिताना " ।
उसके मन का साधुवाद उफान मारने लगा । उसे अपने हुकुम का चेहरा सम्मुख हो आया ," कैसे होंगे हुकुम ? , कैसे युद्ध कर रहे होंगे , शत्रु से ? , कहीं वह घायल तो नही हो गए ? " ।
उसके अंतर्मन में कई तरह के प्रश्न उठने लगे एक डर व्याप्त होने लगा ......। " नहिईईई.... नहीं नहीं " उसने अपना चेहरा अपने हाथों से छिपा लिया , और मन मे बैठे उस डर को परास्त करने में जुट गई ," ऐसा कभी नहीं हो सकता , ऐसा कैसे हो सकता है , मेरा प्यार इतना कमजोर नही है , ये सच्चा इश्क है , और सच्चे इश्क में बहुत ताकत होती है " ।
उसने तुरंत उठकर हाथ मुह धोकर घर मे रखे मंन्दिर का दिया प्रज्वलित किया और मां भवानी , अम्बे मां का ध्यान कर सुमेर सिंह की सुरक्षा और जीत की कामना करने लगीं ।
जारी है.................। तेरे इश्क़ में ( भाग15 )
भगवान सिंह रावत। ( दिल्ली )

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