Pages

Monday, September 16, 2013

तुम कहाँ हो

तुम कहाँ हो ,
तुम्हारी कमी अब बहुत खलने लगी है ।
अंधेरों के डर से
मेरी नजर से
रौशनी भी अब रेत की तरह फिसलने लगी है ।
उम्र की दोपहर चिलचिलाती धूप  से तिलमिलाकर दम तोड़ने लगी है ।
लोगों के परिहास से
टूटते विस्वास से
उम्मीदें मायूसी मैं बदलने लगी है ।
समय का सारथी बेरहमी से सबको कुचलता हुआ रथ को हांक रहा है ।
रंग बदलता आसमान
निशाचर  की मुस्कान
अन्धेरा सब कुछ निगलने को धरती पर झाँक रहा है ।
जिंदगी अब बैराग की लों में जलने लगी है  ।
तुम्हारी कमी अब बहुत खलने लगी है
विश्वास की कोख से व्यभिचार जन्म होने  लगा है ।
बाबाओं के देश मैं
झूठ और ढोंग के परिवेश में
मनुष्य अनचाही आस्थाओं को ढोने लगा है ।
अनुभव से आश्रिवाद से जैसे रूठ गया है
विवेक शर्मसार है
व्याप्त अहंकार है
प्रेरणा से कर्म का साथ छूट गया है ।
हर चौराहे पर भीड़ जुटाकर हर कोई प्रवचन सुनाता है
सच की   चादर मोड़कर
झूठ का लबादा ओढ़कर
अपने आप को  को भगवान् बताता है ।
अन्न की जगह अब आग की फसल ज्यादा खिलने लगी है
वम्नस्य  और अलगाव
मद और क्रोध के गिरते भाव
नफरत तो जैसे मुफ्त मैं मिलने लगी है ।
प्रतिभाएं भी अब स्वभाव बदलने लगी है ।
तुम्हारी कमी अब बहुत खलने लगी है
अहसासों के सैलाब मैं एक उम्मीद थी तुम्हे पाने की ।
एक बार तुम्हे छूने की
तुम्हारे मुस्कुराने की
और फिर वक्त के वहीँ पर थम जाने की ।
और थम हुआ वक्त खुद को युगों में बदल डाले
अजंता की हो जैसे मूरत
प्रतिमाओं जैसी हो सूरत
और इतिहास हमें अपने आप में छुपाले ।
वसुंधरा प्रेम के गीत गाती गुनगुनाती रहे
पंछी चहकते रहें
फूल यूं ही महकते रहें
सरिता की लहरें यूंही बलखाती रहें ।
वक्त की वो  सुबह देखने को तबियत मचलने लगी है  

तुम्हारी कमी अब बहुत खलने लगी है।
तुम्हारी कमी अब बहुत खलने लगी है ।


          भगवान सिंह रावत  (स्वरचित)

No comments:

Post a Comment