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Monday, March 27, 2023

स्वरुप

 


शांत चित्त होकर रघुवीर
बैठ गए सागर के तीर
योद्धा सारे मौन खड़े थे
पर लक्ष्मण थे बहुत अधीर ।
संध्या बीत निशा घिर आई
नए दिवश ने ली अंगड़ाई
नम्र विनय कर रत्नाकर को
बाधा रघुवर ने समझाई ।
तीन दिवश भी बीत गए जब
प्रतिक्रिया कुछ नही हुई जब
नींद नही टूटी सागर की
धैर्य राम का टूट गया तब ।
क्रोधित हरि बोले "जलधाम "
,सारे प्रयत्न कर चुका है राम
बिनय नहीं होंगी अब तुझसे
अब होगा केवल  संग्राम ।
बिन जल के अपना हाल देख
धरती पर पाताल देख
विनम्रता को निर्बल समझा
अब रूप मेरा विकराल  देख
क्रुद्ध होकर अनुज को बुलाया
और अपना आयुध मंगवाया
खींच कमान की प्रत्यंचा को
उस पर अग्नि बाण चढ़ाया ।
डोल गया धरा का कण कण
काँप उठा सम्पूर्ण गगन
असमय ही चल पड़ी आंधियां
गरज उठे आकाश में घन ।
चमक उठी चपला चहुँ ओर
भीष्म घटा छाई घनघोर
मचल उठा सरिताओं का जल 
लहरें उठ उठ करती शोर । 
ज्यों ही कर अग्नि आह्वान
तीर प्रत्यंचा पर ज्यों तान
रौद्र रूप धर हरि ने ज्यों ही
सागर का किया संधान ।
त्राहिमान तब करते करते
बाहर आया सागर जल से
नतमस्तक हो हाथ जोड़ कर
किया निवेदन डरते डरते ।
दया करो हे कृपा निधान
आपका ही है ये वरदान
मेरी मर्यादा टूटी जो
नही रहेगा  विधि विधान ।
राम ने सब वृतांत बताया
विधिवत सागर को समझाया
सेना को बस मार्ग चाहिए
सन्मुख संकट को दोहराया ।
तब सागर ने युक्ति सुझाई
नल और नील हैं दोनों भाई
उनको जो वरदान मिले हैं,
प्रभु को पूरी कथा सुनाई ।
शांत चित्त हो क्रोध विसार
उत्तर दिशा में किया प्रहार
अमोघ अस्त्र से प्रभु ने तब
दशयुओं का किया संघार ।
बाधा  का समाधान हुआ
कार्य सम्पूर्ण महान हुआ
सागर ने भी साथ निभाया
विधिवत सेतु निर्माण हुआ 

                भगवान सिंह रावत  (स्वरचित)

Sunday, February 26, 2023

मजबूर सी जिंदगी

 


माया सुबह उठी तो उसे अपनी तबियत ठीक नही लगी ,पिछले एक हफ्ते से वह महसूस कर रही थी ,थकान और कमजोरी जैसे उसका पीछा नही छोड़ रही थी । अगल बगल में उसके दो बच्चे राजू और पिंकी सो रहे थे ,दुर दूसरी चारपाई पर उसका पति किशन लाल सो रहा था ,
किशन लाल सीधे स्वभाव का व्यक्ति था , वह  कपड़े की एक बड़ी दुकान पर सेल्स मैन का काम करता था ।आमदनी कुछ खास नही थी किसी तरह घिस पिट कर महीना पार हो जाता था
दो बच्चों की पढ़ाई का खर्च ,  कमरे का किराया , गांव में बूढ़े मां बाप उनको भी कुछ न कुछ चाहिए होता था । एक जान और सौ मुसीबत ,माया भी इसी उधेड़बुन में रहती थी कि इस सीमित कमाई में कैसे घर को चलाएं ।
उसने देखा सुबह के छह बजे चुके है ,वह उठी चाय बनाई और एक कप किशन को देकर खुद पीने लगी  । 'सुनो जी मुझे आज कल क्या हुआ है बहुत कमजोरी महसूस हो रही है " ,माया बोली
"क्यों क्या हुआ" ,किशन बोला
"बस थकान सी रहती है ,जरा सा काम करते ही बदन टूट जाता है कभी कभी आंखों के आगे अंधेरा छा जाता है " ,माया ने कहा ।
"डॉक्टर को दिखा दो' , और क्या ,किशन बोला
"हाँ जाती हूँ " आज ,और उसने बच्चों को जगाया , राजू ,पिंकी " बेटा उठो ,स्कूल को तैयार हो जाओ" और माया नास्ता बनाने में जुट गई , बच्चे स्कूल भेजने के बाद माया ने किशन के लिए टिफिन तैयार किया और बोली ,ये लो  कुछ पैसे देना डॉक्टर के जाऊंगी , 'कितने  चाहिए " , " देदो पांच सौ तो लगेंगे ही दो सौ तो फीस ही है उसकी ।फिर दवाइयां भी ....." ।
जेब मे से  पैसे निकालते किशन बोला , "ये लो जरा ध्यान से खर्च करो यार अभी महीना बहुत दूर है "अपनी परेशानी जताते किशन बोला ।माया किशन की मजबूरी समझती थी ,मगर क्या करे , पंद्रह हजार  तनखा में से चार तो किराए को चले जाते है , बाकी बचे ग्यारह उनमे बच्चों की फीस  और घर का राशन दूध वाला बिजली का बिल एक एल आई सी   की क़िस्त  वगेरह  सब मिला कर पैसे कम ही पड़ जाते थे । काम निबटा कर वह  नुक्कड़ पर डॉक्टर के क्लीनिक पर चली गई , डॉक्टर ने चेकअप करके कहा ,  "आप मेडम अपने खाने पीने का ध्यान रखिए आयरन की बहुत कमी है , चक्कर भी आते होंगे ",   "जी कभी कभी वह बोली " , "ये मैं कुछ दवाइयां लिख रही हूं  दस दिन की  दुबारा दिखा देना और आप अपने खाने में दूध और अंडे अवश्य खाये , वजन भी कम है नॉनवेज खा सकती हैं तो जरूर खाएं "।ये कह कर उसने एक पर्चा उसे थमा ढिया ,दोसौ उसे देकर माया वहीं बाहर दवाई की दुकान पर आई ,और पर्चा देकर बोली  " भैया ये दवाई देना "  ।दवाई लिफाफे में रख कर उसने बिल देखा तो वह चौंक गई, छह सौ पचास ......। ओह .....इतनी महंगी । अच्छा हुआ जो वह पांच सौ और साथ मे धर लाई थी नही तो बेइज्जती हो जाती ,वह दवाई लेकर घर आ गई , अब शाम को किशन को बताऊंगी तो  उछल पड़ेगा ,पर बताना तो है ही
किशन ने तबियत के बारे में पूछा तो उसने सब बताया तब किशन बोला ,ठीक है " अपने लिए और थोड़ा ज्यादा दूध ले आया करो ,सेहत तो पहले है '।
इसी तरह  खींच तान कर गाड़ी चल रही थी ।
उज्वल भविष्य  की उम्मीद में माया को लग रहा था जैसे वो और किशन खपते जा रहे हैं , हर महीने कुछ ना कुछ उधार रह ही जाता था ।
एक दिन रात को खाना खा रहे किशन का अचानक फोन बज उठा , 'हेलो कौन " उधर से आवाज आई  "मैं बोल रहा हूँ  बेटा कासी राम ', " ओह बाबू जी ,प्रणाम कैसे हो बाबू जी " , " मैं तो ठीक  हूँ बेटा पर तुम्हारी माँ की तबियत कुछ ठीक नहीं है " ,उधर से आवाज आई
" क्यों क्या हुआ मां को " किशन बोला , " बेटा पिछले महीने से सांस लेने में दिक्कत हो रही थी ,दवा भी दिलवाई मगर तबियत में सुधार नही हुआ,डॉक्टर कहता है भर्ती करना  पड़ेगा  सारे टेस्ट होंगे तब पता चलेगा , बेटा तू एक बार यहां आकर देख जा मेरे बस का भागना दौड़ना नही है " ।
" ठीक है बाबू जी में कल आ रहा हूँ ,आप चिंता मत करो " ,किशन बोला ।
" ठीक है बेटा " वहां से आवाज आई ।
किशन ने फोन रख दिया " माया ....मां की तबियत खराब है सुबह मुझे जाना होगा " , ' ठीक है जाओ ,मैंने सुन लिया " , " लो एक और खर्चा सिर पर आ गया "  किशन बोला और चादर ओढ़कर लेट  गया , माया भी सोने की किशिस करने लगी ,मगर नींद आंखों से कोसों दूर थी ,उसका ध्यान बार बार किशन की पंद्रह हजार की तनखा पर चल जाता था , और जोड़ तोड़ सुरु हो जाता था ,मगर मजाल है जो हिसाब किताब कही बैठने को तैयार हो ।
किशन अगले दिन सुबह बस में बैठ निकल पड़ा गांव तीन चार घंटे का रास्ता था ,लगभग दो बजे किशन घर पहुंचा तो माँ की हालत सच मे खराब थी,किशन चिंतित हो गया ,और सोच में पड़ गया।काफी देर बाद वह बोला " बाबू जी मैं मां को अपने साथ ले जा रहा हूँ जो भी होगा वहीं देख लूंगा ,दूर रह कर मैं भी चिंता में रहूंगा " ।
" जैसी तुम्हारी मर्जी बेटा जाओ ध्यान रखना अपनी मां का " काशी राम बोले ,किशन लाल अपनी मां को साथ ले कर वापस दिल्ली आ गया  ।
अस्पताल में भर्ती कर अपनी माँ के सारे टेस्ट करवाये , तीन चार दिन तक हस्पताल के चक्कर लगते रहे , पैसा भी आने जाने में काफी खर्च हो गया , किसी से कुछ उधार लेकर किशन मा का इलाज करवाता रहा मां को देखने कभी माया भी जाति रही कभी किशन ,दोनों की चक्कर घिन्नी बनी रही । वो तो  अच्छा हुआ लाक डाउन की वजह से काम कुछ खास नही था इस लिए छुट्टी मिल गई  वार्ना इतनी छुट्टी कहाँ मिलती है ।अगले महीने जिससे उधर लिया था उसे भी वापस देना होगा,खर्चे की बैंड बज  गई थी ,माया सोचती तो सोच में ही डूब जाती , पति से कुछ सलाह मशविरा भी करना चाहती तो कैसे करती और कहां करती एक कमरे में सबके सामने , पति के साथ प्यार मनुहार और रोमांस तो बहुत दूर की बात है ,सारा समय काम मे और सोचने में ही निकल जाता है ,किशन भी कभी इस तरफ रुचि नही लेता था । माया सोचती  क्या जिंदगी है हमारी ,कितनी बेबस और मजबूर ।
एक हफ्ते तक अस्पताल में किशन की माँ का इलाज होता रहा , तब जाकर कही तबियत सुधरी ।माया उसी उधार के बारे में सोच रही थी जो सर पर चढ़ गया तथा । एक शाम माया बोली "  सुनो जी में सोच रही हूं ,माजी तो अब ठीक हैं,बच्चों की देख भाल वो कर लेगी , मैं कुछ काम पकड़ लेती हूं । खर्च आराम से निकल जायेगा ' । तब किशन कुछ रुक कर बोला
" माया ठीक कहती हो वैसे भी अब ये तो करना ही पड़ेगा ,मजबूरी है " किशन बोला ।
" ऐसा क्यों कह रहे  हो क्या मजबूरी " ।माया बोली
" तुम जानती हो लोक् डाउन चल रहा है , हमारे मालिक ने भी सबकी तरह सबकी सैलरी आधी देने का फैसला कल सुना दिया है ,उनका कहना है कि जब ग्राहक ही नही आएगा , सेल नही होगी तो सैलरी कहां से आएगी " ।
क्या.......माया का मुह खुला का खुला राह गया ,
है  भगवान एक और मुसीबत , अब क्या होगा , दोनों एक दूसरे का चेहरा ताकने लगे , मानो एक दूसरे से पूछ रहे हों , ये सब मुसीबतें हमारे लिए ही हैं क्या ।
"अब क्या करेंगे " माया ने कहा
" करेंगे क्या एल आई सी की क़िस्त रोकनी पड़ेगी बाद में कुछ पेनाल्टी भरकर रिन्यू करवा लेंगे  , और क्या करे , उधारी तो दिन ब दिन बढ़ती ही रहेगी "।
माया जानती थी एल आई सी रिन्यू नही हो पाएगी
वह विदड्रा ही होगी , सोते समय उसकी आँखों से नींद भाग चुकी थी ,कैसी जिंदगी है ये सपने बुनने पर भी अपना हक नही है । काम तो पकड़ लुंगी मगर क्या जिंदगी का ये ही रंग होता है , इसी तरह अपनी आकांक्षाओं का दमन होता रहेगा, हमेशा निराशाओं से जूझना पड़ेगा कितने संघर्षों से दो चार होना  पड़ेगा......?
उसके अंदर एक ध्वन्द चल रहा था ,आंखे बंद होते हुए भी वह बहुत कुछ देख रही थी । उसे कुछ पंक्तियाँ याद आई जो उसने कहीं पढ़ी थी ,
"निराशाओं से जूझता रहा,जख्मों को सीता रहा
नाउम्मीदी के साये में कुंठाओं को पीता रहा
जिंदगी जीने के लिए जिंदगी भर यूँ हीजीता रहा" ।
और तब वह और कुछ भी ना सोच सकी उसने अपने आपको नींद के हवाले कर दिया ,सुबह से उसे नए संघर्ष की तैयारी भी करनी थी ।
                           
                                भगवान सिंह रावत (दिल्ली)



Monday, February 6, 2023

आपानी अपनी किस्मत है

 


कमला ने दीवार पर टंगी पुरानी घड़ी पर नजर डाली तो वह झट से उठ बैठी ,"ओह.... सात बजने वाले है ,साढ़े सात बजे मुझे  कोठी पर पहुंचना है ,देर हो गई "वह अपने मे ही बुदबुदाई ।और जल्दी से उठ कर मुह हाथ धोए , बगल में दस साल का उसका लड़का चंदू सो रहा था ।उसने चंदू को उठाया और कहा "चंदू उठ जा देर हो गई है  चल जल्दी मुह हाथ धो ,में चाय बनाती हूं तब तक "और उसने केतली में पानी  डाल चूल्हे पर चढ़ाया । रात की बची रोटी और कुछ शब्जी चंदू को परोसती वह बोली ,"चंदू ले खा पीकर स्कूल चले जाना ,और घर मे ही रहना ,आवारागर्दी मत करना ,दो बजे आकर में खाना बना दूंगी ,अभी में जा रही हूँ "और तेज कदमों से वह चल पड़ी , आज फिर देर हो गई ,शालिनी मेम साब डाँटेगी ,बिट्टू बाबा के लिए नाश्ता बनाना है, और खाना बनाना है ,और बाबू जी को खिला कर तब दूसरी जगह झाड़ू पोछा । उफ ... बड़ा झंझट है ,पर क्या कर सकते हैं ,जो पैसे देगा काम भी लेगा , साहब तो घर मे कम ही दिखते है ,आये दिन बाहर ही रहते है ,घर मे केवल तीन प्राणी है ,शालिनी मेंम साब उनका लड़का बिट्टू बाबा , जो कि पंद्रह साल का था उसके चंदू की उम्र का मगर क्या मोटापा था ,लगता था जैसे पच्चीस साल का हो , और  शालिनी मेंम साब के ससुर बड़े बाबू जी ,बाबू जी अक्शर बीमार ही रहते हैं , उनकी बड़ी देखभाल करनी पड़ती है , उधर शालिनी मेमसाब बहुत सख्त मिजाज की थी ,बाबू जी को नास्ते में, खाने में क्या देना है,बिटटू बाबा को क्या खाना है ,ये सब वही देखती थी ,कमली गेट खोलती अंदर पंहुंचीं तो शालिनी बोली "आज फिर देर कर दी कमली  टाइम से आया करो " जल्दी से साड़ी का पल्लू कमर में खोंस कमली अपने काम मे जुट गई । सबका नास्ता तैयार कर टेबल पर लगा कमली एक तरफ बैठ गई ,नास्ता कर बिट्टू बाबा स्कूल चले गए बाबू जी अपने कमरे में चले गए , फिर सारे बर्तन समेत कर सिंक में लेजाकर उन्हें धोने के बाद कमली बोली " मेमसाब मैं चलूं "
"हाँ जाओ ठीक टाइम से आया करो "। "जी मेमसाब" और कमली वहाँ से चल पड़ी दूसरी जगह झाड़ू पोछा कर कमली को डेड बज गए ।और घर आते आते दो बजे गए  । वह थक चुकी थी ,अपनी रोज की इस दिनचर्या से ,चंदू और अपने लिए खाना बना कर वह चारपाई पर पसर गई ।
काश चंदू के बाबा साथ होते तो ये सब अकेले उसे ना झेलना पड़ता । उसे याद आया तीन साल पहले की तो बात है ,अचानक चंदू के बाबा बीमार पड़ गए,
बीमार ऐसे कि खाट जब पकड़ी तो बस चार कंधों पर ही उठे । क्या वक़्त था । खैराती अस्पताल के चक्कर काटते काटते पैर घिस गए मगर चंदू के बाबा की हालत नही सुधरी ,आखिर वही हुआ ,चंदू के बाबा उन दोनों को छोड़ कर चल बसे ।बस फिर समस्या वही घर कैसे चले,कमली कोई पढ़ी लिखी तो थी नही ,सो दो घरों में काम पकड़ लिया ,और गृहस्थी की गाड़ी खींचने में लग गई ।तभी उसे टन टन की आवाज  ने चौंक ढिया ।उसकी नींद उचट गई उसने देखा दीवार पर लगी घड़ी तीन बजने की घोषणा कर रही थी ,हर घंटे पर वह बज उठती थी ।वह उठ बैठी , ।रंजना मेम साब की दी हुई पुरानी घड़ी थी जो दीवार पर टंगी वक़्त हिसाब किताब रखती थी,जब चंदू आया तो दोनों ने मिल कर खाना खाया ।दो तीन घंटे आराम करके फिर शाम को भी शालिनी मेम साब के यहां बर्तन करने जाना था । बस कमली की यही दिनचर्या थी ,किसी तरह गुजारा चल रहा था ,बड़े और ऊंचे सपने देखना अब उसके नसीब में नही था ऐसा वह सोचती थी ।
अगले दिन सुबह शालिनी मेमसाब के घर पर उसने नास्ता तैयार कर मेज पर लगाया ,और खुद दूर एक स्टूल पर बैठ कर चाय पीने लगी शालिनी ने उसे कुछ बिस्किट खाने को दिए ।बाबू जी और बिट्टू बाबा आकर बैठ गए ,शालिनी भी नास्ता करने बैठ गई । नास्ते में आमलेट ब्रेड और मख्खन और हलवा रखा था ।कमली सोच रही थी काश वह भी अपने परिवार के साथ ऐसे ही नास्ता करने बैठती,बिट्टू बाबा की तरह चंदू भी बैठा होता ,आमलेट और हलवे की सुगंध उसके नथुनों तक पहुंच रही थी,जमाना हो गया था ऐसे व्यंजन को घर पर बनाये ,और खाये हुए , रोटी शब्जी और दाल चावल मिल जाये इतना ही बहुत है ।
बिट्टू बाबा ने ब्रेड पर छुरी से मख्खन लगाया और खाने को हुए तभी शालिनी गुस्से में बोली " बिट्टू....। ये  क्या कर रहे हो" , "क्या मम्मा " वह बोला , आपको पता है ना आपको फैट वाली चीज नही खानी , " मम्मा इतने से क्या होता है"  वह बोला और मुह में ले जाकर ब्रैड खाने लगा ,नही..नहीं......।वह गुस्से से बोली और उठकर उनके मुह से आधा ब्रेड खींच लिया ।" अपना वजन देखा है पता है ,डॉक्टर को भी दिखाने में पैसा लगता है वह बोली तबियत खराब होगी वो अलग" ,ये कह कर उसने उस बचे टुकड़े को कूड़े दान में डाल दिया । बिट्टू का चेहरा रुआंसा सा हो गया वह कुछ बोल नही पाया ,और चुप चाप सुखी ब्रेड चबाने लगा ये देख कर कमली की आंखों में आंसू आ गए ।उसे लगा उसके बेटे चंदू के मुह से किसी ने ब्रेड छीन ली हो ,और उसका चंदू रोने लगा हो , बिट्टु बाबा के चेहरे की जगह उसे अपने चिंटू का चेहरा दिख रहा था मायूस सा ,कितना बड़ा पाप है किसी के मुह से आधा खाना छीनना ।
और वह भावावेश में रो पड़ी उसके मुह से निकला "नही मेम साब नही........। मत छीनो  , मुह से निवाला छीनना पाप होता है "। सब एक दम स्तब्ध रह गए । कुछ छण तक मौन छाया रहा ।
"तुम्हे क्या हुआ कमली" शालिनी बोली ",क.. क... कुछ नहीं बस ऐसे ही" ,कमली जैसे तंद्रा से जागी ।और सामान्य होने की कोशिश में लग गई ।
कमली  ने जल्दी जल्दी काम निपटाया और वापस घर आ गई ।अपनी इस भावुकता पर कमली हैरान थी । और शर्मिंदगी महसूस कर रही थी ।उसने फटा फट खाना बनाया ,चंदू भी स्कूल से आ गया ।दोनों खाना खाने लगे , चंदू की तरफ देखती कमली बोली ," चंदू बेटा खाना अच्छा बना है ना' ?
"हाँ मां बहुत अच्छा "।
कमली ने  उसके गाल पर चूम लिया , और प्यार से सर पर हाथ फिराया ,"खा खा शाबाश' ,चंदू मां के इस अप्रत्याशित  व्यवहार से  आश्चर्य में आ गया ।फिर खाना खा कर झट बाहर खेलने दौड़ गया ।कमली उसे देखती रही चंदू की वह क्या बताए कि वह उसे लेकर कैसे कैसे सपने देखती है ,वह सोच रही थी  अपनी अपनी किस्मत है । कोई होते हुए भी नही खा सकता किसी को मिलता ही नही है । इस लिए नही खा सकता ।उसके मष्तिस्क में ध्वन्द चल रहा था , और कुछ देर बाद उसे नींद आ गई ।
                            भगवान सिंह रावत (स्वरचित)

Friday, December 9, 2022

अच्छाई

 


अपना काम निपटा कर मैं सड़क के किनारे बैटरी रिक्सा का इंतजार कर रहा था । सब सवारियों से लदे हुए निकले जा रहे थे,कोई खाली नही था । तभी दूर से एक बैटरी रिक्सा मुझे दिखा,मैंने हाथ से रुकने का संकेत  किया ,रिक्सा झट रुक गया ।उसमे दो सीट खाली थी । और मैंने देखा उसे एक चौबीस पच्चीस साल की लड़की चला रही थी ।ये देख कर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ ,ऐसा मैंने इस इलाके में अभी तक नही देखा था । खैर मैं सीट पर बैठ गया ।,और उस लड़की के विषय मे सोचने लगा ।मुझे बड़ी खुशी हुई ,एक महिला रिक्शा चला रही है , बड़ी हिम्मत का काम है । भले ही उसकी कोई मजबूरी रही होगी,मगर यह महिला को बराबरी का दर्जा मिलने की दिशा में एक नूतन प्रयास था । सभाएँ करने से, समितियां बनाने से , और अध्यक्ष ,सेकेट्री,या कोई पद हासिल करने से,और मीडिया में चर्चा में आने से , बेहतर कदम था यह , ऐसे अनोखे प्रयोग अगर चल निकले तो निसंदेह हमारे समाज की सोच उत्कृष्ट होगी और महिलाओं के प्रति हेय की दृष्टि रखने वालों के मुह पर तमाचे के समान होगा । उस महिला के प्रति मन मे उदारता के भाव उत्पन्न हुए ।  ऐसा प्रयास या ऐसी स्तिथि जहां भी देखता था मन एक सुखद अनुभूति से भर उठता था । तभी अचानक रिक्सा रुका,मेरी तंद्रा टूटी रिक्सा मेरे स्टैंड पर रुक गया था  ।
" चाचा जी  आपका स्टैंड आ गया है ,यहीं उतरना था ना आपको ' ? वह बोली
"अरे.... हाँ हाँ  ख्याल ही नही आया " ,और मैं उतरने लगा । किराया दस रुपये होता है, पर मुझे पता नही क्या सुझा मैंने उस लड़की से कहा  " देखो बेटी तुम मेरी बेटी जैसी हो ,बुरा मत मानना ये तुम पचास रुपये रखलो , मुझे तुम्हे ऐसा काम करते देख बड़ी खुशी हुई है ,किस बहादुरी और हिम्मत से तुमने ये काम करने का निश्चय किया है,ये तारीफ के काबिल है ,इसे अपना पारितोषिक समझो ,आज हमारे समाज को तुम्हारे जैसे बदलाव की जरूरत है " , और मैं वहां से चलने लगा ,वह मेरे वाक्य सुन कर हतप्रभ रह गई । वह बोली चाचा एक मिनट ,वह मेरे पास आई और झट मेरे पैर छू लिये । मै नही जानता उसने मेरी बातों को कितना समझा , परन्तु  उसकी आँखों मे एक चमक थी और कृतज्ञता के भाव थे । मैं वापस घर लौट आया ।  मैं  अक्सर बैटरी रिक्शा में आता जाता रहता था । इस बात को कई दिन बीत गए , एक दिन घर से निकल कर गया तो मेट्रो स्टेशन पर  उतर कर मैंने रिक्सा वाले को पैसे देने के लिए उसे पैसे देने चाहे पर मेरे पास सौ का नोट था ,वह बोला  " खुले नहीं है चाचा , खुले दो । मेरे पास खुले नहीं है " , " जाकर किसी रिक्से वाले से मांग लो खुले " , मैंने कहा । इस बात पर वह अकड़ बैठा , "मैं क्यों जाऊं ,आप जाओ " वह बोला । भरे बाजार में उससे बहस करना मैंने ठीक नही समझा ,और इधर उधर देखने लगा  किसी रिक्से वाले को , चौक के पास और रिक्से थे शायद उनके पास हो ये सोचकर में उस तरफ बढ़ा । तभी पीछे से आवाज आई रुको चाचा जी......। कौन....हो ,मैंने पूछा,एक बीस बाइस साल का युवक खड़ा था , मैं कुछ कहता इससे पहले वो युवक बोला "आपको कुछ करने की जरूरत नही है ,मैंने पैसे उसे दे दिए है "। पर आपने क्यों....,,,।
" आपको शायद ध्यान नही है ,उस दिन जब आपने उस लड़की को पचास का नोट ढिया था तो मैं रिक्से मेही बैठा था ,और आपकी बाते सुन रहा था , आपके उच्च विचारों से मैं बहुत प्रभावित हुआ था , एक अच्छाई का काम मुझे भी करने दीजिए प्लीज "
मैं  उससे जो कहता ,उसने पहले ही उसने प्लीज कह कर बात का अंत कर दिया , " ओह....थैंक्यू अगर ऐसी बात है तो  ठीक है " , मैंने उसके कंधे पर हाथ रख कर थपथपाया , " खुश रहो , इस ज्योति कोअपने अंदर जलाए रखना , इसे बुझने मत देना "। युवक  मुस्कराया और हाथ जोड़कर चला गया । में आश्चर्य चकित था ,उस लड़की का चेहरा मेरे मष्तिस्क में घूम गया । मुझे ऐसा लगा जैसे वह लड़की ही आकर ये काम कर गई हो , सच कहा है किसीने जैसा बोओगे वैसा काटोगे ,अच्छाई ,नेकी, भलाई हमेशा किसी ना किसी रूप में लौट कर आ ही जाती है , हमे कभी कभी अपने सीमित दायरे से ऊपर उठ कर भी चलना चाहिए ।
                           भगवान सिंह रावत ( दिल्ली )

Thursday, December 1, 2022

वक्त के कंधों पर

 वक्त के कंधों पर ,ठहरी है जिंदगी ।

सुबह शाम और दुपहरी है जिंदगी ।

माया और वैभव में उलझ कर रह गई ,

शिक्षा संस्कारों की दीवारें ढह गई ,

भोग और रोग के सैलाब में लिपटी,

लगती कितनी सुनहरी है जिंदगी ।

वक्त के कंधों पर ठहरी है जिंदगी ।

वैभव की चाहत में चल पड़ी गाँव से ,

ऊंचाइयां छोड़ गई खुद अपने पांव से ,

उम्मीद के साये में सपनों को बुनती,

बेगानों जैसे शहरी है जिंदगी ।

वक्त के कंधों पर ठहरी है जिंदगी ।

उधेड़ती है सपने बार बार बुनती हैं ,

अपने पराये की आहट नही सुनती है ,

सिमट के रह गई अपने ही आस पास,

लगता है जैसे बहरी है जिंदगी ।

वक्त के कंधों पर ठहरी है जिंदगी ।

थोड़ा सा पाया और कितना खोया है,

स्वार्थ की धरती पर तृष्णा को बोया है ,

ता उम्र जिंदगी कुछ और बनी रही ,

जाने कहाँ है जो लहरी है जिंदगी ।

वक्त के कंधों पर ठहरी है जिंदगी ।

सुबह शाम और दुपहरी है जिंदगी ।

                           भगवान सिंह रावत (दिल्ली)



Thursday, November 24, 2022

हम फिर मिलेंगे

 जिंदगी के आइने में धूल की परत जम गई है 

बहती उम्र की गति भी थम गई है ।

प्रति ध्वनी करते पर्वत , तुम्हारी अनुपस्थिति दर्ज करा रहे हैं 

बरसते मेघ,भोर के उड़ते पंछी, वो , व्यवहार नही दर्शा रहे हैं ।

तुम्हारी झील सी आँखों मे एक बार देखना चाहता हूँ 

समय का समंदर , चाहत का शहर 

भावों का बाज़ार , प्रीत की लहर 

उन्मुक्त घुमते थे जहाँ , दुनिया से बेखबर 

तभी वक्त ले गया हमें , जाने कहाँ किधर किधर

जाने कहाँ कहाँ किस देश मैं,  वैभव के परिवेश में 

तृष्णा के सैलाब में , इर्ष्या और द्वेष में 

जब  होश आया , अपने को अकेला  पाया  ।

जमाने भर की भीड थी , साथ न था अपना भी साया 

तुम से बिछड़ कर , कहाँ से कहाँ चला आया ।

आज अपने आप से , मैं बहुत सर्मिन्दा हूँ 

जिन्दगी जिन्दगी सी नही है पर जिन्दा हूँ ।

और जिन्दा है मेरे अंदर का एक कवि 

जो अंकुरित हुआ था तुम्हारे मिलने पर

गुलशन ज्यो महके फूलों के खिलने पर ।

जो कभी कलम की शक्ल में , कागज पर दौड़ जाता है ।

निर्जन वन में भी जिन्दगी के गीत गाता है

नाउम्मीदी के घने सैलाब में आशाओं के पुष्प उगाता है ।

तुम कहाँ हो तुम्हारा हाथ अपने हाथ में लेकर 

एक बार जी भरकर  रो लेना चाहता हूँ 

आंसुओ से वक्त के धूल की परत , को धो लेना चाहता हूँ 

तुम्हारे कंधे पर सर रख कर , थोडा सो लेना चाहता हूँ

वक्त ने पहरे बिठाये होंगे तुम्हारे इर्द गिर्द जरुर

फिर भी एक बार , तुम्हारा हो लेना चाहता हूँ

जब तक तुम नहीं मिलते , खोजूंगा निरंतर इस जन्म तक 

इस जन्म ही नहीं , बल्कि जन्मो, जन्मो तक 

पूछूंगा तरासे गए से ,पत्थरों  से महलों के खंडहरों से

पेड़, पौधों से, जंगलों से , गाँव गांव से और शहरों से

हम फिर मिलेंगे कहीं दूर , बहुत दूर, छितिज़ के उस पार 

संकुचित समाज से ऊपर , जहाँ हो चाहत का सँसार ।

शरीरों के बन्धनों से मुक्त ,जैविक  सोच से परे 

छल कपट दिखावे से हटकर जैसे कुंदन से खरे ।

हम फिर मिलेंगे , हम फिर मिलेंगे ।

                भाववन सिंह रावत  (दिल्ली)



Sunday, November 13, 2022

डर

 


               
सत्य घटना पर आधारित इस कहानी के पात्रों के नाम , स्थान अवश्य बदले हुए हैं ,लेकिन कहानी  का हर शब्द चीख चीख कर सच की गवाही दे रहा है । बात आज से चालीस साल पुरानी है । मैं और मेरा दोस्त नीरज दीपावली की छुट्टियाँ में तीन दिन की और छुट्टी लेकर एक हफ़्ते के लिए गांव जाने को तैयार हो गए । रात को दस बजे की रोडवेज़ की बस दिल्ली से पकड़ कर उत्तरांचल अपने गांव को रवाना हुए । पांच बजे सुबह हम लोग ऋषिकेश पहुंचे ,वहां से हमने गाड़ी बदली,और टिहरी की बस में रवाना हो गए ।उस जमाने मे परिवहन व्यवस्था इतनी सुलभ नही थी , आज की अपेक्षा  कहीं दूर की यात्रा में दुगने से भी ज्यादा समय लगता था ।
दो बजे नियत समय पर बस टिहरी पहुंच गई ,वहां से हमे गाँव के लिए बस पकड़नी थी ,जो हमे पाँच बजे तक गाँव के पास उतार देती ,मगर वह बस किसी कारणवश लेट हो गई ।  इंतजार करते करते शाम के पांच बजे गए । हमे अब यकीन हो गया कि हमे गाँव के पास पहुंचते पहुंचते रात हो जाएगी । सर्दी के मौसम में अंधेरा जल्दी हो जाता है ।
हमने बस पकड़ी ,ठीक सात बजे हम गाँव के नजदीक पहुंचे ,आगे का रास्ता पैदल का था घना जंगल और पहाड़ की चढ़ाई ,और उस पर रात का अंधेरा ,अकेला होता तो मैं कभी रात में नहींचलता , टिहरी में ही किसी होटल में रुक जाता मगर हम दो थे ,इस लिए हमने चलने का निश्चय किया था ।
बातचीत करते करते चलते रहेंगे ,ये सोच कर हमने अपना सामान उठाया और चल पड़े ,मेरे पास एक सूटकेस था जबकि  मेरे दोस्त  नीरज के पास सूटकेस और एक थैला भी था ।जंगली जानवरों का भय यहां अक्सर रहता है ,ये सुनने को मिलता था कि लकड़बग्गा आज फलां की बकरी  चपट कर गया किसी के कुत्ते को खा गया ,वगेरह वगेरह ।जब आदमी ऐसी परिस्तिथि में होता है तो ना याद आने वाली बातें भी याद आ जाती है ।और उस जमाने मे भूत प्रेतों की अधिक मान्यताएं होती थी । लोगों के द्वारा बताई गई आप बीती की घटनाएं इसी समय याद आती है । हम कड़ा मन करके चले जा रहे थे ,नीरज बोला " यार गोविंद तू डर तो नही रहा ना " ? मैंने कहा " अरे डरना कैसा जो डरता है उसी को ये सब दिखते हैं , तू भगवान का नाम ले और चलता रह " अपने डर को छिपाते मैंने कहा , "हाँ यहीं तो मैं कह रहा हूँ भूत भात कुछ नहीं होता " में समझ गया वह भी अपना डर छुपा रहा है , भूत के किस्से और घटनाएं बताने वालों में एक यह भी था । मगर इस समय ये बात कहने का कोई समय नहीं था ।आदमी कितना ही निडर क्यों ना हो , थोडे से डर की आशंका उसके मन मे अवस्य होती है । हम अपना डर छिपाए अपने आप को निडर घोषित करते चले जा रहे थे ।अंधेरे सन्नाटे में हमारी पदचाप और बात चीत दूर दूर तक सुनाई पड़ रही थी । जरा सी कहीं से आहट होती तो हम चौंक पड़ते , और एक दूसरे को डरपोक बताने का नाटक करते ,  मेरे मन मे आया कि इससे तो अच्छा था टिहरी में किसी होटल में रुक जाते , सुबह आराम से आते , मगर एक दिन की छुट्टी बेकार हो जाती ,खैर अब आ ही गये तो घर तो पहुंचना ही है , मैंने अपनी सुविधा के लिए एक डंडा चाय वाले कि दुकान से ले लिया था ,शायद इसकी जरूरत पड़ जाय ।बीच बीच मे कुछ जंगली जानवरों की आवाजें हल्की हल्की आती थी मगर सामने कोई अब तक नही आया । चलते चलते नीरज अचानक रुक गया ,ऐसे जैसे बस को ब्रेक लगता हो । मैंने पूछा तो नीरज बोला "प्रकाश देख तो वहां पर कौन बैठा है "
"कहां पर " मैंने कहा "अरे वो देख उस दीवार के बड़े पत्थर पर"मैंने देखा सचमुच दूर से ऐसा लगता था जैसे कोई बैठा हो , दिन के समय कोई राहगीर चलते चलते थक जाते तो उस जगह बैठ जाते थे , वहां पर एक छोटा पेड़ भी था ,जिसकी छांव में बैठ कर आने जाने वाले थोड़ी देर आराम करते थे , गाँव की स्त्रियां जब दूर जंगल से लकड़ियां या घास लेकर आती थी तो यहां पर बैठ कर थोड़ी देर विश्राम करती थी ।ठीक उसी जगह पर मैंने देखा एक आदमी घुटने में मुँह दे कर बैठ था ,उसे इस तरह बैठा देख कर एक बार तो हमारे होश उड़ गए ,वह हम से पचास मीटर की दूरी पर था ,क्या उसे हमारी आवाज सुनाई नही पड़ी ,हम तो जोर जोर से बातें कर रहे थे ।नीरज डर कर मेरे पीछे हो गया। , डर से या फिर हिम्मत से मेरे हाथ की पकड़ डंडे पर मजबूत हो गई । मैं चिल्लाया "कौन है वहां पर " कोई जवाब नहीं आया , तो हमारे होश हवा हो गए , तब एक पत्थर उठा कर मैंने हल्के से उसकी तरफ उछाला ताकि  पत्थर की आवाज से उसे हमारा आभास हो सके । तब उस आदमी ने जोर से हंसते हुए अपना मुह ऊपर किया , "डर गए क्या " वह बोला ।"अरे भाई कौन हो तुम "मैंने कहा "तुमने तो डरा ही दिया था "मैंने अपने को संयत करते हुए कहा । नीरज के चेहरे पर पसीना आ गया था । हम नजदीक आये तो देखा वह एक पचास पचपन साल का दुबला पतला आदमी था ,फिर वह खींसे निपोरता बोला "डरो मत देखो मैं तो अकेला हूं ,तुम तो दो हो 'तब नीरज अपने डर को छिपाता हुआ बोला " हम डर कहां रहे थे ", " हमने सोचा कोई चोर है " । चलो अब साथ चलते हैं ,वह लाठी के सहारे खड़ा हुआ ,और बोला मैं पटुडी गांव का हूँ ,पटुडी गांव हमारे गांव धारकोट से बाद में पड़ता था ,तो क्या ये आदमी वहां तक अकेले ही जायेगा ? हमे आश्चर्य हुआ , पर ये समय ये सब सोचने का नही था । हम एक साथी के मिल जाने से काफी  आस्वस्त हुए , एक उम्र दराज आदमी के मिलने से अब वह पहले जैसा डर नही रह गया था ,अब हम बेफिक्र हो कर चल रहे थे । हम दोनो पच्चीस छब्बीस साल के और वह वृद्ध आदमी हम से दुगनी उम्र का था, हम लोग बातें करते करते चल रहे थे तो उसने हमें भूतो की बातें बताई , " भूत ऐसे नही दिखते जैसा आदमी सोचता है ,भूत अलग अलग रूप में दिखता है , कभी कभी आदमी सोचता है कि भूत नही है पर भूत उसके साथ ही  विधमान रहता है " ।वगेरह वगेरह । उसकी अजीब बातें दिलचस्प भी थी और डराने वाली भी , खैर बात करते करते उसने हमारे गांव के एक दी आदमियों के नाम बताए और कहा कि वह हमारे जानने वाले हैं , तब हमें पूरा यकीन हो गया कि वह सींवाली गांव का है । थोड़ी देर बाद हम लोग अपने गांव की सरहद में पहुंच गए । आठ बजे चुके थे , उसने अपना नाम श्याम सिंह बताया था । जब हमारे गांव का रास्ता अलग हुआ तो  तो मैंने कहा  " अच्छा श्याम सिंह जी  आप आराम से जाइये ,हमारा तो गांव आ गया है "। तब वह बोला ठीक है मैं चलता हूँ ,और वह बे झिझक आगे रास्ते पर चल  पड़ा और अंधेरे में गायब हो गया ,  मैंने देखा उसका व्यवहार ऐसा था जैसे उसके लिए रात का अंधेरा कोई अहमियत ना रखता हो । मुझे वह बहुत बहादुर और हिम्मत वाला आदमी लगा । हमने ईश्वर का धन्यवाद किया ,कि हमे एक साथी और मिल गया था । रास्ते के थोड़ा ऊपर एक छोटी दुकान थी ,जो रात आठ नौ बजे तक खुली रहती थी ,लोग दीपू चाचा की दुकान पर देर तक गप शप्प किया करते थे , हम दुकान पर पहुंचे तो देखा दीपू चाचा के अलावा दो आदमी वहां और बैठे थे । रामा रूमी के बाद चाचा बोले "अरे प्रकाश,नीरज तुम अकेले ही आ रहे हो क्या ? "
मैने कहा "हाँ चाचा हमारे साथ एक आदमी और था"
"कौन था तुम्हारे साथ " दीपू चाचा बोले ,तब मैंने कहा कि पटुडी गांव का कोई श्याम सिंह था ,अभी तो गया है उस तरफ । दीपू चाचा ने कहा रात को इस तरह मत आया करो ,टिहरी में रुक जाते ,चलो ठीक है में भी दुकान बंद कर रहा हूँ ,टाइम हो गया है।और सब उठ कर चलने लगे । हम भी अपने घर आ गए । सुबह नाहा धो कर मैं दीवाली का सामान लेने जाने लगा तो नीरज को आवाज दे कर आने का कहा ,हम दोनो दुकान पर पहुंचे तो दुकान पर दीपू चाचा बैठे थे । तब उन्होंने बताया कि तुम्हे रात को पैदल इस तरह नही आना चाहिए ,"पर चाचा हमे तो कोई दिक्कत नही हुई" ,। मैने कहा । "और अगर कुछ हो जाता तो चाचा बोले मैंने तुम्हें रात में नही बताया , तुम जिस श्याम सिंह  की बात कर रहे थे ,जिसके साथ तुम लोग आधा घंटे तक चलते रहे ,जानते हो उसे मेरे हुए चार महीने हो गए हैं , आये दिन वह रात को लोगों के साथ इसी तरह चलता है"। "क्या " मेरे मुह से जैसे चीख़ निकल गई ,और पैरों तले जमीन खिसक गई ।नीरज तो जैसे बेहोस  सा हो गया । उसका मुह खुला का खुला रह गया ।  "हे भगवान तो क्या वह असल मे भूत था " ?
" हाँ वो वही था ,तुम्हारी किस्मत अच्छी थी कि तुम्हे कुछ हुआ नही "।उस दिन मैं समझा कि डर क्या होता है,वो जो हमने कल रात महसूस किया या वो जिसका अहसास हमे अब हो रहा था ।उस दिन के बाद हम कभी रात को उस समय उस रास्ते नही चले ,बाद में कभी अगर दिन में भी उस जगह चलना पड़ता तो शरीर में डर  की एक लहर सी दौड़ जाती थी ।

                             भगवान सिंह रावत  ( दिल्ली )