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Thursday, September 28, 2023

देश प्रेम


 

मेरे खून के हर कतरे में देश प्रेम समाया है ।
उठो वीर आयुध संभालो रक्त फाग अब आया है ।
तीर तूणीर स्कंध धरो , युद्ध का बिगुल बजाओ
ले विजय भारती संकल्प , शत्रु को धूल चटाओ
टूट पड़ो  आफत बनकर भीषण संग्राम मचाओ
दुनिया देखेगी हमने कैसे अपना फर्ज निभाया है ।
मेरे खून के हर कतरे में देश प्रेम समाया है ।
उठो वीर आयुध संभालो रक्त फाग अब आया है ।
जन मानस को राष्ट्र भक्ति का अब अमृत पिलाना है
देवों की पंक्ति से जबरन दैत्यों को हटाना है
आस्तीन के सांपों को भी तीखा सबक सिखाना है।
भीतर बैठे गद्दारों ने बड़ा उत्पात मचाया है
मेरे खून के हर कतरे  में देश प्रेम समाया है ।
उठो वीर आयुध संभालो रक्त फाग अब आया है ।
अब सीता का हरण न होगा द्रोपदी शस्त्र उठाएगी
हर नारी कटी बांध कटार रानी झांसी कहलायेगी
चमकेगी तलवारें जब शत्रु की शामत आएगी
प्रेम की इस बाँसुरिया ने मौत का राग सुनाया है  ।
मेरे  खून के हर कतरे  में देश प्रेम समाया है ।
उठो वीर आयुध संभालो रक्त फाग अब आया है ।
                      
                               भगवान सिंह रावत  (दिल्ली
                                         (सर्वाधिकार सुरक्षित)

Wednesday, September 6, 2023

धरती पुत्र भाग 5 (हकीकत)

 


दिवान सिंह और प्रताप दोनो एक साथ बैठे थे , बाहर हल्की बारिश हो रही थी ,
"चाचा जी आपको पता है , हमारी दोस्ती और मेहनत को देख कर गांव वालों में कानाफूसी ही रही है " दीवान सिंह बोला
"जानता हूँ अभी तो सुरुआत है  , तुम देखते जाओ दिवान सिंह  मैंने तुम से इस जमीन पर किताबों के चरित्र उतारने की बात कही थी , वो काम मै करके छोडूंगा , दिवान सिंह देखो वही मैं हूँ वही गाँव वाले हैं वही गाँव की धरती माँ है फिर कमी कहां है ? कमी सिर्फ लगन की है, कमी आस्था की है ,कड़ी मेहनत की है  और हौसले की है ,बस लोगों में इसी हौसले को पैदा करना है ,गांव का आदमी सिर्फ़ जमीन के प्रति विमुख है  " प्रताप ने कहा ,ा , दीवान सिंह प्रताप की ये बात सुन कर गद गद हो उठा ,और भावुक  हो गया , सचमुच क्या इस धरती पर  प्रताप जैसे लोग हैं , इतने बड़े जहां में दिवान सिंह ने ऐसी हिम्मत और ऐसे हौसले रखने वाला कोई नही देखा था आज तक ,   दिवान सिंह ने महसूस किया लोग भी उनकी देखा देखी मेहनत करने लगे हैं , और उनकी बातों का अनुसरण करने लगे हैं , इस बार प्रताप और उसके खेतों में समय से खाद और कड़ी मेहनत से अच्छी फसल उगी है ,पहले से कहीं अच्छी । क्यारियों में भी साब्जियां खूब हुई ,ये सब समय से देखभाल और पानी की तराई करने से संभव हुआ था ।
आज गांव में प्रधान जी ने एक मीटिंग बिठाई है , दोनो भी वहाँ पहुंच गए ,मीटिंग बुलाने का कारण एक ही था "विकास कार्यों और पलायन पर चर्चा "मीटिंग में पटवारी समेत ग्राम विकासअधिकारी,प्रमुख और वार्ड के सदस्य औऱ कुछ गांव के लोग बैठे थे , वही प्रताप और दीवान सिंह की तरफ भी काफी लोग बैठे थे । स्पष्ट था कि जो जिसकी  तरफ बैठे थे वो दिल से उनके समर्थक है ।खैर बात ग्राम प्रधान ने आरम्भ की ।
" आदरणीय विकाश अधिकारी जी ,पटवारी जी , और सभी वार्ड मेंबर और ग्राम के सभी सदस्य गण , हम लोग आज यहां पर ग्राम के विकाश पर चर्चा करेंगे , और साथ ही पलायन जो कि आज पर्वतीय क्षेत्र में आम बात हो गई है के विषय मे भी चर्चा करेंगे "  "शुरुआत में में बता दूं कि एक वृक्ष लगाने का   नया अभियान सरकार चलना चाहती है ,हर गांव में फ्री वृक्ष बांटे जाएंगे , और गांव के चारों तरफ लगाए जाएंगे "। " इसके अलावा आप लोग जानते है सरकार की तरफ से कई योजनाएं भी चल रही है जैसे आवास योजना , प्राकृतिक आपदा योजना  आदि , अभी में ग्राम विकास अधिकारी जी से निवेदन करूँगा की दो शब्द कहे " ।
तभी अधिकारी जी उठे और अपनी बात रखने लगे ,
"आदरणीय ग्राम प्रधान जी एवं अन्य उपस्थित गण , जैसा कि प्रधान जी ने बताया कि कितनी तरह की योजनाएं सरकार की तरफ से चल रही है , आप उनका बखूबी लाभ उठा सकते है , हम हर समय आपके साथ हैं , हम लोगों को यहीं पर रह कर मेहनत करनी चाहिए , नाकि पलायन की बात सोचनी चाहिए " । "आज पलायन बहुत बड़ी समस्या बन गई है , इतना सब कुछ होते हुए भी लोग पलायन को क्यों मजबूर हैं ।आप लोगों में से कोई कुछ कहना चाहता है तो उठकर कह सकता है "।
कोई नही उठा , तभी सबकी नजरें प्रताप की ओर उठ गई , प्रताप समझ गया लोग उससे उम्मीद लगा रहे थे । वह उठा और बोला , " आदणीय प्रधान जी ग्राम विकाश अधिकारी ,पटवारी जी एवं अन्य सभी वार्ड मेंबर , जैसा कि आपने  अभी सारी बातें  सुनी , विकास अधिकारी जी की बाते भी आपने सुनी , सब  पलायन की बात करते हैं , औऱ हर कोई पलायन की समस्या को बड़े आराम से लोगों के सिर पर थोप देते है , और खुद साफ बच कर निकल जाते हैं " , " मैं आपसे ये पूछना चाहता हूं कि सरकार की. क्या जिम्मेदारी है , बस योजनाओं को बनाना और कागजों पर गांव गाँवों तक पहुंचना ? वह  योजना  कितने लोगों तक पहुंची , कितने लोग लाभन्वित हुए , और जो नही हो पाए उनके क्या कारण रहे , इसकी कोई जवाब देहि आप लोगों के पास है , श्री मान विकास अधिकारी जी आप चाहते तो ये पलायन रुक सकता था , आपसे मतलब आप जैसे अधिकारी गण , मगर आपकी कार्य के प्रति निष्क्रियता , और उदासीनता के चलते सब कुछ स्वाहा हो गया , आप लोगों ने अपना अधिकार तो समझ लिया मगर कर्तव्य के प्रति बड़ी बेरुखी अपनाई , आप सब लोग असमर्थ नही थे ,  आपलोग अकर्मण्य थे "। तभी बड़ी तेजी से पटवारी जी खड़े हुए, और अधिकारी का बचाव करते उनके पक्ष में कहने लगे , " श्रीमान प्रताप सिंह जी ,ये आप कैसी बात कर रहे हैं , भला हम  लोग उदासीन कैसे हो गए , आप बेवजह सारा दोष हम लोगों पर मढ़ रहे हैं "  ," तब प्रताप बोला पटवारी जी मैं यहां पर आपको दोषी करार देने नही आया हूँ, सिर्फ आप लोगों की गलतियों का अहसास कराने आया हूँ " , " जानता मैं सब कुछ हूँ मुझसे कुछ छुपा नही है , आपकी कार्य करने की शैली का मुझे पता है,आपने किस तरह और किसके किसके ऋण स्वीकृत किये हैं । आपके पास प्राकृतिक आपदा ऋण ,और  आवास योजना ऋण, और भी अन्य तरह के ऋण अभी भी लंबित हैं औऱ कितने विचाराधीन है " , " आप अपनी गैर जिम्मेदाराना हरकतों  से अपने आपको कभी माफ नही कर सकेंगे, अभी अगर सभी तरह की योजनाओं की फाइलों का निरीक्षण किया जाय तो सही तरीके से की गई स्वीकृतियां केवल दस प्रतिशत ही होंगी " , तभी एक युवक बोल उठा ,  " "प्रताप सिंह , अरे भाई ऐसी बात नही है , सरकारी काम मे दिक्कत तो आती ही है " तब प्रताप बोला ,  " देखा अधिकारी जी , हो गया एक दूसरे का बचाव सुरु , यहां पर और भी बहुत लोग हैं जिन्होंने गलत रास्ता अपनाया है , कोई आवाज कैसे उठाये सब भ्रस्टाचार में लिप्त हैं ।और एक दूसरे का बचाव करते हैं " ,  " मानव को अन्न बांटने वाली इस धरती माँ को तुम सब लोगों ने असहाय बना दिया , जिस देव भूमि पर लोग आने को तरसते हैं , उसी धरती माँ के लाडले पलायन कर रहे है , उनकी मायूसी के जिम्मेवार आप लोग हैं ,  मेरी उत्तराखंड की इस पावन धरती को आप सब लोगों ने भ्रष्ट किया है इस धरती मां को उनके सपूतों से दूर किया है , आपार सम्पदा के होते हुए भी यहां के सीधे सच्चे लोग दर डर भटकने को मजबूर हैं " । " तुम लोगों ने धरती मां को उनके बच्चों से विमुख करने का दोषपूर्ण कार्य किया है "। प्रताप थोडा सा भावुक को गया ,  " मगर मैं ऐसा नही होने दूंगा, सबको उनकी औकात बता कर ही दम लूंगा , और इस धरती माँ की गोद मे  हमारे लिए कितना कुछ है , ये सबको बता दूंगा । बहुत से लोग तो समझ चुके हैं और  और लोग भी जल्दी ही समझ जाएंगे , पलायन की एक हकीकत यह भी है " प्रताप की इस बात पर सबने तालियां बजाई ।और प्रताप भाई जिंदाबाद, की आवाज से  माहौल गूंज उठा । तभी दीवान सिंह उठा और बोला " भाइयों इस धरती माँ के आंचल में इतनी संपदा है कि हम बटोर नही सकते , पिछले कुछ दिनों में आपने हमे देख लिया होगा , हमारा थोड़ा सा परिश्रम  कितना रंग लाया है , हमें जरूरत है तो बस सच्ची लगन की ,धरती माँ के प्रति आस्था की दृढ़ संकल्प की , अगर हम सभी ऐसा प्रयत्न करें और परिश्रम करें तो ये धरती एक मिशाल बन जाएगी , और पलायन नही होगा " । फिर से प्रताप के समर्थन में तालियाँ बज उठी । ग्राम प्रधान प्रमुख और पटवारी समेत अधिकारी भी अचंभित रह गए सब के चेहरे उतर गए । उसके पश्चात सब प्रताप के संगरक्षण में कार्य करने लगे । और जीतोड़ मेहनत का बीड़ा उठाया । फलस्वरूप नई फसल में आश्चर्यजनक परिवर्तन आया , फसल में इतनी वृद्धि देख कर गांव के लोगों में नया उत्साह जागा ,  दूसरे गांव के लोग भी आकर प्रताप से सलाह मांगने  लगे ,लोगों में आये इस परिवर्तन को देख विकाश अधिकारी ,पटवारी प्रमुख और प्रधान  भी इस मुहिम में दिलसे शामिल हो गए और उन्होंने विकाश के लिए  यथा संभव प्रयत्न किया । प्रताप  एक प्रतीक बन गया , चर्चा गांव से शहर तक फैली तो प्रताप के परिवार को भी पता चला ।और गांव आकर उसके बेटों ने  अपने पिता  के आदर्शों का सम्मान किया और पत्नी ने भी अपने विमुख व्यवहार के लिए क्षमा मांगी ।अब गांव में खुशहाली का दौर अचूका था । बाद के कुछ दिनों में प्रताप को विकास अधिकारी  और अन्य अधिकारियों के अनुरोध पर जिला स्तर पर सम्मानित एवं पुरष्कृत भी किया गया । एक शाम प्रताप अपने  आंगन में चारपाई पर लेट आसमान की तरफ देख रहा था उसे एक झपकी आई तभी उसने महसूस किया कोई उसके सिर पर उंगलियों से बालों को सहला रहा है , उसके कानों में आवाज सुनाई पड़ी , बेटा सो गए क्या ? मैं हूँ तुम्हारी माँ धरती माँ  , बेटा आज मैं बहुत खुश हूं ,तुम्हारे काम से तुमने वो कर दिखया है  जो कोई कर ना सका , देखो चारों तरफ हरियाली ये बढ़ते हुए पेड़ , और ये लहलहाती ठंडी हवाएं , ये तुम्हारी मेहनत का फल है , तुम्हारे कड़े संकल्प का परिणाम , देख तो जरा सूने से पड़े इस गांव में कितनी चहल पहल हो गई है कितनी खुशहाली आ गईं है ,हर आँखोँ में नए सपने तैरने लगे हैँ ,हर चेहरे पर उम्मीद भरी मुश्कान दिख रही है ,आज तुम्हारी वजह से मेरे बेटों ने मेरी तरफ रुख कर लिया है ।अब मैं अपने बेटों से दूर नही हूँ । तू मेरा पुत्र कहलाने का सच्चा अधिकारी है । तू असली धरती पुत्र है , हाँ धरती पुत्र है ।
प्रताप ने धीरे से आंखें खोली , धरती माँ का आश्रीवाद पाकर वह बहुत प्रशन्नता से भर उठा , उसने देखा उसके लगाए पेड़ अंगड़ाइयां लेकर बड़े हो रहे थे ,अगल बगल की क्यारियां फल फूल रही थी ,  गौरैया और अन्य पक्षी आंगन में दाना चुगने में व्यस्त है । उसे लगा जैसे फिर वही बचपन जैसा समय आ गया है  ।
उसका स्वप्न पूरा हो चुका था, अब उसे लगने लगा था कि जिस काम के लिए उसका जन्म हुआ था , वह सम्पन्न होने को है , अपने जीवन की सार्थकता  से वह अति प्रसन्न था  ।
                                         भगवान सिंह रावत
                                                           दिल्ली

Sunday, July 23, 2023

दहशत


 

आठ बजकर तीस मिनट का समय था ,

जंगल का रास्ता , घुप्प अंधेरा , एक पथिक की पदचाप जंगल की खामोशी में बिघ्न  डाल रही थी और उनका पथ आलोकित करती एक छोटे से टोर्च की रोशनी । बीच बीच मे जंगल की निस्तब्धता को भंग करता हुआ उल्लू काअचानक डरावना स्वर उभरने  से डर के मारे उसका हलक सूख रहा था ।
और बीच बीच मे चूहों के बिलों से गिरती मिट्टी की आवाज भी उसको विचलित कर रही थी । वह उस बुरे समय को कोस रहा था जब अंधेरा होने पर उसने  गोविंद से चलने की जिद की थी ,बहुत कहा था गोविंद ने अरे मान सिंह रुक जा देर हो गई है सुबह जाना  पर वही नही माना , रुक जाता तो ठीक रहता  । पर अब क्या हो सकता था अब तो वह चल पड़ा है , वापस भी जाना अपनी बेइज्जती करवाने जैसा है । जो होगा अब देखा जाएगा । अकेले में  भयभीत मन को निडर बनाना कितना मुश्किल है ये उसे आज पता चल गया  था , दूसरा अगर समझाएं तो आदमी एक बार समझने की कोशिश कर सकता है  परन्तु अकेले में आदमी  खुद के समझये कभी नही समझ सकता , क्योंकि डर पैदा करने वाले विचार उस पर तेजी से हावी होते  रहते है , तभी सामने एक घना पेड़ उसे दिखाई दिया , अंधेरे में उसे पेड़ तो दिख तो गया ,मगर वह ठिठका और गौर से देखने लगा उसके नीचे कोई उसे बैठा दिखाई दिया , इतनी रात को कौन होगा जो इतने आराम से बैठा है , जैसे कोई धूप से बचने को बैठता है , किसी अनहोनी  आशंका से वह भयभीत हो गया ,डर के मारे एक बार तो वह उल्टे पैरों भागने को हुआ , पर कुछ सोच कर वह रुक गया , तभी उसे छोटी टोर्च का ध्यान आया उसने टोर्च की रोशनी में देखा तो दंग रह गया पेड़ के नीचे से ऊपर तक किसी ने तीन बड़े पत्थर रखे हुए थे जो कि अंधेरे में किसी बैठे हुए आदमी की तरह  दिख  रहे थे  । ओह ...... उसके मुह से निकला ,फिर उसने तेज चलती हुई सांसो पर काबू पाया ,कितना डर गया था वह , आस्वस्थ हो कर उसनेआगे कदम बढ़ाया , दो कदम चल कर वह फिर रुक गया और फिर से उस पेड़ की तरफ देखने लगा , इस आशय से कि वह दुबारा वैसे ही दिखेगा या उसके  भ्रमित मन की वजह से उसे ऐसा दिखा था ,ज्यो ही उसने नजर घुमाई अब की बार उसे अंधेरे में भी दो बड़े पत्थर ही दिखे , तो क्या मनुष्य का मन ही प्रेत को जन्म देता है , वह इस बात पर विचार कर ही रहा था कि तभी अचानक वह तीनों  पत्थर  धड़ाम से पेड़ के तने से फिसल कर इस तरह गिरे जैसे किसी आदमी के गिरने की आवाज आती है , और फिर खड़ खड़ की आवाज के साथ एक और आवाज हुई जैसे कोई व्यक्ति जख्मी हो कर कराह रहा हो । ये देख कर  मान सिंह के होश उड़ गए  । वह हड़बड़ा कर तेजी से चलने को हुआ , और अंधेरे में  उसका पैर रास्ते से बाहर की तरफ किसी झाड़ी में फंस गया , वह पैर वापस खींचने लगा , तभी उसने ध्यान से सुना तो उसे किसी महिला की सुबकने की आवाज आई , रह रह कर वह महिला सुबक रही थी , मगर कही कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा था , अब महिला सुबकते सुबकते रोने लगी थी , अत्यधिक भय के कारण मान सिंह के पैरों तले की जमीन खिसक गई  । अब क्या होगा , क्या ये कोई औरत ही है, और इतनी रात गए इस जंगल मे क्यों रो रही है , मान सिंह दूसरे पहलू पर विचार करने लगा ,पर वह जानता था कि ये सच तो हो नही सकता ,किसी तरह झाड़ी से पैर निकाल कर मान सिंह  आगे बढ़ने लगा , तब उस महिला की आवाज फिर से आने लगी , अब वह रोते रोते कह रही थी , " रुक जाओ ,रुक जाओ "  जैसे घायल अवस्था मे कोई मदद के लिए पुकारता है , इस तरह उसकी आवाज सुनाई पड़ रही थी , मान सिंह दहशत में तो था , मगर वह जल्दी जल्दी चलने की कोशिश कर गांव की परिधि में पहुंचना चाहता था , उसके मष्तिस्क की सोच अब बिल्कुल बन्द हो चुकी थी , बस उसे अपने कुल देव का मन मे ध्यान हो आया था , बार बार अपने कुल देवता का स्मरण करते वह  डर को एक तरफ कर बस फटा फट चलता जा रहा था । तभी पीछे से उसी महिला की आवाज सुनाई पड़ी , " रुक जा अरे रुक जा " ,और उसके अगल बगल कुछ छोटे पत्थर और रोड़ियाँ गिरने की आवाज आई ,मगर उसे लगी नहीं , अब उस  आवाज  में भारीपन था , मानो वह अधिकार पूर्वक कह रही हो , " अरे रुक जा ना  सुन " और उसे लगा जैसे उसके पीछे वह आवाज आती जा रही हो ,प्रेत भी कितने छद्म रूप बना लेता है वह सोच रहा था , पत्थर और रोड़ियाँ का उसके अगल बगल गिरना जारी था । तभी उसे दूर से कोई टार्च की रोशनी दिखी " ये कौन हो सकता है ,  कहीं दुसरी मुसीबत तो नही है " पर उसका साहस थोड़ा बढ़ा , उसके अपने गाँव भिंवाली  की सीमा आने वाली थी , कोइ आदमी ही लगता है , तभी उस महिला का अट्टहास भरा स्वर उसे सुनाई पड़ा , " तेरी किस्मत आज अच्छी है , बच गया तू " तब तक टार्च की रोशनी पास आ गई थी ।
"अरे मान सिंह तू कहां गया था रात में " ,वह व्यक्ति बोला , वह ज्ञान चंद था " अरे चाचा क्या बताऊँ बस कोट गाँव तक गया था गोविंद के पास " ,  " अरे तो वही रुक जाता , रात में चलने की क्या जरूरत थी ,चल "  और उसने मान सिंह को आगे कर खुद उसके पीछे चलने लगा , ' रास्ते मे डर तो नही लगा , मैंने देख लिया था दूर से टोर्च की रोशनी को , समझ गया था कि कोई तो अकेला आ रहा है , इस लिए चला आया "  ,मान सिंह ने उसे कुछ नही बताया  ।मान सिंह का घर गांव के छोर पर ही था , सो ज्ञान चंद उसे वहां छोड़ अपने घर चला गया । रात के दस बज चुके थे , उसकी पत्नी और उसकी वृद्ध माँ उसे देख घबरा गए " अरे मानू इतनी रात हमने तो सोचा था कि सुबह आओगे " , " नहीं माँ बस यूं ही चल पड़ा वहां से "  , और फिर मान सिंह ने एक एक कर सारी घटना माँ को बताई , उसकी माँ  ने तुरंत कुछ चावल कटोरी में रख उसके सिर के चारों ओर घुमाए और फिर बाहर आकर चारों तरफ फेंक दिए । फिर अंदर आकर एक टीका चावल का मान सिंह के माथे पर लगा दिया । फिर बोली " बेटा तुम्हे रात में नही चलना चाहिए , आज हमारे कुल देवता ने तुम्हारी रक्षा की है , तुम्हे याद है अभी चार पांच महीने पहले हमने पूजा की थी , तब ज्ञान चंद पर जब देवता अवतरित हुए तब क्या बोले थे ,टीका लगाते बोले थे मैं हर समय तुम्हारे साथ रहूंगा जहां भी तुम याद करोगे " । "  हाँ याद आया " मान सिंह बोला । " हाँ माँ जैसे ही मैंने याद किया  वैसे ही मेरा डर खत्म हो गया था "  , तब उसने कहा " माँ वो कौन है जो रो कर मुझे डरा रही थी , सबके साथ ही होता है क्या वहॉं पर रात में "  , "  ये एक पुरानी कहानी है बेटा "  उसकी माँ बोली , " लगभग दस बारह साल पहले की बात है कोट गाँव की एक जवान औरत उस जंगल मे घास काटने गई थी , हरा पेड़ देखकर वह उस पर चढ़ गई, और उसका पैर फिसल गया , और वहीं पर उसकी मृत्यु हो गई  , तब से उसकी आत्मा वहॉं भटक रही है , और आने जाने वालों को परेशान करती है " ।
ये सुनकर मान सिंह आश्चर्यचकित हो गया  ।  तब उसकी माँ बोली बेटा एक और बात बताऊं , " क्या "  वह बोला "  बेटा तुम बता रहे थे ज्ञान चंद तुम्हे लेने गया था , तुम्हे शायद यह पता नही है ज्ञान चंद पिछले तीन दिन से यहाँ नही है  रिश्तेदारी में शादी में गया है "  ।  " क्या ......मान सिंह अचानक चौंक गया ,तो क्या वह हमारे कुल देवता थे "  ।  " हाँ बेटा कुलदेवता की कभी भूलना मत , हमेशा याद करते रहना " । मान सिंह के मन मे कुल देवता के प्रति श्रद्धा का भाव उत्पन्न हो गया , लाख लाख धन्यवाद कर मन ही मन वह कुल देवता को स्मरण करने लगा ।
                                 भगवान सिंह रावत 
                                               दिल्ली। 

Thursday, July 6, 2023

गीत बनाता हू ।

 


धूप से मुरझाए फूलों  को सीने से लगाता हूँ ।
यादों के सैलाब मे जाकर अक्सर गीत बनाता हूँ ।
जी उठता हूँ रोज सुबह नई उम्मीद को लेकर
व्यथा वेदना के घेरे में साँझ को फिर मर जाता हूँ 
यादों के सैलाब मे जाकर अक्सर गीत बनाता हूँ ।
लौट सको तो देखना आकर मेरा ये दीवानापन
पत्थर दिल की खातिर मैं पत्थर पर फूल चढ़ाता हूँ ।
यादों के सैलाब मे जाकर अकसर गीत बनाता हूँ ।
वन उपवन खामोश हैं गुमसुम है नदिया का पानी
एक कंकड़ उछाल पानी मे  मैं हलचल मचाता हूँ ।
यादों के सैलाब मे जाकर अक्सर गीत बनाता हूँ ।
वक्त कहाँ रुकता है बोलो उम्र बहे पानी सी
उम्मीदों के अरमानों के जबरन बाँध लगाता हूँ
यादों के सैलाब मे जाकर अकसर गीत बनाता हूँ ।
बेरहमी के इस परिवेश में कहाँ छुपे बैठे हो
टूट के बिखर ना जाऊं तेरी यादों से जुड़ जाता हूँ ।
यादों के सैलाब मे जाकर अक्सर गीत बनाता हूँ ।
धूप सेअलसाये फूलों  को सीने से मैं लगाता हूँ ।
यादों के सैलाब मे जाकर अक्सर गीत बनाता हूँ ।

                           भगवान सिंह रावत  (दिल्ली)

पैसा आये कहां से


 

बात आज से लगभग चालीस साल पुरानी है
उस जमाने मे मंदी का दौर था ,एक रुपये किलो दूध डेरी वाला अपने सामने निकाल कर देता था   उस जमाने में ब्लैक एंड व्हाइट टीवी भी सिर्फ अमीर और बड़ी कोठी वालों के यहां  दिखता था ,यही कोई सातवीं या आठवीं में पढ़ता हूंगा । हम लोग एक बैंक हाउस में बने क़वाटरों में रहते थे , हमारे कंपाउंड की दीवार के तरफ दूसरी गली जाती थी , वहाँ बड़ी बडी कोठियां थी और काफी धनाड्य वर्ग के लोग रहते थे , जिनके पास गाड़ियां होती थी , नौकर चाकर होते थे,उस बीस फुटि रोड में कोई समारोह या कोई हलचल होती तो हमे पता लग जाता था बस दिखाई नही पड़ता था , सो बिजली के खंभे से अर्थ की दो तारो पर बंदरो की तरह छलांग लगा कर पंद्रह फुटि दीवार पर चढ़ जाते और मजे से आती जाती बारात को देखते ,  या फिर क्या ही रहा है ये पता करते ।आस पास में थोड़ी दूर पर कुछ गरीब तबके की बस्तियां भी थी , जिनके बच्चे अक्सर उस सड़क पर साइकल के टायर को डंडी से मार मार कर दौड़ाते नजर आजाते थे , या फिर एक दूसरे को आवाज देते हुए अशिष्ट शब्दों का प्रयोग करते थे ।
उस दिन शाम के छह बजे थे हमे गली में कुछ हलचल सुनाई पड़ी , बस फिर क्या था हम दो तीन बच्चे फट से दीवार पर चढ़ गए , देखा तो दूर से एक बारात आ रही थी , तब कंपाउंड की दो तीन महिलाएं और बच्चे भी बारात देखने सीढ़ी लगाकर ऊपर चढ़ कर बारात देखने को हुई ।
थोडा सा अंधेरा हो चला था , धीरे धीरे बारात नजदीक आने लगी , बारात में पहले बैंड बाजे चल रहे थे , और उनके साथ सिर पर गैस मेन्टल लैम्प   उठाये लोग भी थे उस जमाने मे शादी व्याह में गैस मेन्टल लैंप ही उजाला करने के लिए इस्तेमाल होती थी , सबसे आगे दो ढोल बजाने वाले पटर पटर ढोल बजाते नाचने वालों को अपनी ओर आकर्षित कर रहे थे , नाचने वाले फिल्मी धुन पर बैंड की धुन पर नाच रहे थे , और कुछ मुह में पांच या दस रुपये का नोट फसाकर ढोल वाले के आगे नाच रहे थे , नाचने वालों में महिलाएं भी थी ,दूल्हा घोड़ी पर सवार था , बारात दुल्हन के घर जा रही थी । घोड़ी के साथ चलता एक आदमी बीच बीच मे एक थैले में से कुछ रेजगारी निकालता और दूल्हे के ऊपर उछाल देता ,उन सिक्कों को जमीन तक आने से पहले ही गली मोहल्ले के बच्चे उन्हें फट से लपक लेते थे कुछ नीचे गिर जाते तो उन पर झपटा झपटी हो जाती जो कि गाली गलौच तक पहुंच जाती , फिर एक आदमी उन्हें हड़काता और घोड़े से दूर कर देता । एक दो मिनट के लिए बच्चे भाग जाते मगर फिर दुबारा घोड़े के इर्द गिर्द मंडराते नजर आते थे । इधर ढोल वाला अपने हुनर को दिखाता बड़ी तेजी से ढोल बज रहा था नाचने वाले के मुह से नोट खींचना उसके हुनर की सार्थकता थी ,  यों तो कई नोट खींच चुका था अब तक वो मगर इस बार अजिब आदमी से पाला पड़ा था उसका ,जैसे ही वह मुह के पास हाथ ले जाता फट्ट से वह अपना चेहरा घुमा  लेता , नाचने वाला मानो उसे परेशान करने पर आमादा था । हम सब लोग बारात को गौर से देख रहे थे , कंपाउंड की महिलाएं और बच्चे भी आनंद उठा रहे थे तरह तरह की फिल्मी धुन पर लोग थिरक रहे थे ,तभी ढोली ने ढोल बजाते बजाते अचानक नाचने वाले के मुह से नोट छीन  लिया , झटके से खींचने के चक्कर मे पांच का नोट ढोली के हाथ से छिटक कर जमीन पर गिर गया , उस नोट पर किसी और कि भी नजर थी , ढोली ने जैसे ही नोट जमीन से उठाने को हाथ नीचे कर नोट उठाना चाहा गैस मेन्टल लैंप वाले ने फट्ट से अपना भारी भरकम जूता उसके ऊपर रख दिया , ढोल वाले कि उंगलियाँ दब गई ,वह दर्द से चीखा और अपनी उंगली को सहलाता गैस वाले को गालियां बकने लगा ,और अपनी ढोल वाली डंडी से जोर से उसके हाथ पर मारा जिससे उसने सिर पर लैंप पकड़ रखा था ,वह बिलबिला उठा , उसके पास बदला लेने का कोई विकल्प नही था क्योंकि गैस मेन्टल लैंप दोनो हाथों से पकड़ा जाता था ,सो उसने गुस्से में वह गैस की चिमनी ढोल वाले पर गिरा दी जिससे वह जमीन पर गिर गया ,उसका साथी ढोल वाला लड़ने को आगे आया तब लैंप  पकड़ने वाले का साथी भी आगे आया और एक दूसरे के गरेबान पकड़े धक्का देने लगे इस चक्कर मे दूसरा गैस मेन्टल लैंप भी फट्ट से नीचे गिरा , दो चिमनियां फुट चुकी थी , हो हल्ला मच गया लोग तीतर बितर हो गए ,हम सब लोग ऊपर दीवार से सब देख रहे थे  हड़कंप मच गया था ,दोनो ढोल वालों को गैस मेन्टल लैंप  वाले मिलकर पीटने लगे , क्यों कि वह बैंड बाजे वालों के साथ होते है इस लिए उनकी संख्या ज्यादा होती है , थोड़ी दे बाद चार पांच आदमी आगे आये वह शायद बारातियों के खास थे , बड़ी मुश्किल से उन्होंने उनको अलग किया , गैस लैंप  की चिमनियों के टूटने से आपस में चोटे बहुत आई थी कांच सड़क पर फैल गया था , बारात नजदीक पहुंच गई थी इस लिए सब धीरे धीरे दुल्हन के घर की तरफ चल पड़ी , चिमनी वाला और ढोल वाला दोनो घायल थे , लोग पकड़ कर उन्हें ले जा रहे थे, वह पांच रुपये का नोट ना तो लैंप वाले के हाथ लगा और न ढोल  वाले के , उसे कोई और ही ले गया होगा , क्योंकि सब के जाने के बाद वहां पर कुछ भी नही बचा था  ।  पैसा आये कहां से , पैसा जाए कहाँ रे  ।
                         
                         भगवान सिंह रावत (दिल्ली)

Tuesday, May 16, 2023

प्रेतनी


 

आज पूरे एक साल बाद दीपू अपने गाँव जा रहा था , दिल्ली से पहाड़ जाने की खुसी उसे अंदर ही अंदर रोमांच से भर रही थी , शाम को वह गाड़ी से उतरा तो सूरज ढलने को था , उतरते ही उसने बैग हाथ मे लिया और सामने चाय की दुकान पर चाय पीने बैठ गया ,  वह चाय जल्दी खत्म कर लेना चाहता था ,ताकि वह जल्दी घर पहुंच सके । मगर जैसे ही वह चाय पीकर उठने लगा , तेज आंधी के साथ बारिश पड़ने लगी , दीपक का दिल बैठने लगा , अब घर कैसे पहुंचेगा , अंधेरा भी धीरे धीरे छाने लगा था , लगभग आधे घंटे तक बारिश होती रही , अब समय काफी हो गया था ,मगर दीपू को तो जाना ही था अपने घर । दीपक बेग उठाकर चल पड़ा अपने गांव के रास्ते पर , अब रात हो या अंधेरा , कुछ भी हो ,अपने मन मे अपने ईष्ट देवता का ध्यान कर वह चल पड़ा । दीपक बीस बाइस साल का हट्टा कट्टा नौ जवान था  दिल्ली में एक होटल में कुक था । घर मे वृद्ध माँ और बाबा थे । पंद्रह दिन की छुट्टी लेकर गांव आरहा था ।लगभग पैदल का रास्ता एक घंटे का था बीच मे घना जंगल भी पड़ता था । दीपू को और किसी का डर ज्यादा नही था , सिवाय जंगली जानवरों के अलावा वह किसी से भय नही खाता था ।  गाड़ी ने उसे जहां छोड़ा वहां से उसका गांव सामने दिखता दिखता था मगर जंगल का रास्ता तो जंगल का ही होता है , सियार और लकड़ बग्घा जैसे जानवर तो मिल ही सकते थे । उसे पता था कि बाघ की गुफा गांव की दूसरी तरफ थी मगर फिर भी कुछ हो सकता है , जंगल किसी तरह के कानून को नही मानता , वहां उसका अपना कानून चलता है , दीपक ने अपनी सुरक्षा के लिए  सामने एक बड़े झाड़ से मोटा डंडा तोड़ लिया ,  और बेधड़क होकर तेज कदमों से चल पड़ा , उसके पास छोटी टोर्च थी , मगर ऊबड़खाबड़ रास्ते मे टोर्च होने पर भी इतनी तेजी से नहीं चला जा सकता । मनुष्य भले ही अपने आपको कितना ही निडर साबित करे , मगर अंदर से से एक कोने में थोड़ा बहुत डर अवश्य होता है ,वही डर दीपक के अंदर भी था । तेज कदमों से चलता हुआ वह आगे बढ़ता जा रहा था , अचानक जरा सी आहट पर वह चौंक पड़ता था , किसी जानवर की थोड़ी आवाज पर वह हड़बड़ा जाता था , उधर एक मुसीबत और , बारिष फिर से होने को थी , बिजली की चकाचौंध और आवाज अचानक माहौल में डर पैदा कर देती थी , आधे से ज्यादा रास्ता वह तय कर चुका था , तभी अचानक तेज बारिश होने लगी , दीपक झल्ला उठा , सारे काम आज उल्टे ही होने ही थे । वह काफी नजदीक पहुंच चुका था , तभी उसे गांव से पहले काफी दूर पर एक टुटा फूटा मकान दिखायी  दिया , उसे याद आया अरे हाँ ये तो कान्ता मौसी का मकान है , उसे बुढ़िया को लोग कांता मौसी कहा करते थे , के लोग उसे पागल भी कहते थे , वह अकेली रहती थी ,उस घर मे । कभी किसी के यहां खाने बैठ जाती , कभी किसी के यहां भी ठहर जाती थी  ।  कभी कभी वह बे सिरपेर की बातें करने लग जाती थी , कभी अचानक कई कई दिन तक गायब हो जाती , कभी अचानक दिख जाती थी दीपक को उसमे हल्की रोशनी दिखाई दी । तेज बारिश से बचने के लिए झट वह उसमे घुस गया , अंदर आकर उसने देखा ,बुढ़िया चारपाई पर लेटी थी , " कौन है रे "उसकी आवाज आई ।
" मैं हुं मौसी दीपू " ,"अभी जाग रही हो " दीपक ने कहा ।
" कहां से आ रहा है अभी " बुढ़िया बोली
" अरे मौसी दिल्ली से आ रहा हूँ , बारिस तेज हो रही है , भीग गया हूं " ।
" अच्छा अच्छा बैठ जा " बुढ़िया बोली
" देख केतली में चाय रखी है ठंड लग गई होगी तुझे चाय पीले " ।दीपक ने देखा केतली में चाय थी , और  गरम थी, उसे ताज्जुब हुआ मांग कर खाने वाली बुढ़िया मौसी के यहां ये सब , खैर उसने चाय एक गिलास में निकाली और बोला "मौसी तुम्हेभी दूं    "  " हाँ देदे थोडी "  , दीपक ने एक गिलास में उसे भी देदी बारिस के बाद चाय की चुस्कियों का मजा ही कुछ और होता है ,  दीपक चाय पीने लगा , उसने देखा कमरे में से सामान करीने से रखा था , और खाने पीने का सारा सामान मौजूद था , उसे आश्चर्य हुआ , टूटे फूटे घर मे सब सामान , जो बुढ़िया मांग कर खाती हो , उसके यहां ये सब ?
बुढ़िया चारपाई पर उठकर बैठ गई , उसने बुढ़िया के चेहरे पर गौर से देखा , तो वह सिहर गया , चेहरा बदला बदला सा लगा , जैसे बाल बिखरे से , नाक लंबी सी , आंखे सुर्ख लाल सी , उसने मन का वहम समझ अपने को संयत कर फिर से देखा तो वह डर गया ,  ऐसे कैसे हो सकता है ?  वह वहां से जल्द भागना चाहता था  , मगर तेज बारिश अभी भी हो रही थी । तभी बुढ़िया बोली " ऐसी बारिश में कहां जाएगा दीपू बेटा , रुका रह "
अब तो दीपक का  बचा खुचा साहस भी टूट गया , उसे कैसे पता चला कि मैं ऐसा सोच रहा हूँ , वह अंदर से बुरी तरह डर गया , चाय पीने के बाद बुढ़िया हंसते हुए बोली " डर मत " और उसका चाय का गिलास और अपना गिलास हाथ मे ले कर बोली ,  " ये कुछ खास बात नही है " और  झूठे गिलासों को  आठ दस  फुट दूर जहां और झूठे बर्तन  रखे थे रखने को बोली , फिर अचानक बुढ़िया ने कहा "अच्छा रहने दे तू " और वहीं से बैठे बैठे ही हाथ इतना लंबा कर दिया कि वह झूठे बर्तनों तक पहुंच गया । दीपक ये सब देख कर बुरी तरह डर कर सहम गया , आठ दस फीट लंबा हाथ कैसे हो गया ,बुढ़िया ये सब करते हुए भयानक तरह से हंस रही थी ।
दीपक ये देख कर बुरी तरह डर गया उसकी चेतना लुप्त हो गई  , और वह बेहोश हो गया ।
अपने मुह पर पानी के छींटे पड़ते ही वह चौक  पड़ा और उठ बैठा , कान्ता मौसी .....कान्ता मौसी.......। "कहाँ है कान्ता  मौसी " ? एक महिला ने उससे पूछा , " अभी यहीं तो थी , कहां गई "  ? । उसने उन दो तीन महिलाओं को आश्चर्य से देखा , उसने बाहर देखा सुबह हो चुकी थी ।
"दीपू  क्या हुआ तू यहां कैसे " एक महिला ने उससे पूछा
तब उसने रात का सारा किस्सा सुना दिया  ।
" अरे हम तो यहाँ घास काटने आये थे , तो देखा यहां का दरवाजा खुला है , वैसे यहां तो पिछले चार महीने से ताला लगा हुआ रहता है ,सोचा चलो देखते हैँ  " ।
" तो क्या  कान्ता मौसी अब यहां नही रहती " ?
" तुम्हे पता भी है कान्ता मौसी को मरे हुए पूरे चार महीने हो चुके हैं "।
" क्या  कह रही हो दीदी " ? दीपक बोला
" हाँ हाँ ठीक कह रही हूं मैं "
दीपक  के पैरों तले जमीन खिसक गई ।, तो क्या सारी रात वह प्रेतनी के साथ रहा , तभी कोई दीपक की मां को बुला लाया ,  वह दीपक को घर ले गई , दीपक घर आया तो उसकी मां ने अपने ईष्ट देवता का दिया जलाया और कुछ चावल के दाने उसके सिर पर घुमा कर चारो दिशाओं में पूज दिए , और टीका लगा दिया  ।
आज भी दीपक उस घटना को याद कर सिहर उठता है । लोगों का मत है कि कान्ता मौसी दूर से कभी कभी वहां दिखाई पड़ जाती है ,उस जगह पर नजदीक जाने की हिम्मत तो कोई कोई करता नही है ।
                      समाप्त
                                 भगवान सिंह रावत  दिल्ली

Monday, March 27, 2023

स्वरुप

 


शांत चित्त होकर रघुवीर
बैठ गए सागर के तीर
योद्धा सारे मौन खड़े थे
पर लक्ष्मण थे बहुत अधीर ।
संध्या बीत निशा घिर आई
नए दिवश ने ली अंगड़ाई
नम्र विनय कर रत्नाकर को
बाधा रघुवर ने समझाई ।
तीन दिवश भी बीत गए जब
प्रतिक्रिया कुछ नही हुई जब
नींद नही टूटी सागर की
धैर्य राम का टूट गया तब ।
क्रोधित हरि बोले "जलधाम "
,सारे प्रयत्न कर चुका है राम
बिनय नहीं होंगी अब तुझसे
अब होगा केवल  संग्राम ।
बिन जल के अपना हाल देख
धरती पर पाताल देख
विनम्रता को निर्बल समझा
अब रूप मेरा विकराल  देख
क्रुद्ध होकर अनुज को बुलाया
और अपना आयुध मंगवाया
खींच कमान की प्रत्यंचा को
उस पर अग्नि बाण चढ़ाया ।
डोल गया धरा का कण कण
काँप उठा सम्पूर्ण गगन
असमय ही चल पड़ी आंधियां
गरज उठे आकाश में घन ।
चमक उठी चपला चहुँ ओर
भीष्म घटा छाई घनघोर
मचल उठा सरिताओं का जल 
लहरें उठ उठ करती शोर । 
ज्यों ही कर अग्नि आह्वान
तीर प्रत्यंचा पर ज्यों तान
रौद्र रूप धर हरि ने ज्यों ही
सागर का किया संधान ।
त्राहिमान तब करते करते
बाहर आया सागर जल से
नतमस्तक हो हाथ जोड़ कर
किया निवेदन डरते डरते ।
दया करो हे कृपा निधान
आपका ही है ये वरदान
मेरी मर्यादा टूटी जो
नही रहेगा  विधि विधान ।
राम ने सब वृतांत बताया
विधिवत सागर को समझाया
सेना को बस मार्ग चाहिए
सन्मुख संकट को दोहराया ।
तब सागर ने युक्ति सुझाई
नल और नील हैं दोनों भाई
उनको जो वरदान मिले हैं,
प्रभु को पूरी कथा सुनाई ।
शांत चित्त हो क्रोध विसार
उत्तर दिशा में किया प्रहार
अमोघ अस्त्र से प्रभु ने तब
दशयुओं का किया संघार ।
बाधा  का समाधान हुआ
कार्य सम्पूर्ण महान हुआ
सागर ने भी साथ निभाया
विधिवत सेतु निर्माण हुआ 

                भगवान सिंह रावत  (स्वरचित)