किशन पांचवीं कक्षा में था,परिक्षये नजदीक थी ।किशन को किशन के पिता छटी कक्ष में वहां नही पढ़ाना चाहते थे,वो उसे अपने साथ दिल्ली के जाना चाहते थे। ये बात किशन के दादा जी ने उसे बताई थी । ।पांचवी के बाद सामने जूनियर हाई स्कूल में सब बच्चों को शिफ्ट होना पड़ता था । एक दिन घर आते कमलेश ने कहा "सब अगले साल से तो हमे सामने वाले नए स्कूल में जाना होगी न किशन"
"हाँ जाना तो है मगर मेरे घर वाले कहते हैं कि अब तू अगले साल से दिल्ली जाएगा पढ़ने"
क्या....….।कमलेश के मुह से निकला ।सच मे .…
"हाँ मुझे अब छटी से वहीं पढ़ना है "
कमलेश के चेहरे पर कुछ उदासी के भाव उभरे जिनको किशन भी पढ़ ना सका।क्या हुआ तू क्यों चुप चाप हो गई।"कुछ नही " कमलेश बोली । तीन चार दिन बाद परीक्षा थी ।दोनो अब भी साथ साथ आते जाते थे ।किशन छुट्टियों में गांव आने की बात करता था । और कमलेश को मिलने का वादा भी करता था ।परीक्षाएँ हुई ।रिज़ल्ट भी आया दोनो पास हो गए ।और स्कूल कि छुटियाँ पड़ गई ।आज स्कूल में इस साल का आखिरी दिन था।दोनो वापर घर की तरफ आ रहे थे।दोनो चीड के उस घने पेड़ के पास बैठ गए जहां वो रोज बैठते थे ।चीड के पेड़ से साँय सांय की हवा चल रही थी । दोनो आपस मे बातें कर रहे थे ।"किशन अब तो तू दिल्ली जाएगा तो मुझे ये पेड़ जिस पर हमने अपने नाम लिखें हैं ये रास्ते ये पकडंडियाँ ये स्कूल याद करेगा "भ्रांतिचित भाव से कमलेश बोली ।
"हाँ कम्मू मुझे ये सब बहुत याद आएंगे " उसने एक बार पेड़ पर उस जगह नजर डाली जिस पर दोनों के नाम लिखे थे ।
"अभी तो बस मुझे दिल्ली जाकर पढ़ने की बड़ी इच्छा है"
मैं खूब पढ़ना चाहता हूं बहुत बहुत । वह उत्कंठित भाव से बोला। कमलेश के चेहरे पर फिर से कुछ गमगीन से भाव उभरे ,मगर किशन तो बस शहर जाने को उत्सुक होने की वजह से कुछ भी समझ ना सका ।अपने गांव से कमलेश किशन को बहुत देर तक विषादयुक्त भाव से जाते देखती रही।
किशन अब अपने पिता जी के साथ दिल्ली आ गया ।और नए स्कूल में एड्मिसन लिया ।शहर की आबोहवा उसे इतनी भाई कि वह गांव गली स्कूल पहाड़ पकडण्डी सब भूल गया,पढ़ाई के ध्यान में वह कमलेश को भी भूल गया । बस उसे याद था तो बस अपना लक्ष्य ,उसे शीर्ष तक पहुंचना था ।गर्मी की छुट्टियों में भी वह गांव नही जा सका । ठीक दो साल बाद वह चार पांच दिनों के लिए गांव आया , पुराने दोस्तों से मिला,उसने कमलेश के बारे में पूछा तो पता चला कि वह देहरा दून में अपने किसी रिश्तेदार के यहां पढ़ने चली गई है ।उस जमाने मे संचार माध्यम के नाम पर केवल एक चीज हुआ करती थी ,चिट्ठी.....। ज्यादा हुआ तो टेलीग्राम ।चिट्ठी किशन भेज नही सकता था ,पता नही कोई क्या समझ बैठे ।बदनामी का डर अलग से । वह खिन्न हो कर राह गया । समय बीतता गया,उसका ध्यान कामलेश की तरफ से भी हट गया ।
बीच मे कई बार गांव वह गया भी मगर वह अपनी पढ़ाई और दूसरे कामो में व्यस्त रहने लगा ।
आज किशन यानी मैं पढ़ लिख कर पॉलिटेक्निक से इंजिनीयर बन गया हूँ ।और बखूबी अपने को सफल मानता हूं ।अब मेरे पास समय का इतना आभाव नही है ।चार दिन के ब्लॉक हॉलिडे के होने की वजह से गांव आया हूँ। मन के किसी कोने से एक आह्वाहन हुआ ,क्यो न पुराने स्कूल घूम कर आऊं तो बाइक उठाई और चल पड़ा ।मष्तिस्क में कुछ धुंदली यादें उभरने लगी थी ।जिसमे कमलेश का मासूम चेहरा भी था ।शायद कही कुछ पता चले या मिल भी जाये । अब सारे गांव में सड़के थी लोग पैदल भी सड़कों से ही आते जाते थे ।
वहां आकर देखा तो अचंम्भे में पड़ गया ।काफी देर तक बाइक पर ही बैठा उस स्कूल को देख रहा था ।उतर कर एक ढाबे में गया ।और चाय मंगवाई ।सब कुछ बदल गया था ।ना तो वो दुकाने थी, ना वो पुराना स्कूल,ना वो पकडण्डी,ना वहां चीड का घना पेड़,ना वो पुराने गुरु जी ।सब बदल गया था ।बीस साल कुछ कम भी तो नही होते।ना स्कूल में कोई किशन था और ना कोई कमलेश,वह स्कूल शहर के स्कूलों से किसी भी तरह उन्नीस नही था ।दो तीन दुकानों की जगह आज यहां किलोमीटर से लंबा बाजार था ।चीड के पेड़ों का वो जंगलभी अब घना नही लग रहा था आस पास की वो हरियाली और बड़े बड़े खेत भी अब दुकानों और मकानो का रूप ले चुके थे ।एक्का दुक्का पेड़ ही थे । विकाश के चक्र ने हमारी वो पुरानी पहचान मिटा दी थी । विकाश जरूरी है मगर पुरानी सांस्क्रतिक विरासत की कीमत पर नही । अब कमलेश का चेहरा उभर कर सामने मह्सूस होने लगा था ।एक एक कर कमलेश की स्नेह से भरी बातें याद आने लगी थी।चाहत के वो पल मष्तिस्क के चारों ओर घूमने लगे थे ।वो कट्टी करना,औ र वो फिर से एक होना ,वो गुरु जी के पीटने पर हाथ को सहलाना,वो मेरे दिल्ली जाने की बात पर उसके चेहरे के भाव बदल जाना,ओह.... दिल रो उठा,एक टीस सी उभर गई,और अंदर से आवाज आई कमलेश...तुम कहाँ हो ।अपने आपको में कोसने लगा ।मगर अब वक्त निकल चुका था ।और वक्त लौट कर नही आ सकता । अंतर की पीड़ा को किसे बताऊं,और बता कर फायदा भी क्या । भ्रमित होकर मन सोच रहा था कमलेश सामने दिख जाए ,में उसे अपने बाहुपाश में लैलूं और जी भरकर उसके कंधे पर शर रख कर रोऊँ ,और उससे माफी माँगूँ ,और कहूँ कमलेश मुझे माफ़ कर दो मैं तुम्हे समझ ना सका,अब मेरा जीवन तुम्हारे हवाले है । मगर ऐसा अब संभव नही था ,हताश मन रो उठा,पलकें जब आंसुओं का बोझ ना सह सकी तो टप टप कर गालों पर लुढ़कने लगी ।तभी आवाज आई "भाई जी" क्या हुआ बहुत देर से देख रहा हूँ।गम सुम बैठे हो । अरे आपकी आंखों में आंसू....।मैं चौंक गया, मेरी तंद्रा टूट गई,अ.. नही...तो ,शायद कुछ गिर गया है आंख में रुमाल से पोंछते हुए मैंने कहा ।सच्चे प्रेम के उभरते आवेश को मैंने झूट के कवच से ढक लिया ।और चाय के पैसे उसे देकर वहां से बाइक पर अपने गाँव की तरफ चल पड़ा ।
भगवान सिंह रावत( स्वरचित)
दिल्ली
Friday, September 23, 2022
यादों की परछाई ( भाग 2)
यादों की परछाइयां (भाग 1)
सड़क के किनारे खुले ढाबे में बैठा ,उस स्कूल को देख रहा था । पांचवी तक का , अच्छा , सीमेंट का पक्का बना हुआ । बच्चे बैंचों पर बैठे पढ़ रहे थे । सबने यूनिफार्म पहनी थी , टीचर उन्हें ब्लॉक बोर्ड पर लिखते हुए पढा रहह था । थोड़ी दूर पर चार दिवारी थी । उसके बाद एक पीपल का पुराना पेड़ था ,और सामने कु छ दूरी पर जूनियर हाई स्कूल था ,और फिर इण्टर कॉलेज था । सड़क के कुछ दूर मोड़ पर पोलिटेक्निक इंसिट्यूट था ।और यहां स्कूल के सामने बड़ी सी मार्किट खुली थी ।जो कि परचून की दुकान के अलावा रेस्टोरेंट और इलेक्ट्रिक और बार्बर शॉप,और साइबर कैफे वगेरह वगेरह ,ये शृंखला लगभग पूरे एक किलोमीटर से भी ज्यादा लंबी थी । सब कूछ बदला हुआ सा लग रहा था । पूरे बीस साल बाद आया था मैं यहां, इस लिये किसी के पहचानने का कोई मतलब नही रह जाता । यूँ तो मैं जानता था कि वक्त की धूल दुनिया में हर किसी की पहचान पर सपनी छाप छोड जाती है ।और वो भी बीस साल, एक चेहरे को बदलने के लिए बहुत थे ।फिरभी दिल चाह रहा था कि कोई मुझे पहचाने ,और मैं किसी को पहचानू । लेकिन ये मेरा कोरा भ्रम था ,लेकिन जो मैं देख रहा था वह कतई भ्रम नही था । यादों की वो परछाइयां आज भी मेरे दिलो दिमाग पर छाई हुई थी ।आज से ठीक बीस साल पहले इसी स्कूल में कुछ बच्चे एक लंबी सी दरी पर बैठ कर पढ़ रहे हैं ।मास्टर जी कुर्सी पर विराज मांन हैं ।स्कूल में दो कमरे हैं , एक छोटा कमराऔर है ।जो किचन में बदला गया है ।कुल पच्चीस तीस बच्चे हैं ।एक से पांच कक्षा तक ,सभी एक साथ बैठे हैं । एक दुसरी दरी मास्टर साहब के दूसरी ओर बिछी है जिसपर गिनती की सात लड़कियां बैठी थी । सामने रंग से दीवार पर लिखा था " बेसिक पाठशाला "।पत्थरो की दीवार से बनी चार दिवारी के बाद एक पीपल का घना पुराना पेड था।पेड़ के थोड़ी दूर पर चार कमरों का बना जूनियर हाई स्कूल था ।जिसके आस पास रास्ते के दूसरी तरफ एक चाय की दुकान थी,और एक दो और राशन पानी की दुकाने थी ।चारों तरफ़ घने पेड़ों की वज़ह से हरियाली थी ।स्कूल और दुकानों के एक रास्ता था जो दुसरे गाँव की तरफ़ जाता था।
" अरे बच्चों ,शोर नही " "कक्षा चार से इंद्रमणि खड़े हो जाओ
तुम दसवां पाठ जोर से पढ़ो , सब विद्यार्ती ध्यान से सुनो '"।मास्टर जी के कहने पर लड़का जोर जोर से किताब में से अध्याय पढ़ने लगा । सब बच्चों का ध्यान किताब पर था । मास्टर जी चहलकदमी करने लगे । बच्चों की यूनिफार्म के नाम पर कुछ नही था ,सब अपने घर के कपड़े पहन कर आये थे ।किसी बच्चे की कमीज का पल्लू लटक रहा था तो किसी ने कमीज के बटन ऊपर नीचे लगा रखे थे।मास्टर साहब का बहुत खौफ़ हुआ करता था ,इस लिए सब चुप चाप अनुशासन में रहते थे ।तभी दो बच्चे एक बाल्टी में पानी भर कर लाते नजर आए ।उन दो बच्चों ने बाल्टी में डंडा फसा कर कंधे पर रखा हुआ था । वह पानी लेकर आये औऱ किचन के पास रख दिया । मास्टर जी बोले "अरे खेम सिंह तू किचन में काम देख ,और पवन तू आकर यहां बैठ जा " । मास्टर जी के अनुसार खेम सिंह अपने काम में लग गया । उस ज़माने में इसी तरह मास्टर के सारे काम छात्रों को करने पड़ते थे । और पवन बैठ गया । बच्चों में एक मै भी हुँ ।चुप चाप एक कोने में बैठा ,किताब में ध्यान लगाएं हुए ",किशन " ।
दोपहर के एक बजे किसी बच्चे ने घंटी बजाई और छुट्टी की घोषणा होने पर सब बच्चे हल्ला मचाते हुये खड़े हो गये ।कुछ बच्चे स्कूल के बाएं तरफ और कुछ दांयें अपने गांव की तरफ चल पड़े । किसन भी अपना बास्ता उठा कर चलने को हुआ,"चल किशन आजा "पास में खड़ी कमलेश बोली ।"हाँ चल" और वो दोनों स्कूल के बाईं तरफ उस पकडण्डी पर चल पड़े , जिस पर वो दोनों साथ साथ आते जाते थे ।थोड़ी दूर पर ही कमलेश का गांव था ।किशन का गांव उसके बाद पड़ता था । अगले दिन किशन आकर दरी पर चुप चाप आकर बैठ गया । "अरे किशन खाली हाथ आया है ,लकड़ी नही लाया "खड़ा होजा" मास्टर जी बोले "जी गुरु जी आज भूल गया "और मास्टर जी ने दंड स्वरूप दो फूटे कस कर उसके हाथ पर दे मारे ।किशन हाथ झाड़ता हुआ पीड़ा को रोकते हुए बैठ गया ।मास्टर जी वही स्कूल में निवास करते थे ।खाना पीना वही होता था ।इसलिए सारा सामान छात्रों से जुटाया जाता था ।कोरा राशन दूध दाल चावल नइ शब्जी वगैरा वगेरा ।एक लकडी का डंडा भी हर छात्र को लाना अनिवार्य था, मास्टर सरकारी होता था,मगर गांव के लोग बहुत पुराने समय से श्रध्दा स्वरूप अनाज मास्टर जी के यहां दे दिया करते थे ,परन्तु अब हर माह ले कर आने का नियम बनाया गया था ।जिसके पालन न होने पर बच्चों को दंडित किया जाता था । पानी थोडी दूर था तो दो लड़के बाल्टी में पानी ले आते थे । दोपहर में जब छुट्टी हुई तो घर जाते हुए किशन और कमलेश एक चीड के घने पेड़ के पास रुक गए ,जहां वो दोनों अक्सर रुकते थे,वहां पर पूरा जंगल चीड के पेड़ों से ढका था ।थोड़ा सुस्ता कर फिर जाते थे । और कुछ देर बात चीत करते थे ।
" किशन ,मास्टर जी ने तुम्हे क्यों मारा "कमलेश बोली अरे वो में आज लकड़ी लाना भूल गया था । ओहो.....ये गुरु जी भी बहुत बुरे हैं , मुझे बताते मैं तुम्हे घर से दे देती ।कमलेश किशन के हाथ पकड़ते बोली । "सुबह में देर हो गई ना , तुम्हे कहां से बताता । दूसरा हाथ भी तो देखो ना वह बोला ।कमलेश हाथ झटकते बोली " धत पागल "और दोनों हंस पड़े और दोनों घर की तरफ चल पड़े । इसी तरह की हंसी मजाक आपस मे चलती रहती थी ।
अभी स्कूल में हाफ टाइम हुआ है ।बच्चे अपना अपना खाना खा रहे है ।
"किशन , रोटी लाया है ना"कमलेश बोली ।
"हाँ चल उस पत्थर पर बैठते है " किशन बोला ।मैं तो रोटी के साथ गुड़ लाया हूँ ।तेरे पास क्या है ? "कल रात बाबा खेत से सीताफल तोड़ कर लाये थे ।वही लाई हूं " फिर दोनों स्कूल की चार दिवारी के पास एक बड़े पत्थर पर बैठ गए और खाना खाने लगे । दोनो की उम्र नौ या दस के लग भग होगी ।दोनो का आपस मे लगाव जरूर था ।मगर दोनो झगड़ते भी थे ।कुट्टी भी होती थी । एक बार गलती से किशन की स्याही की बोतल अचानक देखेने दिखाने के चक्कर मे पट्ट से गिर गई और फ़ूट गई । अब क्या था किशन नाराज हो गया ।"पगली कहीं की ये क्या कर दिया ,अब घर जाकर दादा जी हुक्के के नैचे से पिटाई करेंगे "।अरे तू मेरी बोतल ले ले कमलेश बोली।" हट दादा जी पूछेंगे तो क्या कहूंगा " दोनो स्कूल आगये उस दिन दोनो कुछ ना बोले दोनो अलग ही रहे । कमलेश भी बिफ़र पड़ी और घर जाते हुए बोली जा तेरी मेरी कट्टी ।और दांत में नाखून फंसा कर उसकी तरफ उछालते कट्टी की रस्म पूरी की ।ये प्रक्रिया उसने दो तीन बार की ।इसी तरह कट्टी होती थी बच्चों में ।और फिर दोनों अलग अलग हो गए ।दो तीन दिन दोनो ने आपस मे बात भी नही की ।दोनों एक दूसरे को काट खाने वाली नजरों से देखते रहे । अगले दिन मास्टर साहब कुर्सी पर बैठे हाजरी ले रहे है ।"चन्दर सिंह"एक लड़का खड़ा होकर "उपस्थित गुरु जी"
"ज्योत सिंह" "उपस्थित गुरु जी " दूसरा लड़का बोला ।
"उमेद सिंह" 'उपस्थित गुरु जी"
"कुंदन सिंह" "उपस्थित गुरु जी"
"किशन सिंह".........."किशन सिंह"मास्टर जी जोर से बोले ।
तभी एक लड़का खड़ा होकर बोला " गुरु जी किशन आज नही आया " क्यों नही आया गुरु जी बोले ।
गुरु जी उसे बुखार है ।ठीक है बैठ जाओ । और मास्टर साहब और बच्चों की हाजरी लेने लगे ।
कामकेश के कानों में आवाज सुनाई दी " वह नही आया और उसे बुखार है "।पहले कमलेश ने ज्यादा ध्यान नही दिया, पर थोड़ी देर बाद वह सोंचने लगी ,क्या हुआ होगा किशन को ,क्या सचमुच उसे बुखार है ? उसके दिमाग से कट्टी वाली बात हट गई ।उसने मास्टर जी के जाने के बाद तुरंत उस लड़के से पुछा , किशन को बुखार कैसे आ गया ? कल तो वह ठीक था । अरे कल उसका और कर्ण सिंह का पानी लाने का नंबर था । तो पानी से भीग गया । गीले कपड़ों में ही घर गया था । ठंड लग गई शायद लड़का बोला ।ओह..... ये बात है कमलेश के मुह से निकला ।और वह वापस आकर बैठ गई । अपने आप को कोसने लगी । किस समय उसने कट्टी की किशन से ।बिचारा बीमार हो गया ।अपने आप को कोसने लगी ।अगले दिन भी किशन को कमलेश की नजरें ढूंढती रही ,मगर किशन नही दिखा, उसे उत्सुकता होने लगी ।क्या इतना ज्यादा बीमार हो गया कि आज भी नही आ सका ।वह उसके साथी से पूछना चाहती थी ,मगर वह टाल गई ,पता नही क्या समझेगा ।वह कहेगा कल ही बताया था बुखार है । किसी के प्रति हमदर्दी भी दिखाना लोगों को चुभता है । वह विषाद से भर उठी । जब तीसरे दिन वह स्कूल पहुंची तो उसकी नजर किशन की क्लास पेर पड़ी ,उसे अचानक किशन दिखा , तब वह आस्वस्त हुई ।चलो अब ठीक है ,अंतर्मन से आवाज आई ।मगर वह चुप चाप बैठा था । बीमार था ना इसलिए सुस्त है,कमलेश मानो अपने आप से कह रही थी ।जब हाफ टाइम हुआ तो कमलेश किशन के पास आई ,और कुछ सकुचाते बोली "किशन कैसी है तबियत "
किशन ने नजर उठाकर देखा "अभी तो कुछ ठीक हूं "किशन बोला
"बुखार तो नही है ना"कमलेश बोली ।
"रोटी खायेगा ना"
हाँ और फिर कमलेश उसका हाथ पकड़ कर उसी जगह ले गई जहां वह रोज बैठते थे ।कमलेश अपने हाथ से उसे खिलाने लगी ।
"मगर हमारी तो कट्टी है"
"हट पागल ऐसे में कही कट्टी होती है"
"चुप चाप खा नही तो कमजोर हो जाएगा " ।और दोनो खाना खाने लगे ।
दोपहर की छुटी के बाद जब वह उस चीड़ के घने पेड़ के पास बैठे तो । कमलेश ने पेड़ के तने पर छीली हुई जगह पर उसे दिखाया ,किशन ने देखा वहां किशन लिखा था ।
"चल अब तू भी मेरा नाम यहां पर लिख दे"
जब भी हम में से कोई अकेला होगा ना तो यहां पर बैठ कर लगेगा जैसे मेरे साथ है। पिछले दो दिन से मैं यही बैठती हूं
तब मुझे अकेलापन नही लगता ।अपने प्रति इतनी हमदर्दी देख कर किशन भाव व्हिभोर हो गया ,और जाने क्या हुआ,किशन रुआंसा हो गया ।कमलेश ने देखा तो बोली " ,अरे क्या हुआ"और उसको अपने करीब खींच कर उसके कन्धे पेर हाथ से सहलाया ।चुप हो जा, रोता क्यों है ,? वह सुबक सुबक कर रोने लगा ।बहुत देर तक कमलेश उसका कंधा पकड़ कर चुप कराती रही । "आज से तेरी मेरी कट्टी खत्म ।दोनो खिल खिला कर हंस पड़े और फिर दोनों घर को चल पड़े।अब दोनो की दोस्ती पहले से पक्की हो गई थी । अब स्कल आते हुए भी कमलेश किशन का इंतजार करती रहती थी,दोनो साथ साथ स्कूलआते जाते थे ।
शेष अगले भाग में.......।
भगवान सिंह रावत (स्वरचित)
दिल्ली
Tuesday, September 13, 2022
खामोशी
घर के आगे कुर्सी लगाकअपने विचारों का मंथन करता जाने कितना समय बीत गया ।पता तब चला जब पुष्पा कोअपने घर के आगे बैठे देखा। वह भी गमसुम सी बैठी थी ,उदास सा चेहरा लिए फर्श पर उंगलियों से कुछ टेढ़ी मेढ़ी आकृति बनाती चुप चाप ।
मै समझ गया जो विचारों का मंथन मेरे मन में चल रहा था वही ध्वंद उसके मन मे भी चल रहा था।मैं फिर से विचारों के सैलाब में खो गया।बचपन से किशोर अवस्था मे भागती जिंदगी ।स्कूल से आते जाते ,हाथ पकड़ कर,साथ साथ स्कूल का काम करते, साथ साथ खेलते,कभी शरारत करते कभी रूठते कभी एक दूसरे को मनाते। एक बार पुष्पा को खेल प्रतियोगिता में एक मैडल मिला। सबसे पहले वह मेरे पास आई, "राजीव देखो तो ,अच्छा है ना"वह बहुत खुश थी। मैंने भी खुशी जाहिर की। "बहुत खुबशुरत है " । समय पंख लग कर तेजी से उड़ रहा था। कब हम दोनों ने बचपन से जवानी की दहलीज पर कदम रखे पता ही न चला।वो लोग और हमारा परिवार अलग अलग राज्यों से थे। दिल्ली में पड़ोस में रहते थे। वो लोग राजस्थान के थे ,और में पहाड़ से था । और रिश्तेदारों के साथ उनके पडोस में रहता था।धीरे धीरे हमारी चुल बुलाहट खामोशी मे बदल गई।हम दोनो प्रेम के अथाह सागर में डूब चुके थे। हमारा अमर प्रेम शब्दों और इजहार का मोहताज नही था। मेरे द्वारा बताई गई बातों का अनुसरण करना।और उसके द्वारा कहे गए हर निर्देश को सरआंखों पर रखना अब नियति बन गई थी।हम दोनों का प्रेम भी अजीब था हम जानते सब कुछ थे। मगर इजहार कभी नही किया। एक दूसरे पर जान छिडकते थे। मगर मुह से कभी कहा नही।एक खामोसी थी एक अहसास था। तभी एक घटना घट गई।मेरे परिवार में मेरे विवाह की बाते होने लगी।मैंने अपना निर्णय सबको बताया जब तक मेरी ट्रेनिंग पूरी नही होती मैं ये सब नही चाहता। और बाद में अपने पसंद से करूंगा, अभी तो कतई नही।गांव से ये फैसला आया शादी तुम जब चाहे तब करना अभी तो हम खोज बीन कर रहे हैं,ऐसी लड़की जो हमारी जमीन जायदाद को चला सके।जो हमारी संस्कृति की हो । हमारी परंपरा को समझ सके।और गांव के वातावरण में पली बढ़ी हो।परिवार का ये फैसला सुन कर मैं सन्न राह गया। एक तरफ माता पिता की इच्छाओं का सैलाब था,दूसरी तरफ पुष्पा का खामोश प्रेम था।एक तरफ परिवार और समाज की रूढ़िवादी परम्पराओं का बोझ था,तो दूसरी तरफ उन्मुक्त प्रेम का सपना था। मैं बहुत बड़े द्वंद्व में था।पुष्पा को कैसे बताऊं ये बात, मगर आधिक दिनों तक ये बात छुपी न रह सकी।गॉंव से बाबू जी आये और उन्होंने वही बात मुझे बताई। बेटा तुम्हारी माँ अब काम के बोझ से टूट चुकी है। उसे कोई साथ देने वाला चाहिए। उसने जो सपने देखे हैं उसे पूरा करने का समय आ गया है।मैंने कुछ संतोष जनक जवाब नही दिया। फिर आस पड़ोस के लोग भी उनसे मिले। और बात वहां तक पहुंच ही गई। तब एक दिन पुष्पा मुझ से मिली और उसने कहा।"राजीव तुम्हारे बाबू जी आये थे ? गांव से,सुना है तुम्हारी शादी की तैयारी कर रहे हैं वो लोग" मुबारक हो । मुझ से कुछ बोलते नही बन पड़ा ।पर मैंने देखा हल्की सी मुश्कान के पीछे की पीड़ा को ।जो स्पष्ट मुखरित हो रही थी ।"अरे नही ऐसी बात नही है, वो तो पूछने आये थे बस "
मैंने झूठ बोल दिया। "ये तो खुशी की बात है"
वह बोली और चली गई। मन मे अंधेरा छाने लगा था। तभी एक घटना और घटी, उसके पिता का ट्रान्सफर उनके पुस्तैनी शहर में हो गया ।और वो भी राजस्थान जाने की तैयारी करने लगे ।वो लोग कुल तीन प्राणी थे। ऐसा नही था कि वह मेरी दुविधा नही समझती थी ।वह जानती थी कि मैं अपने परिवार के फैसले से खुश नही हूँ ।मगर उसने इस बात का अपने व्यवहार पर कोई असर नही आने दिया।आज शाम की गाड़ी से वे लोग अपने शहर चले जायेंगे। मैं कुर्सी पर बैठा बैठाअपनी उधेड़बुन में लगा था। अब सब कुछ खत्म हो जाएगा। क्या हस्र होगा हमारे प्रेम का ? हम कभी मिल नही पाएंगे ?विचारों के उतार चढ़ाव अपने चरम पर थे ।पुष्पा अभी भी वहीं पर बैठी थी। मन रुंआसा हो चला था। तब मैं वहां से उठा और अपने रूम के अंदर चला आया ।और बैठ गया ।कुछ देर बाद मैंने देखा तो मैं अवाक रह गया ।दरवाजे पर पुष्पा खड़ी थी।वह धीरे धीरे पास आई ,और बोली "राजीव हम लोग शाम को जा रहे हैं,सोचा तुमसे मिल तो लूँ "मेरे सब्र का बांध टूट गया,सारा विषाद मेरी आँखों से बूंद बनकर बहने लगा ।एक पल के लिए वह खामोश रही । फिर उसने मेरे दोनो हाथ पकड़ कर अपने हाथ मे लिए ।और बोली "राजीव,तुम इतने कमजोर बन जाओगे ,ऐसा मैं नही समझती थी" मैं प्रश्नवाचक सा उसकी तरफ देखता रहा "हाँ राजीव इतने कमजोर न बनो ,हमारा प्रेम कोई दुनिया की रीत का मोहतज नही,हमारा प्रेम दुनिया के बंधनों में बंधकर रहने वाला नही है,हमारा प्रेमआकाश की ऊंचाइयों से भी ऊंचा है ,और सागरकी गहराईयों से भी गहरा है" । "हमारा प्रेम खामोर्श है ।क्या हुआ जो हम मिल नही पाएंगे ,नदी के दो किनारे मिलते नही है ,मगर आमने सामने तो रहते हैं ,क्या हुआ जो हमारे प्रेम को नाम नही मिला , में पुष्पा के इस नए रूप को देख कर गद गद हो उठा था ।सच कहूं तो आज ही मैंने उसके हाथों का स्पर्श किया था उसने मेरे हाथ अपने होटों तक लेजाकेर चुम लिए । "हमारा प्रेम खामोशी का पथिक है" "तुम्हे हमारे इस खामोश प्रेम की कसम है ,अपने मन मे किसी तरह के विषाद को जगह मत दो " और वह धीरे धीरे चली गई । मेरे मन का सारा ध्वंद साफ हो चुका था ।उसकी बातें मेरे जहन में उतर चुकी थी ।मैं ही नासमझ था । आज मुझे प्रेम का सच्चा अर्थ समझ मे आ चुका था। मैं अपने को गौरवान्वित महसूस कर रहा था । अंतर्मन का विषाद एक नूतन अनुभूति में बदल गया था ।
Saturday, August 27, 2022
ईश्क के नाम पर
खटाक.....खटाक......खटाक.....…। की आवाज से से आस पास की निस्तब्धता भंग हो रही थी ।रुक्मी के हाथ उस बड़े से घण पर मजबूती से जकड़े थे ।वह घुमा घुमा कर घण लोहे की पटिया पर रखे लोहे के टुकड़े पर मार रही थी ।घण लोहे का आकार बदलने में मशगूल था ।सामने सफ़ेद और काली लंबी मूछों वाला अधेड़ उम्र का घासी राम संडासी से उस लोहे के टुकड़े को पकड़े था ।घासी राम रुक्मी का बाप था। ।घासी राम बारबार उस लौहे को भट्टि मे रख देता और फिर उसे संडासी से पकड़ कर रुकमी को घण चलाने को कहता था। काफी देर बाद घासी राम बोला " बस.. बस.. अब हो गया छोरी ,थोड़ी देर सुस्ता ले " तब रुकमी पास पड़े खटोले पर बैठ गई।
जरा सी देर बैठी होगी कि उसे कहीं से बारात के बाजों का स्वर सुनाई पड़ा ।उसने देखा,दूर पुराने खंडहर की तरफ से एक बारात चढ़ी चली आ रही थी ।वह ध्यान से देखने लगी। बारात नजदीक आती जा रही थी ।बारात सामने आ चूकी थी ।कुछ लोग बैंड बाजे की धुन पर नाच रहे थे ।तभी उसका माथा ठनका , ये तो वही है मदन... हाँ मदन हीँ तो है ,जो नाच रहा है ।तो घोड़ी पर चढ़ा ये कौन होगा ? तभी उसने घोड़ी पर बैठे दूल्हे को देखा, जो शेहरे के वजह से दिखाई नही पड़ रहा था ।तभी किसी ने दूल्हे से कुछ कहा, तो चेहरा स्पस्ट दिख गया ।
ओह ...तो ये धीरज है,रुकमी सब समझ गई । उसकी आँखों मे यका यक क्रोध फूट पड़ा ,उसके हाथों की पकड़ घण के हत्थे पर और मजबूत होने लगी थी । मगर बदनामी के डर से वह खामोश रही । रुक्मी की आंखों में वह सपना अचानक तैर गया ,जो उसने अंजाने में देख लिया था ।अठारह बरस की रुक्मी थोड़े पक्के रंग की जरूर थी,मगर उसका चेहरा देखने मे बहुत आकर्षक था ।शरीर भी योवन की दहलीज पर आकर सुडौल हो चुका था,मुस्कुराती तो लगता मोती बिखर गए हों ।उन लोहारों की तीन गाड़ियां सड़क के किनारे लगी थी ।तीन गाड़ियां मतलाब तीन परिवार ।रुक्मी अपने बाबा घासी राम और अम्मा भूरी देवी के साथ रहती थी एक छोटा भाई भी था ।जो अभी छोटा था ।पास में ही एक कस्बा था ।जहां बड़े बड़े मकान थे । और थोड़ी दूर पर एक स्कूल था जो कि एक खंडहर जैसा हो चला था ।शायद कभी यहां बच्चे पढ़ने आते होंगे , मगर अब सिर्फकुछ दीवारें कुछ बेंच और कुछ लोहे की चद्दरें बची थी । खंडहर के पास एक कोयले की दुकान थी । जहां कभी कभी रुक्मी कोयला लेने जाया करती थी ।
उस दिन रुकमी कोयला ले कर वापस आ रही थी,सामने ही एक अच्छी कदकाठी का युवक खड़ा था ।बोला "अरे तुम वही लोहार हो न जो आगे मोड़ पर रहते हो "? "हाँ मैं वहीं रहती हूँ" रुक्मी बोली , तभी कहूँ कहां देखा है तुम्हे ? "एक बार आया था मैं वहां" ,वह युवक गोरा चिट्टा खूब सूरत था ।रुक्मी रुकी और बोली "क्या काम है आपणे" "नही काम कुछ नही है ऐसे ही पूछ लिया,गलत मत समझना " वह बोला ।रुकमी को वह युवक भला दिखा ।जाने क्या था जो उसे बात करने पर मजबूर कर रहा था ।"क्या नाम है तुम्हारा "उसने पूछा । रुकमी ...वह बोली । "बड़ी मेहनत करते हो तुम लोग" "लोहे से दिन रात खेलना मजाक नही" वह बोला ।मेरा नाम धीरज हैं ,सामने बस्ती मे रहता हूँ । काँई करे साहिब मजबूरी है ,खानदानी काम है । समझ सकता हूँ ,बड़ा दर्द है आप लोगों की जिंदगी में ।रुकमी को लगा ये कोई भला मानुष है । और दोचार इधर उधर की बाते हुई ।"चालूं साहिब ,घणा काम पीटणा है "। रुकमी बोली ।और वापस अपने खेमे में आ गई ।
धीरज का चेहरा उसके दिमाग से नही हट रहा था ।ऐसे लोग कहाँ मिलते हैं आज के समय में ।इसी उधेड़ बुन में वह सो गई । तीन दिन बाद रुक्मी उसी रास्ते बस्ती में किसी के ऑर्डर पर बनाये औजार देने गई । तभी उसे एक आवाज सुनाई पड़ी,रुक्मी ....रुको,संयोग वश वह धीरज था ।वह मुश्करा दी ।"अरे साहिब आप " हाँ ,कब से आवाज दे रहा हूँ । "यहां कैसे" "सामान देने आई थी किसी का " रुकमी बोली ।अच्छा ..अच्छा..।और वह सामने बागीचे में लकड़ी के बेंच पर बैठ गया ।रुकमी भी एक तरफ बैठ गई ।"मुश्कराती हो तो फूल झरते है "धीरज बोला ।"क्या अजाक करते हो साहिब""
"मैं सच बोल रहा हूँ ये झूट नही है"रुक्मी को मानो विश्वास होने लगा था ,वह फिर मुश्करा दी ।"कितनी सुंदर हो तुम,बला की खूबसूरत"धीरज बोला ।रुक्मी लाज से भर उठी,उसने नजर झुका ली । जाने क्या हो गया था उसे, ऐसा तो उसे कभी महसूस नही हुआ था ।एक अजीब तरह के अहसास की अनुभूति हो रही थी ।बात करने को कुछ मिल ही नही रहा था,बड़ी मशक्कत से उसने कुछ शब्दों को इकट्ठा कर कहा"क्या साहिब हम लोग तो गरीब हैं "।"हम कहाँ हैं
सुंदर तो आप हैं " "अच्छा में तुम्हे अछा लगता हूँ "?धीरज ने कहा । हाँ हाँ आप अच्छे हो साहिब ।आगे रुक्मी कुछ कह ना पाई और एक बार धीरज की तरफ देखा,वह धीरज की नजरों का सामना नही कर सकी और हथेली से मुह छिपा लिया ।तुमने कभी अपने आप को सीसे मे देखा है ?धीरज बोला तुम बहुत सुंदर हो । मुझे तो तुम दिल से खूबसूरत लगती हो ।रुक्मी ने अपने चेहरे से हथेली हटाई ,उसका चेहरा लाज से लाल हो गया था ।उसने बड़ी हिम्मत जुटाकर धीरज की तरफ मुस्कुराते हुए देखा ।और उठकर बोली" चालूं साहिब' और जल्दी जल्दी चल पड़ी ।
उस रात रुकमी को बहुत देर तक नींद नही आई, वह बार बार उठ कर सीसे मै अपना अक्श देखती फिर सरमा जाती और धीरज की बाते उसे याद आती ।उसे धीरज अच्छा लगा था ।उसने एक ही रात में जाने कितने सपने देख डाले थे ।अब उसे धीरज से अगले दिन मिलने की उत्सुकता होने लगी थी ।वह अक्सर सुनती ही रहती थी ,फलां लड़की को फलां लड़के से प्यार हो गया। ।वह उसे अपना दिल दे बैठी । वह लड़का किसी के प्यार में दीवाना हो गया ,वगेरा,वगेरा....।
अगले दिन वह साफ से कपड़े पहन कर शामको कोयले के लिए बाजार गई ।अपनी लोहारी पोशाक घागरा चोली और एक दुपट्टा पहन कर वह बहुत सुंदर दिख रही थी ।रुक्मी सोच रही थी क्या बात करेगी धीरज से ?कहीं आज तो शर्म के मारे फिर से मुह तो नही ढकेगी ?कुछ भी हो आज तो खुल के बात करेगी वह धीरज से और शर्माएगी तो बिल्कुल भी नही ।आपनी बातो की श्रृंखला को आपस मे जोड़ती रुक्मी दुकान से कोयला खरीद कर वापस हुई ,दस कदम ही चली थी कि किसी ने उसके कंधे पर हल्का हाथ रखा ।वह चौंकी ...कौन ? तभी उसे धीरज का मुस्कुराता चेहरा दिखा ।"अरे साहिब आप "? वह मुड़ी और रुक गई । हल्का अंधेरा छा गया था । "आओ चलो वहां बैठते हैं "धीरज रुकमी का हाथ पकड़ कर उस पुराने स्कूल की तरफ इशारा करते बोला । रुकमी सहज ही उसके साथ चल पड़ी ।जैसे वह इस बात का इंतजार ही कर रही हो ।दोनो बेंच पर बैठ गए ।पहली बार इस उम्र में किसी पराये के हाथों का स्पर्श अपने हाथों पर पा कर वह अजीब सी अनुभूति महसूस करने लगी ।अपने शरीर मे उसे तरंगें सी महसूस होने लगी ।"रुकमी मैं तुम्हे दिल से चाहने लगा हूँ ,तुम्हे अपनाना चाहता हूं " "तुम्हारे बगैर कुछ अच्छा नही लगता "।धीरज बोला "कैसी बात करो हो साहिब,हम ठहरे लोहार,और आप अच्छे घर के पढ़े लिखे लोग,ऐसा कैसे हो जाएगा बोलो तो"रुक्मी बोली । तभी धीरज ने रुक्मी का हाथ पकड़ कर आपने हाथ मे ले कर कहा "हम दोनो चाहेंगे तो क्यों नही होगा " ? उसने रुक्मी का हाथ चूम लिया ।रुकमी के शरीर मे एक सिहरन सी दौड़ गई । साहिब....और उसने अपना शर धीरज के कंधे पर टिका दिया ।बहुत देर तक खामोशी छाई रही । "साहिब क्या तुम मुझे अपनाओगे ?, ब्याह करोगे मुझ से" रुक्मी बोली ।"हाँ हाँ ये भी कोई कहने की बात है "धीरज बोला ।"देखलो सहिब मेरी बिरादरी वालों को खबर पड़ी तो बहुत बवाल हो जावेगा ,मेरा बाबा बहुत कैड़ा है " रुक्मी बोली ।"अरे तुम घबराओ नही तुम मुझे परसों यही मिलो कोई न कोई रास्ता निकल जाएग"धीरज बोला ।फिर एक बार उसने रुकमी का हाथ फिर से चूमा।रुकमी ने भी उसके हाथ को पकड़ कर कस दिया । मानो उसने भी प्यार का इज़हार कर दिया हो ,थोड़ी देर इधर उधर की बाते हुई औऱ फिर दोनों उठ कर अपने रास्तें की तरफ चल पड़े ।
रुकमी घर आकर एक अजीब अहसास का अनुभव कर रही थी ।बार बार उसे धीरज के स्पर्श का अहसास हो रहा था ।और वह रोमांचित हो रही थी । वह सपनों की दुनिया मे कुलांचे भर रही थी ।तभी उसे अपने बाबा घासी राम का चेहरा सामने दिखता तो वह सिहर उठती ।धीरज कोई न कोई रास्ता जरूर निकाल लेगा ।वह मुझे बहुत प्यार जो करता है।पर वह रास्ता क्या होगा ? कहीं अगर कोई बात ना बनी तो मैं तो कही की ना रहूंगी ।कैसे जिऊंगी में अपने साहिब के बगैर ।नहीं नही सब ठीक ही होगा । बनते बिगड़ते विचारों के बीहड़ में रुक्मी रात भर भटकती रही । और कब उसकी आंख लगी उसे पता ही ना चला ।अगला दिन किसी तरह बीत गया,रुक्मी बेसब्री से कल का इंतजार कर रही थी ।धीरज से मिलने के लिए ,और बात करने के लिए वह बेताब हो रही थी ।
और फिर अगला दिन आ ही गया ।हमेशा की तरह उसने थैला उठाया और चल पड़ी ।धीरज पहले से ही उसके इंतजार में टहल रहा था ।रुक्मी उसे देखते ही मुश्करा दी । धीरज ने रुकमि का हाथ पकड़ाऔर दोनों खंडहर के अंदर एक पुराने बेंच पर बैठ गए । " यहां हमे कोई नही देखेगा अपने मन की बात आराम से कर सकते हैं
रुक्मी...धीरज बोला । " ये दो दिन कैसे बीते हैं ,मैं तुम्हे बता नही सकता" ।रुकमी कैसे बताती कि उसने भी ये विरह का वक्त कैसे गुजारा है ,कैसे कैसे एक एक पल कितने भारी लगे। साहिब.... "अब हमें भी आपसे दूर रहना कहाँ अच्छा लगता है"। और वह धीरज के पास सरक कर उससे सट गई ।धीरज ने भी उसे हाथ से आपनी तरफ सटा लिया ।" साहिब क्या जादू कर दिया है आपने "? बस यूं ही आप के पास बैठे रहने को मन करता है । " साहिब....आप हमारे बाबा से जल्दी बात कीजिये ना ,अब हम आपसे दूर नही रह सकते " रुक्मी बोली ।धीरज बोला "हाँ रुक्मी मैं भी कहाँ तुमसे अलग रह पाऊंगा "और हाथ से रुकमी का बाजू पकड़ कर अपने से कस कर सटा लिया । दोनो प्यार की उड़ान भरने लगे ।अंधेरा उजाले को अपने आगोश में लेने को आतुर था ।हल्की ठंडी बयार चल रही थी ।
" तुम्हारे बाबा से बात तो मैं कर लूंगा रुक्मी ,पर मैंने देखा है तेरे बाबा को ,बात नही बनेगी " धीरज बोला ।" तब क्या होगा साहिब " रुकमी बोली ।"कुछ और सोचना पड़ेगा "धीरज ने कहा ।"एक ही रास्ता है,हमे यहां से भागना पड़ेगा, कहीं दूर जाकर हम अपनी दुनिया सुरु करेगे "धीरज ने कहा ।
"क्या कह रहे हो साहिब "रुक्मी चौंकते हुए बोली । "मैं ऐसा कोनी कर सकूं साहिब ,अम्मा बाबा को छोड़ के ना रह सकूँ ,एक बार बाबा से बात तो कर लो "रुक्मी बोली " । "नही रुकमी तुम्हे हमारे प्यार की खातिर ये करना पड़ेगा " ,धीरज ने उसे अपने से कस लिया । रुकमी और धीरज इस तरह आलिंगनबद्ध थे कि एक दूसरे की सांसें स्पस्ट सुनाई पड़ रही थी ।
"फिर हमारा और तुम्हारा प्यार एक मिशाल बन जायेगा "धीरज रुक्मी की तरफ उस पर झुकने लगा ।रुकमी भी भावभेष में बहने लगी ।और बहती चली गई ।उसे होश तब आया जब धीरज प्यार के नाम पर मर्यादा को लांघने की तीव्र कोशिश में था ।उसने अपने कपडों में उलझें धीरज के हाथ अलग किये ।"क्या कर रहे हो सहिब ,ये सब ठीक नही "रुक्मिणी ने कहा और अलग खड़ी हो गई । धीरज फिर उसके पास आया और बोला "रुक्मी....समझने की कोशिश करो मैं तुम्हारे बिना नही रह सकता , तुम्हारे शरीर की मुझे जरूरत है ।और रुक्मी का हाथ पकड़ कर आपनी तरफ खींच लिया ।और अपने बाहुपाश में ले लिया,अबकी बार उसकी पकड़ ज़्यादा मजबूत थी ।
रुक्मी अब सब समझ चुकी थी । उसने अपना सारा जोर लगा कर एक झटका दिया और अलग हो कर एक जोर का धक्का धीरज को दिया । धीरज बड़ी जोर से नीचे गिरा ,और उठ ना सका । वह जोर से बोली "साहिब ये हाथ लोहे को रोज नई शक्ल में ढालते है , पीढियां बीत गई है लोहे से लड़ते लड़ते ,तुम जैसे ढोंगियों औऱ फरेबियों की क्या मजाल,जो इश्क के नाम पर घिनोना काम करते हो ,किसी के जज्बात से खेल कर इज्जत इज्जत का सौदा करते हो " और जमींन पर गिरे हुए धीरज को उसने एक ठोकर पैर सेऔर मार दी।
वह कराह उठा । अब वह सब समझ चुकी थी क्यों साहिब बाबा से बात नही करना चाहता था । रुक्मी उसे लांघती हुई जाने लगी ।तभी सामने एक और युवक खड़ा था । "मेरा नांम मदन है, मैं धीरज का दोस्त हूँ " धीरज को गिरा कर तू चली कैसे जाएगी मेरे रहते" ये कह कर मदन उसका हाथ पकडने लगा । तभी एक जोर की आवाज हुई "चटाक" और रुक्मी का चांटा गाल पर पडते ही मदन चक्कर घिन्नी खाता जमीन पर गिरा ।
"ऐसी वैसी समझ लिया था क्या " ? "लोहार की बेटी हूं ,पीढियां गुजर गई है हमारी लोहा पीटते पीटते "और उसके ऊपर से लांघते रुकमी आगे बढ़ गई । दिल लगाने की क्या सजा मिली थी उसे ? क्या यही होता है प्रेम का हश्र ? कितना बड़ा धोखा किया था साहिब ने उसके साथ ?उसकी सांसे तेजी से चलने लगी थी । क्या क्या सपने देख डाले थे उसने ? उसकी आंखोंमें आंसू आ गए । उन आंसुओं में कभी दुख झलकता था तो कभी क्रोध ।उसकी मां भूरी देवी ने बचपन मे ऐसी ऐसी कहानीयां सुनाई थी कि जो प्रेम को एक नया आयाम देती थी । प्रेमी के लिए जान पर खेलने वाले पात्र का इतना घिनौना स्वरूप , वह जितना सोचती उतना ही सवालों के घेरे में फंस जाती ।
रुक्मी......ओ रुक्मी.......तभी उसे आपने बाबा घासी राम की आवाज सुनाई पड़ी ।अरे छोरी .....काँई होगो नींद आ गई क्या ? रुक्मी की तंद्रा टूटी उसने देखा बारात बहुत दूर जा चुकी थी ।सिर्फ बैंड बाजों की आवाज कानो में गूंज रही थी ।नींद आगी के छोरी......।घासी राम बोला । ना तो बाबा ,नींद से जाग गई हूं ।चल बजा इस पर घण घासी राम ने चिमटी से पकड़े लोहे के टुकड़े को पटिया पर रखा ।रुकमि ने घण उठाया और खटाक.....खटाक......पूरा जोर लगा कर पटिया पर चलाने लगी । उसके हाथों में बला का जोर आ गया था । अरे छोरी .....।घणी जोर से पीट री हैं ।इत्ता जोर काइयाँ आ गियो । रुक्मी उसी तरह द्रुत गति से घण चला रही थी ।रुकमि के सिवा कोई नहीं जानता था कि ये जोर है या गुस्सा है ।
Saturday, July 30, 2022
कैसा ये रंग है
कैसा ये रंग है
जीवन के मूल्यों का ये कैसा रंग है
शब्दों से जख्म मिले कैसी ये जंग है।
अपने बेगानों मे नफरत का मंजर है
भेद भरी बातों में कटुता का खंजर है
अंतर की पीड़ा को कब कोई जाना है
कर्कश है वाणी और स्वभाव जर्जर है
तीखे प्रहारों का अपना ही ढंग है
जीवन के मूल्यों का कैसा ये रंग है।
असहाय जीवन बोझ होजाता है
सामर्थ्य का भी स्वार्थ से नाता है
पार कोई कैसे भंवर से निकले
पथ कोई और नजर नाहीआता है
सक्षमता पूरी है पर राहें तंग है
जीवन के मूल्यों का कैसा ये रंग है।
दुविधा के जंगल मे ये कैसी रीत है
वैभव और माया में उलझ गई प्रीत है
सपनो का टूटना टूटकर बिखरना
क्या माने जीवन की हार है या जीत है
कामनाएं हताश हैं उम्मीदें दंग हैं
जीवन के मूल्यों का कैसा ये रंग है।
अपना पुरुषार्थ और अपनी ही भाषा हो
कर्म के हाथों में छोटी सी आशा हो
एक टुकड़ा धूप का अंजुली भर छांव हो
एक मुट्ठी आसमां इतनी अभिलाषा हो
जीवन के गीत का ये नूतन प्रसंग है ।
जीवन के मूल्यों का ये कैसा रंग है
शब्दों से जख्म मिले कैसी ये जंग है।
भगवान सिंह रावत (स्वरचित)
Monday, June 6, 2022
पहचान
पहचान
मायूस न हो अपनी पहचान को लेकर
खामोशी की भी अलग पहचान होती है।
यूँ ही नहीं आजाती बहार गुलशन में
दर्द में भी उनके चेहरे पे मुस्कान होती है।
वक़्त भले ही उम्र पर अपनी छाप छोड़ दे
जिद्द उनकी हमेशा जवान होती है।
विमुख ना होना अपने लक्ष्य से कभी
सत्कर्मों की सोच हमेशा महान होती है।
मुश्किलों का सैलाब तेरे कदम रोकेगा
कांटो भरी राहें कब आसान होती हैं।
झूठ बिना पैर के दौड़ने लग जाता है
सच्चाई अक्सर लहू लुहान होती है।
तराशने का हुनर हो तो बोल उठती है
कोई भी चीज जो बेजुबान होती है।
भगवान सिंह रावत
(स्वरचित)
Monday, May 16, 2022
धीरे धीरे बीत गए सब
धीरे धीरे बीत गए सब
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धीरे धीरे बीत गए सब
मांग के लाये थे जो दिन
कुछ बीते अर्जित करने में
कुछ बीते तारे गिन गिन
रोता आया हंस ना सका
मुठी में कुछ कस ना सका
घऱ तो बहुत बनाये लेकिन
कभी उनमे खुद बस न सका
पल में फिसल गये मुठी से
जीवन के प्यारे पल छिन।
धीरे धीरे ...................।
तांक झांक जीवन भर की
खुद में कभी न झांक सका
सबका मोल लगाया तूने
खुद को कभी न आंक सका
खुद में ही खो गया तू खुद ही
खुद से तो खुद गया है छिन।
धीरे धीरे....................।
सूरज को बस धुप ही समझ
छाँव को समझ गया अंधियारा
धरती को बस मिट्टी समझा
और सोच को किया किनारा
रात को रात न।समझा सका
और ना समझा दिन को दिन।
धीरे धीरे बीत गए सब
मांग के लाये थे जो दिन
कुछ बीते अर्जित करने में
कुछ बीते तारे गिन गिन .
भगवान सिंह रावत (स्वरचित)





