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Thursday, January 29, 2015

प्यार तुम्हारा


प्यार तुम्हारा 

तुम साथ मेरे नहीं तो क्या ,
प्यार तुम्हारा आज भी है। 
फूल सी कोमल बाँहों का
वो हार तुम्हारा आज भी  है ।
लुकती छिपती धुप छाँव सी ,
तेरी मेरी प्रीत सही ।
विरह वेदना से तड़पते ,
तेरे मेरे गीत सही ।
दकियानूसी  सोच निभाती,
दुनिया की ये रीत सही ।
मेरे दिल की धड़कन पर ,
अधिकार तुम्हारा आज भी है । 
तुम साथ मेरे नही तो क्या
प्यार तुम्हारा आज भी है। 
मुस्किल के उस दौर में तुमने ,
जीना मुझे सिखाया था ।
दुनिया के हर आडम्बर का ,
चेहरा मुझे दिखाया था ।
नफरत की तेज हवाओं में ,
प्यार का दीप  जलाया था ।
उस दीपक से  जगमगाता,
संसार तुहारा आज भी है ।
 तुम साथ मेरे नही तो क्या  
प्यार तुम्हारा आज भी है।
उम्र ढूंढती तरस रही है 
प्यार तुम्हारा पाने को ।
प्यार का तो अहसास बहुत है ,
मरने को मिट जाने को  
कुछ भी नहीं इस धरा पर ,
यूँ तो दिल लगाने को
मेरे इस दीवानेपन को,
इन्तजार तुम्हारा आज भी है
तुम साथ मेरे नही तो क्या 
प्यार तुम्हारा आज भी है ।  
फूल सी कोमल बाँहों का
वो हार तुम्हारा आज भी  है  

                               भगवान सिंह रावत  दिल्ली 
                                        (स्वरचित)

Monday, December 29, 2014

आदमी

                                                                                  आदमी

इस जीवन में अपनी खातिर ,
कब जी पाता  है आदमी
सच्चे दिल से पूछके देखो ,
आँख चुराता है आदमी
बचपन में बडों कi डर ,
अव्वल आने की फिकर ,
कहना सुनना दूर की बात ,
कम क्यूं आये हैं नंबर
क्या कहे क्या कहे ,
बस हकलाता है आदमी
इस जीवन में अपनी खातिर ,
कब जी पाता  है आदमी।
उम्र बढ़ी तो जागे सपने ,
कुछ उम्मीदें लगी पनपने ,
तभी  कहर कुछ ऐसा बरपा ,
लगे मानाने मेरे अपने
फेरों के बंधन में जाने ,
कब बंध  जाता है आदमी ,
इस जीवन में अपनी खातिर ,
कब जी पाता  है आदमी।
कब बीता ये प्यारा बचपन
जाने कब आगई   जवानी ,
दरिया पर जो बाँध लगा तो।
उम्मीदों पर फिर गया पानी
दिखता सबको जिन्दा है पर
खुद मर जाता है आदमी ,
इस जीवन में अपनी खातिर ,
कब जी पाता  है आदमी।
जरूरतों के बोझ तले
समस्याओं  से घिरा हुआ  ,
मन की बात समझे कोई
और  कहे शरफिरा हुआ
अपने सा  मिल जाये कहीं तो ,
रो रो जाता है आदमी ।  
इस जीवन में अपनी खातिर ,
कब जी पाता  है आदमी।
            भगवान  सिंह रावत (स्वरचित)

Thursday, September 18, 2014

जिंदगी ।

             जिंदगी

चेहरो पर मुखौटे हैं इनको क्या देखें ,
भीतर कुछ और ही होती  जिंदगी
रात के अंधेरों में जागती रहती है ,
पल भर भी नहीं सोती है जिंदगी
दुनिआ के मेले में  झंझट झमेले  में,
बिलकुल अकेली ही होती है जिंदगी
भीतर के जख्मो को कब किसने बांटा है ,
खुद अपना सलीब ढोती है जिंदगी
बैभव समेटने को उम्र कम पड़ती है ,
बदले में  कितना कुछ खोती है जिंदगी |
जीवन के उपवन मैं माया के  बंधन   में,
 रिश्तों के मोती पिरोती है जिंदगी  |
खुद के गुनाहों को कुदरत के घावों को ,
आस्था की गंगा मे धोती है जिंदगी |
खुद में  जब झाँका और दोषी पाया ,
करुणामय  होकर  रोती  है जिंदगी |
चेहरे बदलते हैं इन पर मत जाओ ,
भीतर कुछ और ही होती  जिंदगी

            भगवान सिंह  रावत  (स्वरचित)


Sunday, June 8, 2014

दौड़ती भागती है जिन्दगी

 दौड़ती भागती है जिन्दगी
.....................................

कितना दौड़ती भागती है जिन्दगी
नींद मैं भी देखो जागती है जिन्दगी ।
जन्म क्या लिया गुनाह करदिया
हर कदम पे सिला मांगती है जिंदगी ।
सपने बुनती है तोडती मरोड़ती है
अपने अनुभव से फिर उसे जोडती है ।
कुलांचे भरती है सब कुछ रौन्ध्ती है
पीछे नहीं देखती बस आगे ही दौड़ती है ।
नियमों के बंधन को ताक पर रख कर
खुद को कुछ अलाग ही आंकती है जिंदगी । कितना दौड़ती.........।
छोटी सी बात पर रूठ रूठ जाती है
अपनों को गैरों को सबको सताती है ।
सच के  उजाले को खुद मैं छुपाकर
झूठ के लबादे मैं खुद छुप जाती है ।
बदलते चेहरों की दुनिया मैं आकर
झूठ और फरेब को हांकती है जिंदगी । कितना दौड़ती..............।
कितना दुःख होता है जब अपनों को खोती है
करुणा के साये मैं खुद को पिरोती है ।
रोती है बिलखती हो लिपट लिपट जाती है
बैर भाव मन मुटाव आंसुओं से धोती है ।
दिल से लगाती हैै तब हर किसी चीज को
कुदरत के मूल्यों मैं जब झांकती है जिन्दगी ।
कितना दौड़ती भागती है जिन्दगी
नींद मैं भी देखो जागती है जिन्दगी ।
जन्म क्या लिया गुनाह कर दिया
हर कदम पे सिला मांगती है जिन्दगी ।

Thursday, March 27, 2014

गुमराह सी जिंदगी

       
   

भूलती भटकती गुमराह सी जिंदगी
क्यूँ नहीं हो जाती एक राह  सी जिंदगी ।
             जीवन के मूल्यों को मिटाती बनाती है
             नियमों के बाँध भी खुद ही लगाती है ।
             गैरों का दखल मंजूर नहीं होता
             छोटी सी  बात पर रूठ रूठ जाती है ।
अपनों से गैरों से लड़ते झगड़ते
लगती है जैसे गुनाह सी जिंदगी ।  भूलती भटकती  ……।
             बड़े बड़े सपने पर जीवन तो बौना है
             नियति के हाथों में हर कोई खिलौना है ।
             वसुधा के साये में भ्रमित है हर कोई
             यहीं से पाया है यहीं पर खोना है ।
उम्र नप जााती है कुछ ढूँढ़ते विचरते
लगता है जैसे चरवाह सी जिंदगी ।   भूलती भटकती  ……।
              अन्न तो बिखरा है खेतों खलियानों में
              फूलों के मेले  भी लगते बागानों में ।
              सरिता का पावन जल सबके लिए है
              फर्क नहीं होता उसके पैमानों मैं।
सबकुछ है फिर भी कुछ रीता सा लगता है
लगता है जैसे एक चाह  सी जिंदगी।   भूलती भटकती  ……।
              कभी कभी रोना है कभी मुस्कुराना है
              रूठना है कभी और कभी मनाना  है ।
              अंदर कि पीड़ा तो खुद को ही सहनी  है
              अपना सलीब भी खुद ही उठाना है ।
हार कर जाना है कुदरत के साये मैं ।
लगता है जैसे पनाह सी जिंदगी ।
भूलती भटकती गुमराह सी जिंदगी
क्यूँ नहीं हो जाती एक राह  सी जिंदगी ।

                                             भगवान सिंह रावत       

Monday, September 16, 2013

तुम कहाँ हो

तुम कहाँ हो ,
तुम्हारी कमी अब बहुत खलने लगी है
अंधेरों के डर से
मेरी नजर से
रौशनी भी अब रेत की तरह फिसलने लगी है
उम्र की दोपहर चिलचिलाती धूप  से तिलमिलाकर दम तोड़ने लगी है
लोगों के परिहास से
टूटते विस्वास से
उम्मीदें मायूसी मैं बदलने लगी है
समय का सारथी बेरहमी से सबको कुचलता हुआ रथ को हांक रहा है
रंग बदलता आसमान
निशाचर  की मुस्कान
अन्धेरा सब कुछ निगलने को धरती पर झाँक रहा है
जिंदगी अब बैराग की लों में जलने लगी है 
तुम्हारी कमी अब बहुत खलने लगी है
विश्वास की कोख से व्यभिचार जन्म होने  लगा है
बाबाओं के देश मैं
झूठ और ढोंग के परिवेश में
मनुष्य अनचाही आस्थाओं को ढोने लगा है
अनुभव से आश्रिवाद से जैसे रूठ गया है
विवेक शर्मसार है
व्याप्त अहंकार है
प्रेरणा से कर्म का साथ छूट गया है
हर चौराहे पर भीड़ जुटाकर हर कोई प्रवचन सुनाता है
सच की   चादर मोड़कर
झूठ का लबादा ओढ़कर
अपने आप को  को भगवान् बताता है
अन्न की जगह अब आग की फसल ज्यादा खिलने लगी है
वम्नस्य  और अलगाव
मद और क्रोध के गिरते भाव
नफरत तो जैसे मुफ्त मैं मिलने लगी है
प्रतिभाएं भी अब स्वभाव बदलने लगी है
तुम्हारी कमी अब बहुत खलने लगी है
अहसासों के सैलाब मैं एक उम्मीद थी तुम्हे पाने की
एक बार तुम्हे छूने की
तुम्हारे मुस्कुराने की
और फिर वक्त के वहीँ पर थम जाने की
और थम हुआ वक्त खुद को युगों में बदल डाले
अजंता की हो जैसे मूरत
प्रतिमाओं जैसी हो सूरत
और इतिहास हमें अपने आप में छुपाले
वसुंधरा प्रेम के गीत गाती गुनगुनाती रहे
पंछी चहकते रहें
फूल यूं ही महकते रहें
सरिता की लहरें यूंही बलखाती रहें
वक्त की वो  सुबह देखने को तबियत मचलने लगी है  

तुम्हारी कमी अब बहुत खलने लगी है।
तुम्हारी कमी अब बहुत खलने लगी है 


          भगवान सिंह रावत  (स्वरचित)

Wednesday, March 6, 2013

आम आदमी


 आम आदमी

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क्या चीज हो रहा आम आदमी,
नाचीज हो रहा आम आदमी |
           संघर्षों का बोझ पीठ पर,
           ता ऊम्र धो रहा आम आदमी |
थका थका सा हारा हारा ,
जाने कितनी दूर किनारा |
         सुबिधाओं की बाट जोहते ,
         बीत गया ये जीवन सारा |
हाथ लगी जो नाउम्मीदी ,
खुद ही रो रहा आम आदमी | क्या चीज हो.........|
         सुबह शाम बस काम ही काम
         बिना काम के कहाँ है दाम |
हाड़तोड़ मेहनत ही है बस ,
नहीं चैन और ना आराम |
         थकी जहां ये बोझिल पलकें ,
         वहीँ सो रहा आम आदमी | क्या चीज हो.........|
कहीं दीखता नहीं सुधार ,
मंहगाई की सीधी मार |
          वायु यान के यूग मैं भी,
          चींटी सी चाल चले सरकार|
क्या पाया है हमने अबतक .
क्या खो रहा है आम आदमी |  क्या चीज हो.........|
          कभी तो बदले वक्त की नियत ,
          कोई तो हो ऐसी सख्सियत |
नकली चेहरों के शहर में ,
कोई तो होगी असली सूरत |
          सदियों से बंजर धरती पर ,
          स्वप्न बो रहा आम आदमी |
क्या चीज हो रहा आम आदमी,
नाचीज हो रहा आम आदमी |
          संघर्षों का बोझ पीठ पर,
          ता ऊम्र धो रहा आम आदमी |   

                    भगवान सिंह रावत। (सर्वाधिकार सुरक्षित)