अब तक आपने पढ़ा.....................।
चंदू को जब यह पता चलता है कि दुर्गा सुमेर सिंह से प्रेम करती है तो वह गुस्से मे झुंझला उठता है ,वह जानता था कि दुर्गा अपना रास्ता नही बदलेगी ,उस पर सामाजिक दबाव बनाना होगा । उधर सुमेर सिंह अपने और दूर्गा का हाथ मांगने दुर्गा के घर उसके माँ बाबा के पास आया ,और उनकी सहमति मांगी ,और उन्हें समझाया ,वापस आने के पश्चात उसे कुछ दूरी पर कुछ हलचल सुनाई पड़ी , तलवार खींच कर वह अकेला ही उस दिशा की ओर चल पड़ा ।
अब आगे ...................।
सुमेर सिंह ने अपनी तलवार खींची और दबे पांव उस आवाज और उजाले की दिशा की ओर अकेला ही चल पड़ा , उसे अकेले जाने में कोई भय नहीं था ,वह अच्छी तरह जानता था कि वह अकेला दस पर भारी पड़ेगा , अगर हम अपनी ही जमीन पर शत्रु से भय खाने लगे तो हमे अपने को राजपूत कहलाने का कोई हक नही है , बहुत समय से ऐसे ही मौके की तलाश में था सुमेर सिंह , अपनी मिट्टी के लिए कुछ कर गुजरने का मौका ।
सावधानी बरतते हुए वह उस दिशा की ओर बढ़ रहा था , अब उसे दो व्यक्तियों की आवाज सुनाई पड़ रही थी , मगर इतनी स्पष्ट नहीं कि ध्वनि को शब्दों में पिरोया जा सके । उसने देखा लगभग आधे कोस की दूरी पर आग जल रही है ,मुख्य मार्ग से कुछ अलग हट कर , जिससे किसी आते जाते राहगीर को कोई आभास न हो कि शत्रु यहां डेरा डाले छुपा है । बिना कोई आहट किये वह और निकट पंहुंचा ,अब वह स्पष्ट उन्हें देख सकता था ,वह दो व्यक्ति थे , और बैठकर आग ताप रहे थे । और सामने की तरफ एक छोटा शिविर लगा रखा था ।
सुमेर सिंह समझ गया कि ये लोग यहां के नहीं है ,शत्रु हैं ,और आग जलाने का अर्थ है किसी मुखबिर कोअपनी सटीक स्थिति का संदेश पहुँचाना ,इस लिए इनके वार्तालाप से ही इनकी पहचान करनी होगी ,अतः , प्रमाणिकता के लिए कुछ समय यहां पर व्यतीत करना होगा ।
" आज ठंड कुछ ज्यादा नहीं है " उन में से एक बोला
" हाँ है तो , दो तीन दिन की बात और है , बस हमारा मकसद पूरा हो जाय " दूसरे ने जवाब दिया ।
" कल तक हमे सूत्र का पता लग जायेगा , फिर हमारा कार्य समाप्त ,दो योजन की दूरी पर तीन सौ जवानों की टुकड़ी हमारे भरोसे पर बैठी है , बाकी कार्य उनका " । पहला व्यक्ति बोला ।
" गुप्तचर कभी भी आ सकता है ,हमे ये तपस्या तो करनी ही पड़ेगी " । दूसरे व्यक्ति ने जवाब दिया
सुमेर सिंह को उनकी बातचीत से स्पष्ट हो गया कि शत्रु धोखे से आक्रमण करने की तैयारी में है ।
अब सुमेर सिंह को अपना कार्य करना था , सुमेर सिंह यह तसल्ली करना चाहता था कि शत्रु कितने है ।
उसने एक पत्थर को धीरे से उठाया और उनसे थोड़ी दूर पर उछाल दिया , दोनो यकायक चौंक पड़े और खड़े हो इधर उधर देख उस दिशा में चल पड़े जिधर पत्थर गिरा था , दोनों झाड़ियों के बीच जाकर बहुत देर तक देखते रहे , फिर शायद कोई जानवर होगा ,ये समझ कर वापस आगये ।
सुमेर सिंह समझ गया था कि अभी यहां पर सिर्फ दो ही हैं अन्यथा शिविर में कोई और होता तो अब तक बाहर आजाता , उसने एक बार अपनी तलवार को देखा और उठ खड़ा हुआ ।
ठीक शिविर के पिछले भाग में जाकर सुमेर सिंह ने एक बार फिर पत्थर उठाया और काफी दूर तक उछाल दिया , दोनों फिर चौंके मगर उस तरफ गए नही , अरे जा भई देख तो जाकर जानवर भी बहुत हैं यहाँ , और दूसरा व्यक्ति उस तरफ चल दिया ।
पहला बैठकर आग तापता रहा ।
अचानक आग तापते हुए उसने अपनी पीठ पर कोई नुकीली चीज चुभती हुई महसूस की " सावधान "
का स्वर उसे सुनाई पड़ा , उसका हाथ झट अपनी कमर की तलवार पर पंहुंचा ,एक झटके में तलवार खींच वह खड़ा होकर पलटा , सामने एक बलिष्ठ युवक को देख कर वह एक बार विचलित हुआ ,मगर फिर अपनी तलवारें उसकी तरफ तान दी , अगले ही क्षण एक टन्न की आवाज के साथ उसकी तलवार जमीन पर थी , और दूसरे क्षण वह खुद जमीन पर गिर चुका था एक तलवार उसकी कमर में धँस चुकी थी , उसे इस बात का अहसास भी ना हो पाया कि कब उसकी तलवार गिरी और कब उस पर वार हुआ , और उसका प्राणान्त हो गया । 'वीर राजपूत कभी किसी पर धोखे से वार नहीं करते " , फिर सुमेर सिंह उनके शिविर की ओट में होकर दूसरे की प्रतिक्षा करने लगा । वहां कूछ ना देख कर दूसरा व्यक्ति वापस आया तो उसने पहले व्यक्ति को गिरा हुआ देखा , किसी अनहोनी की आशंका में वह कूछ सोचता उसकी नजर सुमेर सिंह पर पड़ी । वह चौंक गया , तलवार पहले से उसके हाथ मे थी , वह सुमेरसिंह पर हमले के लिए झपटा , वह कुछ करता इससे पहले ही खच की आवाज हुई और वह जमीन पर गिर पड़ा , उसकी गर्दन में तलवार धंस चुकी थी ,क्षण भर में सबकुछ हो गया ।
अगर कोई सुमेर सिंह के सम्मुख होता तो कहता कि ये कैसे हो गया ,क्योंकि पलक झपक कर खुलती बाद में थी , शत्रु जमीन पर पहले गिर जाता था , इतनी तत्परता थी सुमेर सिंह के युद्ध कौशल में ।
सुमेर सिंह ने एक गहरी सांस ली , और शिविर में इधर उधर नजर दौड़ाई , कुछ कहने पाइन का सामान और डॉ तीन युद्ध के हथियार वहां मौजूद थे कुछ तलवारें और ढाल और कुछ तीर कमान ।शत्रुओं की गतिविधियों की पुष्टि हो चुकी थी , परंतु
मुखबिर कौन था ये मालूम नही हो पाया था , मुखबिर के लिए वहां पर रुकना समझदारी नही थी ,वह सुबह आये या अगले दिन आये कुछ कह नही जा सकता ।
सुमेर सिंह ने शिविर को नष्ट कर दिया और अगली रणनीति को अंजाम देने के लिए शीघ्रता से वापस किले पर पंहुंचा ।
किले पर पहुंचकर सुमेर सिंह ने प्रथम अपने उच्च अधिकारी के सम्मुख इस घटना की सूचना दे कर पूरा का वृतांत सुनाया ।
अधिकारी ने सुमेर सिंह को आवश्यक निर्देश दिए , और तुरंत कार्यवाही करने को कहा । प्रात काल सुमेर सिंह ने दो सौ सिपाहियों के अपने दस्ते को मैदान ने उतार कर युद्ध के लिए तैयार कर दिया ।
जारी है....................तेरे इश्क़ में (भाग 12)
भगवान सिंह रावत (दिल्ली)

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