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Saturday, December 9, 2023

भक्ति और शक्ति ( भाग 2 )

 बात देश आजाद होने से पहले दो तीन दशक पहले की है,राजा महाराजाओं की प्रसाशन व्यवस्था थी दूर दूर तक सड़के नही थी ,आने जाने के साधन पैदल या घुड़ सवारी ,या सामान लादने वाले खच्चर होते थे,रास्ते भी  दो तीन फुट चौड़े होते थे , पैदल चलने के लिए टेढ़ी मेढ़ी पकडंडियाँ होती थी  ।

उदरपूर्ति के लिए खेती ही एक मात्र विकल्प होता था ।

गोविंदु (गांव का नाम) यानी गोबिंद राणा  पचीस साल का बलिष्ठ युवक लंबा चौड़ा दिखने में आकर्षक , अपनी माता के साथ रहता था थोड़ी जमीन थी उसी से गुजर बसर चलती थी । गोविंदु भी  आस्थावान युवक था , पूजा अर्चना और देवी देवताओं के प्रति अत्यधिक श्रद्धा रखता था । वह भी अवतारी यानी पसुवा था पांडव नाच में वह भीम का अवतारी था , उस पर भीम बहुत ही उग्र रूप से आता था ,और पांडो नाच के उत्सव में वह खूब बढ चढ़ कर हिस्सा लेता था ।

पुराने जमाने मे राजा महाराजा गाँव से भी कर वसूलते थे ,परंतु मुद्रा और सिक्कों का लेन देन व्यापक रूप से नही होता था ,क्यों कि गाँव मे आय के कोई साधन अधिक नहीं होते थे , इस लिए जरूरत की वस्तुओं का लेन देन  सामान के बदले सामान से किया जाता था ।

राजवाड़े से प्रति माह कर वसूलने की प्रथा थी , सो किसी गांव से अनाज , गेहूं , चावल , देसी घी और जो पैदावार होती उसी तरह का कर वसूला जाता था ,किसी गांव से आबादी के अनुशार कर लिया जाता था ।

गोविंदु के गाँव से इस बार पंद्रह शेर घी कर के रूप में देने का फैसला हुआ था , और वह घी राजा के महल तंक पंहुचाना था । बहुत सोच विचार के बाद गोविंदु को इस काम के लिए तैयार किया गया ,क्योकि वह बलिष्ठ और जवान युवक था ।

गोविंदु तैयार हो पंद्रह शेर का चिन्डा (घी का बर्तन) उठाया और सुबह सवेरे गांव से चल पड़ा ।

सुबह आठ नौ बजे का समय था , गोविंदु जंगल के रास्ते पकडंडियों से होता हुआ पंद्रह शेर घी लेकर चल रहा था , चारो तरफ हरे घने जंगल थे सामने की तरफ दूसरे गांव थे और बीच मे भागिरथी नदी का चट्टानों से टकराती लहरों का स्वर  तेज हो रहा था कयोंकि  यही कोई पाँचसौ मीटर नीचे गंगा नदी उस रास्ते के बहुत नजदीक बह रही थी ।

धूप थोड़ी खिल चुकी थी , तभी गोविंदु के कानों में ढोल नगारे की आवाज सुनाई पड़ी , शायद  गंगा पार कोई पाठ या कोई देव उत्सव है , गोविंदु ने घी का चिन्डा नीचे रखा और देखने लगा ,ढोल नगारे की आवाज धीरे धीरे तेज होने लगी थी ।

तभी गोविंदु ने गौर से सुना अरे ये तो पंडों के नाच की धुन है , लगता है सामने गाँव मे पनौ चल रहे हैं , जब ढोल नगारे की ध्वनि तेज हुई तो गोविंदु को एक झटका लगा और उसका शरीर कांपने लगा ,उस पर भीम अवतरित होने लगा , वह बहुत तेज गति से वहीं पर नाचने लगा उसकी आँखें लाल आँगरों के समान  हो गई , और सांसे तेज चलने लगी , भीम पुर्ण रूप से आवेग में आ चुका था , इस  प्रथा के अनुसार भीम को इस समय बहुत कुछ खाने को चाहिए होता है ,जैसे गुड़ , चावल , या भुनी हुई चौलाई या फिर भुने हुए गेहूं या रोटियां ।

परंतु यहां पर  ऐसा कुछ भी मौजूद नही था और इंतजाम भी करने वाला कोई नहीं था । 

भीम कुछ ना मिलने पर  और ज्यादा क्रुद्ध हो गया , उसका शरीर अत्यधिक  आक्रोश से भर उठा , उसने झट पंद्रह शेर का चिन्डा उठाया और मुह से लगा कर गटागट पीना सुरु कर दिया , और छण भर में ही खाली कर एक तरफ रख ढिया । कुछ देर नाचने के बाद सामने के गांव में जब कुछ विश्राम का समय आया तो ढोल नगारे बजने बजने बंद हो गए , इधर गोविंदु का भीम रूप भी शांत हो गया ,कुछ देर विश्राम के बाद जब गोविंदु घी की चिन्डा उठाने लगा तो वह आश्चर्य चकित हो गया , भीम रूप में पंद्रह शेर घी वह पी चुका था ।

वह अचानक हुई इस घटना से सकते में आ गया  अब क्या होगा , आधा रास्ता वह तय कर चुका था , अगर गांव वापस जाएगा तो भी कोई असर विश्वास नहीं करेगा और राज महल में जाकर ये सब बताना तो मूर्खता होगी ,उसे तुरंत कैद कर बंदीगृह में डाल दिया जाएगा ।

वह गहरे सोचमे पड गया , क्या करे क्या ना करे ।

एक तरफ कुंवा एक तरफ खाई वाली बात हो गई ,अब क्या करे । बहुत देर तक  वह इसी अन्तर्ध्वन्द में फँसा रहा , फिर उसने सोचा कि कुछ तो करना ही पड़ेगा , और उसने वापस गांव ना जाकर दरबार मे जाने का फैसला किया , अब चाहे जो हो देखा जाएगा ,और वह राज दरबार की तरफ चल पड़ा । दो घंटे चलने के बाद पूछ ताछ करता करता वह राज दरबार सही जगह पर पहुंचा ,और दरबान को अपना नाम और गांव का नाम बताया , कुछ देर बाद आदेश आया कि फलां गांव से गोविंदु नाम का आदमी हाजिर हो जाये , वह घी का खाली चिन्डा लेकर वहां पहुंचा , अधिकारी ने खाली बर्तन देख कर कहा " अरे खाली बर्तन पंद्रह शेर घी कहां है " तब उसने सारी आपबीती अधिकारी को बताई ,अधिकारी ने कोई प्रतिक्रिया ना देकर सीधे ये बात मंत्री को बताई ,मंत्री उसकी ये बात सुन सोच में पड़ गया , और कुछ सोचकर बोला ठीक है तुम उसे  अतिथि गृह में बिठाओ मैं उससे खुद बात करूंगा ,और राजा के पास जाकर धीरे से उसके कान में कुछ बात कही, थोड़ी देर तक उनमें मन्त्रणा हुई फिर राजा ने सहमति से शिर हिलाया और मंत्री वहां से वापस आ गया ।

जो लोग दूर  के गांव से आते थे और शाम तक घर नही पहुंचते थे उन्हें अतिथि गृह में बिठाया जाता था ,और सुबह उन्हें रवाना कर दिया जाता था ।

गोविंदु अतिथि गृह में जाकर जब और लोगों से मिला तो आश्चर्य में आ गया , किसीने उससे ज्यादा पूछताछ नही की , क्या ये बड़े लोग इतनी आसानी से मान जाते हैं ,इस तरह की बाते सोचकर वह खुश होता रहा कि सुबह उसे भी रवाना कर दिया जाएगा।

सुबह हुई तो एक सिपाही उसके लिए आदेश ले आया , " गोविंदु जो भी है उसे मंत्री के समक्ष पेश होना है " । आदेश सुन कर गोविंदु चकरा गया , वह समझ गया कि उसे अब जरूर दण्ड दिया जाएगा ।वह सिपाही के साथ चल पड़ा ।

सिपाही एक मैदान में ले गया जो राज भवन से थोड़ी ही दूर पर था , " तो क्या यहां कोई कारागृह है " वह सोचने लगा ,तभी उसकी नजर सामने की तरफ पड़ी जहां राजा साहब बैठे थे और उनके साथ मंत्री और अन्य कई  राजसी वस्त्रों में और लोग भी थे , गोविंदु कुछ ना समझ पाया ,अपितु किसी बड़ी मुसीबत की आशंका से और ज्यादा भयभीत ही गया ।

तभि उसकी नजर दूसरी तरफ गई तो वह चौंक गया , तीन चार तरह के ढोल नगारे लेकर औजी वहाँ पर खड़े थे , बहुत सारा खाने पीने का सामान वहां पर मौजूद था और आस पास कुछ जनता भी खड़ी थी ।

क्या होने वाला है  ये उसकी समझ से परे था कि तभी राजा ने मंत्री को कुछ कहा और मंत्री ने हाथ हिलाकर इशारा किया और तभी तीन चार ढोल नगारे बज उठे ।

गोविंदु ये देख कर हैरान हो गया कि ढोल नागारो पर पांडो की धुन बज रही थी ,बस फिर क्या था गोविंदु का शरीर ऐंठने लगा और वह कांपने लगा ,उस पर भीषण रूप से भीम सवार हो गया , और वह नाचने लगा । ढोल नगारे भी जोर शोर से पनौ की धुन बजाने लगे , कुछ देर बाद जब भीम का पसुवा अर्थात गोविंदु पुर्ण आवेग में आया तो उसकी नजर वहां रखे खाने के सामान पर पड़ी तो द्रुत गति से वह खाने पर झपट पड़ा और कुछ ही मिनटों में छोटीचार शेर की  कढ़ाई में हलवा और खीर का पांच शेर का डेगचा और पांच शेर  के आटे की रोटियां जो वहां पर उसके लिए ही रखी थी फिर सब सफ़ा चट कर गया फिर शेर भर लाल मिर्च और इतना ही चना जो कि कुछ दूरी पर और सामान के साथ था उसे भी साफ कर गया । 

राजा और मंत्री ये देख कर हतप्रभ रह गए , वे समझ गए   कि ये देव शक्ति है ।

पहाड़ की धरती पर ये चमत्कार देख  कर राजा और मंत्री अचंभित हो गये, वह श्रद्धा से देव शक्ति के प्रति नतमस्तक हो गये ,और  मन ही मन देवताओं का स्मरण करने लगे ।

उसके बाद वे पसुवा गोविंदु के पास गए ,जो अभी भी बैठ कर भीम के प्रभाव में कांप रहा था ,दोने ने उसे प्रणाम किया ,भीम ने उन दोनों के माथे पर टीका लगाया और आश्रीवाद दिया ,मंत्री ने पहले ही सारा इंतजाम कर दिया था , उसने पांडव के सारे अवतारी अर्जुन युधिष्टर नकुल सहदेव और द्रोपदी को दूसरे  गांवों से बुला भेजा था ,भीम उन सब के साथ खूब नाचा , मंत्री ने बहुत पकवान बनवाये  सारी जनता में प्रसाद बंटवाया और पूरे पंडों के नाच का उत्सव नियम पूर्वक  पूर्ण किया । 

उसके पश्चात राजा ने गोविंदु को बुला कर उसी के सम्मुख ये आदेश किया कि इस गाँव से कोई कर ना लिया जाय अपितु जितना कर निर्धारित हो उसे गोविंदु के घर पहुंचाया जाए ,और गोविंदु को उचित पुरष्कार के साथ उसके गांव भेज दिया ।


                        भगवान सिंह रावत।  (दिल्ली)



भक्ति और शक्ति


 बात देश आजाद होने से पहले दो तीन दशक पहले की है,राजा महाराजाओं की प्रसाशन व्यवस्था थी दूर दूर तक सड़के नही थी ,आने जाने के साधन पैदल या घुड़ सवारी ,या सामान लादने वाले खच्चर होते थे,रास्ते भी  दो तीन फुट चौड़े होते थे , पैदल चलने के लिए टेढ़ी मेढ़ी पकडंडियाँ होती थी  ।

उदरपूर्ति के लिए खेती ही एक मात्र विकल्प होता था ।

गोविंदु (गांव का नाम) यानी गोबिंद राणा  पचीस साल का बलिष्ठ युवक लंबा चौड़ा दिखने में आकर्षक , अपनी माता के साथ रहता था थोड़ी जमीन थी उसी से गुजर बसर चलती थी । गोविंदु भी  आस्थावान युवक था , पूजा अर्चना और देवी देवताओं के प्रति अत्यधिक श्रद्धा रखता था । वह भी अवतारी यानी पसुवा था पांडव नाच में वह भीम का अवतारी था , उस पर भीम बहुत ही उग्र रूप से आता था ,और पांडो नाच के उत्सव में वह खूब बढ चढ़ कर हिस्सा लेता था ।

पुराने जमाने मे राजा महाराजा गाँव से भी कर वसूलते थे ,परंतु मुद्रा और सिक्कों का लेन देन व्यापक रूप से नही होता था ,क्यों कि गाँव मे आय के कोई साधन अधिक नहीं होते थे , इस लिए जरूरत की वस्तुओं का लेन देन  सामान के बदले सामान से किया जाता था ।

राजवाड़े से प्रति माह कर वसूलने की प्रथा थी , सो किसी गांव से अनाज , गेहूं , चावल , देसी घी और जो पैदावार होती उसी तरह का कर वसूला जाता था ,किसी गांव से आबादी के अनुशार कर लिया जाता था ।

गोविंदु के गाँव से इस बार पंद्रह शेर घी कर के रूप में देने का फैसला हुआ था , और वह घी राजा के महल तंक पंहुचाना था । बहुत सोच विचार के बाद गोविंदु को इस काम के लिए तैयार किया गया ,क्योकि वह बलिष्ठ और जवान युवक था ।

गोविंदु तैयार हो पंद्रह शेर का चिन्डा (घी का बर्तन) उठाया और सुबह सवेरे गांव से चल पड़ा ।

सुबह आठ नौ बजे का समय था , गोविंदु जंगल के रास्ते पकडंडियों से होता हुआ पंद्रह शेर घी लेकर चल रहा था , चारो तरफ हरे घने जंगल थे सामने की तरफ दूसरे गांव थे और बीच मे भागिरथी नदी का चट्टानों से टकराती लहरों का स्वर  तेज हो रहा था कयोंकि  यही कोई पाँचसौ मीटर नीचे गंगा नदी उस रास्ते के बहुत नजदीक बह रही थी ।

धूप थोड़ी खिल चुकी थी , तभी गोविंदु के कानों में ढोल नगारे की आवाज सुनाई पड़ी , शायद  गंगा पार कोई पाठ या कोई देव उत्सव है , गोविंदु ने घी का चिन्डा नीचे रखा और देखने लगा ,ढोल नगारे की आवाज धीरे धीरे तेज होने लगी थी ।

तभी गोविंदु ने गौर से सुना अरे ये तो पंडों के नाच की धुन है , लगता है सामने गाँव मे पनौ चल रहे हैं , जब ढोल नगारे की ध्वनि तेज हुई तो गोविंदु को एक झटका लगा और उसका शरीर कांपने लगा ,उस पर भीम अवतरित होने लगा , वह बहुत तेज गति से वहीं पर नाचने लगा उसकी आँखें लाल आँगरों के समान  हो गई , और सांसे तेज चलने लगी , भीम पुर्ण रूप से आवेग में आ चुका था , इस  प्रथा के अनुसार भीम को इस समय बहुत कुछ खाने को चाहिए होता है ,जैसे गुड़ , चावल , या भुनी हुई चौलाई या फिर भुने हुए गेहूं या रोटियां ।

परंतु यहां पर  ऐसा कुछ भी मौजूद नही था और इंतजाम भी करने वाला कोई नहीं था । 

भीम कुछ ना मिलने पर  और ज्यादा क्रुद्ध हो गया , उसका शरीर अत्यधिक  आक्रोश से भर उठा , उसने झट पंद्रह शेर का चिन्डा उठाया और मुह से लगा कर गटागट पीना सुरु कर दिया , और छण भर में ही खाली कर एक तरफ रख ढिया । कुछ देर नाचने के बाद सामने के गांव में जब कुछ विश्राम का समय आया तो ढोल नगारे बजने बजने बंद हो गए , इधर गोविंदु का भीम रूप भी शांत हो गया ,कुछ देर विश्राम के बाद जब गोविंदु घी की चिन्डा उठाने लगा तो वह आश्चर्य चकित हो गया , भीम रूप में पंद्रह शेर घी वह पी चुका था ।

वह अचानक हुई इस घटना से सकते में आ गया  अब क्या होगा , आधा रास्ता वह तय कर चुका था , अगर गांव वापस जाएगा तो भी कोई असर विश्वास नहीं करेगा और राज महल में जाकर ये सब बताना तो मूर्खता होगी ,उसे तुरंत कैद कर बंदीगृह में डाल दिया जाएगा ।

वह गहरे सोचमे पड गया , क्या करे क्या ना करे ।

एक तरफ कुंवा एक तरफ खाई वाली बात हो गई ,अब क्या करे । बहुत देर तक  वह इसी अन्तर्ध्वन्द में फँसा रहा , फिर उसने सोचा कि कुछ तो करना ही पड़ेगा , और उसने वापस गांव ना जाकर दरबार मे जाने का फैसला किया , अब चाहे जो हो देखा जाएगा ,और वह राज दरबार की तरफ चल पड़ा । दो घंटे चलने के बाद पूछ ताछ करता करता वह राज दरबार सही जगह पर पहुंचा ,और दरबान को अपना नाम और गांव का नाम बताया , कुछ देर बाद आदेश आया कि फलां गांव से गोविंदु नाम का आदमी हाजिर हो जाये , वह घी का खाली चिन्डा लेकर वहां पहुंचा , अधिकारी ने खाली बर्तन देख कर कहा " अरे खाली बर्तन पंद्रह शेर घी कहां है " तब उसने सारी आपबीती अधिकारी को बताई ,अधिकारी ने कोई प्रतिक्रिया ना देकर सीधे ये बात मंत्री को बताई ,मंत्री उसकी ये बात सुन सोच में पड़ गया , और कुछ सोचकर बोला ठीक है तुम उसे  अतिथि गृह में बिठाओ मैं उससे खुद बात करूंगा ,और राजा के पास जाकर धीरे से उसके कान में कुछ बात कही, थोड़ी देर तक उनमें मन्त्रणा हुई फिर राजा ने सहमति से शिर हिलाया और मंत्री वहां से वापस आ गया ।

जो लोग दूर  के गांव से आते थे और शाम तक घर नही पहुंचते थे उन्हें अतिथि गृह में बिठाया जाता था ,और सुबह उन्हें रवाना कर दिया जाता था ।

गोविंदु अतिथि गृह में जाकर जब और लोगों से मिला तो आश्चर्य में आ गया , किसीने उससे ज्यादा पूछताछ नही की , क्या ये बड़े लोग इतनी आसानी से मान जाते हैं ,इस तरह की बाते सोचकर वह खुश होता रहा कि सुबह उसे भी रवाना कर दिया जाएगा।

सुबह हुई तो एक सिपाही उसके लिए आदेश ले आया , " गोविंदु जो भी है उसे मंत्री के समक्ष पेश होना है " । आदेश सुन कर गोविंदु चकरा गया , वह समझ गया कि उसे अब जरूर दण्ड दिया जाएगा ।वह सिपाही के साथ चल पड़ा ।

सिपाही एक मैदान में ले गया जो राज भवन से थोड़ी ही दूर पर था , " तो क्या यहां कोई कारागृह है " वह सोचने लगा ,तभी उसकी नजर सामने की तरफ पड़ी जहां राजा साहब बैठे थे और उनके साथ मंत्री और अन्य कई  राजसी वस्त्रों में और लोग भी थे , गोविंदु कुछ ना समझ पाया ,अपितु किसी बड़ी मुसीबत की आशंका से और ज्यादा भयभीत ही गया ।

तभि उसकी नजर दूसरी तरफ गई तो वह चौंक गया , तीन चार तरह के ढोल नगारे लेकर औजी वहाँ पर खड़े थे , बहुत सारा खाने पीने का सामान वहां पर मौजूद था और आस पास कुछ जनता भी खड़ी थी ।

क्या होने वाला है  ये उसकी समझ से परे था कि तभी राजा ने मंत्री को कुछ कहा और मंत्री ने हाथ हिलाकर इशारा किया और तभी तीन चार ढोल नगारे बज उठे ।

गोविंदु ये देख कर हैरान हो गया कि ढोल नागारो पर पांडो की धुन बज रही थी ,बस फिर क्या था गोविंदु का शरीर ऐंठने लगा और वह कांपने लगा ,उस पर भीषण रूप से भीम सवार हो गया , और वह नाचने लगा । ढोल नगारे भी जोर शोर से पनौ की धुन बजाने लगे , कुछ देर बाद जब भीम का पसुवा अर्थात गोविंदु पुर्ण आवेग में आया तो उसकी नजर वहां रखे खाने के सामान पर पड़ी तो द्रुत गति से वह खाने पर झपट पड़ा और कुछ ही मिनटों में छोटीचार शेर की  कढ़ाई में हलवा और खीर का पांच शेर का डेगचा और पांच शेर  के आटे की रोटियां जो वहां पर उसके लिए ही रखी थी फिर सब सफ़ा चट कर गया फिर शेर भर लाल मिर्च और इतना ही चना जो कि कुछ दूरी पर और सामान के साथ था उसे भी साफ कर गया । 

राजा और मंत्री ये देख कर हतप्रभ रह गए , वे समझ गए   कि ये देव शक्ति है ।

पहाड़ की धरती पर ये चमत्कार देख  कर राजा और मंत्री अचंभित हो गये, वह श्रद्धा से देव शक्ति के प्रति नतमस्तक हो गये ,और  मन ही मन देवताओं का स्मरण करने लगे ।

उसके बाद वे पसुवा गोविंदु के पास गए ,जो अभी भी बैठ कर भीम के प्रभाव में कांप रहा था ,दोने ने उसे प्रणाम किया ,भीम ने उन दोनों के माथे पर टीका लगाया और आश्रीवाद दिया ,मंत्री ने पहले ही सारा इंतजाम कर दिया था , उसने पांडव के सारे अवतारी अर्जुन युधिष्टर नकुल सहदेव और द्रोपदी को दूसरे  गांवों से बुला भेजा था ,भीम उन सब के साथ खूब नाचा , मंत्री ने बहुत पकवान बनवाये  सारी जनता में प्रसाद बंटवाया और पूरे पंडों के नाच का उत्सव नियम पूर्वक  पूर्ण किया । 

उसके पश्चात राजा ने गोविंदु को बुला कर उसी के सम्मुख ये आदेश किया कि इस गाँव से कोई कर ना लिया जाय अपितु जितना कर निर्धारित हो उसे गोविंदु के घर पहुंचाया जाए ,और गोविंदु को उचित पुरष्कार के साथ उसके गांव भेज दिया ।


                        भगवान सिंह रावत।  (दिल्ली)


तेरे इश्क़ में ( भाग 14 )

 

अबतक आपने पढ़ा ........................।

सुमेर सिंह अकेला ही अंधेरे में उस ओर तलवार निकाल कर चल पड़ता है ,वहां शत्रु  के दो सैनिकों को मौत के घाट उतार कर शिविर नष्ट कर वापस उच्च अधिकारी को सूचित करता है और आदेश के अनुशार एक शहस्त्र सेना लेकर अभियान पर निकलता है , आगे भेजे गए दो सैनिकों से धुँए का संदेश पाकर सटीक स्थिति का अवलोकन कर धनुर्धारियों को आदेश देता है ,धनुर्धारी शत्रु सेना के नायक को और आस पास के सेकड़ो सैनिकों का भयंकर तीरों  की वर्षा कर संघार करते हैं, ये देखकर नायक विहीन छुपी हुई सेना पेड़ों और झाड़ियों के पीछे से बाहर नही निकलती । 

अब आ

सुमेर सिंह ने सेना को आगे बढ़ने का आदेश दिया ।

दूसरी तरफ नायक विहीन शत्रु सेना अव्यवस्थित होने लगी , और इधर उधर भागने लगी  । परंतु सुमेर सिंह इस स्थिति के लिए तैयार था , पूरी एक सहस्त्र सेना ने शत्रु सेना को दोनो तरफ से घेर लिया , अब युद्ध करने के  सिवाय उनके समक्ष और कोई विकल्प नही बचा था , रजपूती सेना उनके निकट पहुंच चुकी थी , हाथों में तलवार और ढाल सुसज्जित सेना शत्रु पर टूट पड़ी , टन्न टन्न और खच खच की आवाज के साथ साथ सैनिकों  के हृदयविदारक क्रंदन स्वर भी घने जंगल मे उभर रहे थे , अत्यधिक  वीभत्स दृश्य था।

 सुमेर सिंह  खुद सबसे आगे था , एक एक कर  उसने कई शत्रुओं को  उसने मौत के घाट उतार दिया था , लगता था जैसे उसकी तलवार की प्यास अभी बुझी नही थी , शत्रु को उसकी तलवार दिखती ही नहीं थी ,  बस एक हल्की सी चमक आंखों में उभरती थी और फिर एक स्वर तलवार का अपने लक्ष्य पर पहुंचने पर उभरता था  " खच्च " राजपूती सेना में भी युद्ध कौशल  की कोई कमी नही थी , शत्रु के वार करने से पूर्व ही शत्रु का काम तमाम कैसे करना है , ये वह अच्छी तरह समझते थे , भीषण युद्ध की विभीषिका को सहन करती शत्रु सेना अब तितर बितर होकर  पलायन का मार्ग खोज रही थी , यद्यपि सेना में बहुत कम सैनिक ही शेष बचे थे । मगर राजपूती सेना इस युद्ध मे एक मानक स्थापित करना चाहती थी ,वह एक भी सैनिक  को जिंदा बचकर नही जाने देना चाहती थी ।

  नायक विहीन सेना  अव्यवस्थित होकर  दिशा हीन हो जहां रास्ता मिले वहीं भागने लगी , अगर कोई सम्मुख होता तो लड़ता अन्यथा  भागने का मार्ग खोजता , इस समय राजपुती सेना से युद्ध करना आत्मघात करने के समान था ।  

शत्रु की आधे से अधिक सेना धराशाई हो चुकी थी ,   जो कुछ सैनिक शेष बचे थे वह धीरे धीरे पलायन करने लगे , पराजित और भागते हुए शत्रु पर आघात करना , राजपूतों के नियमों और प्रतिष्ठा के विरुद्ध था , अतः कुछ समय पश्चात सुमेर सिंह के द्वारा युद्ध विराम का आदेश दिया गया ।

राजपूती सैनिकों में भी तीन चार सैनिक शहीद हुए ,कुछ गंभीर अवस्था मे घायल थे । उन्हें तुरंत उपचार के  लिए लेजाया गया , और मारे गए सैनिकों को विधिवत अंतिम संस्कार  के लिए ले जाया गया ।

युद्ध विराम हो चुका था  , अब प्रश्न ये था कि शत्रु का मुखबिर कौन था जो इस राज्य की सेना का गुप्त भेद शत्रु को बताने को बाध्य था , उस विश्वासघाती को खोजना अत्यंत आवश्यक था ।

सुमेर सिंह ने गुप्त रूप से अपने दो अनुचर इस कार्य के लिए  नियुक्त किये , और उन्हें  शीघ्र ही अपने कार्य को कार्यरूप देने को कहा ।

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दुर्गा को इस बात की खबर लगी कि किले से सेना युद्ध के लिए कूच कर चुकी है तो वह थोड़ी विचलित हो गई , और सुमेर सिंह को लेकर चिंतित होने लगी , " कैसा होता होगा जब दो सेनाएं आपस मे टकराती है ? कैसे मार काट मचती होगी ? सैनिक शत्रु के खून का प्यासा हो जाता होगा और जबतक वह जिंदा है  तब तक उसे बस लड़ना है और दूसरे के प्राण लेकर ही दम लेना है " । 

" उफ ......। कैसी विडंबना है ये मनुष्य ही मनुष्य के खून का प्यासा है , क्या युद्ध जरूरी है ? क्या बिना युद्ध के दुनियां में काम नही चल सकता ? क्या सब लोग प्रेम से नहीं रह सकते ? कितना ऊंचा होता है इश्क का आसमान कितना सुखद है इश्क के साये में जीवन बिताना " ।

उसके मन का साधुवाद उफान मारने लगा । उसे अपने हुकुम  का चेहरा सम्मुख हो आया ," कैसे होंगे हुकुम  ? , कैसे युद्ध कर रहे होंगे , शत्रु से ? , कहीं वह घायल तो नही हो गए ? " ।

उसके अंतर्मन में कई तरह के प्रश्न उठने लगे  एक डर व्याप्त होने लगा ......। " नहिईईई.... नहीं नहीं " उसने अपना चेहरा अपने हाथों से छिपा लिया , और मन मे बैठे उस डर को परास्त करने में जुट गई ," ऐसा कभी नहीं हो सकता , ऐसा कैसे हो सकता है , मेरा प्यार इतना कमजोर नही है , ये सच्चा इश्क है , और सच्चे इश्क में बहुत ताकत होती है " । 

उसने  तुरंत उठकर हाथ मुह धोकर घर मे रखे मंन्दिर का दिया प्रज्वलित किया और मां भवानी , अम्बे मां का ध्यान कर सुमेर सिंह की सुरक्षा और जीत की कामना करने लगीं ।


जारी है.................। तेरे इश्क़ में  ( भाग15 )

                          भगवान सिंह रावत। ( दिल्ली )



Tuesday, October 17, 2023

तेरे इश्क़ में (भाग 1)

 


कलम की दुनिया के मित्रों एवं पाठक गणो को मेरा प्रणाम  ।
यह एक प्रेम कहानी है जिसमे प्रेम के अनेकों रंग आपको देखने को मिलेंगे ,साथ ही प्रेम के अंकुरित होने से लेकर समर्पण तंक  के अहसास का अनुभव भी देखने को मिलेगा । प्रथम बार कोई बड़ी कहानी लिखने लिखने जा रहा हूँ , आपका सहयोग चाहूंगा ,और त्रुटि के लिए क्षमा प्रार्थी  रहूंगा ।
यह कहानी एक कल्पना मात्र है ,और मनोरंजन के उधेश्य से लिखी गई है पात्रों के नाम , स्थान एवं घटनाएं काल्पनिक हैं , यदि किसी घटना स्थान या नाम का उल्लेख वास्त्विकता के अनुरूप हो तो यह मात्र संयोंग माना जाएगा  ।
परंतु कहानी में मानवता के मूल्य , भावनाओं ,और विचारों का चित्रण यथावत किया गया  है ,अर्थात मानव जीवन पर आधारित ।
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सुनसान उबड़ खाबड़ रास्ते में केवल दुर्गा के पैरोकी पदचाप ही निस्तब्धता को भंग कर रही थी , भोर की ठंडी बयार चल रही थी छोटे पेड़ पौधे   हवा चलने से झुक झुक जाते थे , दोपहर  होने में समय काफी था ,मगर वहां आस पास कोई  भी हलचल नही दिखाई पड़ रही थी ,सिर पर सामान से लदा बोझा ,कमर से ऊपर कुर्ता, और कमर से नीचे  घाघरा ,सिर पर एक चुनरी ,गले मे पारंपरिक हार  ,हाथोंमें कोहनी तक भरी चूड़ियां और कड़े ,पैर में पाजेब , राजस्थानी लोहारिन की सम्पूर्ण वेश भूषा में ,उन्नीस वर्षीय दुर्गा का शरीर  लोहे का घण चलाते चलाते बहुत शुडौल आकर्षक और मजबूत था  ।
छन्न.. छन्न...की व्यवस्थित लयबद्ध आवाज  के साथ दुर्गा किले की तरफ बढ़ती चली जा रही थी , हरे भरे वन में चारों तरफ सन्नटा छाया था , कभी कभी बीच बीच में पक्षियों का स्वर उभर जाता था  दुर्गा  एक लोहार की बेटी थी , दशरथ की बेटी  , मां गोमती और एक छोटा भाई  छगन , यही चार प्राणी थे उस परिवार में , गाड़िया लोहार , राजपूती सेना के लिए युद्ध के औजार बनाते थे , तलवार , कटार ,ढाल, बरछी आदि , किले के बाहर चौकी से एक सिपाही लोहारो की बस्ती में आता और उनका काम और कुशलता देख कर , कुछ हथियारों का अनुबंध कर उन्हें पेशगी दे जाता था , दुर्गा का परिवार भी उनमें से एक था । दुर्गा कई बार इस सुनसान चौकी पर आती , और उस चौकी के सरदार को हथियार गिनवाती  थी ,चौकी का सरदार सुमेर सिंह हृष्ट पुष्ट नौजवान था , चेहरे पर तेज , हर समय सैनिक की पोशाक में दिखता था ।
दुर्गा किले की चौकी पर पहुंची तो अचानक उसे एक कड़क आवाज सुनाई दी ,  "ऐ छोरी रुक ,कहां चली जा रही है " ? दुर्गा के कदम एका यक रुक गए , लंबा तगड़ा शरीर , लंबी काली मूछें , हाथ मे बरछी ,कमर में कटार , द्वार पाल तेजी से उसकी तरफ बढ़ा ,
" दुर्गा हूँ सरकार " ,वह बोली
" कौन दुर्गा "  ?
"अरे नए आये हो क्या साहिब ? मैं तो कितनी ही बार आई हूँ यहाँ ,लोहार दशरथ की बेटी हूँ , वो साहिब नहीं है क्या , सुमेर .....हुकम " ,
तभी उनका वार्तालाप सुन किवाड़ खुला और सुमेर सिंह बाहर आया ,
देखते ही दुर्गा बोली " वो देखो आगये हुकम " ,
"खम्मा खणी हुकम " ,  " ये देखो ये नया द्वारपाल आया है क्या , मुझे रोक रहा है , इसे मालूम नही कि " .....,,दुर्गा सुमेर सिंह को देखते बोली  ।
दुर्गा आगे कुछ ना बोल पाई , कुछ देर खामोश रहकर सुमेर थोड़ा मुस्कराता बोला ,  " ये नए द्वार पाल है , इनको पूछने का अधिकार है " , तब सुमेर सिंह बोला "दीवान सिंह इनका बोझ उत्तरवाओ और औजार चेक करो " ।
दुर्गा ने  सिर पर रखा बोझा उतरवाया और औजार गिनवाए , कुछ तलवारें कुछ ढाल , सब चेक कर दीवान सिंह ने सुमेर सिंह को बताया ।
"ठीक है दुर्गा " सुमेर सिंह बोला
" हुकम देखो ना ये नया द्वारपाल कैसा अकड़ू है
बात भी नही सुनता ,हुँ " .....। दुर्गा मुह बिगाड़ते बोली  । इस पर सुमेर सिंह मुस्कुराया और बोला , " दुर्गा ये द्वारपाल  है इसका काम है ,सतर्क रहना ,  और हर किसी को एक नजर से देखना , कोई दुश्मन भी तो हो सकता है  " ।
" अरे तो क्या मैं इसे दुश्मन  लागूं  हूँ हुकम " ?
सुमेर कुछ ना बोल कर खामोश हो जाता है , और दुर्गा को ताकता रहता है , दुर्गा उसकी खामोशी से सहम जाती है ," ठीक है हुकम मैं चालूं " ।
और दुर्गा उल्टे पैर लौट जाती है , सुमेर सिंह उसे जाते हुए देखता है , " पगली , चंचल , चुलबुली " , वह मन ही मन मे बुदबुदाया और सुमेर सिंह के चेहरे पर फिर एक मुश्कान खिल जाती है ।सुमेर सिंह एक पांव दीवार पर टिका हथेली ठोड़ी पर लगा देर तक उस रास्ते को निहारता है जिस रास्ते दुर्गा जा रही है , कुछ देर बाद दुर्गा पकडण्डी से जाते हुए ओझल हो जाती है ।  तब वह अपनी नजर पश्चिम की ओर केंद्रित करता है ।
सुमेर सिंह की तेज और पैनी नजर , चप्पे चप्पे पर  एक एक पेड़ पौधे को ,चट्टानों को ,टीलों को खंगालती , शत्रु की टोह लेने में माहिर थी  । शत्रु का उस नजर से बच पाना नामुमकिन था ।
दूर दूर तक ऊंची पहाड़ियां और घने जंगलों के सैलाब से लदी हुई घाटियां ,सौंदर्य की प्रातीक ,
मगर हाल के कुछ दिनों में इन घाटियों में शत्रु की गतिविधियां कुछ ज्यादा बढ़ने लगी थी , पूरे राज्य में पश्चिम की तरफ साँकर गढ़  अपने आप मे दुश्मनों से लोहा लेने में पूरी तरह सक्षम था ,पांच हजार सैनिकों  का जमावड़ा और एक से एक बहादुर सैनिकों का समूह ,शत्रु के लिए  इस गढ़ के किले को भेदना नामुमकिन था , सुमेर सिंह के जिम्मे दो सौ सैनिकों की एक टुकडी थी ,  सुमेर सिंह अत्यंत सतर्कता तो बरतता ही था , साथ ही युद्ध कौशल और सच्चा देश भक्त भी था और पैनी नजर रखने में भी माहिर था ये देशभक्ति उसे विरासत में मिली थी ,उसके पिता उदय वीर सिंह भी इसी सेना के सरदार थे ,शत्रु के साथ  उन्होंने कई युद्ध लड़े और शत्रु को भयंकर क्षति पहुंचाई , और एक युद्धमे वह लड़ते लड़ते वीर गति को प्राप्त हुए ,सुमेर सिंह भी अत्यन्त साहसी और वीर योद्धा था , हर वक्त , हर खतरे से निपटने में सक्षम , इसी लिए उसे इस किले की राजपूती सैनिक छाँवनी का सरदार नियुक्त किया गया था ।
सुमेर सिंह की विधवा  माँ भंवरी देवी  अपनी छोटी बेटी  दीपिका के साथ अपने गांव कठौली में रहती है 
सुमेर सिंह में बचपन से ही उसके पिता के बहादुरी  और देश भक्ति के  लक्षण मौजूद थे , भंवरी देवी ने  उन गुणों को और तरासने का काम किया , औऱ सुमेर सिंह को अपने पिता के जैसा बहादुर ,साहसी और कर्तव्यनिष्ठ  बनाया ।

जारी है..........।       तेरे इश्क़ में (भाग 2)                    

Sunday, October 1, 2023

उम्र बह रही पानी सी



 समय रेत सा फिसल रहा उम्र बह रही पानी सी  

बीत जाएगी थोड़ीसी ,बची हुई जिंदगानी सी 

बगिया में फूलों के मेले जब जब आते जाते थे

विरह से व्याकुल मन को सच मे बहुत सताते थे

सर्द हवा बरिस के मौसम मुझको बहुत रुलाते थे 

टूट गई उम्मीदें सारी बन गई एक कहानी सी ।

समय रेत सा फिसल रहा उम्र बह रही पानी सी ।

कोई जगह नहीं दुनियां में सपने पूरे करने को

ये तो चीज बनी है बस टूट के और बिखरने को

तुम्ही बताओ प्रीत बिना अब क्या है जीने मरने को

आहत मन अब खोज रहा है राह कोई अनजानी सी

समय रेत सा फिसल रहा उम्र बह रही पानी सी  

लहर जहां ले जाये मेरे हाथ कोई पतवार नही

आंधी और तूफानों से मुझे कोई सरोकार नहीं

धेय नही है कोई जब जीवन का कोई सार नही

यादें अपनी चुभती है अब लगती है बेगानी सी

समय रेत सा  फिसल रहा उम्र बह रही पानी सी ।

देख सको तो आजाना  कुम्हलाए से फूलों को

पथरीली सी राह में चुभते कुछ दर्दीले शूलों को

मेरी पहचान को छिपाती जमीं वक्त की धूलों को

खिलते उपवन नहीं रहे जगह हुई वीरानी सी

समय रेत सा फिसल रहा  उम्र बाह रही पानी सी

बीत जाएगी थोड़ी सी बची  हुई जिंदगानी सी ।


                               भगवान सिंह रावत  दिल्ली

                                 (सर्वाधिकार सुरक्षित)





Thursday, September 28, 2023

देश प्रेम


 

मेरे खून के हर कतरे में देश प्रेम समाया है ।
उठो वीर आयुध संभालो रक्त फाग अब आया है ।
तीर तूणीर स्कंध धरो , युद्ध का बिगुल बजाओ
ले विजय भारती संकल्प , शत्रु को धूल चटाओ
टूट पड़ो  आफत बनकर भीषण संग्राम मचाओ
दुनिया देखेगी हमने कैसे अपना फर्ज निभाया है ।
मेरे खून के हर कतरे में देश प्रेम समाया है ।
उठो वीर आयुध संभालो रक्त फाग अब आया है ।
जन मानस को राष्ट्र भक्ति का अब अमृत पिलाना है
देवों की पंक्ति से जबरन दैत्यों को हटाना है
आस्तीन के सांपों को भी तीखा सबक सिखाना है।
भीतर बैठे गद्दारों ने बड़ा उत्पात मचाया है
मेरे खून के हर कतरे  में देश प्रेम समाया है ।
उठो वीर आयुध संभालो रक्त फाग अब आया है ।
अब सीता का हरण न होगा द्रोपदी शस्त्र उठाएगी
हर नारी कटी बांध कटार रानी झांसी कहलायेगी
चमकेगी तलवारें जब शत्रु की शामत आएगी
प्रेम की इस बाँसुरिया ने मौत का राग सुनाया है  ।
मेरे  खून के हर कतरे  में देश प्रेम समाया है ।
उठो वीर आयुध संभालो रक्त फाग अब आया है ।
                      
                               भगवान सिंह रावत  (दिल्ली
                                         (सर्वाधिकार सुरक्षित)

Wednesday, September 6, 2023

धरती पुत्र भाग 5 (हकीकत)

 


दिवान सिंह और प्रताप दोनो एक साथ बैठे थे , बाहर हल्की बारिश हो रही थी ,
"चाचा जी आपको पता है , हमारी दोस्ती और मेहनत को देख कर गांव वालों में कानाफूसी ही रही है " दीवान सिंह बोला
"जानता हूँ अभी तो सुरुआत है  , तुम देखते जाओ दिवान सिंह  मैंने तुम से इस जमीन पर किताबों के चरित्र उतारने की बात कही थी , वो काम मै करके छोडूंगा , दिवान सिंह देखो वही मैं हूँ वही गाँव वाले हैं वही गाँव की धरती माँ है फिर कमी कहां है ? कमी सिर्फ लगन की है, कमी आस्था की है ,कड़ी मेहनत की है  और हौसले की है ,बस लोगों में इसी हौसले को पैदा करना है ,गांव का आदमी सिर्फ़ जमीन के प्रति विमुख है  " प्रताप ने कहा ,ा , दीवान सिंह प्रताप की ये बात सुन कर गद गद हो उठा ,और भावुक  हो गया , सचमुच क्या इस धरती पर  प्रताप जैसे लोग हैं , इतने बड़े जहां में दिवान सिंह ने ऐसी हिम्मत और ऐसे हौसले रखने वाला कोई नही देखा था आज तक ,   दिवान सिंह ने महसूस किया लोग भी उनकी देखा देखी मेहनत करने लगे हैं , और उनकी बातों का अनुसरण करने लगे हैं , इस बार प्रताप और उसके खेतों में समय से खाद और कड़ी मेहनत से अच्छी फसल उगी है ,पहले से कहीं अच्छी । क्यारियों में भी साब्जियां खूब हुई ,ये सब समय से देखभाल और पानी की तराई करने से संभव हुआ था ।
आज गांव में प्रधान जी ने एक मीटिंग बिठाई है , दोनो भी वहाँ पहुंच गए ,मीटिंग बुलाने का कारण एक ही था "विकास कार्यों और पलायन पर चर्चा "मीटिंग में पटवारी समेत ग्राम विकासअधिकारी,प्रमुख और वार्ड के सदस्य औऱ कुछ गांव के लोग बैठे थे , वही प्रताप और दीवान सिंह की तरफ भी काफी लोग बैठे थे । स्पष्ट था कि जो जिसकी  तरफ बैठे थे वो दिल से उनके समर्थक है ।खैर बात ग्राम प्रधान ने आरम्भ की ।
" आदरणीय विकाश अधिकारी जी ,पटवारी जी , और सभी वार्ड मेंबर और ग्राम के सभी सदस्य गण , हम लोग आज यहां पर ग्राम के विकाश पर चर्चा करेंगे , और साथ ही पलायन जो कि आज पर्वतीय क्षेत्र में आम बात हो गई है के विषय मे भी चर्चा करेंगे "  "शुरुआत में में बता दूं कि एक वृक्ष लगाने का   नया अभियान सरकार चलना चाहती है ,हर गांव में फ्री वृक्ष बांटे जाएंगे , और गांव के चारों तरफ लगाए जाएंगे "। " इसके अलावा आप लोग जानते है सरकार की तरफ से कई योजनाएं भी चल रही है जैसे आवास योजना , प्राकृतिक आपदा योजना  आदि , अभी में ग्राम विकास अधिकारी जी से निवेदन करूँगा की दो शब्द कहे " ।
तभी अधिकारी जी उठे और अपनी बात रखने लगे ,
"आदरणीय ग्राम प्रधान जी एवं अन्य उपस्थित गण , जैसा कि प्रधान जी ने बताया कि कितनी तरह की योजनाएं सरकार की तरफ से चल रही है , आप उनका बखूबी लाभ उठा सकते है , हम हर समय आपके साथ हैं , हम लोगों को यहीं पर रह कर मेहनत करनी चाहिए , नाकि पलायन की बात सोचनी चाहिए " । "आज पलायन बहुत बड़ी समस्या बन गई है , इतना सब कुछ होते हुए भी लोग पलायन को क्यों मजबूर हैं ।आप लोगों में से कोई कुछ कहना चाहता है तो उठकर कह सकता है "।
कोई नही उठा , तभी सबकी नजरें प्रताप की ओर उठ गई , प्रताप समझ गया लोग उससे उम्मीद लगा रहे थे । वह उठा और बोला , " आदणीय प्रधान जी ग्राम विकाश अधिकारी ,पटवारी जी एवं अन्य सभी वार्ड मेंबर , जैसा कि आपने  अभी सारी बातें  सुनी , विकास अधिकारी जी की बाते भी आपने सुनी , सब  पलायन की बात करते हैं , औऱ हर कोई पलायन की समस्या को बड़े आराम से लोगों के सिर पर थोप देते है , और खुद साफ बच कर निकल जाते हैं " , " मैं आपसे ये पूछना चाहता हूं कि सरकार की. क्या जिम्मेदारी है , बस योजनाओं को बनाना और कागजों पर गांव गाँवों तक पहुंचना ? वह  योजना  कितने लोगों तक पहुंची , कितने लोग लाभन्वित हुए , और जो नही हो पाए उनके क्या कारण रहे , इसकी कोई जवाब देहि आप लोगों के पास है , श्री मान विकास अधिकारी जी आप चाहते तो ये पलायन रुक सकता था , आपसे मतलब आप जैसे अधिकारी गण , मगर आपकी कार्य के प्रति निष्क्रियता , और उदासीनता के चलते सब कुछ स्वाहा हो गया , आप लोगों ने अपना अधिकार तो समझ लिया मगर कर्तव्य के प्रति बड़ी बेरुखी अपनाई , आप सब लोग असमर्थ नही थे ,  आपलोग अकर्मण्य थे "। तभी बड़ी तेजी से पटवारी जी खड़े हुए, और अधिकारी का बचाव करते उनके पक्ष में कहने लगे , " श्रीमान प्रताप सिंह जी ,ये आप कैसी बात कर रहे हैं , भला हम  लोग उदासीन कैसे हो गए , आप बेवजह सारा दोष हम लोगों पर मढ़ रहे हैं "  ," तब प्रताप बोला पटवारी जी मैं यहां पर आपको दोषी करार देने नही आया हूँ, सिर्फ आप लोगों की गलतियों का अहसास कराने आया हूँ " , " जानता मैं सब कुछ हूँ मुझसे कुछ छुपा नही है , आपकी कार्य करने की शैली का मुझे पता है,आपने किस तरह और किसके किसके ऋण स्वीकृत किये हैं । आपके पास प्राकृतिक आपदा ऋण ,और  आवास योजना ऋण, और भी अन्य तरह के ऋण अभी भी लंबित हैं औऱ कितने विचाराधीन है " , " आप अपनी गैर जिम्मेदाराना हरकतों  से अपने आपको कभी माफ नही कर सकेंगे, अभी अगर सभी तरह की योजनाओं की फाइलों का निरीक्षण किया जाय तो सही तरीके से की गई स्वीकृतियां केवल दस प्रतिशत ही होंगी " , तभी एक युवक बोल उठा ,  " "प्रताप सिंह , अरे भाई ऐसी बात नही है , सरकारी काम मे दिक्कत तो आती ही है " तब प्रताप बोला ,  " देखा अधिकारी जी , हो गया एक दूसरे का बचाव सुरु , यहां पर और भी बहुत लोग हैं जिन्होंने गलत रास्ता अपनाया है , कोई आवाज कैसे उठाये सब भ्रस्टाचार में लिप्त हैं ।और एक दूसरे का बचाव करते हैं " ,  " मानव को अन्न बांटने वाली इस धरती माँ को तुम सब लोगों ने असहाय बना दिया , जिस देव भूमि पर लोग आने को तरसते हैं , उसी धरती माँ के लाडले पलायन कर रहे है , उनकी मायूसी के जिम्मेवार आप लोग हैं ,  मेरी उत्तराखंड की इस पावन धरती को आप सब लोगों ने भ्रष्ट किया है इस धरती मां को उनके सपूतों से दूर किया है , आपार सम्पदा के होते हुए भी यहां के सीधे सच्चे लोग दर डर भटकने को मजबूर हैं " । " तुम लोगों ने धरती मां को उनके बच्चों से विमुख करने का दोषपूर्ण कार्य किया है "। प्रताप थोडा सा भावुक को गया ,  " मगर मैं ऐसा नही होने दूंगा, सबको उनकी औकात बता कर ही दम लूंगा , और इस धरती माँ की गोद मे  हमारे लिए कितना कुछ है , ये सबको बता दूंगा । बहुत से लोग तो समझ चुके हैं और  और लोग भी जल्दी ही समझ जाएंगे , पलायन की एक हकीकत यह भी है " प्रताप की इस बात पर सबने तालियां बजाई ।और प्रताप भाई जिंदाबाद, की आवाज से  माहौल गूंज उठा । तभी दीवान सिंह उठा और बोला " भाइयों इस धरती माँ के आंचल में इतनी संपदा है कि हम बटोर नही सकते , पिछले कुछ दिनों में आपने हमे देख लिया होगा , हमारा थोड़ा सा परिश्रम  कितना रंग लाया है , हमें जरूरत है तो बस सच्ची लगन की ,धरती माँ के प्रति आस्था की दृढ़ संकल्प की , अगर हम सभी ऐसा प्रयत्न करें और परिश्रम करें तो ये धरती एक मिशाल बन जाएगी , और पलायन नही होगा " । फिर से प्रताप के समर्थन में तालियाँ बज उठी । ग्राम प्रधान प्रमुख और पटवारी समेत अधिकारी भी अचंभित रह गए सब के चेहरे उतर गए । उसके पश्चात सब प्रताप के संगरक्षण में कार्य करने लगे । और जीतोड़ मेहनत का बीड़ा उठाया । फलस्वरूप नई फसल में आश्चर्यजनक परिवर्तन आया , फसल में इतनी वृद्धि देख कर गांव के लोगों में नया उत्साह जागा ,  दूसरे गांव के लोग भी आकर प्रताप से सलाह मांगने  लगे ,लोगों में आये इस परिवर्तन को देख विकाश अधिकारी ,पटवारी प्रमुख और प्रधान  भी इस मुहिम में दिलसे शामिल हो गए और उन्होंने विकाश के लिए  यथा संभव प्रयत्न किया । प्रताप  एक प्रतीक बन गया , चर्चा गांव से शहर तक फैली तो प्रताप के परिवार को भी पता चला ।और गांव आकर उसके बेटों ने  अपने पिता  के आदर्शों का सम्मान किया और पत्नी ने भी अपने विमुख व्यवहार के लिए क्षमा मांगी ।अब गांव में खुशहाली का दौर अचूका था । बाद के कुछ दिनों में प्रताप को विकास अधिकारी  और अन्य अधिकारियों के अनुरोध पर जिला स्तर पर सम्मानित एवं पुरष्कृत भी किया गया । एक शाम प्रताप अपने  आंगन में चारपाई पर लेट आसमान की तरफ देख रहा था उसे एक झपकी आई तभी उसने महसूस किया कोई उसके सिर पर उंगलियों से बालों को सहला रहा है , उसके कानों में आवाज सुनाई पड़ी , बेटा सो गए क्या ? मैं हूँ तुम्हारी माँ धरती माँ  , बेटा आज मैं बहुत खुश हूं ,तुम्हारे काम से तुमने वो कर दिखया है  जो कोई कर ना सका , देखो चारों तरफ हरियाली ये बढ़ते हुए पेड़ , और ये लहलहाती ठंडी हवाएं , ये तुम्हारी मेहनत का फल है , तुम्हारे कड़े संकल्प का परिणाम , देख तो जरा सूने से पड़े इस गांव में कितनी चहल पहल हो गई है कितनी खुशहाली आ गईं है ,हर आँखोँ में नए सपने तैरने लगे हैँ ,हर चेहरे पर उम्मीद भरी मुश्कान दिख रही है ,आज तुम्हारी वजह से मेरे बेटों ने मेरी तरफ रुख कर लिया है ।अब मैं अपने बेटों से दूर नही हूँ । तू मेरा पुत्र कहलाने का सच्चा अधिकारी है । तू असली धरती पुत्र है , हाँ धरती पुत्र है ।
प्रताप ने धीरे से आंखें खोली , धरती माँ का आश्रीवाद पाकर वह बहुत प्रशन्नता से भर उठा , उसने देखा उसके लगाए पेड़ अंगड़ाइयां लेकर बड़े हो रहे थे ,अगल बगल की क्यारियां फल फूल रही थी ,  गौरैया और अन्य पक्षी आंगन में दाना चुगने में व्यस्त है । उसे लगा जैसे फिर वही बचपन जैसा समय आ गया है  ।
उसका स्वप्न पूरा हो चुका था, अब उसे लगने लगा था कि जिस काम के लिए उसका जन्म हुआ था , वह सम्पन्न होने को है , अपने जीवन की सार्थकता  से वह अति प्रसन्न था  ।
                                         भगवान सिंह रावत
                                                           दिल्ली