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Thursday, July 6, 2023

पैसा आये कहां से


 

बात आज से लगभग चालीस साल पुरानी है
उस जमाने मे मंदी का दौर था ,एक रुपये किलो दूध डेरी वाला अपने सामने निकाल कर देता था   उस जमाने में ब्लैक एंड व्हाइट टीवी भी सिर्फ अमीर और बड़ी कोठी वालों के यहां  दिखता था ,यही कोई सातवीं या आठवीं में पढ़ता हूंगा । हम लोग एक बैंक हाउस में बने क़वाटरों में रहते थे , हमारे कंपाउंड की दीवार के तरफ दूसरी गली जाती थी , वहाँ बड़ी बडी कोठियां थी और काफी धनाड्य वर्ग के लोग रहते थे , जिनके पास गाड़ियां होती थी , नौकर चाकर होते थे,उस बीस फुटि रोड में कोई समारोह या कोई हलचल होती तो हमे पता लग जाता था बस दिखाई नही पड़ता था , सो बिजली के खंभे से अर्थ की दो तारो पर बंदरो की तरह छलांग लगा कर पंद्रह फुटि दीवार पर चढ़ जाते और मजे से आती जाती बारात को देखते ,  या फिर क्या ही रहा है ये पता करते ।आस पास में थोड़ी दूर पर कुछ गरीब तबके की बस्तियां भी थी , जिनके बच्चे अक्सर उस सड़क पर साइकल के टायर को डंडी से मार मार कर दौड़ाते नजर आजाते थे , या फिर एक दूसरे को आवाज देते हुए अशिष्ट शब्दों का प्रयोग करते थे ।
उस दिन शाम के छह बजे थे हमे गली में कुछ हलचल सुनाई पड़ी , बस फिर क्या था हम दो तीन बच्चे फट से दीवार पर चढ़ गए , देखा तो दूर से एक बारात आ रही थी , तब कंपाउंड की दो तीन महिलाएं और बच्चे भी बारात देखने सीढ़ी लगाकर ऊपर चढ़ कर बारात देखने को हुई ।
थोडा सा अंधेरा हो चला था , धीरे धीरे बारात नजदीक आने लगी , बारात में पहले बैंड बाजे चल रहे थे , और उनके साथ सिर पर गैस मेन्टल लैम्प   उठाये लोग भी थे उस जमाने मे शादी व्याह में गैस मेन्टल लैंप ही उजाला करने के लिए इस्तेमाल होती थी , सबसे आगे दो ढोल बजाने वाले पटर पटर ढोल बजाते नाचने वालों को अपनी ओर आकर्षित कर रहे थे , नाचने वाले फिल्मी धुन पर बैंड की धुन पर नाच रहे थे , और कुछ मुह में पांच या दस रुपये का नोट फसाकर ढोल वाले के आगे नाच रहे थे , नाचने वालों में महिलाएं भी थी ,दूल्हा घोड़ी पर सवार था , बारात दुल्हन के घर जा रही थी । घोड़ी के साथ चलता एक आदमी बीच बीच मे एक थैले में से कुछ रेजगारी निकालता और दूल्हे के ऊपर उछाल देता ,उन सिक्कों को जमीन तक आने से पहले ही गली मोहल्ले के बच्चे उन्हें फट से लपक लेते थे कुछ नीचे गिर जाते तो उन पर झपटा झपटी हो जाती जो कि गाली गलौच तक पहुंच जाती , फिर एक आदमी उन्हें हड़काता और घोड़े से दूर कर देता । एक दो मिनट के लिए बच्चे भाग जाते मगर फिर दुबारा घोड़े के इर्द गिर्द मंडराते नजर आते थे । इधर ढोल वाला अपने हुनर को दिखाता बड़ी तेजी से ढोल बज रहा था नाचने वाले के मुह से नोट खींचना उसके हुनर की सार्थकता थी ,  यों तो कई नोट खींच चुका था अब तक वो मगर इस बार अजिब आदमी से पाला पड़ा था उसका ,जैसे ही वह मुह के पास हाथ ले जाता फट्ट से वह अपना चेहरा घुमा  लेता , नाचने वाला मानो उसे परेशान करने पर आमादा था । हम सब लोग बारात को गौर से देख रहे थे , कंपाउंड की महिलाएं और बच्चे भी आनंद उठा रहे थे तरह तरह की फिल्मी धुन पर लोग थिरक रहे थे ,तभी ढोली ने ढोल बजाते बजाते अचानक नाचने वाले के मुह से नोट छीन  लिया , झटके से खींचने के चक्कर मे पांच का नोट ढोली के हाथ से छिटक कर जमीन पर गिर गया , उस नोट पर किसी और कि भी नजर थी , ढोली ने जैसे ही नोट जमीन से उठाने को हाथ नीचे कर नोट उठाना चाहा गैस मेन्टल लैंप वाले ने फट्ट से अपना भारी भरकम जूता उसके ऊपर रख दिया , ढोल वाले कि उंगलियाँ दब गई ,वह दर्द से चीखा और अपनी उंगली को सहलाता गैस वाले को गालियां बकने लगा ,और अपनी ढोल वाली डंडी से जोर से उसके हाथ पर मारा जिससे उसने सिर पर लैंप पकड़ रखा था ,वह बिलबिला उठा , उसके पास बदला लेने का कोई विकल्प नही था क्योंकि गैस मेन्टल लैंप दोनो हाथों से पकड़ा जाता था ,सो उसने गुस्से में वह गैस की चिमनी ढोल वाले पर गिरा दी जिससे वह जमीन पर गिर गया ,उसका साथी ढोल वाला लड़ने को आगे आया तब लैंप  पकड़ने वाले का साथी भी आगे आया और एक दूसरे के गरेबान पकड़े धक्का देने लगे इस चक्कर मे दूसरा गैस मेन्टल लैंप भी फट्ट से नीचे गिरा , दो चिमनियां फुट चुकी थी , हो हल्ला मच गया लोग तीतर बितर हो गए ,हम सब लोग ऊपर दीवार से सब देख रहे थे  हड़कंप मच गया था ,दोनो ढोल वालों को गैस मेन्टल लैंप  वाले मिलकर पीटने लगे , क्यों कि वह बैंड बाजे वालों के साथ होते है इस लिए उनकी संख्या ज्यादा होती है , थोड़ी दे बाद चार पांच आदमी आगे आये वह शायद बारातियों के खास थे , बड़ी मुश्किल से उन्होंने उनको अलग किया , गैस लैंप  की चिमनियों के टूटने से आपस में चोटे बहुत आई थी कांच सड़क पर फैल गया था , बारात नजदीक पहुंच गई थी इस लिए सब धीरे धीरे दुल्हन के घर की तरफ चल पड़ी , चिमनी वाला और ढोल वाला दोनो घायल थे , लोग पकड़ कर उन्हें ले जा रहे थे, वह पांच रुपये का नोट ना तो लैंप वाले के हाथ लगा और न ढोल  वाले के , उसे कोई और ही ले गया होगा , क्योंकि सब के जाने के बाद वहां पर कुछ भी नही बचा था  ।  पैसा आये कहां से , पैसा जाए कहाँ रे  ।
                         
                         भगवान सिंह रावत (दिल्ली)

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