माया सुबह उठी तो उसे अपनी तबियत ठीक नही लगी ,पिछले एक हफ्ते से वह महसूस कर रही थी ,थकान और कमजोरी जैसे उसका पीछा नही छोड़ रही थी । अगल बगल में उसके दो बच्चे राजू और पिंकी सो रहे थे ,दुर दूसरी चारपाई पर उसका पति किशन लाल सो रहा था ,
किशन लाल सीधे स्वभाव का व्यक्ति था , वह कपड़े की एक बड़ी दुकान पर सेल्स मैन का काम करता था ।आमदनी कुछ खास नही थी किसी तरह घिस पिट कर महीना पार हो जाता था
दो बच्चों की पढ़ाई का खर्च , कमरे का किराया , गांव में बूढ़े मां बाप उनको भी कुछ न कुछ चाहिए होता था । एक जान और सौ मुसीबत ,माया भी इसी उधेड़बुन में रहती थी कि इस सीमित कमाई में कैसे घर को चलाएं ।
उसने देखा सुबह के छह बजे चुके है ,वह उठी चाय बनाई और एक कप किशन को देकर खुद पीने लगी । 'सुनो जी मुझे आज कल क्या हुआ है बहुत कमजोरी महसूस हो रही है " ,माया बोली
"क्यों क्या हुआ" ,किशन बोला
"बस थकान सी रहती है ,जरा सा काम करते ही बदन टूट जाता है कभी कभी आंखों के आगे अंधेरा छा जाता है " ,माया ने कहा ।
"डॉक्टर को दिखा दो' , और क्या ,किशन बोला
"हाँ जाती हूँ " आज ,और उसने बच्चों को जगाया , राजू ,पिंकी " बेटा उठो ,स्कूल को तैयार हो जाओ" और माया नास्ता बनाने में जुट गई , बच्चे स्कूल भेजने के बाद माया ने किशन के लिए टिफिन तैयार किया और बोली ,ये लो कुछ पैसे देना डॉक्टर के जाऊंगी , 'कितने चाहिए " , " देदो पांच सौ तो लगेंगे ही दो सौ तो फीस ही है उसकी ।फिर दवाइयां भी ....." ।
जेब मे से पैसे निकालते किशन बोला , "ये लो जरा ध्यान से खर्च करो यार अभी महीना बहुत दूर है "अपनी परेशानी जताते किशन बोला ।माया किशन की मजबूरी समझती थी ,मगर क्या करे , पंद्रह हजार तनखा में से चार तो किराए को चले जाते है , बाकी बचे ग्यारह उनमे बच्चों की फीस और घर का राशन दूध वाला बिजली का बिल एक एल आई सी की क़िस्त वगेरह सब मिला कर पैसे कम ही पड़ जाते थे । काम निबटा कर वह नुक्कड़ पर डॉक्टर के क्लीनिक पर चली गई , डॉक्टर ने चेकअप करके कहा , "आप मेडम अपने खाने पीने का ध्यान रखिए आयरन की बहुत कमी है , चक्कर भी आते होंगे ", "जी कभी कभी वह बोली " , "ये मैं कुछ दवाइयां लिख रही हूं दस दिन की दुबारा दिखा देना और आप अपने खाने में दूध और अंडे अवश्य खाये , वजन भी कम है नॉनवेज खा सकती हैं तो जरूर खाएं "।ये कह कर उसने एक पर्चा उसे थमा ढिया ,दोसौ उसे देकर माया वहीं बाहर दवाई की दुकान पर आई ,और पर्चा देकर बोली " भैया ये दवाई देना " ।दवाई लिफाफे में रख कर उसने बिल देखा तो वह चौंक गई, छह सौ पचास ......। ओह .....इतनी महंगी । अच्छा हुआ जो वह पांच सौ और साथ मे धर लाई थी नही तो बेइज्जती हो जाती ,वह दवाई लेकर घर आ गई , अब शाम को किशन को बताऊंगी तो उछल पड़ेगा ,पर बताना तो है ही
किशन ने तबियत के बारे में पूछा तो उसने सब बताया तब किशन बोला ,ठीक है " अपने लिए और थोड़ा ज्यादा दूध ले आया करो ,सेहत तो पहले है '।
इसी तरह खींच तान कर गाड़ी चल रही थी ।
उज्वल भविष्य की उम्मीद में माया को लग रहा था जैसे वो और किशन खपते जा रहे हैं , हर महीने कुछ ना कुछ उधार रह ही जाता था ।
एक दिन रात को खाना खा रहे किशन का अचानक फोन बज उठा , 'हेलो कौन " उधर से आवाज आई "मैं बोल रहा हूँ बेटा कासी राम ', " ओह बाबू जी ,प्रणाम कैसे हो बाबू जी " , " मैं तो ठीक हूँ बेटा पर तुम्हारी माँ की तबियत कुछ ठीक नहीं है " ,उधर से आवाज आई
" क्यों क्या हुआ मां को " किशन बोला , " बेटा पिछले महीने से सांस लेने में दिक्कत हो रही थी ,दवा भी दिलवाई मगर तबियत में सुधार नही हुआ,डॉक्टर कहता है भर्ती करना पड़ेगा सारे टेस्ट होंगे तब पता चलेगा , बेटा तू एक बार यहां आकर देख जा मेरे बस का भागना दौड़ना नही है " ।
" ठीक है बाबू जी में कल आ रहा हूँ ,आप चिंता मत करो " ,किशन बोला ।
" ठीक है बेटा " वहां से आवाज आई ।
किशन ने फोन रख दिया " माया ....मां की तबियत खराब है सुबह मुझे जाना होगा " , ' ठीक है जाओ ,मैंने सुन लिया " , " लो एक और खर्चा सिर पर आ गया " किशन बोला और चादर ओढ़कर लेट गया , माया भी सोने की किशिस करने लगी ,मगर नींद आंखों से कोसों दूर थी ,उसका ध्यान बार बार किशन की पंद्रह हजार की तनखा पर चल जाता था , और जोड़ तोड़ सुरु हो जाता था ,मगर मजाल है जो हिसाब किताब कही बैठने को तैयार हो ।
किशन अगले दिन सुबह बस में बैठ निकल पड़ा गांव तीन चार घंटे का रास्ता था ,लगभग दो बजे किशन घर पहुंचा तो माँ की हालत सच मे खराब थी,किशन चिंतित हो गया ,और सोच में पड़ गया।काफी देर बाद वह बोला " बाबू जी मैं मां को अपने साथ ले जा रहा हूँ जो भी होगा वहीं देख लूंगा ,दूर रह कर मैं भी चिंता में रहूंगा " ।
" जैसी तुम्हारी मर्जी बेटा जाओ ध्यान रखना अपनी मां का " काशी राम बोले ,किशन लाल अपनी मां को साथ ले कर वापस दिल्ली आ गया ।
अस्पताल में भर्ती कर अपनी माँ के सारे टेस्ट करवाये , तीन चार दिन तक हस्पताल के चक्कर लगते रहे , पैसा भी आने जाने में काफी खर्च हो गया , किसी से कुछ उधार लेकर किशन मा का इलाज करवाता रहा मां को देखने कभी माया भी जाति रही कभी किशन ,दोनों की चक्कर घिन्नी बनी रही । वो तो अच्छा हुआ लाक डाउन की वजह से काम कुछ खास नही था इस लिए छुट्टी मिल गई वार्ना इतनी छुट्टी कहाँ मिलती है ।अगले महीने जिससे उधर लिया था उसे भी वापस देना होगा,खर्चे की बैंड बज गई थी ,माया सोचती तो सोच में ही डूब जाती , पति से कुछ सलाह मशविरा भी करना चाहती तो कैसे करती और कहां करती एक कमरे में सबके सामने , पति के साथ प्यार मनुहार और रोमांस तो बहुत दूर की बात है ,सारा समय काम मे और सोचने में ही निकल जाता है ,किशन भी कभी इस तरफ रुचि नही लेता था । माया सोचती क्या जिंदगी है हमारी ,कितनी बेबस और मजबूर ।
एक हफ्ते तक अस्पताल में किशन की माँ का इलाज होता रहा , तब जाकर कही तबियत सुधरी ।माया उसी उधार के बारे में सोच रही थी जो सर पर चढ़ गया तथा । एक शाम माया बोली " सुनो जी में सोच रही हूं ,माजी तो अब ठीक हैं,बच्चों की देख भाल वो कर लेगी , मैं कुछ काम पकड़ लेती हूं । खर्च आराम से निकल जायेगा ' । तब किशन कुछ रुक कर बोला
" माया ठीक कहती हो वैसे भी अब ये तो करना ही पड़ेगा ,मजबूरी है " किशन बोला ।
" ऐसा क्यों कह रहे हो क्या मजबूरी " ।माया बोली
" तुम जानती हो लोक् डाउन चल रहा है , हमारे मालिक ने भी सबकी तरह सबकी सैलरी आधी देने का फैसला कल सुना दिया है ,उनका कहना है कि जब ग्राहक ही नही आएगा , सेल नही होगी तो सैलरी कहां से आएगी " ।
क्या.......माया का मुह खुला का खुला राह गया ,
है भगवान एक और मुसीबत , अब क्या होगा , दोनों एक दूसरे का चेहरा ताकने लगे , मानो एक दूसरे से पूछ रहे हों , ये सब मुसीबतें हमारे लिए ही हैं क्या ।
"अब क्या करेंगे " माया ने कहा
" करेंगे क्या एल आई सी की क़िस्त रोकनी पड़ेगी बाद में कुछ पेनाल्टी भरकर रिन्यू करवा लेंगे , और क्या करे , उधारी तो दिन ब दिन बढ़ती ही रहेगी "।
माया जानती थी एल आई सी रिन्यू नही हो पाएगी
वह विदड्रा ही होगी , सोते समय उसकी आँखों से नींद भाग चुकी थी ,कैसी जिंदगी है ये सपने बुनने पर भी अपना हक नही है । काम तो पकड़ लुंगी मगर क्या जिंदगी का ये ही रंग होता है , इसी तरह अपनी आकांक्षाओं का दमन होता रहेगा, हमेशा निराशाओं से जूझना पड़ेगा कितने संघर्षों से दो चार होना पड़ेगा......?
उसके अंदर एक ध्वन्द चल रहा था ,आंखे बंद होते हुए भी वह बहुत कुछ देख रही थी । उसे कुछ पंक्तियाँ याद आई जो उसने कहीं पढ़ी थी ,
"निराशाओं से जूझता रहा,जख्मों को सीता रहा
नाउम्मीदी के साये में कुंठाओं को पीता रहा
जिंदगी जीने के लिए जिंदगी भर यूँ हीजीता रहा" ।
और तब वह और कुछ भी ना सोच सकी उसने अपने आपको नींद के हवाले कर दिया ,सुबह से उसे नए संघर्ष की तैयारी भी करनी थी ।
भगवान सिंह रावत (दिल्ली)

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