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Monday, October 24, 2022

स्पर्श (भाग 2)

 


दीपावली के पश्चात दो तीन दिन तक त्योहारों की खूब धूम धाम रही ,अचानक शुमना की तबियत एक दिन खराब हो गई ।
सूरत सिंह ने  देखा उसे बुखार था ,उसने जीरे का पानी उबाल कर शुमना को दिया , थोड़ा आराम हुआ ,पर रात को फिर दुबारा बुखार चढ़ गया । तब सूरत सिंह ने दुकान से बुखार की गोली मंगवाई ,और शुमना को देकर कहा ,चुप चाप रजाई ओढ़ लो , पसीना आएगा तो बुखार टूट जाएगा ।
कमली भी स्कूल नही जा सकी , जैसे तैसे घर का काम निपटाती रही , और माँ की देखभाल भी करती रही।अगले दिन सुबह बुखार टूट गया , दोपहर के बाद शाम होते होते फिर शुमना का बदन टूटने लगा औऱ फिर  बुखार चढ़ गया ।
सूरत सिंह परेशान हो गया । डॉक्टर यहां से मिलो दूर है ,एक वैध जी हैं वो भी दूसरे गांव में रहते हैं,बुखार की गोलियां असर नही कर रही है ,अब क्या होगा ।तभी अगले दिन सूबह जीतू वहां पहुंचा ।"अरे चाचा क्या हुआ "? जीतू बोला , "अरे तेरी चाची को पिछले चार दिन से बुखार है बार बार उतर कर चढ़ जाता है,समझ नही आता क्या करूँ " । डॉक्टर तक ये जा नही सकेंगी इतनी दूर है । सवांली गांव से शहर पांच मील दूर है ।
"अरे चाचा वो अपना मंगलु है ना,उसके पास है इस बुखार की दवा ,अभी कुछ दिन पहले रुकमा मौसी को भी ऐसा ही हुआ था,तब उसकी दवाई से ही ठीक हुई थी वो ऎसी दवाई बनाता है"। "हाँ यार ये ठीक रहेगा "।सूरत सिंह बोला ।
उसने तुरंत कमली को आवाज दे कर बुलाया और मंगलु के पास जाकर दवाई लाने को कहा । कमली तुरंत गाँव के दूसरे छोर पर रहने वाले मंगलू के घर की तरफ चल पड़ी ।वह सोचती जा रही थी माँ और बाबा तो कहते थे कि इनसे दूरी बनाकर रखनी चाहिए , फिर बाबा ने तो दीवाली में मंगलु के हाथ से बोतल झट से पकड़ ली थी , क्या बोतल से कुछ नही होता  ? ऐसा कैसे होता है ? क्या नही छूना और क्या छूना है वह असमंजस में पड़ गई उसका  मन भ्रांतियों के जाल में उलझ कर राह गया ,उसने देखा सामने मंगलु दास का घर है । उसने बाहर से कुंडी खटखटाई ,बाहर आने पर उसने मंगलू दास को सारी बात बताई ,मंगलु दास उसे वहीं पर रुकने को कह कर अंदर चला गया ।और थोड़ी देर में वापस आया ।उसके हाथ मे एक छोटी सीसी थी ," ले बेटी लेजा ये ही बची है,और फिर एक दो दिन में बनाऊंगा , जंगल से बूटी लानी होगी " मंगलु दास ने सीसी कमली के हाथ मे देने को हाथ बढ़ाया ,कमली सोचमे पड गई उसे झट मां की बात याद आई,इनसे दूरी बनाकर रखो ,कमली न अपना हाथ वापस खींच लिया । मगर फिर बाबा का वह दारू की बोतल लेकर कमीज के अंदर खोंस लेने वाला दृश्य ध्यान में आया ," लो बेटी " मंगलू ने कहा,उसने फिर हाथ आगे बढ़ाया । कमली के मन मे एक ध्वंद पैदा हो गया,वह असमंजस की स्तिथि में थी,उसने हाथ आगे बढ़ाया ,सीसी को पकड़ा ही था कि  मन से आवाज आई ,"नही कमली नही ये सीसी अछूत हो जाएगी " "अरे कमली लेले सीसी तेरी मां की तबियत ठीक हो जाएगी ,"  "नही कमली नही ,हम लोग श्रवण हैं ,ये परंपरा  हमारे पुरखों से चल रही है," कमली एक अजीब से अन्तर्ध्वन्ध में फंस गई थी ,वह झल्ला उठी और उसने अपना हाथ वापस खिंच लिया ,मंगलु कमली के हाथ मे सीसी थमा चुका था ,फिर वही हुआ कामकी के हाथ से सीसी छूट कर नीचे गिर पड़ी  और सीसी टुट गई और सारी दावा बिखर गई ।"अरे कमली......ये क्या किया ओह अब क्या होगा नई दवा बनाने में तो दो दिन लग जाएंगे " ।
कमली भी हतप्रभ हो गई ,वह रुवांसी हो गई ।अचानक उसका ध्यान उसकी मां पर गया ।वह झट उल्टे पैरों घर की तरफ भागी ।दौड़ कर वह घर पहुंची,सब उसका इंतजार कर रहे थे वह बाबा से लिपट कर रोने लगी ",बाबा....बाबा...सीसी टूट गई'।
"कैसे ".....सूरत सिंह ने पूछा ,बाबा आपने ही तो कहा था ये लोग छोटी जात के हैं जिनसे दूरी बना कर रखनी चाहिए ,और और.....।वह जोर जोर से रोने लगी "।सूरत सिंह  सारा माजरा समझ गया। । "अच्छा चल चुप होजा" ,उसने कमली को चुप कराया ,तब सूरत सिंह ने जीतू को मंधार गांव वैध को बुलाने भेजा, शाम हो गई पेर जीतू लौट कर नही आया, शुमना की तबियत और बिगड़ने लगी ।
जीतू अब तक क्यों नही लौटा सूरत सिंह बहुत परेशान हो गया ,तभी एक दूसरे गाँव का व्यक्ति वहाँ आया और बोला ,"सूरत सिंह आप हैं क्या" ?" हाँ में ही  हूँ  क्या बात है" उस व्यक्ति ने कहा कि मैं  मंधार गांव का सेवा दास हूँ, और मुझे जीतू जी ने भेजा है और कहा है कि वैध जी दूसरे गांव गए है सुबह आएंगे मैं सुबह उन्हें लेकर ही आऊंगा ।ओह....सूरत  सिंह के मुह से निक्ला । फिर सूरत सिंहअवाक रह गया,जब कमरे से आती एक पड़ोस  की औरत ने बाहर आकर बताया कि शुमना अब नही रही । उसकी मृत्यु हो चुकी है ,सूरत सिंह के ऊपर मानो वज्रपात हो गया ।उसके हाथ पैर  एक बार को जैसे ठंडे पैड गए । वह उठ कर शुमना के पास गया ,और निर्जीव शुमना का हाथ अपने हाथ मे ले कर फफक फफक कर बच्चों की तरह रो पड़ा ,वह शुमना को जीजान से चाहता था , कमली भी पास में ही शुमना के पैरों की तरफ बैठ कर सुबकने लगी ।तब आस पास के लोग जमा हो गए ।सबने उनको चुप कराया और अंतिम संस्कार की तैयारी करने लगे ।
सूरत सिंह क्रिया कर्म पर  एक तरफ खामोश बैठा है,कमली उसके बगल में उदास बैठी है ।अडोस पड़ोस के दो तीन लोग और बैठे है ,सब शुमना की मौत पर दुख प्रकट कर उसे सांत्वना दे रहे हैं । तभी कमली रुवांसी होकर बाबा का हाथ पकड़ कर बोली
"बाबा ये सब मेरे कारण हुआ है ",और रोने लगी ।सूरत सिंह बोला "ना बेटी इसमें तुम्हारा कोई दोष नही है ,असल मे दोषी तो मैं हूँ, और मैं ही क्यों हम सब दोषी हैं, हम सब लोग झूटी और सडी गली पुरानी परम्पराओं को बे वजह आज भी मान्यता दे रहे है , मनुष्य ने अपनी सुगमता के लिए खुद मनुष्य को ही अलग अलग टुकड़ों में बांट दिया है, में तुम्हे अगर ये सब नही बताता तो तुम् ये सब नही करती,इस जात पांत की और ऊंच नीच की ब्यवस्था ने मुझसे मेरी शुमना को छीन लिया है,इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकाई है मैंने ,ना जाने हम लोगों के इस भेद भाव के कारण हमारे समाज मे कितनी क्षति होती है और हमे पता भी नही चलता , ।इस देश के पिछड़े पन का यह भी  एक कारण है" । सब लाग चूपचाप सूरत सिंह की बातों को सुन रहे थे ।
उसे अपने अंदर एक नई चेतना का संचार होता महसूस हुआ ।अस्पर्शता समाज के प्रति कितना बड़ा अपराध है वह समझ चुका था , उसका अंतर्मन जाग चुका था । कमली भी बाबा के चेहरे पर ये बदलाव देख कर  अचंभित थी ।सूरत सिंह ने तब  समाज मे छुआ छूत की बंदिशों को तोड़ने का  एक नया अभियान  चलाया ।शुमना को श्रद्धांजलि स्वरूप
यह एक नया आयाम था ।
                            समाप्त ।
                    भगवान सिंह रावत (स्वरचित)

स्पर्श (भाग 1)

 




सभी रचनाकारों को और पाठक बंधुओं को  मेरा प्रणाम !
मेरी इस रचना को पढ़ने से पहले आपको आज से   लगभग पचास साल पीछे जाना होगा ।उस समय का व्यक्ति किस धारणा में जीता होगा , उस समय संचार ,परिवहन,उच्चस्तरीय शिक्षा,के माध्यमों का बहुत आभाव था, साथ ही समाज मे पुरानी परम्पराओं की पकड़ थी । आज स्थिति काफी बदल चुकी है। हमने पीछे क्या छोड़ा है,नई पीढ़ियाँ के इस पूरानी परम्पराओं के प्रति नए विचार क्या हैं  पौरणिक परंपराएं और नए विचार जब किसी मोड पर टकराते हैं तो क्या स्थिति उत्पन्न होती है , इस कहानी में इसी तरह का चित्रण  है ।

सूरत सिंह ने , देखा दोपहर होने को थी ।उसने जल्दी जल्दी बैलों को हांकना  चाहा, मगर खेत अभी बाकी था।धूप भी शिर पर चढ आई थी । किसी तरह उसने पूरा खेत जोत डाला।
और हल और जुआ (हल चलाते समय बेलो के कंधे पर रखा जाता है) कन्धे पर उठा, बैलों को घर की तरफ हड़का कर खेत से चल पड़ा ।
"कमला की माँ ' अरे जरा बैलों को बांध"और हल जुआ एक तरफ पटक कर चारपाई पर बैठ सुस्ताने लगा । " पूरा खेत कर आये " बेलों को पानी पिलाते  हुए  सुमना बोली। 'हाँ हो गया' पूरा दिन खत्म हो जाता है इस खेत पर "।
"अरे कमला अभी तक नही आई स्कूल से"खाना खाते हुए सूरत सिंह बोला ।"आ जायेगी ...चार बजे तक आती है ना" शुमना लोटे में पानी र्देते बोली ।
सुबह सात बजे जब सूरत  बैलो का न्यार पानी दे रहा था, तो उसे ढोल नगाड़े की आवाज आई,तो सूरत रसोई में काम करती शुमना से बोला "अरे शुमना  आज क्या है भई, गाँव मे,ढोल की आवाज आ रही है" पाइप  से चूल्हा फूंकती शुमना बोली " आज  संग्रान्द (संक्रांति) है ना इस लिए" । "लो इनको भी  जब देखो मांगने का मौका मिल जाता है ।इन औजियों की भी मौज है"  ( औजी -गांव में जो लोग छोटी जात के होते है,वह लोग ढोल बजाना,बॉल काटना ,कपड़े सिलना, और छोटे मोटे और भी कई तरह के काम करते हैं,जिसके बदले उन्हें समय समय पर ठाकुरों के घरों से अनाज और खाना पीना मिल जाता है) "अरे कमली को उठाओ स्कूल नही जाना क्या उसे"
"बाबा में कबसे उठी हूं आज छुट्टी है ,आज नही जाना स्कूल"
नौ साल की कमली चौक में उछलती बोली ।"अच्छा चलो  ये ठीक है,खेत चलोगी मेरे साथ " ? सूरत बोला
"हाँ बाबा चलूंगी"खुश होती कमली बोली ।
तभी ढोल की आवाज नजदीक सुनाई पड़ी ,और उनके चौक पर एक ढोल वाला,एक नागाड़े वाला और एक  औरत जिसके सिर पर एक टोकरा रखा था, जिसमे माँगा हुआ कुछ अनाज था । उनमे एक मंगलू दास ढोल की आवाज कम करता हाथ जोड़ कर प्रणाम करते बोला "जय हो ठाकुर महाराज की" सूरत बोला "कैसा है रे मंगलू " ?
" ठीक हूँ साब कृपा है आप लोगों की "
तभी शुमना एक सूप में भरकर  अनाज ले कर आई और उनके साथ वाली औरत को इशारा करती बोली "ये ले, टोकरी पहले नीचे रख "और उससे  एक निश्चित दूरी   बनाते हुए उसकी टोकरी में अनाज उंडेल दीया । उस औरत ने  आभार  प्रकट किया ।और वो दूसरे घरों की तरफ चलने लगे ।   कमली  ये सब देख रही थी । फिर कुछ देर बाद सूरत सिंह बैलों को हड़काता खेत पर चल पड़ा ।साथमे कमली भी थी । सूरत सिंह कुछ देर हल चला कर सुस्ताने बैठा,और बीड़ी पीने लगा । तब कमली बोली "बाबा जी  ये जो औजी हैं, ये लोग कौन होते हैं,"  "कयूं क्या हुआ सूरत ने पूछा " । "मैंने देखा है लोग उनसे दूर रहते है,मां जी ने भी उनकी कितनी दूर से अनाज ढिया ","उनको छूने से क्या होता है "। "हमारे स्कूल में भी दो औजियों के बच्चे पढ़ने जाते हैं उनसे भी सब दूर हटकर  चलते है" ,कमली अपने सरल स्वभाव से बोली ।
तब सूरत थोड़ा कड़क स्वभाव से बोला "हां बेटा हम लोग श्रवण है ,और वे लोग छोटी जात के हैं हम लोगों को उनसे दूरी बनाकर रखनी पड़ती है,वो हमारे किसी भी बर्तन या किसी चीज को छू ले तो वो चीज अछूत हो जाती है,उसे फर धो कर साफ करना पड़ता है ,और वो हमारे घर में दहलीज से बाहर ही रहते है "। "ऐसा क्यों है बाबा"
"अरे बस है तो है ,पहले से ये सब चलता आ रहा है हमारे बाप दादा ये करते आये है तुम अभी बच्चे हो ,कुछ जानते नही हो , तू बहस बहुत करती है "। कमली के कोमल स्वभाव को सूरत ने   क्रूरता के  आवरण से ढक दिया,कमली सहम कर चुप हो गई ।और कूछ न बोली ।
"बेटा कमली देख तो ये क्या है " ? क्या हैं मां ?शुमना के हाथ मे नई फ्रॉक देख कर कमली खुश होते बोली"ये कब लाये बाबा ....बाजार तो गए नही कितने दिन से " ?
"अरे ये बाजार से नही लाये ,मंगलू औजी है ना उसने सिली है,पहन तो जरा " । कमली ने आसमानी रंग की फ्राक पहनी, उसे बहुत पसंद आई । तभी कमली भ्रांतिचित हो कर बोली," माजी बाबा तो कह रहे थे कि इनसे दूरी रखनी पड़ती है,ये हमारी चीज को हाथ नही लगाते ।चीज अछूत हो जाती है ,फिर ये......।
"अरे वो सब ठीक है ये तो कपड़ा है ,इसमें ऐसा नही होता। ले इसे पहन कर जा स्कूल । औऱ हाँ तू बहस बहुत करती है,तुझे जैसे  बोलें वैसा करा कर " शुमना बोली । बाबा और माँ  से औजियों के लिए एक सी प्रतिक्रिया  देख असमंजस सी हो कर कमली फ्रॉक पहन स्कूल चली गई ।
गाँव मे दीवाली की चहल पहल, आते जाते दिखते लोग,दुकान पर लोगों की भीड़  बता रही थी कि लोग आज कितने प्रसन्न हैं । "चलो बाबा  बहुत देर हो गई । दुकान में पटाखे नही बचेंगे बाद में "। " अरे चलो गुड़िया रानी चलो " सूरत बोला ।औऱ दोनो घर से निकल पड़े । दुकान पर भीड़ काफी थी , सूरत बाहर बेंच पर बैठ गया । एक और आदमी जीतू वहां पहले ही बैठा था ,"और जीतू कैसा है रे तू" ? सूरत बोला  "बस चाचा सब ठीक है ' ।
जीतू ने उत्तर दिया ।"दीवाली कैसे मन रहे हो अबकी बार"सूरत बोला "बस चाचा  एक रिश्तेदार आया है घर पर शाम को बैठेंगे,दीवाली मानेगी"जीतू बोला "बहुत खूबअरे मिल तो जाएगी पीने कोआज यहां" सूरत ने आहिस्ते से कहा ।"अरे चाचा मिलेगी क्यों नही ,मंगलू जिंदाबाद"जीतू बोला । "अच्छा अब मंगलू भी कच्ची तोड़ने लगा है"सूरत बोला ।
"हाँ काफी दिन हो गए "।"ये रहा उसका छोरा बुला लूँ मंगलू को '
"हाँ बुला यार आज तो चाहिए ही"
एक  गंदी सी कमीज पहने एक लड़का पंद्रह साल का कुछ बच्चों में खेल रहा था । "अरे कालू ओ कालू इधर आ " ।
"जा जरा अपने बाप को बुला कर ले आ ,कहना सुरतु चाचा ने बुलाया है ' । कालू सरपट भागता  चला गया । थोड़ी देर बाद मंगलू आया "जय हो ठाकुरों और हाथ जोड़ कर बोला "महाराज  हुकम ' तब सुरतु बोला "अरे हुकम क्या एक बोतल चाहिए ,जुगाड़ कर"
"👌साब मिल तो जाएगी  पर नगद होगी ,त्योहार का दिन है ना "
"हाँ ठीक है  मिल जाएगी" ,मंगलू बोला । "ये ले " सुरतु ने बगल के खीसे से एक नोट लिकाल कर मंगलू को थमाया । मंगलू रुपये को माथे से लगा बोला ।
"थोड़ी देर रुको ठाकुरो लाता हूँ "। कमली  एक ओर बैठी चुप चाप सब देख रही थी  बाबा क्या।मंगा रहे हैं उस औजी से,औऱ बाबा ने ये क्या किया ,मंगलु को हात में रुपया पकड़ाया । उसके मन मे फिर अन्तर्ध्वन्ध चलने लगा ,तभी वहां से उसका ध्यान हटा , वह जमीन पर कंचे खेलते बच्चों को देखने में मस्त हो गई । तभी उसे बाबा की आवाज आई "कमली आजा ले ले अपनी पसंद के पटाखे "।कमली ने कुछ फुलझड़ियां कुछ चकरियाँ और कुछ पटाखे खरीदे,,सुरतु ने कुछ और घर का सामान खरीदा ,दुकान से बाहर आये तो सामने मंगलु खड़ा था सुरतु ने इधर उधर देखा और झट मंगलु के हाथ से कागज में लिपटी बोतल लेकर कुरते के अंदर कर पाजामे में खोंस दी ।और बोला " कमली चल बेटा चल घर चल बहुत देर हो गई " ।
कमली देख चुकी थी ।ये क्या हो सकता है ।जो बाबा ने कमीज में छिपाया है , घर पहुंचकर कमली ने चुपके से देखा बाबा ने दूसरे कमरे में जाकर वह सामान निकाला ,और कागज हटाया ,फिर उसे गौर से देखा और प्रसन्नचित होकर अलमारी में रख दी । ओह..... तो ये दारू की बोतल है , कमली समझ गई थी । कमली सोच में पड़ गई , उसका मन फिर ऊहापोह के जंजाल में फंस गया । ये क्या माँ तो इनसे दूर रहने को कहती है , और बाबा बोतल हाथ से ले रहे हैं । कमली असमंजस में पड़ गई । वह कुछ निर्णय नही ले सकी ।और इधर उधर के काम मे व्यस्त हो गई ।
शाम को छः बजे चुके हैं दीवाली की तैयारियां जोरों पर थी,रह रह कर पटाखों की आवाज सुनाई पड़ रही थी । सुमना पकवान बना चुकी तो उसने कमली को आवाज दी ।
"कमली.... ओ कमली .....। इधर आ बेटा बाबा को ये पकवान दे आ ,पूजा कर लेंगे और लक्ष्मी माता को भोग लगाएंगे  "। कमली ने प्लेट में पकवान बाबा को दिए ।और दोनों घरमे बने मँदिर में  पूजा करने बैठे,कुछ देर बाद शुमना भी आ गई ।तीनो ने पूजा समाप्त की और गांव में अखाड़े की दीवाली देखने की तैयारी में लग गए ।कमली तैयार हो चुकी तो वह बाबा के कमरे मे बाबा को बुलाने गई ।तब उसने देखा बाबा बोतल से गिलास में भट कर दारू के घूंट लगा रहे थे ," चलो बाबा अखाड़े में ,सब लोग आ गए होंगे,ढोल की आवाज सुनाई पड़ रही है "।
"हां हां चलते है अभी ,बस थोड़ी देर में "सूरत बोला
सूरत ने गिलास में से आखिरी घूंट भरा और उठ खड़ा हुआ ।
सवांली गांव में आज धुम मची थी । दो सौ परीवारों का ये गांव अपनी सांस्कृतिक त्योहारों को ,अपनी पौराणिक धरोहर को  भली भांति  जीवित  रखने के लिए  मशहूर था ।
गांव की दीवाली सब लोग अपने पटाखे ले कर अखाड़े में पहुंचे हुए है ।एक जगह पर आग का कुंड बना है ।जिसमे आग जल रही है "ढोल और नगारा बजने लगे है "लोग अपने भैलु (पहाड़ में भैलु का मतलब होता है कुछ लकड़ियों को छोटा गठर बना कर फिर उसे सांकल से बंधा जाता है और  आग से जला कर फिर घूमाया जाता है )   जलाने लगे थे ,और फिर एक साथ दस पंद्रह भैलु घूमते हुए नजर आते है ।अंधेरे में दूर से बड़ा मन मोहक दृश्य लगता है ।पटाखों की आवाज भी साथ साथ आती है,लग भाग एक घंटे तक ये सब चलता है । फिर सुरु होता है गीतों का और पारंपरिक  नृत्यों का दौर ,झुमैलो ,चाँचरी नृत्य ,गांव की स्त्रियां एक दूसरे के कंधे में हाथ डाल कर गीत गाती हुई गोल गोल घूमती है,ओर एक ताल पर  पैरों को गति देती है । इधर दूसरी तरफ पुरुषों की टोली भी पारंपरिक गीत गाती है ,बड़ा  मनमोहक दृश्य होता है । लग भाग दो घंटे तक ये सब चलता है  । कमली  भी अपनी सहेलियों से मिल  कर बहुत प्रसन्न होती है ।
और फिर लग भाग मध्य रात्रि तक लोग वापस घर आते हैं ।
शेष अगले भाग में......।  स्पर्श  भाग 2

Monday, October 17, 2022

मैं अपना फर्ज निभाउंगा

 


                                                                                
अपना फर्ज निभाउंगा

तुम राज करो इन महलों में मैं गलियारों में जाऊंगा,
तुम्हे लालसा बैभव की मै अपना फर्ज निभाउंगा ।
शर्तों से लिपटी प्रीत से जो मैंने अनुराग बढ़ाया,
प्रेम का कुछ अहसास नहीं बस एकाकीपन पाया ।
प्रेम के पावन उत्सव में भी थी तृष्णा की छाया ,
मधुर प्रेम की कटुता को मैं कभी भूल ना पाऊंगा ।
तुम्हे लालसा बैभव की  मैं अपना फर्ज निभाउंगा ।
रंग महल में रमे रहो मखमल को गले लगाओगे ,
दास दासियों के घेरे में अपना हुक्म चलाओगे ,
दर्पण के सम्मुख जाकर तुम बार बार इतराओगे ,
मेरा क्या मैं तो सुख दुख में सबका हाथ बटाउँगा ।
तुम्हे लालसा बैभव की मै अपना फर्ज निभाउंगा ।
वक्त है कम, काम बहुत है इन उजड़े गलियारों में ,
सत्य अकेला खड़ा धरा पर झूठ है पहरेदारों में ,
दुष्ट आज भी घुड़सवार है नेक चले अंगारों में ।
मानवता के घायल पग पर मैं तो महरम लगाऊंगा ।
तुम्हे लालसा  बैभव की में  अपना फर्ज  निभाउंगा ।

चकाचौंध की उस दुनिया मे इठलाना , इतराना ,
स्वर्ण रजत और मोती माणिक इन पर प्यार लुटाना ,
जब जब चीखेंगे गलियारे तुम हर्षोल्लास मानाना ,
मानवता की सेवा मे मैं तो सारी उम्र बिताऊंगा ।
तुम्हे लालसा बैभव की मैं अपना फ़र्ज़ निभाउंगा ।
तुम राज करो इन महलों में मै गलियारों में जाऊँगा ,
तुम्हे लालस बैभव की में अपना फर्ज निभाउंगा ।
                   भगवान सिंह रावत (स्वरचित)


Sunday, October 9, 2022

वापसी

 दिवान सिंह गाड़ी को लॉक कर चाबी चौकीदार को थमा कर वापस अपने घर की तरफ चल पड़ा ।आज वह थका थका सा महसूस कर रहा था ।सुबह आठ बजे से शाम के नौ  बज चुके थे ।सारा दिन इधर उधर गाड़ी दौड़ाते वह टूट सा गया था । क्वाटर पर पहुंच कर वह चारपाई पर पसर गया । 

उसकी पत्नी  मीना किचेन में थी,खाना बनाना छोड़ पत्नी का गिलास लेकर पहुँची और लेटे हुए  दिवान सिंह को ढिया और वापस खाना बनाने में लग गई । जमीन पर आठ साल का उसका बेटा विनोद किताब लेकर पढ़ाई कर रहा था । पानी पी कर दिवान सिंह  ने गिलास स्टूल पर रक्खा औऱ सोचते सोचते  अतीत में खो गया ।

 सीधा सादा दीवान सिंह  अपने पहाड़ में गांव की पुरखों की जमीन पर खेती करता था । ठीक ही चल रही थी गाड़ी ,अगर  गुलाब सिंह उसे ना बरगलाता , गुलाब सिंह उसका दूर का सम्बन्धी था । वह खुद दिल्ली में पिछले सात आठ साल से रह रहा था । हप्ते भर की छुट्टी में गाँव आकर बडी शान से रहता था,और खुले दिल से खर्च करता था । एक दिन गुलाब सिंह उसके पास बैठा बोला ,"चल यार तुझे घूम लाऊं दिल्ली , शहर में देखने को अच्छी अच्छी चीजें हैं , पालिका बाजार, लाल किला, चिड़िया घर ,बिरला मंदिर सुर भी बहुत कुछ है " तब दीवान सिंह बोला  " भाई जी ,वो तो ठीक हैं  , पर इतने दिन कौन रहेगा और  कहाँ रहेगा वहां ये सब देखने को "

"अरे मैं हूँ ना मेरे यहाँ रहना ,अरे मैं तो कहता हूं  मैं तुझे ड्राइविंग सिखा दूंगा ,फिरआराम से नौकरी करना और क्या " गुलाब सिंह ने आश्वासन दिया ।

दो तीन बार इसी तरह गुलाब सिंह ने उसे शब्ज बाग दिखाए तो दिवान सिंह के मन मे लालसा जाग उठी,पहाड़ी रोजमर्रा के जीवन के प्रति वह उदासीन हो चला था । गांव के और भी लोग शहरों में रहते है , उनके ठाट बाट देख कर उसका मन भ्रमित  हो चला था ।

दिवान  सिंह  आखिरकार शहर जाने को तैयार हो गया ,वह दसवीं पास था बस , काम उसे कुछ आता नही था । 

अपने उज्वल भविष्य के सपने बुनता , ऊंचे ख्वाब देखता दिवान सिंह आखिर दिल्ली आ ही गया । गुलाब सिंह के घर पर दो तीन दिन रह कर  वह गुलाब सिंह के कहने पर जिस जगह गुलाब सिंह बुलाता वह उसे गाड़ी चलाने की ट्रेनिंग देता , जब भी गुलाब की गाड़ी खाली होती ,वह दिवान को बुलाता और गाड़ी सिखाता ।

इस तरह दो महीने में दिवान ट्रैंड हो गया ,वह गाड़ी चलाना सीख गया ,।गुलाब सिंह ने लाइसेंस भी बनवा दिया ।

अब दिवान सिंह ड्राइवर बन चुका था ,और गाड़ी चलाने में निपुण हो गया था । पहले एक दो जगह कम वेतन पर काम करके उसने फिर एक अच्छे बड़े सेठ के घरपर नौकरी पकड़ी,वहां उसकी सेलरी ज्यादा नही तो कम भी नही थी ।पंद्रह हजार महीना । दीवान सिंह खुश हो गया ,इन दो तीन महीने वह घर बार सब भूल गया , ना ही उसे बच्चों का ध्यान आया , वह तो बस ड्राइवर बनकर ही दम लेना चाहता था ।

उसने एक अलग क़वाटर किराये पर लिया और वहां रहने लगा और झट गांव जाकर अपने बच्चों को साथ ले आया ।  उसे काम करते करते एक साल से ज्यादा हो गया था । सप्ताह में एक की की छुट्टी ,पंद्रह हजार सेलरी ,कभी कभी सौ दो सौ गिफ्ट भी मिल जाते थे । सुबह से शाम तक वह गाड़ी दौड़ाता फिरता था,पहले  रॉय साहब को  फैक्ट्री छोड़ो फिर मिसेज रॉय को क्लब,और फिर सरोज बिटिया को  टेनिस ग्राउंड, और फिर सबको वापस घर छोड़ो,बारी बारी से , सबसे देर मे राय साहब फैक्ट्री से आते थे , आते आते कभी कभी आठ  भी बज जाते थे ।उन्हें कोठी पर छोड़ दिवान सिंह नौ बजे घर पहुंचता था । गांव गलियारे की उसे कुछ खबर नही थी । क्या चल रहा है क्या नही ।

यहाँ पर दिवान सिंह की सैलरी तो गुजारे लायक ठीक थी  मगर बचत कुछ नही थी । ऊपर से उसे फुरसत बिल्कुल नही थी , सारा समय उसका डयूटी में ही चला जाता था । शहर में आकर अब खर्चों में बढ़ोतरी होने लगी थी ।चार हजार मकान का किराया बच्चे की फीस  और फिर कपड़े लत्ते ,लोक दिखावा,अच्छा दिखना अच्छा खाना , यह एक शौक बन गया था शहर में आकर ।फिर  उसने देखा पैसे के लिए लोग कितना झूठ बोलते है ,छोटे से छोटा आदमी ,और बड़े से बड़ा बिजनेस मैन । हर आदमी सामने  वाले को लूटना चाहता है । दिवान सिंह भी उसी राह चल पड़ा ।जैसा देश वैसा भेष , उसकी अंतरात्मा मर चुकी थी ।  अब वह अर्जित करने में व्यस्त हो गया । इस कारण वह चिंतित रहने लगा और कमजोर भी हो गया । किसी ने उसे बताया कि शाम को एक दो पेग लेलो सारी थकान मिट जाएगी ।दीवान सिंह ने वैसा ही किया ।वह शाम को रोज दो पेग मारता और सो जाता ।सुबह तैयार होकर ड्यूटी पर जाता दिन भर गाड़ी चलाता ,और थका मांदा घर आकर शराब पीता और सो जाता ।अब उसकी जिंदगी का यही नियम बन गया था । कभी कभी वह इस जिंदगी से खिंन्न होजाता था,ऊब जाता था मगर फिर अपने आप को एडजेस्ट कर लेता था । मगर आज जो उसके साथ हुआ उससे वह बेचैन हो गया , वह मिसेज राय को किटी पार्टी पर छोड़ कर बाहर गाड़ी में बैठा था उसे दो घंटे हो चुके थे ,तभी राय साहब का कॉल आया , उन्हें आज गाड़ी जल्दी चाहिए थी । मिसेस राय पार्टी में है दिवान बोला ,उनको खबर दो कि मुझे गाड़ी चाहिए  कही जाना  है ।दिवान ने चैकीदार से खबर भिजवाई मगर मिसेज राय नही आई ।फिर राय साहब का फोन आया इस बार उनकी आवाज में कठोरता थी , दिवान सिंह ने फिर संदेसा भिजवाया । थोड़ी देर बाद दान दनाती मिसेज राय बाहर आई और बोली दिवान सिंह क्या मुसीबत है तुम्हे ? "मैडम जी साहब तीन बार फोन कर चुके है ।उन्हें गाड़ी जल्दी चाहिए " ठीक है उनसे कहो आती हूँ और बड़बड़ाती हुई अंदर चली गई । फिर आधे घंटे बाद आई । राय साहब का फोन फिर आया वह गुस्से में बोले दीवान सिंह तुमने  सुना नही मेम साहब को घेर छोड़ कर जल्दी आओ ।जी आया बस । दिवान सिंह दोनो तरफ से डांट खा रहा था । मैडम गाड़ी में भी बड़बड़ाती रही ,दिवान कुछ ना बोला , उसे अभी वापस भी जाना है साहब को लेने,पता नहीं देर से जाने पर वो क्या कहेंगे । वहीं हुआ आते ही राय सहाब उस पर  बरस पड़े ,दिवान सिंह इतनी देर क्यों लगाई  ? साहब जी वो मेडम जी.......। मैडम  मैडम क्या मैने कहा था न मूझे जल्दी गाड़ी चाहिए । फिर ,? बेचारे गुप्ता जी को टेक्सी कर आना पड़ा  । हद्द हो गई वह गुस्से ।में तमतमाते बोले ।

" अब चलो मुझे घर छोड़ कर गुप्ता जी भी ले जाना , बादमे छुट्टी करना ,आइए गुप्ता जी " औऱ दो दोनो गाड़ी में बैठ गए ।दिवान सिंह  गाड़ी लेकर चल पड़ा , इतना अपमान उसने आज तक नही सहा था ।अंदर ही अंदर वह झुलस रहा था  , मगर क्या करता ,वह नौकर जो था । वह कुछ कह न सका । राय साहब को घर छोड़ वह गुप्ता जी को उनके घर छोड़कर वापस आया और गाड़ी पार्क कर चाबी चौकी दार को देकर घर की तरफ चल पड़ा । औऱ खाट पर पसर गया ।आज घर आते उसे नौ बजे गए ।अछा होता वह गांव से न आता ,इतनी बेइज्जती उसने कभी महसूस नही की थी । सारी घटनाये उसके मष्तिस्क में घूम गई । इतना क्या सोच रहे , इतनी देर से देख राही हूँ , गुमशुन बैठे हो क्या हुआ । मीना की आवाज ने उसे चौंका ढिया ।

" ओह...। कुछ नही बस यूं ही ,अरे क्या टाइम हो गया है "साढ़े नौ बजे गए है खाना दे दूं " अभी भूख नही है मीना ,जरा बैठो तो ,उसने कुर्सी की तरफ इशारा किया । तब दिवान सिंह बोला

" मीना बस अब बहुत हो चुका ,मैंने फैसला कर लिया है अब हम अपने गांव चले जायेंगे ,ये शहर मेरे जैसे आदमियों के लिए नही बना है, यहां हर कदम पर झूठ आगे आकर कदम रोक देता है, औऱ सच छटपटा कर रह जाता है ,  मक्कारी अपना काम निकल लेती है और ईमानदारी मन मशोस कर रह जाती है , फरेब बाजार में खुले आम बिकता है , और इंसानियत  ढूंढने पर भी नही मिलती , चेहरों पर मुखौटों का रिवाज चल पड़ा है हर कोई दिखावे  के रथ पर सवार है , समय ने यहां अपने आप को सिकोड़ लिया है "। " मीना " उसने पत्नी का हाथ पकड़ कर कहा, " मेरे पास तुम लोगों के लिए भी समय नही है , यहाँ धनवान  धृष्टता को अपनी हकूमत समझता है,और गरीब बेबसी को अपनी किस्मत ,मैं इस छोटे से किराये के घर को अपनी किस्मत नही बनाना चाहता , में अपनी शर्तों पर जीना चाहता हूं " , " हम अपने गाँव चले जायेंगे , वहां मैं अपनी थोड़ी सी खेती पर मेहनत करूंगा , और चैन से जीऊंगा   ।हम लोगों ने  रोटी पाने की दौड़ में धरती को पूजना छोड़ दिया है " मीना  अपने पति के इस बदलाव को देखकर दंग रह गई ,वह आश्चर्यचकित थी और प्रसन्न भी , दिवान सिंह के विचारों का समर्थन करती वह बोली , " ठीक कहते हैं आप अपने पुरखों की जमीन पर हम खूब मेहनत करेंगे ,और वहीं अपने सपनों को साकार करेंगे , में तुम्हारा साथ दूंगी "  दिवान सिंहने मीना का हाथ चूम लिया । मुझे तुम से ये ही आशा थी ।

दिवान सिंह सपरिवार गाँव आ गया ,अब उसे नए शिरे से जीना था । वह सुबह उठा हाथ मुह धो कर चौक में आया ,चारों तरफ हरियाली थी ,सामने पहाड़ पर हल्की धूप खिल गईं थी,नीचे गंगा मैया का नीला जल बह रहा था ,पँछीअपने स्वर में अलग अलग  तरह से चहक रहे थे ,ये सब देख कर दिवान सिंह  का मन खुशी से प्रफुल्लित हो उठा ।इतने लंबे समय बाद ऐसा विहंगम दृश्य  देखने को मिला था उसे , इस तरह का अहसास उसे पहले कभी नही हुआ था ,एक झूटी दिखावे की खुशी की कितनी बड़ी कीमत चुका रहा था वह ,उसे अपने ऊपर क्रोधः  आ रहा था ,पश्चाताप  में उसके आँसू टपक पड़े थे , ठीक वैसे ही जैसे कोई मां से बिछड़ कर वापस लौट कर मां से लिपट कर रोता है । मगर सुबह का भूल शाम को घर आ चुका था मगर अब वह अपनी जन्म भूमि पर लौट आया था ,धरती माँ के पुत्र की वापसी हो चुकी थी , बेबसी भरी जिंदगी की आग में सोना तप कर कुंदन बन चुका था ।   उसे अपने  अंदर एक नई ऊर्जा के सँचार का अहसास हुआ ,और अगले दिन से वह अपने पुरखों की जमीन पर मेहनत करने में जुट गया ।

                  भगवान सिंह रावत (स्वरचित)

 


Wednesday, October 5, 2022

सच के उजाले

 सच के उजाले 


झूठ का अंधकार फैला है सच के उजाले कहाँ गए

बड़े ख्वाब और झूठे स्वप्न दिखाने वाले कहां गए।

रंग महल के लोग वही हैँ कुर्सी का भी वही मिजाज

नेकी घुटने टेक टेक करआज भी करती है फरियाद

बड़े बडे आकाओं  का  भी पहले जैसा ही रिवाज ।

गलियारों को राजभवन पंहुचाने वाले कहां गए ।

झूठ का अंधकार ........।

मेरे सीधे सादे गांव को शहरों ने लूटा है ,

जो रक्षक थे अस्मत के उन पहरों ने लूटा है ,

सच से फेर लिया मुह उन अंधे बहरों ने लूटा है ।

 करुणा देख जो रो पड़े थे वो जियाले कहां गए ।

झूठ का अंधकार........,।

प्यासी धरती तड़प रही है बूंदों की अभिलाषा में

मेहनत स्वेद बहा रही है  उम्मीदों की भाषा मे ,

नाता तोड़ के कर्म धरा से चला बैभव की आशा में ।

सही समय पर बरस पड़े वो बादल काले कUहां गए ।

झूठ का अंधकार ..........।

जगे चेतना मनाष की ऐसा अब कुछ करना होगा

आग पहन कर प्रतिभा को तूफानो से गुजरना होगा

पुस्तक में बंद चरित्रों को धरती पर उतरना होगा 

ढूंढो इस वसुधा में पूण्य कमाने वाले कहाँ गये ।

झूठ का अंधकार फैला है सच के उजाले कहाँ गए

बड़े ख्वाब और झूठे स्वप्न दिखाने वाले कहां गए।


                       भगवान सिंह रावत (स्वरचित)