अब तक आपने पढ़ा ...............
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सुमेर सिंह दो शत्रुओं को मौत के घाट उतार कर अपने उच्चाधिकारी से आदेश लेकर एक शहस्त्र सेना लेकर शत्रुओं पर आक्रमण के लिए निकलता है पहले धनुर्धारी शत्रु की सेना के नायक के साथ कई शत्रुओं का विनाश करते हैं , उसके बाद सारे छुपे हुए शत्रु बिना नायक के तितर बितर हो इधर उधर हो जाते है भीषण युद्ध होता है शत्रु की आधे से ज्यादा सैनिक मारे जाते है , शेष भाग जाते है ।
दुर्गा को युद्ध का पता लगता है तो वह सुमेर सिंह के प्रति चिंतित हो जाती है ।
अब आगे ................…।
दुर्गा तेजी से किले की तरफ बढ़ रही थी , उबड़ खाबड़ पगडंडियों के पथरीले रास्ते पर वह ऐसे चल रही थी मानो नीचे कंकर पत्थर कुछ है ही नही , झाड़ झंकाड का भी उस पर कोई असर नही था , उसके पैर जगह जगह से छिल गए थे , परंतु उसे कोई परवाह नहीं थी , आज हथियार भी नही थे फिर भी वह किले पर अपने हुकुम से मिलने आ पहुंची थी , अब उसे किसी की परवाह नहीं थी , इश्क के आसमान में वह इतना ऊंचा उठ चुकी थी कि उसका हौसला सातवें आसमान पर था ।
उसे सपना की तरह दिलेर बनना था , वह सुमेर सिंह का हाल जानने के लिए किले पहुंची थी , युद्ध का क्या हुआ , युद्ध खत्म हुआ या अभी जारी है , हुकुम कहाँ है , कही घायल तो नही , उसके मन मे कई प्रश्न थे , जो रह रह कर उसे भ्रमित कर रहे थे और जिसका उत्तर उसे चाहिए था ।
अभी किला उससे थोड़ी दूर था कि अचानक उसकी नजर सामने किले की तरफ गई , उसे कोई आता दिखाई दिया ,कौन होगा ? एक और प्रश्न उसके मष्तिष्क में घूम गया , जो भी हो , उसने अपना शिर झटक दिया और आगे बढ़ गई ।
कुछ देर आगे चलने के बाद उसके पग अचानक थम गए , " क्या ..........सच मे ये तो हुकुम हैं " , उसके अंतर्मन में हर्ष की लहर दौड़ गई और होंटों पर मुश्कान छा गई , वह जोर से चिल्ला उठी " हुकुम....हुकुम ".....। और तेजी से दौड़ पड़ी ।
और नजदीक आकर सुमेर सिंह के सम्मुख मुस्कुरा कर खड़ी हो गई , सुमेर सिंह भी मुश्करा कर मूर्तिवत हो गया , दोनो एक दूसरे को अल्पक निहारते रहे , मानो सदियों से मिलने पर अपनी आंखों की प्यास बुझा रहे हों ।
दुर्गा मानो कह रही हो , " जाओ में तुमसे बात नहीं करती , बताया ही नही की युद्ध मे जा रहा हूँ " ।
और सुमेर सिंह कह रहा हो , " सब कुछ अचानक हुआ है कैसे और कब बताता " ।
" जानते हो पूरी रात मैंने कैसे काटी है , एक पल को भी तुम्हारा चेहरा मुझसे दूर नही हुआ " दुर्गा जैसे कह रही हो ।
" जानता हूँ दुर्गा सब जानता हूँ पर देश के लिए हमारा जीवन सर्वप्रथम है " ।
" सच मे मुझे बड़ा डर लग रहा था युद्ध से , बहुत डर गसी थी मैं , कुछ अनिष्ट की आशंका से ।
" कैसी बात करती हो दुर्गा , मेरे साथ तुम्हारा प्यार जो था , जानती हो सच्चे प्रेम की ताकत " ।
दुर्गा जैसे आस्वत हो गई थी , और फिर तेजी से सुमेर सिंह के पास आकर उससे लिपट गई , सुमेर सिंह ने भी उसे दोनो हाथों से कस कर आलिंगनबद्ध कर लिया ।
इसके पश्चात उन्हें कुछ आपस मे पूछने की आवश्यक्ता नही पड़ी आंखों ही आंखों में दिल के सवालों का जवाब मिल चुका था ।
" ओह..... हुकुम ओह....कैसा है ये कमबख्त इश्क बस ऐसे ही तुम्हारी बाहों में मर जाने को जी चाहता है " और वह और जोर से सुमेर सिंह से चिपट कर मानो एकाकार होना चाहती थी , " काश ऐसा हो कि हम दोनों एक हो जाएं" , दुर्गा भावावेश में आकर बोली ।
ओर सुमेर सिंह भी उसे अलग नही होने देना चाहता था , कुछ देर तक निस्तब्धता रही , कोई कुछ नहीं बोला बस एक दूसरे की धड़कनें सुनते रहे ।"
" दुर्गा..... दुर्गा" ....सुमेर सिंह ने दुर्गा को अपने बाहुपाश से थोड़ा अलग करते हुए कहा ।
" सुबह मैं अपनी माता से मिलने जाऊंगा , और उनके समक्ष तुम्हारे और मेरे विषय मे अपना पक्ष रखूंगा " , सुमेर सिंह ने कहा ।
" सच कह रहे हो हुकुम " ,दुर्गा ने उसका एक हाथ पकड़ कर अपने सीने पर लगा कर कहा ," देखो मेरा दिल कितनी तेजी से धड़क रहा है " ।
" दुर्गा तुम निश्चिन्त रहो , सब ठीक होगा , मुझे मेरी माता पर और तुम्हारे प्रेम पर पूरा भरोसा है " ।
दुर्गा ने उसका हाथ होंठों पर लेजाकर चूम लिया ।
" और मुझे मेरे हुकुम पर " , दुर्गा ने कहा
" में तुम्हारे भरोसे की रक्षा के लिए दुनियां से टकरा जाऊंगा दुर्गा , तुम देखती जाओ जीत आखिर इश्क की ही होगी " ।
दुर्गा एक बार फिर से सुमेर सिंह के नजदीक आकर अपना शिर उसकी छाती पर रख दिया ।
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भंवरी देवी एक ओर बाहर दीवान पर विराजमान हैं , सुमेर सिंह उनके सम्मुख खड़े होकर और इधर उधर टहलते हुए कुछ सोचते हुए बार बार माता के चेहरे की तरफ देखते है , अपने अंदर जो था सुमेर सिंह एक बार मे कह चुका था , अब वह माता के उत्तर की प्रतीक्षा में था ।
भंवरी देवी गहनता से विचार कर रही थी , एक तरफ रजपूती प्रतिष्ठा का प्रश्न था तो दूसरी तरफ पुत्र का मोह था , वह पुत्र की बात को अनसुना भी नही कर सकती थी , वह जानती थी , कि उसका पुत्र जो करता है करके छोड़ता है , वह दुर्गा के अलावा किसी औऱ के विषय मे विचार करने की अपेक्षा आजीवन अविवाहित रहना पसंद करेगा ,
बहुत समय बाद निस्तब्धता तो तोड़ते हुए भंवरी देवी बोली ," सुमेर सिंह मेरी बात ध्यान से सुनो , हम राजपूत हैं मुझे अपनी रजपूती परंपरा और प्रतिष्ठा को ध्यान में रखना जरूरी है , और सामाजिक परिवेश में रहकर रीति रिवाज , मान मर्यादा का निर्वाह भी करना है " ।
सुमेर सिंह मा साहेब के शब्दों को सुनकर एकाएक अधीर हो उठा था , अपने पक्ष में निर्णय ना आने पर सुमेर सिंह विचलित होने लगा , उसके पश्चात भंवरी देवी बोली , " लेकिन सुमेर सिंह तुम मेरे बेटे हो ,मुझे तुम्हारे विषय मेभी सोचना है , तुम्हारा हित अहित भी मुझे ही देखना है , तुम राजपूत हो और राजपूत जो भी करता है , निडर होकर उस का सामना करता है , इतिहास गवाह है राजपूतों ने इस तरह के कारनामों को अंजाम दिया है ,और फिर एक अलग तरह का इतिहास रचा है , अगर तुम भी कुछ इस तरह के कार्य करने की क्षमता रखते हो तो तुम्हे भीषण कठिनाइयों का सामना करना होगा , तुम तैयार हो " ?
" हाँ माँ साहेब मैँ हर तरह से तैयार हूं , आप शीघ्र अपना निर्णय दें " सुमेर सिंह ने कहा ।
" तो ठीक है , तुम जो करना चाहते हों करो , इसके पश्चात जो जो हमारे समाज मे हमसे जुड़े लोग हैं , जो निर्णय वह लोग करेंगे , तुम्हे मान्य होना चाहिए , वह लोग तुम्हे मुझसे पृथक रहने का विचार भी बना सकते हैं , और हमारे सामाजिक रीतियों से अलग भी कर सकते हैं , या फिर कुछ भी ना करें यह भी संभव हो सकता है , अभी ये सब भविष्य के गर्त में छिपा है ,तुम्हे स्वीकार है " ? भंवरी देवी बोली
" हाँ माँ साहेब मैँ तैयार हूँ सुमेर सिंह ने जवाब दिया " ।
" ठीक है , मैने एक माता का और राजपूत दोनो का कर्तव्य निभाया है , इससे आगे मुझे कुछ नही कहना " ,और भंवरी देवी वहां से चली गई ।
जारी है...........तेरे इश्क़ में (भाग 16)
भगवान सिंह रावत (दिल्ली)

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