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Monday, September 26, 2022

आछरी (भाग 2)

 रात का समय ,हीरा सिंह खाना खाकर  अभी निबटा था ।समय का कुछ अनुमान लगाना कठिन था।उसकी पत्नी और बच्चे सो चुके थे । नींद ना आने की वजह से हीरा ने किवाड भेड दिए ,लैंप जला छोड़ थोड़ी दूर पर कल्याण सिंह के घर की ओर हुक्का पीने चला गया।खाना खाने के बाद हुक्का पीने की आदत जो थी उसे,चलो थोड़ी गपशप भी ही जाएगी।ये सोच कर वो घर से चल पड़ा।उसका घर गांव के सबसे छोर पर था, उसके घर से दूसरे घर की दूरी लगभग दो सौ मीटर  थी।पहाड़ में गांव के घरों में अक्शर काफी दूरियां होती है।वह कल्याण के घर पर आकर बैठा । यहां से हीरा का घर नही दिखता था बीच मे एक खेतों का बड़ा मोड़ पड़ जाता था ।कल्याण हुक्का पी ही रहा था।"आ हीरा बैठ" खाना हो गया ? कल्याण बोला",हाँ 'हीरा ने जवाब दिया।वह दोनों खेत खलियान के विषय मे बात करने लगे । "फ़सल की कटाई कब से सुरु कर रहे हो"कल्याण बोला,"अभी हफ्ते बाद देखेगे" हीरा ने कहा ।तभी कल्याण की नजर दूर एक जगह पर टिक गई । "अरे हीरा क्या टाइम है अभी " ? कल्याण बोला  , "पता नही यार, क्यों क्या हुआ "  हीरा ने कहा  । "अरे देख दूर उस पहाड़ी से एक उजाला इस तरफ आता दिखाई पड़ रहा है "कल्याण बोला , " अरे कोई दूसरे गांव का राह चल रहा होगा ' हीरा ने बात को हल्के में लेकर कहा । " अरे नही हीरा ये उजाला किसी राहगीर का नाही हो सकता वह तो पकडण्डी पर एक दम सीधा चल रहा है ।गाड़ी के जैसा " अपनी बात पर जोर देते कल्याण बोला । तब हीरा ने गौर से देखा । " हाँ  यार वह कोई आदमी तो नही लगता " । हीरा ने उस का समर्थन करते कहा   "फिरतो वही है तुझे ढोल नगाड़े की आवाज आ रही है क्या " ? कल्याण बोला सुन ध्यानसे 

हीरा कान लगा कर सुनने लगा । " अरे आ रही है हल्की सी ,पक्का आछरी ही है " 'हीरा ने झट खड़े होते हुए कहा  ।इस बीच वह रोशनी नजदीक आ गई थी । तभी हीरा सिंह को अपने घर का ख्याल आया ।ओह.... वह तो किवाड भेड कर आ गया था बस ।उसकी पत्नी और बच्चे तो सो रहे होंगे । में तो लैंप जला छोड कर आया था । हे भगवान अब क्या होगा ।क्या मैं  तब तक वहां पहुंच पाऊंगा ? उस उजाले  से पहले ? इस बीच रोशनी काफी तीव्र गति से बढ़ती चली आ रही थी।हीरा ने तेजी से अपने कदम घर की ओर बढ़ाये  ।रोशनी उसके घर के लगभग पास आ चुकी थी ।रास्ता ही वही था ।लगभग दौड़ता सा वह हांफने लगा ,आज तो गए कामसे, वह डर के मारे कांपने लगा था।पर उसने हिम्मत नही हारी ।नंगे पैर भागते हुए उसके पैर भी जगह जगह से छिल गए ।अब वह अपने घर के चौक के पास आगया था।और रोशनी उससे लगभग बीस बाइस मीटर दूर थी ।वह लगभग हवा की तरह घर की सिढिया लांघता जोर से दरवाजे को धक्का दे कर अंदर पहुंचा।और झट एक हाथ से लैंप की बत्ती को मसल डाला उसका हाथ भी झुलस गया । डर के मारे अभी भी उसकी धड़कने तेजी से चल रही थी । रोशनी चौक के अंदर आ चुकी थी। हीरा ने देखा वह एक नही दो थी । दरवाजे के पास आकर उन दोनों की आवाज साफ सुनाई पड़ रही थी । हीरा का डर के मारे दिल बैठा जा रहा था ।आज तो बच्चे और मैं सब गए।आज बचना मुश्किल हैं।तभी उसे आवाज सुनाई पड़ी ।"दीदी चलो न अंदर"उनमे से एक नए कहा ।

"अरे चल छोड़ आज रहने दे " दुसरी बोली ," नही दीदी चल ना मुझे अंदर जाना है"। पहले वाली आवाज़ आईं " रहने दे ना "  दूसरी बोली "नहीं चल अब आही  गए हैं तो चल"   पहली वाली की आवाज आई ,ये वार्ता लाप सुन हीरा का कलेजा काँप उठा ,डर के आगे हिम्मत दम  तोड़ चुकी थींऔर तब बेहोशी ने उसे अपने आगोश में ले लिया। सुबह जब उसने अपने मुह पर पानी के छींटे महसूस किए तो वह झट से उठ बैठा , उसे रात का सारा माजरा  समझ आ गया । "क्या हो गया था तुम्हे " , उसकी पत्नी ने पूछा ,उसकी पत्नी जाकर एक पडोशी को भी बुला लाई थी । बच्चे भी गुमशुम बैठे उसे ताक रहे थे । वह जिंदा है और सब ठीक है,तब  जाकर उसकी सांस में सांस आई ।वह कुछ ना बोला उन्हें रात की बात बताना उसने ठीक नही समझा । कहीं ये लोग डर ना जाये । "अरे कुछ नही शायद चक्कर आ गया था,।कुछ नही में ठीक हूँ।  मुझे कुछ नही हुआ है " । वह उठा और मुह हाथ धो कर धूप,दिया  जलाने लगा और कुल देवता के साथ आछरी  की  भी पूजा अर्चना की ।तब जा कर उसका मन शांत हुआ ।उसके पश्चात उसने कभी वह गलती नही की जो कल उससे अकस्मात हो गई थी ।

                         भगवान सिंह रावत (स्वरचित)     



आछरी (भाग 1)


सभी लेखक एवं पाठक बन्धुओं को मेरा नमस्कार ।

मेरी कहानी (वृतान्त)कुछ अलग हट कर है ,इस लिए इसकी पृष्ठभूमि पर जाना अति आवश्यक है।ये कहानी आज के समय के अनुरुप सही ना लगे लेकिन हमारे समय मे ये कथाएं काफी प्रचलित थी । अर्थात लगभाग पचास वर्ष पूर्व जब दूर  दराज के गाँव विकाश  से वंचित थे, घने औऱ विशाल जंगल हुआ करते थे,तब ऎसी कहानियों का  बहुत महत्व होता था । ये कहानी पहाड़ से संबंधित है ,शायद आपने 'आछरी ' नाम नही सुना होगा,  ये नाम  पहाड़ी है ।आछरी का अर्थ वहां पर परीयों के लिए प्रयोग किया जाता है,कयोंकि जिसने भी उन्हें देखा हैं ,उनका स्वरूप परियों जैसा बताया है ।यधपि मेरा इस तरह किसी से कभी साक्षत्कार नही हुआ , पर लोगों से और अपने पूर्वजों से  ये वृतान्त अवश्य सुना है ।

"आछरी" पहाड़ में भूत प्रेत देवताओँ और आत्माओं की श्रेणी में  रखी गई हैं । कही कहीं  कुछ लोग उन्हें देव तुल्य भी मानते हैं और सम्मान के साथ उनको पूजते भी हैं । और कई जगहोँ पर उनके मंदिर भी स्थापित किए गए हैं जिनकी समय समय पर आज भी  पूजा अर्चना की जाती है । जिसने भी उनके स्वरूप को देखा है , उनकेअनुशार आछरियाँ लंबी पतली और अक्शर सफेद वस्त्रों में दिखाई पड़ती है।और एक स्थिर आकार नही रखती, और लहराते स्वरूप में दिखती हैं।मान्यता है कि वह रोज सुबह अर्ध रात्रि के पश्चात अपने दल बल के साथ पहाड़ की चोटी से गंगा स्नान के लिए उतरती है ,और अधिकतर  फूलों के मौसम  में और रात्री मेँ उनको देखा जा सकता  है । उसके साथ कई तरह के प्रेत भी चलते है।और एक ढोल और नगाड़ा भी होता है,जो उसके दल के आने का सूचक होता है ।माना जाता है कि ढोल और नगाड़ा अलग अलग प्रवर्ति के होते हैं ढोल की धुन का अर्थ लगाया जाता है कि (अबाटे के बाट) इसका अर्थ होता हैं कि जो रास्ते से अलग हैं वो रास्ते पर आ जाय,ताकि आछरी उसे अपने साथ ले जाए,और नगाड़े की धुन का अर्थ ये लगाया जाता है कि (बाटे के अबॉट) इसका अर्थ होता है कि जो रास्ते मे है वो अलग रास्ते पर चले जाए,ताकि वह बच सकें। जिसको भी आछरी अपने साथ ले जाती हैं तो फिर वह कहीं मिलता नही है नदी के किनारे उसके वस्त्र अवश्य मिल जाते हैं ,कहा जाता है कि एक बार एक गांव की कूछ महिलाएं जंगल मे घास काटने गई थी तो उन्हे  एक मधुर  गीत की आवाज़ सुनाई पडी , आवाज बड़ी सुरीली थी,एक महिला उस आवाज के पीछे चल पड़ी ,और बहुत दूर निकल गई। साथ आई महिलाओं के बहुत खोजने पर भी  उसका पता नही चल सका ,चार पांच दिन बाद वह वापस आई तो उसकी आवाज नही निकल रही थी ।उसके गले से आवाज भर्रा कर आ रही थी,कहते हैं कि आछरी  ने उसकी आवाज हर ली थी । यहाँ पर यह मानते है कि जहाँ उजाला होता है आछरी वहीं पहुंचती है।अंधेरे में या अँधेरे घर मे वह नहीं जाती , इसी संदर्भ में बहुत बहुत से व्रतांत मिलते हैं ।यहां पर पात्रों के नाम काल्पनिक हैं।

शेष  (आछरी भाग 2) में........।

                   भगवान सिंह रावत  (दिल्ली )

                        (स्वरचित)




Friday, September 23, 2022

यादों की परछाई ( भाग 2)


 

किशन पांचवीं कक्षा में था,परिक्षये नजदीक थी ।किशन को किशन के पिता छटी कक्ष में वहां नही पढ़ाना चाहते थे,वो उसे अपने साथ दिल्ली के जाना चाहते थे। ये बात किशन के दादा जी ने उसे बताई थी । ।पांचवी  के बाद सामने जूनियर हाई स्कूल में सब बच्चों को शिफ्ट होना पड़ता था । एक दिन घर आते कमलेश ने कहा "सब अगले साल से तो हमे सामने वाले नए स्कूल में जाना होगी न किशन"
"हाँ जाना तो है मगर मेरे घर वाले कहते हैं कि अब तू अगले साल से दिल्ली जाएगा पढ़ने"
क्या....….।कमलेश के मुह से निकला ।सच मे .…
"हाँ मुझे अब छटी से वहीं पढ़ना है "
कमलेश के चेहरे पर  कुछ उदासी के भाव उभरे जिनको किशन भी पढ़ ना सका।क्या हुआ तू क्यों चुप चाप हो गई।"कुछ नही " कमलेश बोली । तीन चार दिन बाद परीक्षा थी ।दोनो अब भी साथ साथ आते जाते थे ।किशन छुट्टियों में गांव आने की बात करता था । और कमलेश को मिलने का वादा भी करता था ।परीक्षाएँ हुई ।रिज़ल्ट भी आया दोनो पास हो गए ।और स्कूल  कि छुटियाँ पड़  गई ।आज स्कूल में इस साल का आखिरी दिन था।दोनो वापर घर की तरफ आ रहे थे।दोनो चीड के उस घने पेड़ के पास बैठ गए जहां वो रोज बैठते थे ।चीड के पेड़ से साँय सांय की हवा चल रही थी । दोनो  आपस मे बातें कर रहे थे ।"किशन अब तो तू दिल्ली जाएगा तो मुझे ये पेड़ जिस पर हमने अपने नाम लिखें हैं ये रास्ते ये पकडंडियाँ ये स्कूल याद करेगा "भ्रांतिचित भाव से कमलेश बोली ।
"हाँ कम्मू मुझे ये सब बहुत याद आएंगे " उसने एक बार पेड़ पर उस जगह नजर डाली जिस पर दोनों के नाम लिखे थे ।
"अभी तो बस मुझे दिल्ली जाकर पढ़ने की बड़ी इच्छा  है"
मैं खूब पढ़ना चाहता हूं बहुत बहुत । वह उत्कंठित भाव से बोला। कमलेश के चेहरे पर फिर से कुछ गमगीन से भाव उभरे ,मगर किशन तो बस शहर जाने को उत्सुक होने की वजह से कुछ भी समझ ना सका ।अपने गांव  से कमलेश किशन को बहुत देर तक  विषादयुक्त भाव से जाते देखती रही।
किशन अब अपने पिता जी के साथ दिल्ली आ गया ।और नए स्कूल में एड्मिसन लिया ।शहर की आबोहवा उसे इतनी भाई कि वह गांव गली स्कूल पहाड़ पकडण्डी सब भूल गया,पढ़ाई के ध्यान में वह कमलेश को भी भूल गया । बस उसे याद था तो बस अपना लक्ष्य ,उसे शीर्ष तक पहुंचना था ।गर्मी की छुट्टियों में भी वह गांव नही जा सका । ठीक दो साल बाद वह चार पांच दिनों के लिए गांव आया , पुराने दोस्तों से मिला,उसने कमलेश के बारे में पूछा तो पता चला कि वह देहरा दून में अपने किसी रिश्तेदार के यहां पढ़ने चली गई है ।उस जमाने मे संचार माध्यम के नाम पर केवल एक चीज हुआ करती थी ,चिट्ठी.....। ज्यादा हुआ तो टेलीग्राम ।चिट्ठी किशन भेज नही सकता था ,पता नही कोई क्या समझ बैठे ।बदनामी का डर अलग से  । वह खिन्न हो कर राह गया । समय बीतता गया,उसका ध्यान कामलेश की तरफ से भी हट गया ।
बीच मे कई बार गांव वह गया भी मगर वह अपनी पढ़ाई और दूसरे कामो में व्यस्त रहने लगा ।
आज किशन यानी मैं पढ़ लिख कर पॉलिटेक्निक से इंजिनीयर बन गया हूँ ।और बखूबी अपने को सफल मानता हूं ।अब मेरे पास समय का इतना आभाव नही है ।चार दिन के ब्लॉक हॉलिडे के होने की वजह से गांव आया हूँ। मन के किसी कोने से एक आह्वाहन हुआ ,क्यो न पुराने स्कूल  घूम कर आऊं तो बाइक उठाई और चल पड़ा ।मष्तिस्क में कुछ धुंदली यादें उभरने लगी थी ।जिसमे कमलेश का मासूम चेहरा भी था ।शायद कही कुछ पता चले या मिल भी जाये । अब सारे गांव में सड़के थी  लोग पैदल भी सड़कों से ही आते जाते थे ।
वहां आकर देखा तो अचंम्भे में पड़ गया ।काफी देर तक बाइक पर ही बैठा उस स्कूल को देख रहा था ।उतर कर एक ढाबे में गया ।और चाय मंगवाई ।सब कुछ बदल गया था ।ना तो वो दुकाने थी, ना वो पुराना स्कूल,ना वो पकडण्डी,ना वहां चीड का घना पेड़,ना वो पुराने गुरु जी ।सब बदल गया था ।बीस साल कुछ कम भी तो नही होते।ना स्कूल में कोई किशन था और ना कोई कमलेश,वह स्कूल शहर के स्कूलों से किसी भी तरह उन्नीस नही था ।दो तीन दुकानों की जगह आज यहां किलोमीटर से लंबा बाजार था ।चीड के पेड़ों का वो जंगलभी अब घना नही लग रहा था आस पास की वो हरियाली और बड़े बड़े खेत भी अब  दुकानों और मकानो का रूप ले चुके थे  ।एक्का दुक्का पेड़ ही थे । विकाश के चक्र ने हमारी  वो पुरानी पहचान मिटा दी थी । विकाश जरूरी है मगर पुरानी सांस्क्रतिक विरासत की कीमत पर नही । अब कमलेश का चेहरा  उभर कर सामने मह्सूस होने लगा था ।एक एक कर कमलेश की  स्नेह से भरी बातें याद आने लगी थी।चाहत के वो पल मष्तिस्क के चारों ओर घूमने लगे थे ।वो कट्टी करना,औ र वो फिर से एक होना ,वो गुरु जी के पीटने पर हाथ को सहलाना,वो मेरे दिल्ली जाने की बात पर उसके चेहरे के भाव बदल जाना,ओह.... दिल रो उठा,एक टीस सी उभर गई,और अंदर से आवाज आई कमलेश...तुम कहाँ हो ।अपने आपको में कोसने लगा ।मगर अब वक्त निकल चुका था ।और वक्त लौट कर नही आ सकता । अंतर की पीड़ा को किसे बताऊं,और बता कर फायदा भी क्या ।  भ्रमित होकर मन सोच रहा था कमलेश सामने दिख जाए ,में उसे अपने बाहुपाश में लैलूं और जी भरकर उसके कंधे पर शर रख कर रोऊँ ,और   उससे माफी माँगूँ ,और कहूँ कमलेश मुझे माफ़ कर दो मैं तुम्हे समझ ना सका,अब मेरा जीवन तुम्हारे हवाले है । मगर ऐसा अब संभव नही था ,हताश मन रो उठा,पलकें जब आंसुओं का बोझ ना सह सकी तो टप टप कर गालों पर लुढ़कने लगी ।तभी आवाज आई "भाई जी" क्या हुआ बहुत देर से देख रहा हूँ।गम सुम बैठे हो । अरे आपकी आंखों में आंसू....।मैं चौंक गया, मेरी तंद्रा टूट गई,अ.. नही...तो ,शायद कुछ गिर गया है आंख में रुमाल से पोंछते हुए मैंने कहा ।सच्चे प्रेम के उभरते आवेश को  मैंने झूट के कवच से ढक लिया ।और चाय के पैसे उसे देकर वहां से बाइक पर अपने गाँव की तरफ  चल पड़ा ।
    भगवान सिंह रावत( स्वरचित)
         दिल्ली

यादों की परछाइयां (भाग 1)


 सड़क के किनारे खुले  ढाबे में बैठा ,उस स्कूल को देख रहा था । पांचवी तक का , अच्छा , सीमेंट का पक्का बना  हुआ । बच्चे बैंचों पर बैठे पढ़ रहे थे । सबने यूनिफार्म पहनी थी , टीचर उन्हें ब्लॉक बोर्ड पर लिखते हुए पढा रहह था । थोड़ी दूर पर चार दिवारी थी । उसके बाद एक पीपल का पुराना पेड़ था ,और सामने कु छ दूरी पर  जूनियर हाई स्कूल था ,और फिर इण्टर कॉलेज था । सड़क के कुछ दूर मोड़ पर पोलिटेक्निक इंसिट्यूट था ।और यहां स्कूल के सामने बड़ी सी  मार्किट खुली थी ।जो कि परचून की दुकान के अलावा रेस्टोरेंट  और इलेक्ट्रिक और बार्बर शॉप,और  साइबर कैफे वगेरह वगेरह ,ये शृंखला लगभग पूरे एक किलोमीटर से भी ज्यादा लंबी   थी । सब कूछ बदला हुआ सा लग रहा था । पूरे बीस साल बाद आया था मैं यहां,  इस लिये किसी के पहचानने का कोई मतलब नही रह जाता । यूँ तो मैं जानता था कि वक्त  की धूल दुनिया में हर किसी की पहचान पर सपनी छाप छोड  जाती है ।और वो भी बीस  साल, एक चेहरे को बदलने के लिए बहुत थे ।फिरभी दिल चाह रहा था कि कोई मुझे पहचाने ,और मैं किसी को पहचानू । लेकिन ये मेरा कोरा भ्रम था ,लेकिन जो मैं देख रहा था वह कतई भ्रम नही था । यादों की वो परछाइयां आज भी मेरे दिलो दिमाग पर  छाई हुई थी ।आज से ठीक बीस साल पहले इसी स्कूल में कुछ बच्चे एक लंबी सी दरी पर बैठ कर पढ़ रहे हैं ।मास्टर जी कुर्सी पर विराज मांन हैं ।स्कूल में दो कमरे हैं , एक छोटा कमराऔर है ।जो किचन में बदला गया है ।कुल पच्चीस तीस बच्चे हैं ।एक से पांच कक्षा तक ,सभी एक साथ बैठे हैं । एक दुसरी  दरी मास्टर साहब के दूसरी ओर बिछी है जिसपर गिनती की सात लड़कियां बैठी थी । सामने रंग से दीवार पर लिखा था " बेसिक पाठशाला "।पत्थरो की दीवार से बनी चार दिवारी के बाद एक पीपल का घना पुराना पेड था।पेड़ के  थोड़ी दूर पर चार कमरों का बना जूनियर हाई स्कूल था ।जिसके आस पास रास्ते के दूसरी तरफ एक चाय की दुकान थी,और एक दो और राशन पानी की दुकाने थी ।चारों तरफ़ घने पेड़ों की वज़ह से हरियाली थी ।स्कूल और दुकानों के एक रास्ता था जो दुसरे गाँव की तरफ़ जाता था।

" अरे बच्चों ,शोर नही " "कक्षा चार से इंद्रमणि खड़े हो जाओ 

तुम दसवां पाठ  जोर से पढ़ो , सब  विद्यार्ती ध्यान से सुनो '"।मास्टर जी के कहने पर लड़का जोर जोर से   किताब में से   अध्याय पढ़ने  लगा । सब बच्चों का ध्यान किताब पर था । मास्टर जी चहलकदमी करने लगे । बच्चों की यूनिफार्म के नाम पर कुछ नही था ,सब अपने घर के कपड़े पहन कर आये थे ।किसी बच्चे की कमीज का पल्लू लटक रहा था तो किसी ने कमीज के बटन ऊपर नीचे लगा रखे थे।मास्टर साहब का बहुत खौफ़ हुआ करता था ,इस लिए सब चुप चाप अनुशासन में रहते थे ।तभी दो बच्चे एक बाल्टी में पानी भर कर लाते नजर आए ।उन दो बच्चों ने बाल्टी में डंडा फसा कर कंधे पर  रखा हुआ था । वह पानी लेकर आये औऱ किचन के पास रख दिया । मास्टर जी बोले "अरे खेम सिंह तू किचन में काम देख ,और पवन तू आकर यहां बैठ जा " । मास्टर जी के अनुसार खेम सिंह अपने काम में लग गया । उस ज़माने में इसी तरह मास्टर के सारे काम छात्रों को करने पड़ते थे । और पवन बैठ गया । बच्चों में एक मै भी हुँ ।चुप चाप एक कोने में बैठा ,किताब में ध्यान लगाएं हुए  ",किशन " ।

दोपहर के एक बजे किसी बच्चे ने घंटी बजाई और छुट्टी की घोषणा होने पर सब बच्चे हल्ला मचाते हुये खड़े हो गये ।कुछ बच्चे स्कूल के बाएं तरफ और कुछ दांयें  अपने गांव की तरफ चल पड़े । किसन भी अपना बास्ता उठा कर चलने को हुआ,"चल किशन आजा "पास में खड़ी कमलेश बोली ।"हाँ चल" और वो दोनों स्कूल के बाईं तरफ उस पकडण्डी पर चल पड़े , जिस पर वो दोनों साथ साथ आते जाते थे ।थोड़ी दूर पर ही कमलेश का गांव था ।किशन का गांव उसके बाद पड़ता था । अगले दिन किशन आकर दरी पर चुप चाप आकर बैठ गया  । "अरे किशन खाली हाथ आया है ,लकड़ी नही लाया "खड़ा होजा"  मास्टर जी बोले "जी गुरु जी आज भूल गया "और मास्टर जी ने दंड स्वरूप दो फूटे कस कर उसके हाथ पर दे मारे ।किशन हाथ झाड़ता हुआ  पीड़ा को रोकते हुए बैठ गया ।मास्टर जी वही स्कूल में निवास करते थे ।खाना पीना वही होता था ।इसलिए सारा सामान छात्रों से जुटाया जाता था ।कोरा राशन दूध  दाल चावल नइ शब्जी वगैरा वगेरा ।एक लकडी का डंडा भी हर छात्र को लाना अनिवार्य था, मास्टर सरकारी होता था,मगर  गांव के लोग बहुत पुराने समय से श्रध्दा स्वरूप अनाज मास्टर जी के यहां दे दिया करते थे ,परन्तु अब  हर माह  ले कर आने का नियम बनाया गया था ।जिसके पालन न होने पर बच्चों को दंडित किया जाता था  । पानी थोडी दूर था तो दो लड़के बाल्टी में पानी ले आते थे । दोपहर में जब छुट्टी हुई तो घर जाते हुए किशन और कमलेश एक चीड के  घने  पेड़ के पास रुक गए ,जहां वो दोनों  अक्सर रुकते थे,वहां पर पूरा जंगल चीड के पेड़ों से ढका था ।थोड़ा सुस्ता कर फिर जाते थे । और कुछ देर बात चीत करते थे ।

" किशन ,मास्टर जी ने तुम्हे क्यों मारा "कमलेश बोली अरे वो में आज लकड़ी लाना भूल गया था ।  ओहो.....ये गुरु जी भी बहुत बुरे हैं , मुझे बताते मैं तुम्हे घर से दे देती ।कमलेश किशन के हाथ पकड़ते  बोली । "सुबह में देर  हो गई ना , तुम्हे कहां से बताता । दूसरा हाथ भी तो देखो ना वह बोला ।कमलेश हाथ झटकते बोली " धत  पागल "और दोनों हंस पड़े और दोनों घर की तरफ चल पड़े । इसी तरह की हंसी मजाक आपस मे चलती रहती थी । 

अभी स्कूल में हाफ टाइम हुआ है ।बच्चे अपना अपना खाना खा रहे है । 

"किशन , रोटी लाया है ना"कमलेश बोली ।

"हाँ चल उस पत्थर पर बैठते है " किशन बोला ।मैं तो रोटी के साथ गुड़ लाया हूँ ।तेरे पास क्या है ? "कल रात बाबा खेत से  सीताफल तोड़ कर लाये थे ।वही लाई हूं " फिर दोनों स्कूल की चार दिवारी के पास एक बड़े पत्थर पर बैठ गए और खाना खाने लगे । दोनो की उम्र नौ या दस के लग भग होगी ।दोनो का आपस मे लगाव जरूर था ।मगर दोनो झगड़ते भी थे ।कुट्टी भी होती थी । एक बार गलती से किशन की स्याही की बोतल अचानक देखेने दिखाने के चक्कर मे पट्ट से गिर गई और फ़ूट गई । अब क्या था किशन नाराज हो गया ।"पगली कहीं की ये क्या कर दिया ,अब घर जाकर दादा जी हुक्के के नैचे से पिटाई करेंगे "।अरे तू मेरी बोतल ले ले कमलेश बोली।" हट  दादा जी पूछेंगे तो क्या कहूंगा " दोनो स्कूल आगये उस दिन दोनो कुछ ना बोले  दोनो अलग ही रहे ।  कमलेश भी बिफ़र पड़ी और घर जाते हुए बोली जा तेरी मेरी कट्टी ।और दांत में नाखून फंसा कर उसकी तरफ उछालते कट्टी की रस्म पूरी की ।ये प्रक्रिया उसने दो तीन बार की ।इसी तरह कट्टी  होती थी बच्चों में ।और फिर दोनों अलग अलग हो गए ।दो तीन दिन दोनो ने आपस मे बात भी नही की ।दोनों एक दूसरे को काट खाने वाली नजरों से देखते रहे । अगले दिन मास्टर साहब कुर्सी पर बैठे हाजरी ले रहे है ।"चन्दर सिंह"एक लड़का  खड़ा होकर "उपस्थित गुरु जी"

"ज्योत सिंह"  "उपस्थित गुरु जी " दूसरा लड़का बोला ।

"उमेद सिंह" 'उपस्थित गुरु जी"

"कुंदन सिंह" "उपस्थित गुरु जी"

"किशन सिंह".........."किशन सिंह"मास्टर जी जोर से बोले ।

तभी एक लड़का खड़ा होकर बोला " गुरु जी किशन आज नही आया " क्यों नही आया  गुरु जी बोले ।

गुरु जी उसे बुखार है ।ठीक है बैठ जाओ । और मास्टर साहब और बच्चों की हाजरी लेने लगे ।

कामकेश के कानों में आवाज सुनाई दी " वह नही आया और उसे बुखार है "।पहले कमलेश ने ज्यादा ध्यान नही दिया, पर थोड़ी देर बाद वह सोंचने लगी ,क्या हुआ होगा किशन को ,क्या सचमुच उसे बुखार है ? उसके दिमाग  से कट्टी वाली बात हट गई ।उसने मास्टर जी के जाने के बाद तुरंत उस लड़के से पुछा , किशन को बुखार कैसे आ गया ? कल तो वह ठीक था । अरे कल उसका और  कर्ण सिंह का  पानी लाने का नंबर था । तो पानी से भीग गया । गीले कपड़ों में ही घर गया था । ठंड लग गई शायद लड़का बोला ।ओह..... ये बात है कमलेश के मुह से निकला ।और वह वापस आकर बैठ गई ।  अपने आप को कोसने लगी । किस समय उसने कट्टी की किशन से ।बिचारा बीमार हो गया ।अपने आप को कोसने लगी ।अगले दिन भी किशन को कमलेश की नजरें ढूंढती रही ,मगर किशन नही दिखा, उसे उत्सुकता होने लगी ।क्या इतना ज्यादा बीमार हो गया कि आज भी नही आ सका ।वह उसके साथी से पूछना चाहती थी ,मगर वह टाल गई ,पता नही क्या समझेगा ।वह कहेगा कल ही बताया था बुखार है । किसी के प्रति हमदर्दी भी दिखाना  लोगों को चुभता है । वह विषाद से भर उठी । जब तीसरे दिन वह स्कूल पहुंची तो उसकी नजर किशन की क्लास पेर पड़ी ,उसे अचानक किशन दिखा , तब वह आस्वस्त हुई ।चलो अब ठीक है ,अंतर्मन से आवाज आई ।मगर वह चुप चाप बैठा था । बीमार था ना इसलिए सुस्त है,कमलेश मानो अपने आप से कह रही थी ।जब हाफ टाइम हुआ तो कमलेश किशन के पास आई ,और कुछ सकुचाते बोली "किशन कैसी है तबियत " 

किशन ने नजर उठाकर देखा "अभी तो कुछ ठीक हूं "किशन बोला

 "बुखार तो नही है ना"कमलेश बोली ।

"रोटी खायेगा ना"

हाँ  और फिर कमलेश उसका हाथ पकड़ कर उसी जगह ले गई जहां वह रोज बैठते थे ।कमलेश अपने हाथ से उसे खिलाने लगी ।

"मगर हमारी तो कट्टी है"

"हट पागल ऐसे में कही कट्टी होती है"

"चुप चाप खा नही तो कमजोर हो जाएगा " ।और दोनो खाना  खाने लगे ।

दोपहर की छुटी के बाद जब वह उस चीड़ के घने पेड़ के पास बैठे तो । कमलेश ने पेड़ के तने पर छीली हुई जगह पर उसे दिखाया ,किशन ने देखा वहां किशन लिखा था । 

"चल अब तू भी मेरा नाम यहां पर लिख दे"

जब भी हम में से कोई अकेला होगा ना तो यहां पर बैठ कर लगेगा जैसे मेरे साथ है। पिछले दो दिन से मैं यही बैठती हूं 

तब मुझे अकेलापन नही लगता ।अपने प्रति इतनी हमदर्दी देख  कर किशन भाव व्हिभोर हो गया ,और जाने क्या हुआ,किशन रुआंसा हो गया ।कमलेश ने देखा तो बोली " ,अरे क्या हुआ"और उसको अपने  करीब खींच कर उसके कन्धे पेर हाथ से सहलाया  ।चुप हो जा, रोता क्यों है ,? वह सुबक सुबक कर रोने लगा ।बहुत देर तक कमलेश उसका कंधा  पकड़ कर चुप कराती रही । "आज से तेरी मेरी कट्टी खत्म ।दोनो खिल खिला कर  हंस पड़े और फिर दोनों घर को चल पड़े।अब दोनो की दोस्ती पहले से पक्की हो गई थी । अब स्कल आते हुए भी कमलेश किशन का इंतजार करती रहती थी,दोनो साथ साथ स्कूलआते जाते थे ।

शेष अगले भाग में.......।

                  भगवान सिंह रावत (स्वरचित)

                          दिल्ली 


Tuesday, September 13, 2022

खामोशी


 घर के आगे कुर्सी  लगाकअपने विचारों का मंथन करता  जाने कितना समय बीत गया ।पता तब चला जब पुष्पा कोअपने घर के आगे बैठे देखा। वह भी गमसुम सी बैठी थी ,उदास सा चेहरा लिए फर्श पर उंगलियों से कुछ टेढ़ी मेढ़ी आकृति बनाती चुप चाप ।

मै समझ गया जो विचारों का मंथन मेरे मन में चल रहा था वही  ध्वंद  उसके मन मे भी  चल रहा था।मैं फिर से विचारों के सैलाब में खो गया।बचपन से किशोर अवस्था मे भागती जिंदगी ।स्कूल से आते जाते ,हाथ  पकड़ कर,साथ साथ स्कूल का काम करते, साथ साथ खेलते,कभी शरारत करते कभी रूठते कभी एक दूसरे को मनाते।  एक बार पुष्पा को खेल प्रतियोगिता में  एक मैडल मिला।  सबसे पहले वह  मेरे पास आई, "राजीव देखो तो ,अच्छा है ना"वह बहुत खुश थी। मैंने भी खुशी जाहिर की।  "बहुत खुबशुरत है " । समय पंख लग कर तेजी से उड़ रहा था। कब हम दोनों ने बचपन से जवानी की दहलीज पर कदम रखे पता ही न चला।वो लोग  और हमारा परिवार अलग अलग राज्यों से थे। दिल्ली में पड़ोस में रहते थे। वो लोग राजस्थान के थे ,और में पहाड़ से था । और रिश्तेदारों  के साथ उनके पडोस में रहता था।धीरे धीरे हमारी चुल बुलाहट खामोशी मे बदल गई।हम दोनो प्रेम के अथाह सागर में  डूब चुके थे।   हमारा अमर प्रेम  शब्दों और इजहार का मोहताज नही था।   मेरे द्वारा बताई गई बातों का अनुसरण करना।और उसके द्वारा कहे गए हर निर्देश को सरआंखों पर रखना अब नियति बन गई थी।हम दोनों का प्रेम भी अजीब था  हम जानते सब कुछ थे। मगर  इजहार कभी नही किया। एक दूसरे पर जान छिडकते थे। मगर मुह से कभी कहा नही।एक खामोसी  थी  एक अहसास था। तभी एक घटना घट गई।मेरे परिवार में मेरे विवाह की बाते होने लगी।मैंने अपना निर्णय सबको बताया जब तक मेरी ट्रेनिंग पूरी नही होती मैं ये सब नही चाहता। और बाद में अपने पसंद से करूंगा, अभी तो कतई नही।गांव से ये फैसला आया शादी तुम जब चाहे तब करना अभी तो हम खोज बीन कर रहे हैं,ऐसी लड़की जो हमारी जमीन जायदाद को चला सके।जो हमारी संस्कृति की हो । हमारी परंपरा  को समझ सके।और गांव के वातावरण में पली बढ़ी हो।परिवार का ये फैसला सुन कर मैं सन्न राह गया। एक तरफ माता पिता की इच्छाओं का सैलाब था,दूसरी तरफ पुष्पा का खामोश प्रेम था।एक तरफ परिवार और समाज  की रूढ़िवादी परम्पराओं का बोझ था,तो दूसरी तरफ उन्मुक्त  प्रेम  का सपना था। मैं बहुत बड़े द्वंद्व में था।पुष्पा को कैसे बताऊं ये बात,  मगर आधिक दिनों तक ये बात छुपी न रह सकी।गॉंव से बाबू जी आये और उन्होंने वही बात मुझे बताई। बेटा तुम्हारी माँ अब काम के बोझ से टूट चुकी है। उसे कोई साथ देने वाला चाहिए। उसने जो सपने देखे हैं उसे पूरा करने का समय आ गया है।मैंने कुछ संतोष जनक जवाब नही दिया। फिर आस पड़ोस के लोग भी उनसे मिले। और बात वहां तक पहुंच ही गई। तब एक दिन पुष्पा मुझ से मिली और उसने कहा।"राजीव तुम्हारे बाबू जी आये थे ? गांव से,सुना है तुम्हारी शादी की तैयारी कर रहे हैं वो लोग" मुबारक हो । मुझ से कुछ बोलते नही बन पड़ा ।पर मैंने देखा हल्की सी मुश्कान के पीछे की पीड़ा को ।जो स्पष्ट मुखरित हो  रही थी ।"अरे नही ऐसी बात नही है, वो तो पूछने आये थे बस "

मैंने झूठ बोल दिया। "ये तो खुशी की बात है"

वह बोली और चली गई। मन मे अंधेरा छाने लगा था। तभी एक घटना और घटी,  उसके पिता का ट्रान्सफर उनके पुस्तैनी शहर  में हो गया ।और वो भी राजस्थान जाने की तैयारी करने लगे ।वो लोग कुल तीन प्राणी थे। ऐसा नही था कि वह मेरी दुविधा नही समझती थी ।वह जानती थी कि मैं अपने परिवार के फैसले से खुश नही हूँ ।मगर उसने इस बात का अपने व्यवहार पर कोई असर नही आने दिया।आज शाम की गाड़ी से वे लोग अपने शहर चले जायेंगे। मैं कुर्सी पर बैठा बैठाअपनी उधेड़बुन में लगा था। अब सब कुछ खत्म हो जाएगा। क्या हस्र होगा हमारे प्रेम का ? हम कभी मिल नही पाएंगे ?विचारों के उतार चढ़ाव अपने चरम पर थे ।पुष्पा अभी भी वहीं पर बैठी थी। मन रुंआसा हो चला था। तब मैं वहां  से उठा और अपने रूम के अंदर चला आया ।और बैठ गया ।कुछ देर बाद मैंने देखा तो मैं अवाक रह गया ।दरवाजे पर पुष्पा खड़ी थी।वह धीरे धीरे पास आई ,और बोली "राजीव हम लोग शाम को जा रहे हैं,सोचा तुमसे मिल तो लूँ "मेरे सब्र का बांध टूट गया,सारा विषाद मेरी आँखों से बूंद बनकर बहने लगा ।एक पल के लिए वह खामोश रही । फिर उसने मेरे दोनो हाथ पकड़ कर अपने हाथ मे लिए ।और बोली "राजीव,तुम इतने कमजोर  बन जाओगे ,ऐसा मैं नही समझती थी" मैं प्रश्नवाचक सा उसकी तरफ देखता रहा "हाँ राजीव इतने कमजोर न बनो ,हमारा प्रेम कोई  दुनिया की  रीत  का मोहतज नही,हमारा प्रेम दुनिया के बंधनों में बंधकर  रहने वाला नही है,हमारा प्रेमआकाश की ऊंचाइयों  से भी ऊंचा है ,और सागरकी गहराईयों  से भी गहरा है" । "हमारा प्रेम खामोर्श है ।क्या हुआ जो  हम मिल नही पाएंगे ,नदी के दो किनारे मिलते नही है ,मगर  आमने सामने तो रहते हैं ,क्या हुआ जो हमारे प्रेम को नाम नही मिला , में पुष्पा के इस नए रूप को देख कर गद गद हो उठा था ।सच कहूं तो आज ही मैंने उसके हाथों का स्पर्श किया था  उसने मेरे हाथ अपने होटों तक लेजाकेर चुम लिए । "हमारा प्रेम खामोशी का पथिक  है" "तुम्हे हमारे इस खामोश प्रेम की कसम है ,अपने मन मे किसी तरह के विषाद को जगह मत दो " और वह धीरे धीरे चली गई । मेरे मन का सारा ध्वंद साफ हो चुका था ।उसकी बातें मेरे जहन में उतर चुकी थी ।मैं ही नासमझ था । आज मुझे प्रेम का सच्चा अर्थ  समझ मे आ चुका था। मैं अपने को गौरवान्वित  महसूस कर रहा था । अंतर्मन का विषाद एक नूतन  अनुभूति में बदल गया था ।