आठ बजकर तीस मिनट का समय था ,
जंगल का रास्ता , घुप्प अंधेरा , एक पथिक की पदचाप जंगल की खामोशी में बिघ्न डाल रही थी और उनका पथ आलोकित करती एक छोटे से टोर्च की रोशनी । बीच बीच मे जंगल की निस्तब्धता को भंग करता हुआ उल्लू काअचानक डरावना स्वर उभरने से डर के मारे उसका हलक सूख रहा था ।
और बीच बीच मे चूहों के बिलों से गिरती मिट्टी की आवाज भी उसको विचलित कर रही थी । वह उस बुरे समय को कोस रहा था जब अंधेरा होने पर उसने गोविंद से चलने की जिद की थी ,बहुत कहा था गोविंद ने अरे मान सिंह रुक जा देर हो गई है सुबह जाना पर वही नही माना , रुक जाता तो ठीक रहता । पर अब क्या हो सकता था अब तो वह चल पड़ा है , वापस भी जाना अपनी बेइज्जती करवाने जैसा है । जो होगा अब देखा जाएगा । अकेले में भयभीत मन को निडर बनाना कितना मुश्किल है ये उसे आज पता चल गया था , दूसरा अगर समझाएं तो आदमी एक बार समझने की कोशिश कर सकता है परन्तु अकेले में आदमी खुद के समझये कभी नही समझ सकता , क्योंकि डर पैदा करने वाले विचार उस पर तेजी से हावी होते रहते है , तभी सामने एक घना पेड़ उसे दिखाई दिया , अंधेरे में उसे पेड़ तो दिख तो गया ,मगर वह ठिठका और गौर से देखने लगा उसके नीचे कोई उसे बैठा दिखाई दिया , इतनी रात को कौन होगा जो इतने आराम से बैठा है , जैसे कोई धूप से बचने को बैठता है , किसी अनहोनी आशंका से वह भयभीत हो गया ,डर के मारे एक बार तो वह उल्टे पैरों भागने को हुआ , पर कुछ सोच कर वह रुक गया , तभी उसे छोटी टोर्च का ध्यान आया उसने टोर्च की रोशनी में देखा तो दंग रह गया पेड़ के नीचे से ऊपर तक किसी ने तीन बड़े पत्थर रखे हुए थे जो कि अंधेरे में किसी बैठे हुए आदमी की तरह दिख रहे थे । ओह ...... उसके मुह से निकला ,फिर उसने तेज चलती हुई सांसो पर काबू पाया ,कितना डर गया था वह , आस्वस्थ हो कर उसनेआगे कदम बढ़ाया , दो कदम चल कर वह फिर रुक गया और फिर से उस पेड़ की तरफ देखने लगा , इस आशय से कि वह दुबारा वैसे ही दिखेगा या उसके भ्रमित मन की वजह से उसे ऐसा दिखा था ,ज्यो ही उसने नजर घुमाई अब की बार उसे अंधेरे में भी दो बड़े पत्थर ही दिखे , तो क्या मनुष्य का मन ही प्रेत को जन्म देता है , वह इस बात पर विचार कर ही रहा था कि तभी अचानक वह तीनों पत्थर धड़ाम से पेड़ के तने से फिसल कर इस तरह गिरे जैसे किसी आदमी के गिरने की आवाज आती है , और फिर खड़ खड़ की आवाज के साथ एक और आवाज हुई जैसे कोई व्यक्ति जख्मी हो कर कराह रहा हो । ये देख कर मान सिंह के होश उड़ गए । वह हड़बड़ा कर तेजी से चलने को हुआ , और अंधेरे में उसका पैर रास्ते से बाहर की तरफ किसी झाड़ी में फंस गया , वह पैर वापस खींचने लगा , तभी उसने ध्यान से सुना तो उसे किसी महिला की सुबकने की आवाज आई , रह रह कर वह महिला सुबक रही थी , मगर कही कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा था , अब महिला सुबकते सुबकते रोने लगी थी , अत्यधिक भय के कारण मान सिंह के पैरों तले की जमीन खिसक गई । अब क्या होगा , क्या ये कोई औरत ही है, और इतनी रात गए इस जंगल मे क्यों रो रही है , मान सिंह दूसरे पहलू पर विचार करने लगा ,पर वह जानता था कि ये सच तो हो नही सकता ,किसी तरह झाड़ी से पैर निकाल कर मान सिंह आगे बढ़ने लगा , तब उस महिला की आवाज फिर से आने लगी , अब वह रोते रोते कह रही थी , " रुक जाओ ,रुक जाओ " जैसे घायल अवस्था मे कोई मदद के लिए पुकारता है , इस तरह उसकी आवाज सुनाई पड़ रही थी , मान सिंह दहशत में तो था , मगर वह जल्दी जल्दी चलने की कोशिश कर गांव की परिधि में पहुंचना चाहता था , उसके मष्तिस्क की सोच अब बिल्कुल बन्द हो चुकी थी , बस उसे अपने कुल देव का मन मे ध्यान हो आया था , बार बार अपने कुल देवता का स्मरण करते वह डर को एक तरफ कर बस फटा फट चलता जा रहा था । तभी पीछे से उसी महिला की आवाज सुनाई पड़ी , " रुक जा अरे रुक जा " ,और उसके अगल बगल कुछ छोटे पत्थर और रोड़ियाँ गिरने की आवाज आई ,मगर उसे लगी नहीं , अब उस आवाज में भारीपन था , मानो वह अधिकार पूर्वक कह रही हो , " अरे रुक जा ना सुन " और उसे लगा जैसे उसके पीछे वह आवाज आती जा रही हो ,प्रेत भी कितने छद्म रूप बना लेता है वह सोच रहा था , पत्थर और रोड़ियाँ का उसके अगल बगल गिरना जारी था । तभी उसे दूर से कोई टार्च की रोशनी दिखी " ये कौन हो सकता है , कहीं दुसरी मुसीबत तो नही है " पर उसका साहस थोड़ा बढ़ा , उसके अपने गाँव भिंवाली की सीमा आने वाली थी , कोइ आदमी ही लगता है , तभी उस महिला का अट्टहास भरा स्वर उसे सुनाई पड़ा , " तेरी किस्मत आज अच्छी है , बच गया तू " तब तक टार्च की रोशनी पास आ गई थी ।
"अरे मान सिंह तू कहां गया था रात में " ,वह व्यक्ति बोला , वह ज्ञान चंद था " अरे चाचा क्या बताऊँ बस कोट गाँव तक गया था गोविंद के पास " , " अरे तो वही रुक जाता , रात में चलने की क्या जरूरत थी ,चल " और उसने मान सिंह को आगे कर खुद उसके पीछे चलने लगा , ' रास्ते मे डर तो नही लगा , मैंने देख लिया था दूर से टोर्च की रोशनी को , समझ गया था कि कोई तो अकेला आ रहा है , इस लिए चला आया " ,मान सिंह ने उसे कुछ नही बताया ।मान सिंह का घर गांव के छोर पर ही था , सो ज्ञान चंद उसे वहां छोड़ अपने घर चला गया । रात के दस बज चुके थे , उसकी पत्नी और उसकी वृद्ध माँ उसे देख घबरा गए " अरे मानू इतनी रात हमने तो सोचा था कि सुबह आओगे " , " नहीं माँ बस यूं ही चल पड़ा वहां से " , और फिर मान सिंह ने एक एक कर सारी घटना माँ को बताई , उसकी माँ ने तुरंत कुछ चावल कटोरी में रख उसके सिर के चारों ओर घुमाए और फिर बाहर आकर चारों तरफ फेंक दिए । फिर अंदर आकर एक टीका चावल का मान सिंह के माथे पर लगा दिया । फिर बोली " बेटा तुम्हे रात में नही चलना चाहिए , आज हमारे कुल देवता ने तुम्हारी रक्षा की है , तुम्हे याद है अभी चार पांच महीने पहले हमने पूजा की थी , तब ज्ञान चंद पर जब देवता अवतरित हुए तब क्या बोले थे ,टीका लगाते बोले थे मैं हर समय तुम्हारे साथ रहूंगा जहां भी तुम याद करोगे " । " हाँ याद आया " मान सिंह बोला । " हाँ माँ जैसे ही मैंने याद किया वैसे ही मेरा डर खत्म हो गया था " , तब उसने कहा " माँ वो कौन है जो रो कर मुझे डरा रही थी , सबके साथ ही होता है क्या वहॉं पर रात में " , " ये एक पुरानी कहानी है बेटा " उसकी माँ बोली , " लगभग दस बारह साल पहले की बात है कोट गाँव की एक जवान औरत उस जंगल मे घास काटने गई थी , हरा पेड़ देखकर वह उस पर चढ़ गई, और उसका पैर फिसल गया , और वहीं पर उसकी मृत्यु हो गई , तब से उसकी आत्मा वहॉं भटक रही है , और आने जाने वालों को परेशान करती है " ।
ये सुनकर मान सिंह आश्चर्यचकित हो गया । तब उसकी माँ बोली बेटा एक और बात बताऊं , " क्या " वह बोला " बेटा तुम बता रहे थे ज्ञान चंद तुम्हे लेने गया था , तुम्हे शायद यह पता नही है ज्ञान चंद पिछले तीन दिन से यहाँ नही है रिश्तेदारी में शादी में गया है " । " क्या ......मान सिंह अचानक चौंक गया ,तो क्या वह हमारे कुल देवता थे " । " हाँ बेटा कुलदेवता की कभी भूलना मत , हमेशा याद करते रहना " । मान सिंह के मन मे कुल देवता के प्रति श्रद्धा का भाव उत्पन्न हो गया , लाख लाख धन्यवाद कर मन ही मन वह कुल देवता को स्मरण करने लगा ।
भगवान सिंह रावत
दिल्ली।

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