आदमी
इस जीवन में
अपनी खातिर ,
कब जी पाता है
आदमी
सच्चे दिल से
पूछके देखो ,
आँख चुराता है आदमी
।
बचपन में बडों
कi डर ,
अव्वल न आने
की फिकर ,
कहना सुनना दूर की
बात ,
कम क्यूं आये हैं
नंबर ।
क्या कहे क्या
न कहे ,
बस हकलाता है आदमी
।
इस जीवन में
अपनी खातिर ,
कब जी पाता है
आदमी।
उम्र बढ़ी तो
जागे सपने ,
कुछ उम्मीदें लगी पनपने
,
तभी कहर
कुछ ऐसा बरपा
,
लगे मानाने मेरे अपने
।
फेरों के बंधन
में जाने ,
कब बंध
जाता है आदमी
। ,
इस जीवन में
अपनी खातिर ,
कब जी पाता है
आदमी।
कब बीता ये
प्यारा बचपन
जाने कब आगई जवानी
,
दरिया पर जो
बाँध लगा तो।
उम्मीदों पर फिर
गया पानी ।
दिखता सबको जिन्दा
है पर
खुद मर जाता
है आदमी ।
,
इस जीवन में
अपनी खातिर ,
कब जी पाता है
आदमी।
जरूरतों के बोझ
तले
समस्याओं से
घिरा हुआ ,
मन की बात
समझे न कोई
और कहे
शरफिरा हुआ ।
अपने सा मिल जाये कहीं तो ,
रो रो जाता है आदमी
।
इस जीवन में
अपनी खातिर ,
कब जी पाता है
आदमी।भगवान सिंह रावत (स्वरचित)
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