धूप से मुरझाए फूलों को सीने से लगाता हूँ ।
यादों के सैलाब मे जाकर अक्सर गीत बनाता हूँ ।
जी उठता हूँ रोज सुबह नई उम्मीद को लेकर
व्यथा वेदना के घेरे में साँझ को फिर मर जाता हूँ
यादों के सैलाब मे जाकर अक्सर गीत बनाता हूँ ।
लौट सको तो देखना आकर मेरा ये दीवानापन
पत्थर दिल की खातिर मैं पत्थर पर फूल चढ़ाता हूँ ।
यादों के सैलाब मे जाकर अकसर गीत बनाता हूँ ।
वन उपवन खामोश हैं गुमसुम है नदिया का पानी
एक कंकड़ उछाल पानी मे मैं हलचल मचाता हूँ ।
यादों के सैलाब मे जाकर अक्सर गीत बनाता हूँ ।
वक्त कहाँ रुकता है बोलो उम्र बहे पानी सी
उम्मीदों के अरमानों के जबरन बाँध लगाता हूँ
यादों के सैलाब मे जाकर अकसर गीत बनाता हूँ ।
बेरहमी के इस परिवेश में कहाँ छुपे बैठे हो
टूट के बिखर ना जाऊं तेरी यादों से जुड़ जाता हूँ ।
यादों के सैलाब मे जाकर अक्सर गीत बनाता हूँ ।
धूप सेअलसाये फूलों को सीने से मैं लगाता हूँ ।
यादों के सैलाब मे जाकर अक्सर गीत बनाता हूँ ।
भगवान सिंह रावत (दिल्ली)

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