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Sunday, July 23, 2023

दहशत


 

आठ बजकर तीस मिनट का समय था ,

जंगल का रास्ता , घुप्प अंधेरा , एक पथिक की पदचाप जंगल की खामोशी में बिघ्न  डाल रही थी और उनका पथ आलोकित करती एक छोटे से टोर्च की रोशनी । बीच बीच मे जंगल की निस्तब्धता को भंग करता हुआ उल्लू काअचानक डरावना स्वर उभरने  से डर के मारे उसका हलक सूख रहा था ।
और बीच बीच मे चूहों के बिलों से गिरती मिट्टी की आवाज भी उसको विचलित कर रही थी । वह उस बुरे समय को कोस रहा था जब अंधेरा होने पर उसने  गोविंद से चलने की जिद की थी ,बहुत कहा था गोविंद ने अरे मान सिंह रुक जा देर हो गई है सुबह जाना  पर वही नही माना , रुक जाता तो ठीक रहता  । पर अब क्या हो सकता था अब तो वह चल पड़ा है , वापस भी जाना अपनी बेइज्जती करवाने जैसा है । जो होगा अब देखा जाएगा । अकेले में  भयभीत मन को निडर बनाना कितना मुश्किल है ये उसे आज पता चल गया  था , दूसरा अगर समझाएं तो आदमी एक बार समझने की कोशिश कर सकता है  परन्तु अकेले में आदमी  खुद के समझये कभी नही समझ सकता , क्योंकि डर पैदा करने वाले विचार उस पर तेजी से हावी होते  रहते है , तभी सामने एक घना पेड़ उसे दिखाई दिया , अंधेरे में उसे पेड़ तो दिख तो गया ,मगर वह ठिठका और गौर से देखने लगा उसके नीचे कोई उसे बैठा दिखाई दिया , इतनी रात को कौन होगा जो इतने आराम से बैठा है , जैसे कोई धूप से बचने को बैठता है , किसी अनहोनी  आशंका से वह भयभीत हो गया ,डर के मारे एक बार तो वह उल्टे पैरों भागने को हुआ , पर कुछ सोच कर वह रुक गया , तभी उसे छोटी टोर्च का ध्यान आया उसने टोर्च की रोशनी में देखा तो दंग रह गया पेड़ के नीचे से ऊपर तक किसी ने तीन बड़े पत्थर रखे हुए थे जो कि अंधेरे में किसी बैठे हुए आदमी की तरह  दिख  रहे थे  । ओह ...... उसके मुह से निकला ,फिर उसने तेज चलती हुई सांसो पर काबू पाया ,कितना डर गया था वह , आस्वस्थ हो कर उसनेआगे कदम बढ़ाया , दो कदम चल कर वह फिर रुक गया और फिर से उस पेड़ की तरफ देखने लगा , इस आशय से कि वह दुबारा वैसे ही दिखेगा या उसके  भ्रमित मन की वजह से उसे ऐसा दिखा था ,ज्यो ही उसने नजर घुमाई अब की बार उसे अंधेरे में भी दो बड़े पत्थर ही दिखे , तो क्या मनुष्य का मन ही प्रेत को जन्म देता है , वह इस बात पर विचार कर ही रहा था कि तभी अचानक वह तीनों  पत्थर  धड़ाम से पेड़ के तने से फिसल कर इस तरह गिरे जैसे किसी आदमी के गिरने की आवाज आती है , और फिर खड़ खड़ की आवाज के साथ एक और आवाज हुई जैसे कोई व्यक्ति जख्मी हो कर कराह रहा हो । ये देख कर  मान सिंह के होश उड़ गए  । वह हड़बड़ा कर तेजी से चलने को हुआ , और अंधेरे में  उसका पैर रास्ते से बाहर की तरफ किसी झाड़ी में फंस गया , वह पैर वापस खींचने लगा , तभी उसने ध्यान से सुना तो उसे किसी महिला की सुबकने की आवाज आई , रह रह कर वह महिला सुबक रही थी , मगर कही कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा था , अब महिला सुबकते सुबकते रोने लगी थी , अत्यधिक भय के कारण मान सिंह के पैरों तले की जमीन खिसक गई  । अब क्या होगा , क्या ये कोई औरत ही है, और इतनी रात गए इस जंगल मे क्यों रो रही है , मान सिंह दूसरे पहलू पर विचार करने लगा ,पर वह जानता था कि ये सच तो हो नही सकता ,किसी तरह झाड़ी से पैर निकाल कर मान सिंह  आगे बढ़ने लगा , तब उस महिला की आवाज फिर से आने लगी , अब वह रोते रोते कह रही थी , " रुक जाओ ,रुक जाओ "  जैसे घायल अवस्था मे कोई मदद के लिए पुकारता है , इस तरह उसकी आवाज सुनाई पड़ रही थी , मान सिंह दहशत में तो था , मगर वह जल्दी जल्दी चलने की कोशिश कर गांव की परिधि में पहुंचना चाहता था , उसके मष्तिस्क की सोच अब बिल्कुल बन्द हो चुकी थी , बस उसे अपने कुल देव का मन मे ध्यान हो आया था , बार बार अपने कुल देवता का स्मरण करते वह  डर को एक तरफ कर बस फटा फट चलता जा रहा था । तभी पीछे से उसी महिला की आवाज सुनाई पड़ी , " रुक जा अरे रुक जा " ,और उसके अगल बगल कुछ छोटे पत्थर और रोड़ियाँ गिरने की आवाज आई ,मगर उसे लगी नहीं , अब उस  आवाज  में भारीपन था , मानो वह अधिकार पूर्वक कह रही हो , " अरे रुक जा ना  सुन " और उसे लगा जैसे उसके पीछे वह आवाज आती जा रही हो ,प्रेत भी कितने छद्म रूप बना लेता है वह सोच रहा था , पत्थर और रोड़ियाँ का उसके अगल बगल गिरना जारी था । तभी उसे दूर से कोई टार्च की रोशनी दिखी " ये कौन हो सकता है ,  कहीं दुसरी मुसीबत तो नही है " पर उसका साहस थोड़ा बढ़ा , उसके अपने गाँव भिंवाली  की सीमा आने वाली थी , कोइ आदमी ही लगता है , तभी उस महिला का अट्टहास भरा स्वर उसे सुनाई पड़ा , " तेरी किस्मत आज अच्छी है , बच गया तू " तब तक टार्च की रोशनी पास आ गई थी ।
"अरे मान सिंह तू कहां गया था रात में " ,वह व्यक्ति बोला , वह ज्ञान चंद था " अरे चाचा क्या बताऊँ बस कोट गाँव तक गया था गोविंद के पास " ,  " अरे तो वही रुक जाता , रात में चलने की क्या जरूरत थी ,चल "  और उसने मान सिंह को आगे कर खुद उसके पीछे चलने लगा , ' रास्ते मे डर तो नही लगा , मैंने देख लिया था दूर से टोर्च की रोशनी को , समझ गया था कि कोई तो अकेला आ रहा है , इस लिए चला आया "  ,मान सिंह ने उसे कुछ नही बताया  ।मान सिंह का घर गांव के छोर पर ही था , सो ज्ञान चंद उसे वहां छोड़ अपने घर चला गया । रात के दस बज चुके थे , उसकी पत्नी और उसकी वृद्ध माँ उसे देख घबरा गए " अरे मानू इतनी रात हमने तो सोचा था कि सुबह आओगे " , " नहीं माँ बस यूं ही चल पड़ा वहां से "  , और फिर मान सिंह ने एक एक कर सारी घटना माँ को बताई , उसकी माँ  ने तुरंत कुछ चावल कटोरी में रख उसके सिर के चारों ओर घुमाए और फिर बाहर आकर चारों तरफ फेंक दिए । फिर अंदर आकर एक टीका चावल का मान सिंह के माथे पर लगा दिया । फिर बोली " बेटा तुम्हे रात में नही चलना चाहिए , आज हमारे कुल देवता ने तुम्हारी रक्षा की है , तुम्हे याद है अभी चार पांच महीने पहले हमने पूजा की थी , तब ज्ञान चंद पर जब देवता अवतरित हुए तब क्या बोले थे ,टीका लगाते बोले थे मैं हर समय तुम्हारे साथ रहूंगा जहां भी तुम याद करोगे " । "  हाँ याद आया " मान सिंह बोला । " हाँ माँ जैसे ही मैंने याद किया  वैसे ही मेरा डर खत्म हो गया था "  , तब उसने कहा " माँ वो कौन है जो रो कर मुझे डरा रही थी , सबके साथ ही होता है क्या वहॉं पर रात में "  , "  ये एक पुरानी कहानी है बेटा "  उसकी माँ बोली , " लगभग दस बारह साल पहले की बात है कोट गाँव की एक जवान औरत उस जंगल मे घास काटने गई थी , हरा पेड़ देखकर वह उस पर चढ़ गई, और उसका पैर फिसल गया , और वहीं पर उसकी मृत्यु हो गई  , तब से उसकी आत्मा वहॉं भटक रही है , और आने जाने वालों को परेशान करती है " ।
ये सुनकर मान सिंह आश्चर्यचकित हो गया  ।  तब उसकी माँ बोली बेटा एक और बात बताऊं , " क्या "  वह बोला "  बेटा तुम बता रहे थे ज्ञान चंद तुम्हे लेने गया था , तुम्हे शायद यह पता नही है ज्ञान चंद पिछले तीन दिन से यहाँ नही है  रिश्तेदारी में शादी में गया है "  ।  " क्या ......मान सिंह अचानक चौंक गया ,तो क्या वह हमारे कुल देवता थे "  ।  " हाँ बेटा कुलदेवता की कभी भूलना मत , हमेशा याद करते रहना " । मान सिंह के मन मे कुल देवता के प्रति श्रद्धा का भाव उत्पन्न हो गया , लाख लाख धन्यवाद कर मन ही मन वह कुल देवता को स्मरण करने लगा ।
                                 भगवान सिंह रावत 
                                               दिल्ली। 

Thursday, July 6, 2023

गीत बनाता हू ।

 


धूप से मुरझाए फूलों  को सीने से लगाता हूँ ।
यादों के सैलाब मे जाकर अक्सर गीत बनाता हूँ ।
जी उठता हूँ रोज सुबह नई उम्मीद को लेकर
व्यथा वेदना के घेरे में साँझ को फिर मर जाता हूँ 
यादों के सैलाब मे जाकर अक्सर गीत बनाता हूँ ।
लौट सको तो देखना आकर मेरा ये दीवानापन
पत्थर दिल की खातिर मैं पत्थर पर फूल चढ़ाता हूँ ।
यादों के सैलाब मे जाकर अकसर गीत बनाता हूँ ।
वन उपवन खामोश हैं गुमसुम है नदिया का पानी
एक कंकड़ उछाल पानी मे  मैं हलचल मचाता हूँ ।
यादों के सैलाब मे जाकर अक्सर गीत बनाता हूँ ।
वक्त कहाँ रुकता है बोलो उम्र बहे पानी सी
उम्मीदों के अरमानों के जबरन बाँध लगाता हूँ
यादों के सैलाब मे जाकर अकसर गीत बनाता हूँ ।
बेरहमी के इस परिवेश में कहाँ छुपे बैठे हो
टूट के बिखर ना जाऊं तेरी यादों से जुड़ जाता हूँ ।
यादों के सैलाब मे जाकर अक्सर गीत बनाता हूँ ।
धूप सेअलसाये फूलों  को सीने से मैं लगाता हूँ ।
यादों के सैलाब मे जाकर अक्सर गीत बनाता हूँ ।

                           भगवान सिंह रावत  (दिल्ली)

पैसा आये कहां से


 

बात आज से लगभग चालीस साल पुरानी है
उस जमाने मे मंदी का दौर था ,एक रुपये किलो दूध डेरी वाला अपने सामने निकाल कर देता था   उस जमाने में ब्लैक एंड व्हाइट टीवी भी सिर्फ अमीर और बड़ी कोठी वालों के यहां  दिखता था ,यही कोई सातवीं या आठवीं में पढ़ता हूंगा । हम लोग एक बैंक हाउस में बने क़वाटरों में रहते थे , हमारे कंपाउंड की दीवार के तरफ दूसरी गली जाती थी , वहाँ बड़ी बडी कोठियां थी और काफी धनाड्य वर्ग के लोग रहते थे , जिनके पास गाड़ियां होती थी , नौकर चाकर होते थे,उस बीस फुटि रोड में कोई समारोह या कोई हलचल होती तो हमे पता लग जाता था बस दिखाई नही पड़ता था , सो बिजली के खंभे से अर्थ की दो तारो पर बंदरो की तरह छलांग लगा कर पंद्रह फुटि दीवार पर चढ़ जाते और मजे से आती जाती बारात को देखते ,  या फिर क्या ही रहा है ये पता करते ।आस पास में थोड़ी दूर पर कुछ गरीब तबके की बस्तियां भी थी , जिनके बच्चे अक्सर उस सड़क पर साइकल के टायर को डंडी से मार मार कर दौड़ाते नजर आजाते थे , या फिर एक दूसरे को आवाज देते हुए अशिष्ट शब्दों का प्रयोग करते थे ।
उस दिन शाम के छह बजे थे हमे गली में कुछ हलचल सुनाई पड़ी , बस फिर क्या था हम दो तीन बच्चे फट से दीवार पर चढ़ गए , देखा तो दूर से एक बारात आ रही थी , तब कंपाउंड की दो तीन महिलाएं और बच्चे भी बारात देखने सीढ़ी लगाकर ऊपर चढ़ कर बारात देखने को हुई ।
थोडा सा अंधेरा हो चला था , धीरे धीरे बारात नजदीक आने लगी , बारात में पहले बैंड बाजे चल रहे थे , और उनके साथ सिर पर गैस मेन्टल लैम्प   उठाये लोग भी थे उस जमाने मे शादी व्याह में गैस मेन्टल लैंप ही उजाला करने के लिए इस्तेमाल होती थी , सबसे आगे दो ढोल बजाने वाले पटर पटर ढोल बजाते नाचने वालों को अपनी ओर आकर्षित कर रहे थे , नाचने वाले फिल्मी धुन पर बैंड की धुन पर नाच रहे थे , और कुछ मुह में पांच या दस रुपये का नोट फसाकर ढोल वाले के आगे नाच रहे थे , नाचने वालों में महिलाएं भी थी ,दूल्हा घोड़ी पर सवार था , बारात दुल्हन के घर जा रही थी । घोड़ी के साथ चलता एक आदमी बीच बीच मे एक थैले में से कुछ रेजगारी निकालता और दूल्हे के ऊपर उछाल देता ,उन सिक्कों को जमीन तक आने से पहले ही गली मोहल्ले के बच्चे उन्हें फट से लपक लेते थे कुछ नीचे गिर जाते तो उन पर झपटा झपटी हो जाती जो कि गाली गलौच तक पहुंच जाती , फिर एक आदमी उन्हें हड़काता और घोड़े से दूर कर देता । एक दो मिनट के लिए बच्चे भाग जाते मगर फिर दुबारा घोड़े के इर्द गिर्द मंडराते नजर आते थे । इधर ढोल वाला अपने हुनर को दिखाता बड़ी तेजी से ढोल बज रहा था नाचने वाले के मुह से नोट खींचना उसके हुनर की सार्थकता थी ,  यों तो कई नोट खींच चुका था अब तक वो मगर इस बार अजिब आदमी से पाला पड़ा था उसका ,जैसे ही वह मुह के पास हाथ ले जाता फट्ट से वह अपना चेहरा घुमा  लेता , नाचने वाला मानो उसे परेशान करने पर आमादा था । हम सब लोग बारात को गौर से देख रहे थे , कंपाउंड की महिलाएं और बच्चे भी आनंद उठा रहे थे तरह तरह की फिल्मी धुन पर लोग थिरक रहे थे ,तभी ढोली ने ढोल बजाते बजाते अचानक नाचने वाले के मुह से नोट छीन  लिया , झटके से खींचने के चक्कर मे पांच का नोट ढोली के हाथ से छिटक कर जमीन पर गिर गया , उस नोट पर किसी और कि भी नजर थी , ढोली ने जैसे ही नोट जमीन से उठाने को हाथ नीचे कर नोट उठाना चाहा गैस मेन्टल लैंप वाले ने फट्ट से अपना भारी भरकम जूता उसके ऊपर रख दिया , ढोल वाले कि उंगलियाँ दब गई ,वह दर्द से चीखा और अपनी उंगली को सहलाता गैस वाले को गालियां बकने लगा ,और अपनी ढोल वाली डंडी से जोर से उसके हाथ पर मारा जिससे उसने सिर पर लैंप पकड़ रखा था ,वह बिलबिला उठा , उसके पास बदला लेने का कोई विकल्प नही था क्योंकि गैस मेन्टल लैंप दोनो हाथों से पकड़ा जाता था ,सो उसने गुस्से में वह गैस की चिमनी ढोल वाले पर गिरा दी जिससे वह जमीन पर गिर गया ,उसका साथी ढोल वाला लड़ने को आगे आया तब लैंप  पकड़ने वाले का साथी भी आगे आया और एक दूसरे के गरेबान पकड़े धक्का देने लगे इस चक्कर मे दूसरा गैस मेन्टल लैंप भी फट्ट से नीचे गिरा , दो चिमनियां फुट चुकी थी , हो हल्ला मच गया लोग तीतर बितर हो गए ,हम सब लोग ऊपर दीवार से सब देख रहे थे  हड़कंप मच गया था ,दोनो ढोल वालों को गैस मेन्टल लैंप  वाले मिलकर पीटने लगे , क्यों कि वह बैंड बाजे वालों के साथ होते है इस लिए उनकी संख्या ज्यादा होती है , थोड़ी दे बाद चार पांच आदमी आगे आये वह शायद बारातियों के खास थे , बड़ी मुश्किल से उन्होंने उनको अलग किया , गैस लैंप  की चिमनियों के टूटने से आपस में चोटे बहुत आई थी कांच सड़क पर फैल गया था , बारात नजदीक पहुंच गई थी इस लिए सब धीरे धीरे दुल्हन के घर की तरफ चल पड़ी , चिमनी वाला और ढोल वाला दोनो घायल थे , लोग पकड़ कर उन्हें ले जा रहे थे, वह पांच रुपये का नोट ना तो लैंप वाले के हाथ लगा और न ढोल  वाले के , उसे कोई और ही ले गया होगा , क्योंकि सब के जाने के बाद वहां पर कुछ भी नही बचा था  ।  पैसा आये कहां से , पैसा जाए कहाँ रे  ।
                         
                         भगवान सिंह रावत (दिल्ली)

Tuesday, May 16, 2023

प्रेतनी


 

आज पूरे एक साल बाद दीपू अपने गाँव जा रहा था , दिल्ली से पहाड़ जाने की खुसी उसे अंदर ही अंदर रोमांच से भर रही थी , शाम को वह गाड़ी से उतरा तो सूरज ढलने को था , उतरते ही उसने बैग हाथ मे लिया और सामने चाय की दुकान पर चाय पीने बैठ गया ,  वह चाय जल्दी खत्म कर लेना चाहता था ,ताकि वह जल्दी घर पहुंच सके । मगर जैसे ही वह चाय पीकर उठने लगा , तेज आंधी के साथ बारिश पड़ने लगी , दीपक का दिल बैठने लगा , अब घर कैसे पहुंचेगा , अंधेरा भी धीरे धीरे छाने लगा था , लगभग आधे घंटे तक बारिश होती रही , अब समय काफी हो गया था ,मगर दीपू को तो जाना ही था अपने घर । दीपक बेग उठाकर चल पड़ा अपने गांव के रास्ते पर , अब रात हो या अंधेरा , कुछ भी हो ,अपने मन मे अपने ईष्ट देवता का ध्यान कर वह चल पड़ा । दीपक बीस बाइस साल का हट्टा कट्टा नौ जवान था  दिल्ली में एक होटल में कुक था । घर मे वृद्ध माँ और बाबा थे । पंद्रह दिन की छुट्टी लेकर गांव आरहा था ।लगभग पैदल का रास्ता एक घंटे का था बीच मे घना जंगल भी पड़ता था । दीपू को और किसी का डर ज्यादा नही था , सिवाय जंगली जानवरों के अलावा वह किसी से भय नही खाता था ।  गाड़ी ने उसे जहां छोड़ा वहां से उसका गांव सामने दिखता दिखता था मगर जंगल का रास्ता तो जंगल का ही होता है , सियार और लकड़ बग्घा जैसे जानवर तो मिल ही सकते थे । उसे पता था कि बाघ की गुफा गांव की दूसरी तरफ थी मगर फिर भी कुछ हो सकता है , जंगल किसी तरह के कानून को नही मानता , वहां उसका अपना कानून चलता है , दीपक ने अपनी सुरक्षा के लिए  सामने एक बड़े झाड़ से मोटा डंडा तोड़ लिया ,  और बेधड़क होकर तेज कदमों से चल पड़ा , उसके पास छोटी टोर्च थी , मगर ऊबड़खाबड़ रास्ते मे टोर्च होने पर भी इतनी तेजी से नहीं चला जा सकता । मनुष्य भले ही अपने आपको कितना ही निडर साबित करे , मगर अंदर से से एक कोने में थोड़ा बहुत डर अवश्य होता है ,वही डर दीपक के अंदर भी था । तेज कदमों से चलता हुआ वह आगे बढ़ता जा रहा था , अचानक जरा सी आहट पर वह चौंक पड़ता था , किसी जानवर की थोड़ी आवाज पर वह हड़बड़ा जाता था , उधर एक मुसीबत और , बारिष फिर से होने को थी , बिजली की चकाचौंध और आवाज अचानक माहौल में डर पैदा कर देती थी , आधे से ज्यादा रास्ता वह तय कर चुका था , तभी अचानक तेज बारिश होने लगी , दीपक झल्ला उठा , सारे काम आज उल्टे ही होने ही थे । वह काफी नजदीक पहुंच चुका था , तभी उसे गांव से पहले काफी दूर पर एक टुटा फूटा मकान दिखायी  दिया , उसे याद आया अरे हाँ ये तो कान्ता मौसी का मकान है , उसे बुढ़िया को लोग कांता मौसी कहा करते थे , के लोग उसे पागल भी कहते थे , वह अकेली रहती थी ,उस घर मे । कभी किसी के यहां खाने बैठ जाती , कभी किसी के यहां भी ठहर जाती थी  ।  कभी कभी वह बे सिरपेर की बातें करने लग जाती थी , कभी अचानक कई कई दिन तक गायब हो जाती , कभी अचानक दिख जाती थी दीपक को उसमे हल्की रोशनी दिखाई दी । तेज बारिश से बचने के लिए झट वह उसमे घुस गया , अंदर आकर उसने देखा ,बुढ़िया चारपाई पर लेटी थी , " कौन है रे "उसकी आवाज आई ।
" मैं हुं मौसी दीपू " ,"अभी जाग रही हो " दीपक ने कहा ।
" कहां से आ रहा है अभी " बुढ़िया बोली
" अरे मौसी दिल्ली से आ रहा हूँ , बारिस तेज हो रही है , भीग गया हूं " ।
" अच्छा अच्छा बैठ जा " बुढ़िया बोली
" देख केतली में चाय रखी है ठंड लग गई होगी तुझे चाय पीले " ।दीपक ने देखा केतली में चाय थी , और  गरम थी, उसे ताज्जुब हुआ मांग कर खाने वाली बुढ़िया मौसी के यहां ये सब , खैर उसने चाय एक गिलास में निकाली और बोला "मौसी तुम्हेभी दूं    "  " हाँ देदे थोडी "  , दीपक ने एक गिलास में उसे भी देदी बारिस के बाद चाय की चुस्कियों का मजा ही कुछ और होता है ,  दीपक चाय पीने लगा , उसने देखा कमरे में से सामान करीने से रखा था , और खाने पीने का सारा सामान मौजूद था , उसे आश्चर्य हुआ , टूटे फूटे घर मे सब सामान , जो बुढ़िया मांग कर खाती हो , उसके यहां ये सब ?
बुढ़िया चारपाई पर उठकर बैठ गई , उसने बुढ़िया के चेहरे पर गौर से देखा , तो वह सिहर गया , चेहरा बदला बदला सा लगा , जैसे बाल बिखरे से , नाक लंबी सी , आंखे सुर्ख लाल सी , उसने मन का वहम समझ अपने को संयत कर फिर से देखा तो वह डर गया ,  ऐसे कैसे हो सकता है ?  वह वहां से जल्द भागना चाहता था  , मगर तेज बारिश अभी भी हो रही थी । तभी बुढ़िया बोली " ऐसी बारिश में कहां जाएगा दीपू बेटा , रुका रह "
अब तो दीपक का  बचा खुचा साहस भी टूट गया , उसे कैसे पता चला कि मैं ऐसा सोच रहा हूँ , वह अंदर से बुरी तरह डर गया , चाय पीने के बाद बुढ़िया हंसते हुए बोली " डर मत " और उसका चाय का गिलास और अपना गिलास हाथ मे ले कर बोली ,  " ये कुछ खास बात नही है " और  झूठे गिलासों को  आठ दस  फुट दूर जहां और झूठे बर्तन  रखे थे रखने को बोली , फिर अचानक बुढ़िया ने कहा "अच्छा रहने दे तू " और वहीं से बैठे बैठे ही हाथ इतना लंबा कर दिया कि वह झूठे बर्तनों तक पहुंच गया । दीपक ये सब देख कर बुरी तरह डर कर सहम गया , आठ दस फीट लंबा हाथ कैसे हो गया ,बुढ़िया ये सब करते हुए भयानक तरह से हंस रही थी ।
दीपक ये देख कर बुरी तरह डर गया उसकी चेतना लुप्त हो गई  , और वह बेहोश हो गया ।
अपने मुह पर पानी के छींटे पड़ते ही वह चौक  पड़ा और उठ बैठा , कान्ता मौसी .....कान्ता मौसी.......। "कहाँ है कान्ता  मौसी " ? एक महिला ने उससे पूछा , " अभी यहीं तो थी , कहां गई "  ? । उसने उन दो तीन महिलाओं को आश्चर्य से देखा , उसने बाहर देखा सुबह हो चुकी थी ।
"दीपू  क्या हुआ तू यहां कैसे " एक महिला ने उससे पूछा
तब उसने रात का सारा किस्सा सुना दिया  ।
" अरे हम तो यहाँ घास काटने आये थे , तो देखा यहां का दरवाजा खुला है , वैसे यहां तो पिछले चार महीने से ताला लगा हुआ रहता है ,सोचा चलो देखते हैँ  " ।
" तो क्या  कान्ता मौसी अब यहां नही रहती " ?
" तुम्हे पता भी है कान्ता मौसी को मरे हुए पूरे चार महीने हो चुके हैं "।
" क्या  कह रही हो दीदी " ? दीपक बोला
" हाँ हाँ ठीक कह रही हूं मैं "
दीपक  के पैरों तले जमीन खिसक गई ।, तो क्या सारी रात वह प्रेतनी के साथ रहा , तभी कोई दीपक की मां को बुला लाया ,  वह दीपक को घर ले गई , दीपक घर आया तो उसकी मां ने अपने ईष्ट देवता का दिया जलाया और कुछ चावल के दाने उसके सिर पर घुमा कर चारो दिशाओं में पूज दिए , और टीका लगा दिया  ।
आज भी दीपक उस घटना को याद कर सिहर उठता है । लोगों का मत है कि कान्ता मौसी दूर से कभी कभी वहां दिखाई पड़ जाती है ,उस जगह पर नजदीक जाने की हिम्मत तो कोई कोई करता नही है ।
                      समाप्त
                                 भगवान सिंह रावत  दिल्ली

Monday, March 27, 2023

स्वरुप

 


शांत चित्त होकर रघुवीर
बैठ गए सागर के तीर
योद्धा सारे मौन खड़े थे
पर लक्ष्मण थे बहुत अधीर ।
संध्या बीत निशा घिर आई
नए दिवश ने ली अंगड़ाई
नम्र विनय कर रत्नाकर को
बाधा रघुवर ने समझाई ।
तीन दिवश भी बीत गए जब
प्रतिक्रिया कुछ नही हुई जब
नींद नही टूटी सागर की
धैर्य राम का टूट गया तब ।
क्रोधित हरि बोले "जलधाम "
,सारे प्रयत्न कर चुका है राम
बिनय नहीं होंगी अब तुझसे
अब होगा केवल  संग्राम ।
बिन जल के अपना हाल देख
धरती पर पाताल देख
विनम्रता को निर्बल समझा
अब रूप मेरा विकराल  देख
क्रुद्ध होकर अनुज को बुलाया
और अपना आयुध मंगवाया
खींच कमान की प्रत्यंचा को
उस पर अग्नि बाण चढ़ाया ।
डोल गया धरा का कण कण
काँप उठा सम्पूर्ण गगन
असमय ही चल पड़ी आंधियां
गरज उठे आकाश में घन ।
चमक उठी चपला चहुँ ओर
भीष्म घटा छाई घनघोर
मचल उठा सरिताओं का जल 
लहरें उठ उठ करती शोर । 
ज्यों ही कर अग्नि आह्वान
तीर प्रत्यंचा पर ज्यों तान
रौद्र रूप धर हरि ने ज्यों ही
सागर का किया संधान ।
त्राहिमान तब करते करते
बाहर आया सागर जल से
नतमस्तक हो हाथ जोड़ कर
किया निवेदन डरते डरते ।
दया करो हे कृपा निधान
आपका ही है ये वरदान
मेरी मर्यादा टूटी जो
नही रहेगा  विधि विधान ।
राम ने सब वृतांत बताया
विधिवत सागर को समझाया
सेना को बस मार्ग चाहिए
सन्मुख संकट को दोहराया ।
तब सागर ने युक्ति सुझाई
नल और नील हैं दोनों भाई
उनको जो वरदान मिले हैं,
प्रभु को पूरी कथा सुनाई ।
शांत चित्त हो क्रोध विसार
उत्तर दिशा में किया प्रहार
अमोघ अस्त्र से प्रभु ने तब
दशयुओं का किया संघार ।
बाधा  का समाधान हुआ
कार्य सम्पूर्ण महान हुआ
सागर ने भी साथ निभाया
विधिवत सेतु निर्माण हुआ 

                भगवान सिंह रावत  (स्वरचित)

Sunday, February 26, 2023

मजबूर सी जिंदगी

 


माया सुबह उठी तो उसे अपनी तबियत ठीक नही लगी ,पिछले एक हफ्ते से वह महसूस कर रही थी ,थकान और कमजोरी जैसे उसका पीछा नही छोड़ रही थी । अगल बगल में उसके दो बच्चे राजू और पिंकी सो रहे थे ,दुर दूसरी चारपाई पर उसका पति किशन लाल सो रहा था ,
किशन लाल सीधे स्वभाव का व्यक्ति था , वह  कपड़े की एक बड़ी दुकान पर सेल्स मैन का काम करता था ।आमदनी कुछ खास नही थी किसी तरह घिस पिट कर महीना पार हो जाता था
दो बच्चों की पढ़ाई का खर्च ,  कमरे का किराया , गांव में बूढ़े मां बाप उनको भी कुछ न कुछ चाहिए होता था । एक जान और सौ मुसीबत ,माया भी इसी उधेड़बुन में रहती थी कि इस सीमित कमाई में कैसे घर को चलाएं ।
उसने देखा सुबह के छह बजे चुके है ,वह उठी चाय बनाई और एक कप किशन को देकर खुद पीने लगी  । 'सुनो जी मुझे आज कल क्या हुआ है बहुत कमजोरी महसूस हो रही है " ,माया बोली
"क्यों क्या हुआ" ,किशन बोला
"बस थकान सी रहती है ,जरा सा काम करते ही बदन टूट जाता है कभी कभी आंखों के आगे अंधेरा छा जाता है " ,माया ने कहा ।
"डॉक्टर को दिखा दो' , और क्या ,किशन बोला
"हाँ जाती हूँ " आज ,और उसने बच्चों को जगाया , राजू ,पिंकी " बेटा उठो ,स्कूल को तैयार हो जाओ" और माया नास्ता बनाने में जुट गई , बच्चे स्कूल भेजने के बाद माया ने किशन के लिए टिफिन तैयार किया और बोली ,ये लो  कुछ पैसे देना डॉक्टर के जाऊंगी , 'कितने  चाहिए " , " देदो पांच सौ तो लगेंगे ही दो सौ तो फीस ही है उसकी ।फिर दवाइयां भी ....." ।
जेब मे से  पैसे निकालते किशन बोला , "ये लो जरा ध्यान से खर्च करो यार अभी महीना बहुत दूर है "अपनी परेशानी जताते किशन बोला ।माया किशन की मजबूरी समझती थी ,मगर क्या करे , पंद्रह हजार  तनखा में से चार तो किराए को चले जाते है , बाकी बचे ग्यारह उनमे बच्चों की फीस  और घर का राशन दूध वाला बिजली का बिल एक एल आई सी   की क़िस्त  वगेरह  सब मिला कर पैसे कम ही पड़ जाते थे । काम निबटा कर वह  नुक्कड़ पर डॉक्टर के क्लीनिक पर चली गई , डॉक्टर ने चेकअप करके कहा ,  "आप मेडम अपने खाने पीने का ध्यान रखिए आयरन की बहुत कमी है , चक्कर भी आते होंगे ",   "जी कभी कभी वह बोली " , "ये मैं कुछ दवाइयां लिख रही हूं  दस दिन की  दुबारा दिखा देना और आप अपने खाने में दूध और अंडे अवश्य खाये , वजन भी कम है नॉनवेज खा सकती हैं तो जरूर खाएं "।ये कह कर उसने एक पर्चा उसे थमा ढिया ,दोसौ उसे देकर माया वहीं बाहर दवाई की दुकान पर आई ,और पर्चा देकर बोली  " भैया ये दवाई देना "  ।दवाई लिफाफे में रख कर उसने बिल देखा तो वह चौंक गई, छह सौ पचास ......। ओह .....इतनी महंगी । अच्छा हुआ जो वह पांच सौ और साथ मे धर लाई थी नही तो बेइज्जती हो जाती ,वह दवाई लेकर घर आ गई , अब शाम को किशन को बताऊंगी तो  उछल पड़ेगा ,पर बताना तो है ही
किशन ने तबियत के बारे में पूछा तो उसने सब बताया तब किशन बोला ,ठीक है " अपने लिए और थोड़ा ज्यादा दूध ले आया करो ,सेहत तो पहले है '।
इसी तरह  खींच तान कर गाड़ी चल रही थी ।
उज्वल भविष्य  की उम्मीद में माया को लग रहा था जैसे वो और किशन खपते जा रहे हैं , हर महीने कुछ ना कुछ उधार रह ही जाता था ।
एक दिन रात को खाना खा रहे किशन का अचानक फोन बज उठा , 'हेलो कौन " उधर से आवाज आई  "मैं बोल रहा हूँ  बेटा कासी राम ', " ओह बाबू जी ,प्रणाम कैसे हो बाबू जी " , " मैं तो ठीक  हूँ बेटा पर तुम्हारी माँ की तबियत कुछ ठीक नहीं है " ,उधर से आवाज आई
" क्यों क्या हुआ मां को " किशन बोला , " बेटा पिछले महीने से सांस लेने में दिक्कत हो रही थी ,दवा भी दिलवाई मगर तबियत में सुधार नही हुआ,डॉक्टर कहता है भर्ती करना  पड़ेगा  सारे टेस्ट होंगे तब पता चलेगा , बेटा तू एक बार यहां आकर देख जा मेरे बस का भागना दौड़ना नही है " ।
" ठीक है बाबू जी में कल आ रहा हूँ ,आप चिंता मत करो " ,किशन बोला ।
" ठीक है बेटा " वहां से आवाज आई ।
किशन ने फोन रख दिया " माया ....मां की तबियत खराब है सुबह मुझे जाना होगा " , ' ठीक है जाओ ,मैंने सुन लिया " , " लो एक और खर्चा सिर पर आ गया "  किशन बोला और चादर ओढ़कर लेट  गया , माया भी सोने की किशिस करने लगी ,मगर नींद आंखों से कोसों दूर थी ,उसका ध्यान बार बार किशन की पंद्रह हजार की तनखा पर चल जाता था , और जोड़ तोड़ सुरु हो जाता था ,मगर मजाल है जो हिसाब किताब कही बैठने को तैयार हो ।
किशन अगले दिन सुबह बस में बैठ निकल पड़ा गांव तीन चार घंटे का रास्ता था ,लगभग दो बजे किशन घर पहुंचा तो माँ की हालत सच मे खराब थी,किशन चिंतित हो गया ,और सोच में पड़ गया।काफी देर बाद वह बोला " बाबू जी मैं मां को अपने साथ ले जा रहा हूँ जो भी होगा वहीं देख लूंगा ,दूर रह कर मैं भी चिंता में रहूंगा " ।
" जैसी तुम्हारी मर्जी बेटा जाओ ध्यान रखना अपनी मां का " काशी राम बोले ,किशन लाल अपनी मां को साथ ले कर वापस दिल्ली आ गया  ।
अस्पताल में भर्ती कर अपनी माँ के सारे टेस्ट करवाये , तीन चार दिन तक हस्पताल के चक्कर लगते रहे , पैसा भी आने जाने में काफी खर्च हो गया , किसी से कुछ उधार लेकर किशन मा का इलाज करवाता रहा मां को देखने कभी माया भी जाति रही कभी किशन ,दोनों की चक्कर घिन्नी बनी रही । वो तो  अच्छा हुआ लाक डाउन की वजह से काम कुछ खास नही था इस लिए छुट्टी मिल गई  वार्ना इतनी छुट्टी कहाँ मिलती है ।अगले महीने जिससे उधर लिया था उसे भी वापस देना होगा,खर्चे की बैंड बज  गई थी ,माया सोचती तो सोच में ही डूब जाती , पति से कुछ सलाह मशविरा भी करना चाहती तो कैसे करती और कहां करती एक कमरे में सबके सामने , पति के साथ प्यार मनुहार और रोमांस तो बहुत दूर की बात है ,सारा समय काम मे और सोचने में ही निकल जाता है ,किशन भी कभी इस तरफ रुचि नही लेता था । माया सोचती  क्या जिंदगी है हमारी ,कितनी बेबस और मजबूर ।
एक हफ्ते तक अस्पताल में किशन की माँ का इलाज होता रहा , तब जाकर कही तबियत सुधरी ।माया उसी उधार के बारे में सोच रही थी जो सर पर चढ़ गया तथा । एक शाम माया बोली "  सुनो जी में सोच रही हूं ,माजी तो अब ठीक हैं,बच्चों की देख भाल वो कर लेगी , मैं कुछ काम पकड़ लेती हूं । खर्च आराम से निकल जायेगा ' । तब किशन कुछ रुक कर बोला
" माया ठीक कहती हो वैसे भी अब ये तो करना ही पड़ेगा ,मजबूरी है " किशन बोला ।
" ऐसा क्यों कह रहे  हो क्या मजबूरी " ।माया बोली
" तुम जानती हो लोक् डाउन चल रहा है , हमारे मालिक ने भी सबकी तरह सबकी सैलरी आधी देने का फैसला कल सुना दिया है ,उनका कहना है कि जब ग्राहक ही नही आएगा , सेल नही होगी तो सैलरी कहां से आएगी " ।
क्या.......माया का मुह खुला का खुला राह गया ,
है  भगवान एक और मुसीबत , अब क्या होगा , दोनों एक दूसरे का चेहरा ताकने लगे , मानो एक दूसरे से पूछ रहे हों , ये सब मुसीबतें हमारे लिए ही हैं क्या ।
"अब क्या करेंगे " माया ने कहा
" करेंगे क्या एल आई सी की क़िस्त रोकनी पड़ेगी बाद में कुछ पेनाल्टी भरकर रिन्यू करवा लेंगे  , और क्या करे , उधारी तो दिन ब दिन बढ़ती ही रहेगी "।
माया जानती थी एल आई सी रिन्यू नही हो पाएगी
वह विदड्रा ही होगी , सोते समय उसकी आँखों से नींद भाग चुकी थी ,कैसी जिंदगी है ये सपने बुनने पर भी अपना हक नही है । काम तो पकड़ लुंगी मगर क्या जिंदगी का ये ही रंग होता है , इसी तरह अपनी आकांक्षाओं का दमन होता रहेगा, हमेशा निराशाओं से जूझना पड़ेगा कितने संघर्षों से दो चार होना  पड़ेगा......?
उसके अंदर एक ध्वन्द चल रहा था ,आंखे बंद होते हुए भी वह बहुत कुछ देख रही थी । उसे कुछ पंक्तियाँ याद आई जो उसने कहीं पढ़ी थी ,
"निराशाओं से जूझता रहा,जख्मों को सीता रहा
नाउम्मीदी के साये में कुंठाओं को पीता रहा
जिंदगी जीने के लिए जिंदगी भर यूँ हीजीता रहा" ।
और तब वह और कुछ भी ना सोच सकी उसने अपने आपको नींद के हवाले कर दिया ,सुबह से उसे नए संघर्ष की तैयारी भी करनी थी ।
                           
                                भगवान सिंह रावत (दिल्ली)



Monday, February 6, 2023

आपानी अपनी किस्मत है

 


कमला ने दीवार पर टंगी पुरानी घड़ी पर नजर डाली तो वह झट से उठ बैठी ,"ओह.... सात बजने वाले है ,साढ़े सात बजे मुझे  कोठी पर पहुंचना है ,देर हो गई "वह अपने मे ही बुदबुदाई ।और जल्दी से उठ कर मुह हाथ धोए , बगल में दस साल का उसका लड़का चंदू सो रहा था ।उसने चंदू को उठाया और कहा "चंदू उठ जा देर हो गई है  चल जल्दी मुह हाथ धो ,में चाय बनाती हूं तब तक "और उसने केतली में पानी  डाल चूल्हे पर चढ़ाया । रात की बची रोटी और कुछ शब्जी चंदू को परोसती वह बोली ,"चंदू ले खा पीकर स्कूल चले जाना ,और घर मे ही रहना ,आवारागर्दी मत करना ,दो बजे आकर में खाना बना दूंगी ,अभी में जा रही हूँ "और तेज कदमों से वह चल पड़ी , आज फिर देर हो गई ,शालिनी मेम साब डाँटेगी ,बिट्टू बाबा के लिए नाश्ता बनाना है, और खाना बनाना है ,और बाबू जी को खिला कर तब दूसरी जगह झाड़ू पोछा । उफ ... बड़ा झंझट है ,पर क्या कर सकते हैं ,जो पैसे देगा काम भी लेगा , साहब तो घर मे कम ही दिखते है ,आये दिन बाहर ही रहते है ,घर मे केवल तीन प्राणी है ,शालिनी मेंम साब उनका लड़का बिट्टू बाबा , जो कि पंद्रह साल का था उसके चंदू की उम्र का मगर क्या मोटापा था ,लगता था जैसे पच्चीस साल का हो , और  शालिनी मेंम साब के ससुर बड़े बाबू जी ,बाबू जी अक्शर बीमार ही रहते हैं , उनकी बड़ी देखभाल करनी पड़ती है , उधर शालिनी मेमसाब बहुत सख्त मिजाज की थी ,बाबू जी को नास्ते में, खाने में क्या देना है,बिटटू बाबा को क्या खाना है ,ये सब वही देखती थी ,कमली गेट खोलती अंदर पंहुंचीं तो शालिनी बोली "आज फिर देर कर दी कमली  टाइम से आया करो " जल्दी से साड़ी का पल्लू कमर में खोंस कमली अपने काम मे जुट गई । सबका नास्ता तैयार कर टेबल पर लगा कमली एक तरफ बैठ गई ,नास्ता कर बिट्टू बाबा स्कूल चले गए बाबू जी अपने कमरे में चले गए , फिर सारे बर्तन समेत कर सिंक में लेजाकर उन्हें धोने के बाद कमली बोली " मेमसाब मैं चलूं "
"हाँ जाओ ठीक टाइम से आया करो "। "जी मेमसाब" और कमली वहाँ से चल पड़ी दूसरी जगह झाड़ू पोछा कर कमली को डेड बज गए ।और घर आते आते दो बजे गए  । वह थक चुकी थी ,अपनी रोज की इस दिनचर्या से ,चंदू और अपने लिए खाना बना कर वह चारपाई पर पसर गई ।
काश चंदू के बाबा साथ होते तो ये सब अकेले उसे ना झेलना पड़ता । उसे याद आया तीन साल पहले की तो बात है ,अचानक चंदू के बाबा बीमार पड़ गए,
बीमार ऐसे कि खाट जब पकड़ी तो बस चार कंधों पर ही उठे । क्या वक़्त था । खैराती अस्पताल के चक्कर काटते काटते पैर घिस गए मगर चंदू के बाबा की हालत नही सुधरी ,आखिर वही हुआ ,चंदू के बाबा उन दोनों को छोड़ कर चल बसे ।बस फिर समस्या वही घर कैसे चले,कमली कोई पढ़ी लिखी तो थी नही ,सो दो घरों में काम पकड़ लिया ,और गृहस्थी की गाड़ी खींचने में लग गई ।तभी उसे टन टन की आवाज  ने चौंक ढिया ।उसकी नींद उचट गई उसने देखा दीवार पर लगी घड़ी तीन बजने की घोषणा कर रही थी ,हर घंटे पर वह बज उठती थी ।वह उठ बैठी , ।रंजना मेम साब की दी हुई पुरानी घड़ी थी जो दीवार पर टंगी वक़्त हिसाब किताब रखती थी,जब चंदू आया तो दोनों ने मिल कर खाना खाया ।दो तीन घंटे आराम करके फिर शाम को भी शालिनी मेम साब के यहां बर्तन करने जाना था । बस कमली की यही दिनचर्या थी ,किसी तरह गुजारा चल रहा था ,बड़े और ऊंचे सपने देखना अब उसके नसीब में नही था ऐसा वह सोचती थी ।
अगले दिन सुबह शालिनी मेमसाब के घर पर उसने नास्ता तैयार कर मेज पर लगाया ,और खुद दूर एक स्टूल पर बैठ कर चाय पीने लगी शालिनी ने उसे कुछ बिस्किट खाने को दिए ।बाबू जी और बिट्टू बाबा आकर बैठ गए ,शालिनी भी नास्ता करने बैठ गई । नास्ते में आमलेट ब्रेड और मख्खन और हलवा रखा था ।कमली सोच रही थी काश वह भी अपने परिवार के साथ ऐसे ही नास्ता करने बैठती,बिट्टू बाबा की तरह चंदू भी बैठा होता ,आमलेट और हलवे की सुगंध उसके नथुनों तक पहुंच रही थी,जमाना हो गया था ऐसे व्यंजन को घर पर बनाये ,और खाये हुए , रोटी शब्जी और दाल चावल मिल जाये इतना ही बहुत है ।
बिट्टू बाबा ने ब्रेड पर छुरी से मख्खन लगाया और खाने को हुए तभी शालिनी गुस्से में बोली " बिट्टू....। ये  क्या कर रहे हो" , "क्या मम्मा " वह बोला , आपको पता है ना आपको फैट वाली चीज नही खानी , " मम्मा इतने से क्या होता है"  वह बोला और मुह में ले जाकर ब्रैड खाने लगा ,नही..नहीं......।वह गुस्से से बोली और उठकर उनके मुह से आधा ब्रेड खींच लिया ।" अपना वजन देखा है पता है ,डॉक्टर को भी दिखाने में पैसा लगता है वह बोली तबियत खराब होगी वो अलग" ,ये कह कर उसने उस बचे टुकड़े को कूड़े दान में डाल दिया । बिट्टू का चेहरा रुआंसा सा हो गया वह कुछ बोल नही पाया ,और चुप चाप सुखी ब्रेड चबाने लगा ये देख कर कमली की आंखों में आंसू आ गए ।उसे लगा उसके बेटे चंदू के मुह से किसी ने ब्रेड छीन ली हो ,और उसका चंदू रोने लगा हो , बिट्टु बाबा के चेहरे की जगह उसे अपने चिंटू का चेहरा दिख रहा था मायूस सा ,कितना बड़ा पाप है किसी के मुह से आधा खाना छीनना ।
और वह भावावेश में रो पड़ी उसके मुह से निकला "नही मेम साब नही........। मत छीनो  , मुह से निवाला छीनना पाप होता है "। सब एक दम स्तब्ध रह गए । कुछ छण तक मौन छाया रहा ।
"तुम्हे क्या हुआ कमली" शालिनी बोली ",क.. क... कुछ नहीं बस ऐसे ही" ,कमली जैसे तंद्रा से जागी ।और सामान्य होने की कोशिश में लग गई ।
कमली  ने जल्दी जल्दी काम निपटाया और वापस घर आ गई ।अपनी इस भावुकता पर कमली हैरान थी । और शर्मिंदगी महसूस कर रही थी ।उसने फटा फट खाना बनाया ,चंदू भी स्कूल से आ गया ।दोनों खाना खाने लगे , चंदू की तरफ देखती कमली बोली ," चंदू बेटा खाना अच्छा बना है ना' ?
"हाँ मां बहुत अच्छा "।
कमली ने  उसके गाल पर चूम लिया , और प्यार से सर पर हाथ फिराया ,"खा खा शाबाश' ,चंदू मां के इस अप्रत्याशित  व्यवहार से  आश्चर्य में आ गया ।फिर खाना खा कर झट बाहर खेलने दौड़ गया ।कमली उसे देखती रही चंदू की वह क्या बताए कि वह उसे लेकर कैसे कैसे सपने देखती है ,वह सोच रही थी  अपनी अपनी किस्मत है । कोई होते हुए भी नही खा सकता किसी को मिलता ही नही है । इस लिए नही खा सकता ।उसके मष्तिस्क में ध्वन्द चल रहा था , और कुछ देर बाद उसे नींद आ गई ।
                            भगवान सिंह रावत (स्वरचित)