समय रेत सा फिसल रहा उम्र बह रही पानी सी
बीत जाएगी थोड़ीसी ,बची हुई जिंदगानी सी
बगिया में फूलों के मेले जब जब आते जाते थे
विरह से व्याकुल मन को सच मे बहुत सताते थे
सर्द हवा बरिस के मौसम मुझको बहुत रुलाते थे
टूट गई उम्मीदें सारी बन गई एक कहानी सी ।
समय रेत सा फिसल रहा उम्र बह रही पानी सी ।
कोई जगह नहीं दुनियां में सपने पूरे करने को
ये तो चीज बनी है बस टूट के और बिखरने को
तुम्ही बताओ प्रीत बिना अब क्या है जीने मरने को
आहत मन अब खोज रहा है राह कोई अनजानी सी
समय रेत सा फिसल रहा उम्र बह रही पानी सी
लहर जहां ले जाये मेरे हाथ कोई पतवार नही
आंधी और तूफानों से मुझे कोई सरोकार नहीं
धेय नही है कोई जब जीवन का कोई सार नही
यादें अपनी चुभती है अब लगती है बेगानी सी
समय रेत सा फिसल रहा उम्र बह रही पानी सी ।
देख सको तो आजाना कुम्हलाए से फूलों को
पथरीली सी राह में चुभते कुछ दर्दीले शूलों को
मेरी पहचान को छिपाती जमीं वक्त की धूलों को
खिलते उपवन नहीं रहे जगह हुई वीरानी सी
समय रेत सा फिसल रहा उम्र बाह रही पानी सी
बीत जाएगी थोड़ी सी बची हुई जिंदगानी सी ।
भगवान सिंह रावत दिल्ली
(सर्वाधिकार सुरक्षित)

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