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Thursday, March 27, 2014

गुमराह सी जिंदगी

       
   

भूलती भटकती गुमराह सी जिंदगी
क्यूँ नहीं हो जाती एक राह  सी जिंदगी ।
             जीवन के मूल्यों को मिटाती बनाती है
             नियमों के बाँध भी खुद ही लगाती है ।
             गैरों का दखल मंजूर नहीं होता
             छोटी सी  बात पर रूठ रूठ जाती है ।
अपनों से गैरों से लड़ते झगड़ते
लगती है जैसे गुनाह सी जिंदगी ।  भूलती भटकती  ……।
             बड़े बड़े सपने पर जीवन तो बौना है
             नियति के हाथों में हर कोई खिलौना है ।
             वसुधा के साये में भ्रमित है हर कोई
             यहीं से पाया है यहीं पर खोना है ।
उम्र नप जााती है कुछ ढूँढ़ते विचरते
लगता है जैसे चरवाह सी जिंदगी ।   भूलती भटकती  ……।
              अन्न तो बिखरा है खेतों खलियानों में
              फूलों के मेले  भी लगते बागानों में ।
              सरिता का पावन जल सबके लिए है
              फर्क नहीं होता उसके पैमानों मैं।
सबकुछ है फिर भी कुछ रीता सा लगता है
लगता है जैसे एक चाह  सी जिंदगी।   भूलती भटकती  ……।
              कभी कभी रोना है कभी मुस्कुराना है
              रूठना है कभी और कभी मनाना  है ।
              अंदर कि पीड़ा तो खुद को ही सहनी  है
              अपना सलीब भी खुद ही उठाना है ।
हार कर जाना है कुदरत के साये मैं ।
लगता है जैसे पनाह सी जिंदगी ।
भूलती भटकती गुमराह सी जिंदगी
क्यूँ नहीं हो जाती एक राह  सी जिंदगी ।

                                             भगवान सिंह रावत       

Monday, September 16, 2013

तुम कहाँ हो

तुम कहाँ हो ,
तुम्हारी कमी अब बहुत खलने लगी है
अंधेरों के डर से
मेरी नजर से
रौशनी भी अब रेत की तरह फिसलने लगी है
उम्र की दोपहर चिलचिलाती धूप  से तिलमिलाकर दम तोड़ने लगी है
लोगों के परिहास से
टूटते विस्वास से
उम्मीदें मायूसी मैं बदलने लगी है
समय का सारथी बेरहमी से सबको कुचलता हुआ रथ को हांक रहा है
रंग बदलता आसमान
निशाचर  की मुस्कान
अन्धेरा सब कुछ निगलने को धरती पर झाँक रहा है
जिंदगी अब बैराग की लों में जलने लगी है 
तुम्हारी कमी अब बहुत खलने लगी है
विश्वास की कोख से व्यभिचार जन्म होने  लगा है
बाबाओं के देश मैं
झूठ और ढोंग के परिवेश में
मनुष्य अनचाही आस्थाओं को ढोने लगा है
अनुभव से आश्रिवाद से जैसे रूठ गया है
विवेक शर्मसार है
व्याप्त अहंकार है
प्रेरणा से कर्म का साथ छूट गया है
हर चौराहे पर भीड़ जुटाकर हर कोई प्रवचन सुनाता है
सच की   चादर मोड़कर
झूठ का लबादा ओढ़कर
अपने आप को  को भगवान् बताता है
अन्न की जगह अब आग की फसल ज्यादा खिलने लगी है
वम्नस्य  और अलगाव
मद और क्रोध के गिरते भाव
नफरत तो जैसे मुफ्त मैं मिलने लगी है
प्रतिभाएं भी अब स्वभाव बदलने लगी है
तुम्हारी कमी अब बहुत खलने लगी है
अहसासों के सैलाब मैं एक उम्मीद थी तुम्हे पाने की
एक बार तुम्हे छूने की
तुम्हारे मुस्कुराने की
और फिर वक्त के वहीँ पर थम जाने की
और थम हुआ वक्त खुद को युगों में बदल डाले
अजंता की हो जैसे मूरत
प्रतिमाओं जैसी हो सूरत
और इतिहास हमें अपने आप में छुपाले
वसुंधरा प्रेम के गीत गाती गुनगुनाती रहे
पंछी चहकते रहें
फूल यूं ही महकते रहें
सरिता की लहरें यूंही बलखाती रहें
वक्त की वो  सुबह देखने को तबियत मचलने लगी है  

तुम्हारी कमी अब बहुत खलने लगी है।
तुम्हारी कमी अब बहुत खलने लगी है 


          भगवान सिंह रावत  (स्वरचित)

Wednesday, March 6, 2013

आम आदमी


 आम आदमी

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क्या चीज हो रहा आम आदमी,
नाचीज हो रहा आम आदमी |
           संघर्षों का बोझ पीठ पर,
           ता ऊम्र धो रहा आम आदमी |
थका थका सा हारा हारा ,
जाने कितनी दूर किनारा |
         सुबिधाओं की बाट जोहते ,
         बीत गया ये जीवन सारा |
हाथ लगी जो नाउम्मीदी ,
खुद ही रो रहा आम आदमी | क्या चीज हो.........|
         सुबह शाम बस काम ही काम
         बिना काम के कहाँ है दाम |
हाड़तोड़ मेहनत ही है बस ,
नहीं चैन और ना आराम |
         थकी जहां ये बोझिल पलकें ,
         वहीँ सो रहा आम आदमी | क्या चीज हो.........|
कहीं दीखता नहीं सुधार ,
मंहगाई की सीधी मार |
          वायु यान के यूग मैं भी,
          चींटी सी चाल चले सरकार|
क्या पाया है हमने अबतक .
क्या खो रहा है आम आदमी |  क्या चीज हो.........|
          कभी तो बदले वक्त की नियत ,
          कोई तो हो ऐसी सख्सियत |
नकली चेहरों के शहर में ,
कोई तो होगी असली सूरत |
          सदियों से बंजर धरती पर ,
          स्वप्न बो रहा आम आदमी |
क्या चीज हो रहा आम आदमी,
नाचीज हो रहा आम आदमी |
          संघर्षों का बोझ पीठ पर,
          ता ऊम्र धो रहा आम आदमी |   

                    भगवान सिंह रावत। (सर्वाधिकार सुरक्षित)

Sunday, March 3, 2013

तुम भी बदल गए तो क्या

तुम भी बदल गए तो क्या 


मौसम बदला दुनिया बदली तुम भी बदल गए तो क्या ,
चकाचौंध के अंधे दौर में आगे निकल गए तो क्या,
मौसम बदला ...........................................|
रंग बदलती इन आँखों मैं पहले जैसा प्यार कहाँ ,
हंसी ठीटोली चंचल कोमल पहले सा मनुहार कहाँ ,
साथ साथ जो देखा था वो सपनो का संसार कहाँ ,
हीरे मोती की चाहत मैं अरमा मचल गए तो क्या |
मौसम बदला ...........................................|
मेरे आदर्शों को लेकर ,मन मैं वो साम्मान कहाँ ,
दिल की बातों से तुम्हारे चेहरे पर मुश्कान कहाँ ,
चाहत को जो समझ सको इतना तुमको ध्यान कहाँ ,
अल्पक तकती मेरी आंखें आंसू निकल गए तो क्या |
मौसम बदला दुनिया बदली तुम भी बदल गए तो क्या ,
चकाचौंध के अंधे दौर में आगे निकल गए तो क्या |
                              
                         भगवान सिंह रावत (स्वरचित)

Sunday, September 30, 2012

जिंदगी


          जिंदगी  (2)
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कुछ इस तरह के रंग दिखाती है जिंदगी ,
हंसाती है कभी रुलाती है जिंदगी |
कुछ इस तरह........|
तारीख कहाँ होती है दुनिया मैं उम्र की ,
क्यूँ बड़े बड़े सपने सजाती है जिंदगी |
कुछ इस तरह........|
शुरुआत  से आखिर तक सफ़र ही सफ़र है ,
चैन कहाँ पल भर  पाती है जिंदगी |
कुछ इस तरह........|
नाव है टूटी हुई पतवार क्या करे ,
क्यूँ जुल्म खिव्हये पे ढाती है जिंदगी |
कुछ इस तरह........|
अपने से किये सितम का कुछ गिला नहीं ,
दुनिया से मिले  जख्म दिखाती जिंदगी |
कुछ इस तरह........|
गुस्सा ,गुरूर,नफरत मौजूद सब यहाँ ,
दौलत के दायरे मैं जब आती है जिंदगी |
कुछ इस तरह........|
काँटों से  भरी  राह हो मुश्किल हो सैकड़ों,
हर चीज को तब दिल से लगाती जिंदगी  |
कुछ इस तरह के रंग दिखाती है जिंदगी ,
हंसाती है कभी रुलाती है जिंदगी |
                     (भगवान सिंह रावत )

Wednesday, September 26, 2012

फूलों जैसा प्यार तुम्हारा


    फूलों जैसा प्यार तुम्हारा
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फूलों जैसा प्यार तुम्हारा ,खुसबू सा इजहार तुम्हारा ,
पुरवा सी मुस्कान तुम्हारी ,ऋतुओं सा  व्यवहार तुम्हारा |
साथ तुम्हारा जब जब पाया ,कंचन की सी थी वो काया ,
रज़त सरीखी हंसी तुम्हारी ,गन्धर्वों सा स्वर लहराया  ,
माणिक जैसा  उजला उजला ,बाँहों का ये हार तुम्हारा |
फूलों जैसा प्यार तुम्हारा ............ |
होते हो पर नज़र न आते ,जाने कहाँ कहाँ छुप जाते ,
कौन जहाँ से आते हो तुम ,पता ठिकाना नहीं बताते ,
लुका  छिपी का खेल खिलाता,कैसा है संसार तुम्हारा |
फूलों जैसा प्यार तुम्हारा ............ |
कभी ख्वाब  और कभी ख़याल ,बीते दिन महीने साल
अल्पक देखे राह तुहारी उम्र पूछती रही सवाल ,
कब जोड़ेगा टूटी सरगम ,मन वीणा का तार तुम्हारा |
फूलों जैसा प्यार तुम्हारा ,खुसबू सा इजहार तुम्हारा ,
पुरवा सी मुस्कान तुम्हारी ,ऋतुओं सा  व्यवहार तुम्हारा |


                     भगवान सिंह रावत 

Sunday, September 9, 2012

खामोश


बेजुबान

खामोश  हूँ मगर बेजुबान नहीं हूँ ,
निर्जीव सा रखा हुआ कोई सामान नहीं हूँ |
सब जानता समझता हूँ तुम्हें ,
तुम्हारी हरकतों से अंजान नहीं हूँ 
चेहरे बदल बदल कर जख्म दिए हैं तुमने
ये बात और है लहू लुहान नहीं हूँ |
अपने जैसा नहीं बना पाओगे मुझे,
साधू हूँ कोई शैतान  नहीं हूँ |
क़त्ल करते हो और मुझमे दफनाते हो,   
तुम्हारा राज दार हूँ शमशान नहीं हूँ |
मुझ से नज़र ना चुराओ चोरों की तरह ,
सब कुछ देखता हूँ नादान नहीं हूँ |
क्यूं भागते हो मुझ से दूर दूर,
तुम्हारे बीच में रहता हूँ भगवान् नहीं हूँ |
तांक झांक करते हो कभी खुद मैं भी झांको ,
अंतरात्मा हूँ तुम्हारी मैं कोई इंसान नहीं हूँ ।
  
          ((भगवान सिंह रावत)