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Saturday, December 9, 2023

भक्ति और शक्ति ( भाग 2 )

 बात देश आजाद होने से पहले दो तीन दशक पहले की है,राजा महाराजाओं की प्रसाशन व्यवस्था थी दूर दूर तक सड़के नही थी ,आने जाने के साधन पैदल या घुड़ सवारी ,या सामान लादने वाले खच्चर होते थे,रास्ते भी  दो तीन फुट चौड़े होते थे , पैदल चलने के लिए टेढ़ी मेढ़ी पकडंडियाँ होती थी  ।

उदरपूर्ति के लिए खेती ही एक मात्र विकल्प होता था ।

गोविंदु (गांव का नाम) यानी गोबिंद राणा  पचीस साल का बलिष्ठ युवक लंबा चौड़ा दिखने में आकर्षक , अपनी माता के साथ रहता था थोड़ी जमीन थी उसी से गुजर बसर चलती थी । गोविंदु भी  आस्थावान युवक था , पूजा अर्चना और देवी देवताओं के प्रति अत्यधिक श्रद्धा रखता था । वह भी अवतारी यानी पसुवा था पांडव नाच में वह भीम का अवतारी था , उस पर भीम बहुत ही उग्र रूप से आता था ,और पांडो नाच के उत्सव में वह खूब बढ चढ़ कर हिस्सा लेता था ।

पुराने जमाने मे राजा महाराजा गाँव से भी कर वसूलते थे ,परंतु मुद्रा और सिक्कों का लेन देन व्यापक रूप से नही होता था ,क्यों कि गाँव मे आय के कोई साधन अधिक नहीं होते थे , इस लिए जरूरत की वस्तुओं का लेन देन  सामान के बदले सामान से किया जाता था ।

राजवाड़े से प्रति माह कर वसूलने की प्रथा थी , सो किसी गांव से अनाज , गेहूं , चावल , देसी घी और जो पैदावार होती उसी तरह का कर वसूला जाता था ,किसी गांव से आबादी के अनुशार कर लिया जाता था ।

गोविंदु के गाँव से इस बार पंद्रह शेर घी कर के रूप में देने का फैसला हुआ था , और वह घी राजा के महल तंक पंहुचाना था । बहुत सोच विचार के बाद गोविंदु को इस काम के लिए तैयार किया गया ,क्योकि वह बलिष्ठ और जवान युवक था ।

गोविंदु तैयार हो पंद्रह शेर का चिन्डा (घी का बर्तन) उठाया और सुबह सवेरे गांव से चल पड़ा ।

सुबह आठ नौ बजे का समय था , गोविंदु जंगल के रास्ते पकडंडियों से होता हुआ पंद्रह शेर घी लेकर चल रहा था , चारो तरफ हरे घने जंगल थे सामने की तरफ दूसरे गांव थे और बीच मे भागिरथी नदी का चट्टानों से टकराती लहरों का स्वर  तेज हो रहा था कयोंकि  यही कोई पाँचसौ मीटर नीचे गंगा नदी उस रास्ते के बहुत नजदीक बह रही थी ।

धूप थोड़ी खिल चुकी थी , तभी गोविंदु के कानों में ढोल नगारे की आवाज सुनाई पड़ी , शायद  गंगा पार कोई पाठ या कोई देव उत्सव है , गोविंदु ने घी का चिन्डा नीचे रखा और देखने लगा ,ढोल नगारे की आवाज धीरे धीरे तेज होने लगी थी ।

तभी गोविंदु ने गौर से सुना अरे ये तो पंडों के नाच की धुन है , लगता है सामने गाँव मे पनौ चल रहे हैं , जब ढोल नगारे की ध्वनि तेज हुई तो गोविंदु को एक झटका लगा और उसका शरीर कांपने लगा ,उस पर भीम अवतरित होने लगा , वह बहुत तेज गति से वहीं पर नाचने लगा उसकी आँखें लाल आँगरों के समान  हो गई , और सांसे तेज चलने लगी , भीम पुर्ण रूप से आवेग में आ चुका था , इस  प्रथा के अनुसार भीम को इस समय बहुत कुछ खाने को चाहिए होता है ,जैसे गुड़ , चावल , या भुनी हुई चौलाई या फिर भुने हुए गेहूं या रोटियां ।

परंतु यहां पर  ऐसा कुछ भी मौजूद नही था और इंतजाम भी करने वाला कोई नहीं था । 

भीम कुछ ना मिलने पर  और ज्यादा क्रुद्ध हो गया , उसका शरीर अत्यधिक  आक्रोश से भर उठा , उसने झट पंद्रह शेर का चिन्डा उठाया और मुह से लगा कर गटागट पीना सुरु कर दिया , और छण भर में ही खाली कर एक तरफ रख ढिया । कुछ देर नाचने के बाद सामने के गांव में जब कुछ विश्राम का समय आया तो ढोल नगारे बजने बजने बंद हो गए , इधर गोविंदु का भीम रूप भी शांत हो गया ,कुछ देर विश्राम के बाद जब गोविंदु घी की चिन्डा उठाने लगा तो वह आश्चर्य चकित हो गया , भीम रूप में पंद्रह शेर घी वह पी चुका था ।

वह अचानक हुई इस घटना से सकते में आ गया  अब क्या होगा , आधा रास्ता वह तय कर चुका था , अगर गांव वापस जाएगा तो भी कोई असर विश्वास नहीं करेगा और राज महल में जाकर ये सब बताना तो मूर्खता होगी ,उसे तुरंत कैद कर बंदीगृह में डाल दिया जाएगा ।

वह गहरे सोचमे पड गया , क्या करे क्या ना करे ।

एक तरफ कुंवा एक तरफ खाई वाली बात हो गई ,अब क्या करे । बहुत देर तक  वह इसी अन्तर्ध्वन्द में फँसा रहा , फिर उसने सोचा कि कुछ तो करना ही पड़ेगा , और उसने वापस गांव ना जाकर दरबार मे जाने का फैसला किया , अब चाहे जो हो देखा जाएगा ,और वह राज दरबार की तरफ चल पड़ा । दो घंटे चलने के बाद पूछ ताछ करता करता वह राज दरबार सही जगह पर पहुंचा ,और दरबान को अपना नाम और गांव का नाम बताया , कुछ देर बाद आदेश आया कि फलां गांव से गोविंदु नाम का आदमी हाजिर हो जाये , वह घी का खाली चिन्डा लेकर वहां पहुंचा , अधिकारी ने खाली बर्तन देख कर कहा " अरे खाली बर्तन पंद्रह शेर घी कहां है " तब उसने सारी आपबीती अधिकारी को बताई ,अधिकारी ने कोई प्रतिक्रिया ना देकर सीधे ये बात मंत्री को बताई ,मंत्री उसकी ये बात सुन सोच में पड़ गया , और कुछ सोचकर बोला ठीक है तुम उसे  अतिथि गृह में बिठाओ मैं उससे खुद बात करूंगा ,और राजा के पास जाकर धीरे से उसके कान में कुछ बात कही, थोड़ी देर तक उनमें मन्त्रणा हुई फिर राजा ने सहमति से शिर हिलाया और मंत्री वहां से वापस आ गया ।

जो लोग दूर  के गांव से आते थे और शाम तक घर नही पहुंचते थे उन्हें अतिथि गृह में बिठाया जाता था ,और सुबह उन्हें रवाना कर दिया जाता था ।

गोविंदु अतिथि गृह में जाकर जब और लोगों से मिला तो आश्चर्य में आ गया , किसीने उससे ज्यादा पूछताछ नही की , क्या ये बड़े लोग इतनी आसानी से मान जाते हैं ,इस तरह की बाते सोचकर वह खुश होता रहा कि सुबह उसे भी रवाना कर दिया जाएगा।

सुबह हुई तो एक सिपाही उसके लिए आदेश ले आया , " गोविंदु जो भी है उसे मंत्री के समक्ष पेश होना है " । आदेश सुन कर गोविंदु चकरा गया , वह समझ गया कि उसे अब जरूर दण्ड दिया जाएगा ।वह सिपाही के साथ चल पड़ा ।

सिपाही एक मैदान में ले गया जो राज भवन से थोड़ी ही दूर पर था , " तो क्या यहां कोई कारागृह है " वह सोचने लगा ,तभी उसकी नजर सामने की तरफ पड़ी जहां राजा साहब बैठे थे और उनके साथ मंत्री और अन्य कई  राजसी वस्त्रों में और लोग भी थे , गोविंदु कुछ ना समझ पाया ,अपितु किसी बड़ी मुसीबत की आशंका से और ज्यादा भयभीत ही गया ।

तभि उसकी नजर दूसरी तरफ गई तो वह चौंक गया , तीन चार तरह के ढोल नगारे लेकर औजी वहाँ पर खड़े थे , बहुत सारा खाने पीने का सामान वहां पर मौजूद था और आस पास कुछ जनता भी खड़ी थी ।

क्या होने वाला है  ये उसकी समझ से परे था कि तभी राजा ने मंत्री को कुछ कहा और मंत्री ने हाथ हिलाकर इशारा किया और तभी तीन चार ढोल नगारे बज उठे ।

गोविंदु ये देख कर हैरान हो गया कि ढोल नागारो पर पांडो की धुन बज रही थी ,बस फिर क्या था गोविंदु का शरीर ऐंठने लगा और वह कांपने लगा ,उस पर भीषण रूप से भीम सवार हो गया , और वह नाचने लगा । ढोल नगारे भी जोर शोर से पनौ की धुन बजाने लगे , कुछ देर बाद जब भीम का पसुवा अर्थात गोविंदु पुर्ण आवेग में आया तो उसकी नजर वहां रखे खाने के सामान पर पड़ी तो द्रुत गति से वह खाने पर झपट पड़ा और कुछ ही मिनटों में छोटीचार शेर की  कढ़ाई में हलवा और खीर का पांच शेर का डेगचा और पांच शेर  के आटे की रोटियां जो वहां पर उसके लिए ही रखी थी फिर सब सफ़ा चट कर गया फिर शेर भर लाल मिर्च और इतना ही चना जो कि कुछ दूरी पर और सामान के साथ था उसे भी साफ कर गया । 

राजा और मंत्री ये देख कर हतप्रभ रह गए , वे समझ गए   कि ये देव शक्ति है ।

पहाड़ की धरती पर ये चमत्कार देख  कर राजा और मंत्री अचंभित हो गये, वह श्रद्धा से देव शक्ति के प्रति नतमस्तक हो गये ,और  मन ही मन देवताओं का स्मरण करने लगे ।

उसके बाद वे पसुवा गोविंदु के पास गए ,जो अभी भी बैठ कर भीम के प्रभाव में कांप रहा था ,दोने ने उसे प्रणाम किया ,भीम ने उन दोनों के माथे पर टीका लगाया और आश्रीवाद दिया ,मंत्री ने पहले ही सारा इंतजाम कर दिया था , उसने पांडव के सारे अवतारी अर्जुन युधिष्टर नकुल सहदेव और द्रोपदी को दूसरे  गांवों से बुला भेजा था ,भीम उन सब के साथ खूब नाचा , मंत्री ने बहुत पकवान बनवाये  सारी जनता में प्रसाद बंटवाया और पूरे पंडों के नाच का उत्सव नियम पूर्वक  पूर्ण किया । 

उसके पश्चात राजा ने गोविंदु को बुला कर उसी के सम्मुख ये आदेश किया कि इस गाँव से कोई कर ना लिया जाय अपितु जितना कर निर्धारित हो उसे गोविंदु के घर पहुंचाया जाए ,और गोविंदु को उचित पुरष्कार के साथ उसके गांव भेज दिया ।


                        भगवान सिंह रावत।  (दिल्ली)



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