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Saturday, December 9, 2023

तेरे इश्क़ में ( भाग 14 )

 

अबतक आपने पढ़ा ........................।

सुमेर सिंह अकेला ही अंधेरे में उस ओर तलवार निकाल कर चल पड़ता है ,वहां शत्रु  के दो सैनिकों को मौत के घाट उतार कर शिविर नष्ट कर वापस उच्च अधिकारी को सूचित करता है और आदेश के अनुशार एक शहस्त्र सेना लेकर अभियान पर निकलता है , आगे भेजे गए दो सैनिकों से धुँए का संदेश पाकर सटीक स्थिति का अवलोकन कर धनुर्धारियों को आदेश देता है ,धनुर्धारी शत्रु सेना के नायक को और आस पास के सेकड़ो सैनिकों का भयंकर तीरों  की वर्षा कर संघार करते हैं, ये देखकर नायक विहीन छुपी हुई सेना पेड़ों और झाड़ियों के पीछे से बाहर नही निकलती । 

अब आ

सुमेर सिंह ने सेना को आगे बढ़ने का आदेश दिया ।

दूसरी तरफ नायक विहीन शत्रु सेना अव्यवस्थित होने लगी , और इधर उधर भागने लगी  । परंतु सुमेर सिंह इस स्थिति के लिए तैयार था , पूरी एक सहस्त्र सेना ने शत्रु सेना को दोनो तरफ से घेर लिया , अब युद्ध करने के  सिवाय उनके समक्ष और कोई विकल्प नही बचा था , रजपूती सेना उनके निकट पहुंच चुकी थी , हाथों में तलवार और ढाल सुसज्जित सेना शत्रु पर टूट पड़ी , टन्न टन्न और खच खच की आवाज के साथ साथ सैनिकों  के हृदयविदारक क्रंदन स्वर भी घने जंगल मे उभर रहे थे , अत्यधिक  वीभत्स दृश्य था।

 सुमेर सिंह  खुद सबसे आगे था , एक एक कर  उसने कई शत्रुओं को  उसने मौत के घाट उतार दिया था , लगता था जैसे उसकी तलवार की प्यास अभी बुझी नही थी , शत्रु को उसकी तलवार दिखती ही नहीं थी ,  बस एक हल्की सी चमक आंखों में उभरती थी और फिर एक स्वर तलवार का अपने लक्ष्य पर पहुंचने पर उभरता था  " खच्च " राजपूती सेना में भी युद्ध कौशल  की कोई कमी नही थी , शत्रु के वार करने से पूर्व ही शत्रु का काम तमाम कैसे करना है , ये वह अच्छी तरह समझते थे , भीषण युद्ध की विभीषिका को सहन करती शत्रु सेना अब तितर बितर होकर  पलायन का मार्ग खोज रही थी , यद्यपि सेना में बहुत कम सैनिक ही शेष बचे थे । मगर राजपूती सेना इस युद्ध मे एक मानक स्थापित करना चाहती थी ,वह एक भी सैनिक  को जिंदा बचकर नही जाने देना चाहती थी ।

  नायक विहीन सेना  अव्यवस्थित होकर  दिशा हीन हो जहां रास्ता मिले वहीं भागने लगी , अगर कोई सम्मुख होता तो लड़ता अन्यथा  भागने का मार्ग खोजता , इस समय राजपुती सेना से युद्ध करना आत्मघात करने के समान था ।  

शत्रु की आधे से अधिक सेना धराशाई हो चुकी थी ,   जो कुछ सैनिक शेष बचे थे वह धीरे धीरे पलायन करने लगे , पराजित और भागते हुए शत्रु पर आघात करना , राजपूतों के नियमों और प्रतिष्ठा के विरुद्ध था , अतः कुछ समय पश्चात सुमेर सिंह के द्वारा युद्ध विराम का आदेश दिया गया ।

राजपूती सैनिकों में भी तीन चार सैनिक शहीद हुए ,कुछ गंभीर अवस्था मे घायल थे । उन्हें तुरंत उपचार के  लिए लेजाया गया , और मारे गए सैनिकों को विधिवत अंतिम संस्कार  के लिए ले जाया गया ।

युद्ध विराम हो चुका था  , अब प्रश्न ये था कि शत्रु का मुखबिर कौन था जो इस राज्य की सेना का गुप्त भेद शत्रु को बताने को बाध्य था , उस विश्वासघाती को खोजना अत्यंत आवश्यक था ।

सुमेर सिंह ने गुप्त रूप से अपने दो अनुचर इस कार्य के लिए  नियुक्त किये , और उन्हें  शीघ्र ही अपने कार्य को कार्यरूप देने को कहा ।

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दुर्गा को इस बात की खबर लगी कि किले से सेना युद्ध के लिए कूच कर चुकी है तो वह थोड़ी विचलित हो गई , और सुमेर सिंह को लेकर चिंतित होने लगी , " कैसा होता होगा जब दो सेनाएं आपस मे टकराती है ? कैसे मार काट मचती होगी ? सैनिक शत्रु के खून का प्यासा हो जाता होगा और जबतक वह जिंदा है  तब तक उसे बस लड़ना है और दूसरे के प्राण लेकर ही दम लेना है " । 

" उफ ......। कैसी विडंबना है ये मनुष्य ही मनुष्य के खून का प्यासा है , क्या युद्ध जरूरी है ? क्या बिना युद्ध के दुनियां में काम नही चल सकता ? क्या सब लोग प्रेम से नहीं रह सकते ? कितना ऊंचा होता है इश्क का आसमान कितना सुखद है इश्क के साये में जीवन बिताना " ।

उसके मन का साधुवाद उफान मारने लगा । उसे अपने हुकुम  का चेहरा सम्मुख हो आया ," कैसे होंगे हुकुम  ? , कैसे युद्ध कर रहे होंगे , शत्रु से ? , कहीं वह घायल तो नही हो गए ? " ।

उसके अंतर्मन में कई तरह के प्रश्न उठने लगे  एक डर व्याप्त होने लगा ......। " नहिईईई.... नहीं नहीं " उसने अपना चेहरा अपने हाथों से छिपा लिया , और मन मे बैठे उस डर को परास्त करने में जुट गई ," ऐसा कभी नहीं हो सकता , ऐसा कैसे हो सकता है , मेरा प्यार इतना कमजोर नही है , ये सच्चा इश्क है , और सच्चे इश्क में बहुत ताकत होती है " । 

उसने  तुरंत उठकर हाथ मुह धोकर घर मे रखे मंन्दिर का दिया प्रज्वलित किया और मां भवानी , अम्बे मां का ध्यान कर सुमेर सिंह की सुरक्षा और जीत की कामना करने लगीं ।


जारी है.................। तेरे इश्क़ में  ( भाग15 )

                          भगवान सिंह रावत। ( दिल्ली )



Tuesday, October 17, 2023

तेरे इश्क़ में (भाग 1)

 


कलम की दुनिया के मित्रों एवं पाठक गणो को मेरा प्रणाम  ।
यह एक प्रेम कहानी है जिसमे प्रेम के अनेकों रंग आपको देखने को मिलेंगे ,साथ ही प्रेम के अंकुरित होने से लेकर समर्पण तंक  के अहसास का अनुभव भी देखने को मिलेगा । प्रथम बार कोई बड़ी कहानी लिखने लिखने जा रहा हूँ , आपका सहयोग चाहूंगा ,और त्रुटि के लिए क्षमा प्रार्थी  रहूंगा ।
यह कहानी एक कल्पना मात्र है ,और मनोरंजन के उधेश्य से लिखी गई है पात्रों के नाम , स्थान एवं घटनाएं काल्पनिक हैं , यदि किसी घटना स्थान या नाम का उल्लेख वास्त्विकता के अनुरूप हो तो यह मात्र संयोंग माना जाएगा  ।
परंतु कहानी में मानवता के मूल्य , भावनाओं ,और विचारों का चित्रण यथावत किया गया  है ,अर्थात मानव जीवन पर आधारित ।
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सुनसान उबड़ खाबड़ रास्ते में केवल दुर्गा के पैरोकी पदचाप ही निस्तब्धता को भंग कर रही थी , भोर की ठंडी बयार चल रही थी छोटे पेड़ पौधे   हवा चलने से झुक झुक जाते थे , दोपहर  होने में समय काफी था ,मगर वहां आस पास कोई  भी हलचल नही दिखाई पड़ रही थी ,सिर पर सामान से लदा बोझा ,कमर से ऊपर कुर्ता, और कमर से नीचे  घाघरा ,सिर पर एक चुनरी ,गले मे पारंपरिक हार  ,हाथोंमें कोहनी तक भरी चूड़ियां और कड़े ,पैर में पाजेब , राजस्थानी लोहारिन की सम्पूर्ण वेश भूषा में ,उन्नीस वर्षीय दुर्गा का शरीर  लोहे का घण चलाते चलाते बहुत शुडौल आकर्षक और मजबूत था  ।
छन्न.. छन्न...की व्यवस्थित लयबद्ध आवाज  के साथ दुर्गा किले की तरफ बढ़ती चली जा रही थी , हरे भरे वन में चारों तरफ सन्नटा छाया था , कभी कभी बीच बीच में पक्षियों का स्वर उभर जाता था  दुर्गा  एक लोहार की बेटी थी , दशरथ की बेटी  , मां गोमती और एक छोटा भाई  छगन , यही चार प्राणी थे उस परिवार में , गाड़िया लोहार , राजपूती सेना के लिए युद्ध के औजार बनाते थे , तलवार , कटार ,ढाल, बरछी आदि , किले के बाहर चौकी से एक सिपाही लोहारो की बस्ती में आता और उनका काम और कुशलता देख कर , कुछ हथियारों का अनुबंध कर उन्हें पेशगी दे जाता था , दुर्गा का परिवार भी उनमें से एक था । दुर्गा कई बार इस सुनसान चौकी पर आती , और उस चौकी के सरदार को हथियार गिनवाती  थी ,चौकी का सरदार सुमेर सिंह हृष्ट पुष्ट नौजवान था , चेहरे पर तेज , हर समय सैनिक की पोशाक में दिखता था ।
दुर्गा किले की चौकी पर पहुंची तो अचानक उसे एक कड़क आवाज सुनाई दी ,  "ऐ छोरी रुक ,कहां चली जा रही है " ? दुर्गा के कदम एका यक रुक गए , लंबा तगड़ा शरीर , लंबी काली मूछें , हाथ मे बरछी ,कमर में कटार , द्वार पाल तेजी से उसकी तरफ बढ़ा ,
" दुर्गा हूँ सरकार " ,वह बोली
" कौन दुर्गा "  ?
"अरे नए आये हो क्या साहिब ? मैं तो कितनी ही बार आई हूँ यहाँ ,लोहार दशरथ की बेटी हूँ , वो साहिब नहीं है क्या , सुमेर .....हुकम " ,
तभी उनका वार्तालाप सुन किवाड़ खुला और सुमेर सिंह बाहर आया ,
देखते ही दुर्गा बोली " वो देखो आगये हुकम " ,
"खम्मा खणी हुकम " ,  " ये देखो ये नया द्वारपाल आया है क्या , मुझे रोक रहा है , इसे मालूम नही कि " .....,,दुर्गा सुमेर सिंह को देखते बोली  ।
दुर्गा आगे कुछ ना बोल पाई , कुछ देर खामोश रहकर सुमेर थोड़ा मुस्कराता बोला ,  " ये नए द्वार पाल है , इनको पूछने का अधिकार है " , तब सुमेर सिंह बोला "दीवान सिंह इनका बोझ उत्तरवाओ और औजार चेक करो " ।
दुर्गा ने  सिर पर रखा बोझा उतरवाया और औजार गिनवाए , कुछ तलवारें कुछ ढाल , सब चेक कर दीवान सिंह ने सुमेर सिंह को बताया ।
"ठीक है दुर्गा " सुमेर सिंह बोला
" हुकम देखो ना ये नया द्वारपाल कैसा अकड़ू है
बात भी नही सुनता ,हुँ " .....। दुर्गा मुह बिगाड़ते बोली  । इस पर सुमेर सिंह मुस्कुराया और बोला , " दुर्गा ये द्वारपाल  है इसका काम है ,सतर्क रहना ,  और हर किसी को एक नजर से देखना , कोई दुश्मन भी तो हो सकता है  " ।
" अरे तो क्या मैं इसे दुश्मन  लागूं  हूँ हुकम " ?
सुमेर कुछ ना बोल कर खामोश हो जाता है , और दुर्गा को ताकता रहता है , दुर्गा उसकी खामोशी से सहम जाती है ," ठीक है हुकम मैं चालूं " ।
और दुर्गा उल्टे पैर लौट जाती है , सुमेर सिंह उसे जाते हुए देखता है , " पगली , चंचल , चुलबुली " , वह मन ही मन मे बुदबुदाया और सुमेर सिंह के चेहरे पर फिर एक मुश्कान खिल जाती है ।सुमेर सिंह एक पांव दीवार पर टिका हथेली ठोड़ी पर लगा देर तक उस रास्ते को निहारता है जिस रास्ते दुर्गा जा रही है , कुछ देर बाद दुर्गा पकडण्डी से जाते हुए ओझल हो जाती है ।  तब वह अपनी नजर पश्चिम की ओर केंद्रित करता है ।
सुमेर सिंह की तेज और पैनी नजर , चप्पे चप्पे पर  एक एक पेड़ पौधे को ,चट्टानों को ,टीलों को खंगालती , शत्रु की टोह लेने में माहिर थी  । शत्रु का उस नजर से बच पाना नामुमकिन था ।
दूर दूर तक ऊंची पहाड़ियां और घने जंगलों के सैलाब से लदी हुई घाटियां ,सौंदर्य की प्रातीक ,
मगर हाल के कुछ दिनों में इन घाटियों में शत्रु की गतिविधियां कुछ ज्यादा बढ़ने लगी थी , पूरे राज्य में पश्चिम की तरफ साँकर गढ़  अपने आप मे दुश्मनों से लोहा लेने में पूरी तरह सक्षम था ,पांच हजार सैनिकों  का जमावड़ा और एक से एक बहादुर सैनिकों का समूह ,शत्रु के लिए  इस गढ़ के किले को भेदना नामुमकिन था , सुमेर सिंह के जिम्मे दो सौ सैनिकों की एक टुकडी थी ,  सुमेर सिंह अत्यंत सतर्कता तो बरतता ही था , साथ ही युद्ध कौशल और सच्चा देश भक्त भी था और पैनी नजर रखने में भी माहिर था ये देशभक्ति उसे विरासत में मिली थी ,उसके पिता उदय वीर सिंह भी इसी सेना के सरदार थे ,शत्रु के साथ  उन्होंने कई युद्ध लड़े और शत्रु को भयंकर क्षति पहुंचाई , और एक युद्धमे वह लड़ते लड़ते वीर गति को प्राप्त हुए ,सुमेर सिंह भी अत्यन्त साहसी और वीर योद्धा था , हर वक्त , हर खतरे से निपटने में सक्षम , इसी लिए उसे इस किले की राजपूती सैनिक छाँवनी का सरदार नियुक्त किया गया था ।
सुमेर सिंह की विधवा  माँ भंवरी देवी  अपनी छोटी बेटी  दीपिका के साथ अपने गांव कठौली में रहती है 
सुमेर सिंह में बचपन से ही उसके पिता के बहादुरी  और देश भक्ति के  लक्षण मौजूद थे , भंवरी देवी ने  उन गुणों को और तरासने का काम किया , औऱ सुमेर सिंह को अपने पिता के जैसा बहादुर ,साहसी और कर्तव्यनिष्ठ  बनाया ।

जारी है..........।       तेरे इश्क़ में (भाग 2)                    

Sunday, October 1, 2023

उम्र बह रही पानी सी



 समय रेत सा फिसल रहा उम्र बह रही पानी सी  

बीत जाएगी थोड़ीसी ,बची हुई जिंदगानी सी 

बगिया में फूलों के मेले जब जब आते जाते थे

विरह से व्याकुल मन को सच मे बहुत सताते थे

सर्द हवा बरिस के मौसम मुझको बहुत रुलाते थे 

टूट गई उम्मीदें सारी बन गई एक कहानी सी ।

समय रेत सा फिसल रहा उम्र बह रही पानी सी ।

कोई जगह नहीं दुनियां में सपने पूरे करने को

ये तो चीज बनी है बस टूट के और बिखरने को

तुम्ही बताओ प्रीत बिना अब क्या है जीने मरने को

आहत मन अब खोज रहा है राह कोई अनजानी सी

समय रेत सा फिसल रहा उम्र बह रही पानी सी  

लहर जहां ले जाये मेरे हाथ कोई पतवार नही

आंधी और तूफानों से मुझे कोई सरोकार नहीं

धेय नही है कोई जब जीवन का कोई सार नही

यादें अपनी चुभती है अब लगती है बेगानी सी

समय रेत सा  फिसल रहा उम्र बह रही पानी सी ।

देख सको तो आजाना  कुम्हलाए से फूलों को

पथरीली सी राह में चुभते कुछ दर्दीले शूलों को

मेरी पहचान को छिपाती जमीं वक्त की धूलों को

खिलते उपवन नहीं रहे जगह हुई वीरानी सी

समय रेत सा फिसल रहा  उम्र बाह रही पानी सी

बीत जाएगी थोड़ी सी बची  हुई जिंदगानी सी ।


                               भगवान सिंह रावत  दिल्ली

                                 (सर्वाधिकार सुरक्षित)





Thursday, September 28, 2023

देश प्रेम


 

मेरे खून के हर कतरे में देश प्रेम समाया है ।
उठो वीर आयुध संभालो रक्त फाग अब आया है ।
तीर तूणीर स्कंध धरो , युद्ध का बिगुल बजाओ
ले विजय भारती संकल्प , शत्रु को धूल चटाओ
टूट पड़ो  आफत बनकर भीषण संग्राम मचाओ
दुनिया देखेगी हमने कैसे अपना फर्ज निभाया है ।
मेरे खून के हर कतरे में देश प्रेम समाया है ।
उठो वीर आयुध संभालो रक्त फाग अब आया है ।
जन मानस को राष्ट्र भक्ति का अब अमृत पिलाना है
देवों की पंक्ति से जबरन दैत्यों को हटाना है
आस्तीन के सांपों को भी तीखा सबक सिखाना है।
भीतर बैठे गद्दारों ने बड़ा उत्पात मचाया है
मेरे खून के हर कतरे  में देश प्रेम समाया है ।
उठो वीर आयुध संभालो रक्त फाग अब आया है ।
अब सीता का हरण न होगा द्रोपदी शस्त्र उठाएगी
हर नारी कटी बांध कटार रानी झांसी कहलायेगी
चमकेगी तलवारें जब शत्रु की शामत आएगी
प्रेम की इस बाँसुरिया ने मौत का राग सुनाया है  ।
मेरे  खून के हर कतरे  में देश प्रेम समाया है ।
उठो वीर आयुध संभालो रक्त फाग अब आया है ।
                      
                               भगवान सिंह रावत  (दिल्ली
                                         (सर्वाधिकार सुरक्षित)

Wednesday, September 6, 2023

धरती पुत्र भाग 5 (हकीकत)

 


दिवान सिंह और प्रताप दोनो एक साथ बैठे थे , बाहर हल्की बारिश हो रही थी ,
"चाचा जी आपको पता है , हमारी दोस्ती और मेहनत को देख कर गांव वालों में कानाफूसी ही रही है " दीवान सिंह बोला
"जानता हूँ अभी तो सुरुआत है  , तुम देखते जाओ दिवान सिंह  मैंने तुम से इस जमीन पर किताबों के चरित्र उतारने की बात कही थी , वो काम मै करके छोडूंगा , दिवान सिंह देखो वही मैं हूँ वही गाँव वाले हैं वही गाँव की धरती माँ है फिर कमी कहां है ? कमी सिर्फ लगन की है, कमी आस्था की है ,कड़ी मेहनत की है  और हौसले की है ,बस लोगों में इसी हौसले को पैदा करना है ,गांव का आदमी सिर्फ़ जमीन के प्रति विमुख है  " प्रताप ने कहा ,ा , दीवान सिंह प्रताप की ये बात सुन कर गद गद हो उठा ,और भावुक  हो गया , सचमुच क्या इस धरती पर  प्रताप जैसे लोग हैं , इतने बड़े जहां में दिवान सिंह ने ऐसी हिम्मत और ऐसे हौसले रखने वाला कोई नही देखा था आज तक ,   दिवान सिंह ने महसूस किया लोग भी उनकी देखा देखी मेहनत करने लगे हैं , और उनकी बातों का अनुसरण करने लगे हैं , इस बार प्रताप और उसके खेतों में समय से खाद और कड़ी मेहनत से अच्छी फसल उगी है ,पहले से कहीं अच्छी । क्यारियों में भी साब्जियां खूब हुई ,ये सब समय से देखभाल और पानी की तराई करने से संभव हुआ था ।
आज गांव में प्रधान जी ने एक मीटिंग बिठाई है , दोनो भी वहाँ पहुंच गए ,मीटिंग बुलाने का कारण एक ही था "विकास कार्यों और पलायन पर चर्चा "मीटिंग में पटवारी समेत ग्राम विकासअधिकारी,प्रमुख और वार्ड के सदस्य औऱ कुछ गांव के लोग बैठे थे , वही प्रताप और दीवान सिंह की तरफ भी काफी लोग बैठे थे । स्पष्ट था कि जो जिसकी  तरफ बैठे थे वो दिल से उनके समर्थक है ।खैर बात ग्राम प्रधान ने आरम्भ की ।
" आदरणीय विकाश अधिकारी जी ,पटवारी जी , और सभी वार्ड मेंबर और ग्राम के सभी सदस्य गण , हम लोग आज यहां पर ग्राम के विकाश पर चर्चा करेंगे , और साथ ही पलायन जो कि आज पर्वतीय क्षेत्र में आम बात हो गई है के विषय मे भी चर्चा करेंगे "  "शुरुआत में में बता दूं कि एक वृक्ष लगाने का   नया अभियान सरकार चलना चाहती है ,हर गांव में फ्री वृक्ष बांटे जाएंगे , और गांव के चारों तरफ लगाए जाएंगे "। " इसके अलावा आप लोग जानते है सरकार की तरफ से कई योजनाएं भी चल रही है जैसे आवास योजना , प्राकृतिक आपदा योजना  आदि , अभी में ग्राम विकास अधिकारी जी से निवेदन करूँगा की दो शब्द कहे " ।
तभी अधिकारी जी उठे और अपनी बात रखने लगे ,
"आदरणीय ग्राम प्रधान जी एवं अन्य उपस्थित गण , जैसा कि प्रधान जी ने बताया कि कितनी तरह की योजनाएं सरकार की तरफ से चल रही है , आप उनका बखूबी लाभ उठा सकते है , हम हर समय आपके साथ हैं , हम लोगों को यहीं पर रह कर मेहनत करनी चाहिए , नाकि पलायन की बात सोचनी चाहिए " । "आज पलायन बहुत बड़ी समस्या बन गई है , इतना सब कुछ होते हुए भी लोग पलायन को क्यों मजबूर हैं ।आप लोगों में से कोई कुछ कहना चाहता है तो उठकर कह सकता है "।
कोई नही उठा , तभी सबकी नजरें प्रताप की ओर उठ गई , प्रताप समझ गया लोग उससे उम्मीद लगा रहे थे । वह उठा और बोला , " आदणीय प्रधान जी ग्राम विकाश अधिकारी ,पटवारी जी एवं अन्य सभी वार्ड मेंबर , जैसा कि आपने  अभी सारी बातें  सुनी , विकास अधिकारी जी की बाते भी आपने सुनी , सब  पलायन की बात करते हैं , औऱ हर कोई पलायन की समस्या को बड़े आराम से लोगों के सिर पर थोप देते है , और खुद साफ बच कर निकल जाते हैं " , " मैं आपसे ये पूछना चाहता हूं कि सरकार की. क्या जिम्मेदारी है , बस योजनाओं को बनाना और कागजों पर गांव गाँवों तक पहुंचना ? वह  योजना  कितने लोगों तक पहुंची , कितने लोग लाभन्वित हुए , और जो नही हो पाए उनके क्या कारण रहे , इसकी कोई जवाब देहि आप लोगों के पास है , श्री मान विकास अधिकारी जी आप चाहते तो ये पलायन रुक सकता था , आपसे मतलब आप जैसे अधिकारी गण , मगर आपकी कार्य के प्रति निष्क्रियता , और उदासीनता के चलते सब कुछ स्वाहा हो गया , आप लोगों ने अपना अधिकार तो समझ लिया मगर कर्तव्य के प्रति बड़ी बेरुखी अपनाई , आप सब लोग असमर्थ नही थे ,  आपलोग अकर्मण्य थे "। तभी बड़ी तेजी से पटवारी जी खड़े हुए, और अधिकारी का बचाव करते उनके पक्ष में कहने लगे , " श्रीमान प्रताप सिंह जी ,ये आप कैसी बात कर रहे हैं , भला हम  लोग उदासीन कैसे हो गए , आप बेवजह सारा दोष हम लोगों पर मढ़ रहे हैं "  ," तब प्रताप बोला पटवारी जी मैं यहां पर आपको दोषी करार देने नही आया हूँ, सिर्फ आप लोगों की गलतियों का अहसास कराने आया हूँ " , " जानता मैं सब कुछ हूँ मुझसे कुछ छुपा नही है , आपकी कार्य करने की शैली का मुझे पता है,आपने किस तरह और किसके किसके ऋण स्वीकृत किये हैं । आपके पास प्राकृतिक आपदा ऋण ,और  आवास योजना ऋण, और भी अन्य तरह के ऋण अभी भी लंबित हैं औऱ कितने विचाराधीन है " , " आप अपनी गैर जिम्मेदाराना हरकतों  से अपने आपको कभी माफ नही कर सकेंगे, अभी अगर सभी तरह की योजनाओं की फाइलों का निरीक्षण किया जाय तो सही तरीके से की गई स्वीकृतियां केवल दस प्रतिशत ही होंगी " , तभी एक युवक बोल उठा ,  " "प्रताप सिंह , अरे भाई ऐसी बात नही है , सरकारी काम मे दिक्कत तो आती ही है " तब प्रताप बोला ,  " देखा अधिकारी जी , हो गया एक दूसरे का बचाव सुरु , यहां पर और भी बहुत लोग हैं जिन्होंने गलत रास्ता अपनाया है , कोई आवाज कैसे उठाये सब भ्रस्टाचार में लिप्त हैं ।और एक दूसरे का बचाव करते हैं " ,  " मानव को अन्न बांटने वाली इस धरती माँ को तुम सब लोगों ने असहाय बना दिया , जिस देव भूमि पर लोग आने को तरसते हैं , उसी धरती माँ के लाडले पलायन कर रहे है , उनकी मायूसी के जिम्मेवार आप लोग हैं ,  मेरी उत्तराखंड की इस पावन धरती को आप सब लोगों ने भ्रष्ट किया है इस धरती मां को उनके सपूतों से दूर किया है , आपार सम्पदा के होते हुए भी यहां के सीधे सच्चे लोग दर डर भटकने को मजबूर हैं " । " तुम लोगों ने धरती मां को उनके बच्चों से विमुख करने का दोषपूर्ण कार्य किया है "। प्रताप थोडा सा भावुक को गया ,  " मगर मैं ऐसा नही होने दूंगा, सबको उनकी औकात बता कर ही दम लूंगा , और इस धरती माँ की गोद मे  हमारे लिए कितना कुछ है , ये सबको बता दूंगा । बहुत से लोग तो समझ चुके हैं और  और लोग भी जल्दी ही समझ जाएंगे , पलायन की एक हकीकत यह भी है " प्रताप की इस बात पर सबने तालियां बजाई ।और प्रताप भाई जिंदाबाद, की आवाज से  माहौल गूंज उठा । तभी दीवान सिंह उठा और बोला " भाइयों इस धरती माँ के आंचल में इतनी संपदा है कि हम बटोर नही सकते , पिछले कुछ दिनों में आपने हमे देख लिया होगा , हमारा थोड़ा सा परिश्रम  कितना रंग लाया है , हमें जरूरत है तो बस सच्ची लगन की ,धरती माँ के प्रति आस्था की दृढ़ संकल्प की , अगर हम सभी ऐसा प्रयत्न करें और परिश्रम करें तो ये धरती एक मिशाल बन जाएगी , और पलायन नही होगा " । फिर से प्रताप के समर्थन में तालियाँ बज उठी । ग्राम प्रधान प्रमुख और पटवारी समेत अधिकारी भी अचंभित रह गए सब के चेहरे उतर गए । उसके पश्चात सब प्रताप के संगरक्षण में कार्य करने लगे । और जीतोड़ मेहनत का बीड़ा उठाया । फलस्वरूप नई फसल में आश्चर्यजनक परिवर्तन आया , फसल में इतनी वृद्धि देख कर गांव के लोगों में नया उत्साह जागा ,  दूसरे गांव के लोग भी आकर प्रताप से सलाह मांगने  लगे ,लोगों में आये इस परिवर्तन को देख विकाश अधिकारी ,पटवारी प्रमुख और प्रधान  भी इस मुहिम में दिलसे शामिल हो गए और उन्होंने विकाश के लिए  यथा संभव प्रयत्न किया । प्रताप  एक प्रतीक बन गया , चर्चा गांव से शहर तक फैली तो प्रताप के परिवार को भी पता चला ।और गांव आकर उसके बेटों ने  अपने पिता  के आदर्शों का सम्मान किया और पत्नी ने भी अपने विमुख व्यवहार के लिए क्षमा मांगी ।अब गांव में खुशहाली का दौर अचूका था । बाद के कुछ दिनों में प्रताप को विकास अधिकारी  और अन्य अधिकारियों के अनुरोध पर जिला स्तर पर सम्मानित एवं पुरष्कृत भी किया गया । एक शाम प्रताप अपने  आंगन में चारपाई पर लेट आसमान की तरफ देख रहा था उसे एक झपकी आई तभी उसने महसूस किया कोई उसके सिर पर उंगलियों से बालों को सहला रहा है , उसके कानों में आवाज सुनाई पड़ी , बेटा सो गए क्या ? मैं हूँ तुम्हारी माँ धरती माँ  , बेटा आज मैं बहुत खुश हूं ,तुम्हारे काम से तुमने वो कर दिखया है  जो कोई कर ना सका , देखो चारों तरफ हरियाली ये बढ़ते हुए पेड़ , और ये लहलहाती ठंडी हवाएं , ये तुम्हारी मेहनत का फल है , तुम्हारे कड़े संकल्प का परिणाम , देख तो जरा सूने से पड़े इस गांव में कितनी चहल पहल हो गई है कितनी खुशहाली आ गईं है ,हर आँखोँ में नए सपने तैरने लगे हैँ ,हर चेहरे पर उम्मीद भरी मुश्कान दिख रही है ,आज तुम्हारी वजह से मेरे बेटों ने मेरी तरफ रुख कर लिया है ।अब मैं अपने बेटों से दूर नही हूँ । तू मेरा पुत्र कहलाने का सच्चा अधिकारी है । तू असली धरती पुत्र है , हाँ धरती पुत्र है ।
प्रताप ने धीरे से आंखें खोली , धरती माँ का आश्रीवाद पाकर वह बहुत प्रशन्नता से भर उठा , उसने देखा उसके लगाए पेड़ अंगड़ाइयां लेकर बड़े हो रहे थे ,अगल बगल की क्यारियां फल फूल रही थी ,  गौरैया और अन्य पक्षी आंगन में दाना चुगने में व्यस्त है । उसे लगा जैसे फिर वही बचपन जैसा समय आ गया है  ।
उसका स्वप्न पूरा हो चुका था, अब उसे लगने लगा था कि जिस काम के लिए उसका जन्म हुआ था , वह सम्पन्न होने को है , अपने जीवन की सार्थकता  से वह अति प्रसन्न था  ।
                                         भगवान सिंह रावत
                                                           दिल्ली

Sunday, July 23, 2023

दहशत


 

आठ बजकर तीस मिनट का समय था ,

जंगल का रास्ता , घुप्प अंधेरा , एक पथिक की पदचाप जंगल की खामोशी में बिघ्न  डाल रही थी और उनका पथ आलोकित करती एक छोटे से टोर्च की रोशनी । बीच बीच मे जंगल की निस्तब्धता को भंग करता हुआ उल्लू काअचानक डरावना स्वर उभरने  से डर के मारे उसका हलक सूख रहा था ।
और बीच बीच मे चूहों के बिलों से गिरती मिट्टी की आवाज भी उसको विचलित कर रही थी । वह उस बुरे समय को कोस रहा था जब अंधेरा होने पर उसने  गोविंद से चलने की जिद की थी ,बहुत कहा था गोविंद ने अरे मान सिंह रुक जा देर हो गई है सुबह जाना  पर वही नही माना , रुक जाता तो ठीक रहता  । पर अब क्या हो सकता था अब तो वह चल पड़ा है , वापस भी जाना अपनी बेइज्जती करवाने जैसा है । जो होगा अब देखा जाएगा । अकेले में  भयभीत मन को निडर बनाना कितना मुश्किल है ये उसे आज पता चल गया  था , दूसरा अगर समझाएं तो आदमी एक बार समझने की कोशिश कर सकता है  परन्तु अकेले में आदमी  खुद के समझये कभी नही समझ सकता , क्योंकि डर पैदा करने वाले विचार उस पर तेजी से हावी होते  रहते है , तभी सामने एक घना पेड़ उसे दिखाई दिया , अंधेरे में उसे पेड़ तो दिख तो गया ,मगर वह ठिठका और गौर से देखने लगा उसके नीचे कोई उसे बैठा दिखाई दिया , इतनी रात को कौन होगा जो इतने आराम से बैठा है , जैसे कोई धूप से बचने को बैठता है , किसी अनहोनी  आशंका से वह भयभीत हो गया ,डर के मारे एक बार तो वह उल्टे पैरों भागने को हुआ , पर कुछ सोच कर वह रुक गया , तभी उसे छोटी टोर्च का ध्यान आया उसने टोर्च की रोशनी में देखा तो दंग रह गया पेड़ के नीचे से ऊपर तक किसी ने तीन बड़े पत्थर रखे हुए थे जो कि अंधेरे में किसी बैठे हुए आदमी की तरह  दिख  रहे थे  । ओह ...... उसके मुह से निकला ,फिर उसने तेज चलती हुई सांसो पर काबू पाया ,कितना डर गया था वह , आस्वस्थ हो कर उसनेआगे कदम बढ़ाया , दो कदम चल कर वह फिर रुक गया और फिर से उस पेड़ की तरफ देखने लगा , इस आशय से कि वह दुबारा वैसे ही दिखेगा या उसके  भ्रमित मन की वजह से उसे ऐसा दिखा था ,ज्यो ही उसने नजर घुमाई अब की बार उसे अंधेरे में भी दो बड़े पत्थर ही दिखे , तो क्या मनुष्य का मन ही प्रेत को जन्म देता है , वह इस बात पर विचार कर ही रहा था कि तभी अचानक वह तीनों  पत्थर  धड़ाम से पेड़ के तने से फिसल कर इस तरह गिरे जैसे किसी आदमी के गिरने की आवाज आती है , और फिर खड़ खड़ की आवाज के साथ एक और आवाज हुई जैसे कोई व्यक्ति जख्मी हो कर कराह रहा हो । ये देख कर  मान सिंह के होश उड़ गए  । वह हड़बड़ा कर तेजी से चलने को हुआ , और अंधेरे में  उसका पैर रास्ते से बाहर की तरफ किसी झाड़ी में फंस गया , वह पैर वापस खींचने लगा , तभी उसने ध्यान से सुना तो उसे किसी महिला की सुबकने की आवाज आई , रह रह कर वह महिला सुबक रही थी , मगर कही कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा था , अब महिला सुबकते सुबकते रोने लगी थी , अत्यधिक भय के कारण मान सिंह के पैरों तले की जमीन खिसक गई  । अब क्या होगा , क्या ये कोई औरत ही है, और इतनी रात गए इस जंगल मे क्यों रो रही है , मान सिंह दूसरे पहलू पर विचार करने लगा ,पर वह जानता था कि ये सच तो हो नही सकता ,किसी तरह झाड़ी से पैर निकाल कर मान सिंह  आगे बढ़ने लगा , तब उस महिला की आवाज फिर से आने लगी , अब वह रोते रोते कह रही थी , " रुक जाओ ,रुक जाओ "  जैसे घायल अवस्था मे कोई मदद के लिए पुकारता है , इस तरह उसकी आवाज सुनाई पड़ रही थी , मान सिंह दहशत में तो था , मगर वह जल्दी जल्दी चलने की कोशिश कर गांव की परिधि में पहुंचना चाहता था , उसके मष्तिस्क की सोच अब बिल्कुल बन्द हो चुकी थी , बस उसे अपने कुल देव का मन मे ध्यान हो आया था , बार बार अपने कुल देवता का स्मरण करते वह  डर को एक तरफ कर बस फटा फट चलता जा रहा था । तभी पीछे से उसी महिला की आवाज सुनाई पड़ी , " रुक जा अरे रुक जा " ,और उसके अगल बगल कुछ छोटे पत्थर और रोड़ियाँ गिरने की आवाज आई ,मगर उसे लगी नहीं , अब उस  आवाज  में भारीपन था , मानो वह अधिकार पूर्वक कह रही हो , " अरे रुक जा ना  सुन " और उसे लगा जैसे उसके पीछे वह आवाज आती जा रही हो ,प्रेत भी कितने छद्म रूप बना लेता है वह सोच रहा था , पत्थर और रोड़ियाँ का उसके अगल बगल गिरना जारी था । तभी उसे दूर से कोई टार्च की रोशनी दिखी " ये कौन हो सकता है ,  कहीं दुसरी मुसीबत तो नही है " पर उसका साहस थोड़ा बढ़ा , उसके अपने गाँव भिंवाली  की सीमा आने वाली थी , कोइ आदमी ही लगता है , तभी उस महिला का अट्टहास भरा स्वर उसे सुनाई पड़ा , " तेरी किस्मत आज अच्छी है , बच गया तू " तब तक टार्च की रोशनी पास आ गई थी ।
"अरे मान सिंह तू कहां गया था रात में " ,वह व्यक्ति बोला , वह ज्ञान चंद था " अरे चाचा क्या बताऊँ बस कोट गाँव तक गया था गोविंद के पास " ,  " अरे तो वही रुक जाता , रात में चलने की क्या जरूरत थी ,चल "  और उसने मान सिंह को आगे कर खुद उसके पीछे चलने लगा , ' रास्ते मे डर तो नही लगा , मैंने देख लिया था दूर से टोर्च की रोशनी को , समझ गया था कि कोई तो अकेला आ रहा है , इस लिए चला आया "  ,मान सिंह ने उसे कुछ नही बताया  ।मान सिंह का घर गांव के छोर पर ही था , सो ज्ञान चंद उसे वहां छोड़ अपने घर चला गया । रात के दस बज चुके थे , उसकी पत्नी और उसकी वृद्ध माँ उसे देख घबरा गए " अरे मानू इतनी रात हमने तो सोचा था कि सुबह आओगे " , " नहीं माँ बस यूं ही चल पड़ा वहां से "  , और फिर मान सिंह ने एक एक कर सारी घटना माँ को बताई , उसकी माँ  ने तुरंत कुछ चावल कटोरी में रख उसके सिर के चारों ओर घुमाए और फिर बाहर आकर चारों तरफ फेंक दिए । फिर अंदर आकर एक टीका चावल का मान सिंह के माथे पर लगा दिया । फिर बोली " बेटा तुम्हे रात में नही चलना चाहिए , आज हमारे कुल देवता ने तुम्हारी रक्षा की है , तुम्हे याद है अभी चार पांच महीने पहले हमने पूजा की थी , तब ज्ञान चंद पर जब देवता अवतरित हुए तब क्या बोले थे ,टीका लगाते बोले थे मैं हर समय तुम्हारे साथ रहूंगा जहां भी तुम याद करोगे " । "  हाँ याद आया " मान सिंह बोला । " हाँ माँ जैसे ही मैंने याद किया  वैसे ही मेरा डर खत्म हो गया था "  , तब उसने कहा " माँ वो कौन है जो रो कर मुझे डरा रही थी , सबके साथ ही होता है क्या वहॉं पर रात में "  , "  ये एक पुरानी कहानी है बेटा "  उसकी माँ बोली , " लगभग दस बारह साल पहले की बात है कोट गाँव की एक जवान औरत उस जंगल मे घास काटने गई थी , हरा पेड़ देखकर वह उस पर चढ़ गई, और उसका पैर फिसल गया , और वहीं पर उसकी मृत्यु हो गई  , तब से उसकी आत्मा वहॉं भटक रही है , और आने जाने वालों को परेशान करती है " ।
ये सुनकर मान सिंह आश्चर्यचकित हो गया  ।  तब उसकी माँ बोली बेटा एक और बात बताऊं , " क्या "  वह बोला "  बेटा तुम बता रहे थे ज्ञान चंद तुम्हे लेने गया था , तुम्हे शायद यह पता नही है ज्ञान चंद पिछले तीन दिन से यहाँ नही है  रिश्तेदारी में शादी में गया है "  ।  " क्या ......मान सिंह अचानक चौंक गया ,तो क्या वह हमारे कुल देवता थे "  ।  " हाँ बेटा कुलदेवता की कभी भूलना मत , हमेशा याद करते रहना " । मान सिंह के मन मे कुल देवता के प्रति श्रद्धा का भाव उत्पन्न हो गया , लाख लाख धन्यवाद कर मन ही मन वह कुल देवता को स्मरण करने लगा ।
                                 भगवान सिंह रावत 
                                               दिल्ली। 

Thursday, July 6, 2023

गीत बनाता हू ।

 


धूप से मुरझाए फूलों  को सीने से लगाता हूँ ।
यादों के सैलाब मे जाकर अक्सर गीत बनाता हूँ ।
जी उठता हूँ रोज सुबह नई उम्मीद को लेकर
व्यथा वेदना के घेरे में साँझ को फिर मर जाता हूँ 
यादों के सैलाब मे जाकर अक्सर गीत बनाता हूँ ।
लौट सको तो देखना आकर मेरा ये दीवानापन
पत्थर दिल की खातिर मैं पत्थर पर फूल चढ़ाता हूँ ।
यादों के सैलाब मे जाकर अकसर गीत बनाता हूँ ।
वन उपवन खामोश हैं गुमसुम है नदिया का पानी
एक कंकड़ उछाल पानी मे  मैं हलचल मचाता हूँ ।
यादों के सैलाब मे जाकर अक्सर गीत बनाता हूँ ।
वक्त कहाँ रुकता है बोलो उम्र बहे पानी सी
उम्मीदों के अरमानों के जबरन बाँध लगाता हूँ
यादों के सैलाब मे जाकर अकसर गीत बनाता हूँ ।
बेरहमी के इस परिवेश में कहाँ छुपे बैठे हो
टूट के बिखर ना जाऊं तेरी यादों से जुड़ जाता हूँ ।
यादों के सैलाब मे जाकर अक्सर गीत बनाता हूँ ।
धूप सेअलसाये फूलों  को सीने से मैं लगाता हूँ ।
यादों के सैलाब मे जाकर अक्सर गीत बनाता हूँ ।

                           भगवान सिंह रावत  (दिल्ली)