दीपावली के पश्चात दो तीन दिन तक त्योहारों की खूब धूम धाम रही ,अचानक शुमना की तबियत एक दिन खराब हो गई ।
सूरत सिंह ने देखा उसे बुखार था ,उसने जीरे का पानी उबाल कर शुमना को दिया , थोड़ा आराम हुआ ,पर रात को फिर दुबारा बुखार चढ़ गया । तब सूरत सिंह ने दुकान से बुखार की गोली मंगवाई ,और शुमना को देकर कहा ,चुप चाप रजाई ओढ़ लो , पसीना आएगा तो बुखार टूट जाएगा ।
कमली भी स्कूल नही जा सकी , जैसे तैसे घर का काम निपटाती रही , और माँ की देखभाल भी करती रही।अगले दिन सुबह बुखार टूट गया , दोपहर के बाद शाम होते होते फिर शुमना का बदन टूटने लगा औऱ फिर बुखार चढ़ गया ।
सूरत सिंह परेशान हो गया । डॉक्टर यहां से मिलो दूर है ,एक वैध जी हैं वो भी दूसरे गांव में रहते हैं,बुखार की गोलियां असर नही कर रही है ,अब क्या होगा ।तभी अगले दिन सूबह जीतू वहां पहुंचा ।"अरे चाचा क्या हुआ "? जीतू बोला , "अरे तेरी चाची को पिछले चार दिन से बुखार है बार बार उतर कर चढ़ जाता है,समझ नही आता क्या करूँ " । डॉक्टर तक ये जा नही सकेंगी इतनी दूर है । सवांली गांव से शहर पांच मील दूर है ।
"अरे चाचा वो अपना मंगलु है ना,उसके पास है इस बुखार की दवा ,अभी कुछ दिन पहले रुकमा मौसी को भी ऐसा ही हुआ था,तब उसकी दवाई से ही ठीक हुई थी वो ऎसी दवाई बनाता है"। "हाँ यार ये ठीक रहेगा "।सूरत सिंह बोला ।
उसने तुरंत कमली को आवाज दे कर बुलाया और मंगलु के पास जाकर दवाई लाने को कहा । कमली तुरंत गाँव के दूसरे छोर पर रहने वाले मंगलू के घर की तरफ चल पड़ी ।वह सोचती जा रही थी माँ और बाबा तो कहते थे कि इनसे दूरी बनाकर रखनी चाहिए , फिर बाबा ने तो दीवाली में मंगलु के हाथ से बोतल झट से पकड़ ली थी , क्या बोतल से कुछ नही होता ? ऐसा कैसे होता है ? क्या नही छूना और क्या छूना है वह असमंजस में पड़ गई उसका मन भ्रांतियों के जाल में उलझ कर राह गया ,उसने देखा सामने मंगलु दास का घर है । उसने बाहर से कुंडी खटखटाई ,बाहर आने पर उसने मंगलू दास को सारी बात बताई ,मंगलु दास उसे वहीं पर रुकने को कह कर अंदर चला गया ।और थोड़ी देर में वापस आया ।उसके हाथ मे एक छोटी सीसी थी ," ले बेटी लेजा ये ही बची है,और फिर एक दो दिन में बनाऊंगा , जंगल से बूटी लानी होगी " मंगलु दास ने सीसी कमली के हाथ मे देने को हाथ बढ़ाया ,कमली सोचमे पड गई उसे झट मां की बात याद आई,इनसे दूरी बनाकर रखो ,कमली न अपना हाथ वापस खींच लिया । मगर फिर बाबा का वह दारू की बोतल लेकर कमीज के अंदर खोंस लेने वाला दृश्य ध्यान में आया ," लो बेटी " मंगलू ने कहा,उसने फिर हाथ आगे बढ़ाया । कमली के मन मे एक ध्वंद पैदा हो गया,वह असमंजस की स्तिथि में थी,उसने हाथ आगे बढ़ाया ,सीसी को पकड़ा ही था कि मन से आवाज आई ,"नही कमली नही ये सीसी अछूत हो जाएगी " "अरे कमली लेले सीसी तेरी मां की तबियत ठीक हो जाएगी ," "नही कमली नही ,हम लोग श्रवण हैं ,ये परंपरा हमारे पुरखों से चल रही है," कमली एक अजीब से अन्तर्ध्वन्ध में फंस गई थी ,वह झल्ला उठी और उसने अपना हाथ वापस खिंच लिया ,मंगलु कमली के हाथ मे सीसी थमा चुका था ,फिर वही हुआ कामकी के हाथ से सीसी छूट कर नीचे गिर पड़ी और सीसी टुट गई और सारी दावा बिखर गई ।"अरे कमली......ये क्या किया ओह अब क्या होगा नई दवा बनाने में तो दो दिन लग जाएंगे " ।
कमली भी हतप्रभ हो गई ,वह रुवांसी हो गई ।अचानक उसका ध्यान उसकी मां पर गया ।वह झट उल्टे पैरों घर की तरफ भागी ।दौड़ कर वह घर पहुंची,सब उसका इंतजार कर रहे थे वह बाबा से लिपट कर रोने लगी ",बाबा....बाबा...सीसी टूट गई'।
"कैसे ".....सूरत सिंह ने पूछा ,बाबा आपने ही तो कहा था ये लोग छोटी जात के हैं जिनसे दूरी बना कर रखनी चाहिए ,और और.....।वह जोर जोर से रोने लगी "।सूरत सिंह सारा माजरा समझ गया। । "अच्छा चल चुप होजा" ,उसने कमली को चुप कराया ,तब सूरत सिंह ने जीतू को मंधार गांव वैध को बुलाने भेजा, शाम हो गई पेर जीतू लौट कर नही आया, शुमना की तबियत और बिगड़ने लगी ।
जीतू अब तक क्यों नही लौटा सूरत सिंह बहुत परेशान हो गया ,तभी एक दूसरे गाँव का व्यक्ति वहाँ आया और बोला ,"सूरत सिंह आप हैं क्या" ?" हाँ में ही हूँ क्या बात है" उस व्यक्ति ने कहा कि मैं मंधार गांव का सेवा दास हूँ, और मुझे जीतू जी ने भेजा है और कहा है कि वैध जी दूसरे गांव गए है सुबह आएंगे मैं सुबह उन्हें लेकर ही आऊंगा ।ओह....सूरत सिंह के मुह से निक्ला । फिर सूरत सिंहअवाक रह गया,जब कमरे से आती एक पड़ोस की औरत ने बाहर आकर बताया कि शुमना अब नही रही । उसकी मृत्यु हो चुकी है ,सूरत सिंह के ऊपर मानो वज्रपात हो गया ।उसके हाथ पैर एक बार को जैसे ठंडे पैड गए । वह उठ कर शुमना के पास गया ,और निर्जीव शुमना का हाथ अपने हाथ मे ले कर फफक फफक कर बच्चों की तरह रो पड़ा ,वह शुमना को जीजान से चाहता था , कमली भी पास में ही शुमना के पैरों की तरफ बैठ कर सुबकने लगी ।तब आस पास के लोग जमा हो गए ।सबने उनको चुप कराया और अंतिम संस्कार की तैयारी करने लगे ।
सूरत सिंह क्रिया कर्म पर एक तरफ खामोश बैठा है,कमली उसके बगल में उदास बैठी है ।अडोस पड़ोस के दो तीन लोग और बैठे है ,सब शुमना की मौत पर दुख प्रकट कर उसे सांत्वना दे रहे हैं । तभी कमली रुवांसी होकर बाबा का हाथ पकड़ कर बोली
"बाबा ये सब मेरे कारण हुआ है ",और रोने लगी ।सूरत सिंह बोला "ना बेटी इसमें तुम्हारा कोई दोष नही है ,असल मे दोषी तो मैं हूँ, और मैं ही क्यों हम सब दोषी हैं, हम सब लोग झूटी और सडी गली पुरानी परम्पराओं को बे वजह आज भी मान्यता दे रहे है , मनुष्य ने अपनी सुगमता के लिए खुद मनुष्य को ही अलग अलग टुकड़ों में बांट दिया है, में तुम्हे अगर ये सब नही बताता तो तुम् ये सब नही करती,इस जात पांत की और ऊंच नीच की ब्यवस्था ने मुझसे मेरी शुमना को छीन लिया है,इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकाई है मैंने ,ना जाने हम लोगों के इस भेद भाव के कारण हमारे समाज मे कितनी क्षति होती है और हमे पता भी नही चलता , ।इस देश के पिछड़े पन का यह भी एक कारण है" । सब लाग चूपचाप सूरत सिंह की बातों को सुन रहे थे ।
उसे अपने अंदर एक नई चेतना का संचार होता महसूस हुआ ।अस्पर्शता समाज के प्रति कितना बड़ा अपराध है वह समझ चुका था , उसका अंतर्मन जाग चुका था । कमली भी बाबा के चेहरे पर ये बदलाव देख कर अचंभित थी ।सूरत सिंह ने तब समाज मे छुआ छूत की बंदिशों को तोड़ने का एक नया अभियान चलाया ।शुमना को श्रद्धांजलि स्वरूप
यह एक नया आयाम था ।
समाप्त ।
भगवान सिंह रावत (स्वरचित)




