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Monday, June 6, 2022

पहचान

 पहचान


मायूस न हो अपनी पहचान को लेकर

खामोशी की भी अलग पहचान होती है।

यूँ ही नहीं आजाती बहार गुलशन में

दर्द में भी उनके चेहरे पे मुस्कान होती है।

वक़्त भले ही उम्र पर अपनी छाप छोड़ दे

जिद्द उनकी हमेशा जवान होती है।

विमुख ना होना अपने लक्ष्य से कभी

सत्कर्मों की सोच  हमेशा महान होती है।

मुश्किलों का सैलाब तेरे कदम रोकेगा

कांटो  भरी राहें कब आसान होती हैं।

झूठ बिना पैर के दौड़ने लग जाता है

सच्चाई अक्सर लहू लुहान होती है।

तराशने  का हुनर हो तो बोल उठती है

कोई भी चीज जो बेजुबान होती है।


                     भगवान सिंह रावत

                           (स्वरचित)

Monday, May 16, 2022

धीरे धीरे बीत गए सब

               धीरे धीरे बीत गए सब

             ----------------------------



धीरे धीरे बीत गए सब 

मांग के लाये थे जो दिन

कुछ बीते अर्जित करने में 

कुछ बीते  तारे गिन गिन

रोता आया हंस ना सका 

मुठी में कुछ कस ना सका

घऱ तो बहुत बनाये लेकिन 

कभी उनमे खुद बस न सका

पल में  फिसल गये  मुठी से

 जीवन के प्यारे पल छिन।

धीरे धीरे ...................।

तांक झांक जीवन भर की

खुद में कभी न झांक सका

सबका मोल लगाया तूने

खुद को कभी न आंक सका

खुद में ही खो गया तू खुद ही

खुद से तो खुद गया है छिन।

धीरे धीरे....................।

सूरज को बस धुप  ही समझ

छाँव को समझ गया अंधियारा

धरती को बस मिट्टी समझा

और सोच को किया किनारा

रात को रात न।समझा  सका

और ना समझा दिन को दिन।

धीरे धीरे बीत गए सब 

मांग के लाये थे जो दिन

कुछ बीते अर्जित करने में 

कुछ बीते  तारे गिन गिन . 


              भगवान सिंह रावत (स्वरचित)



Saturday, April 9, 2022

पहचान

 पहचान


मायूस न हो अपनी पहचान को लेकर

खामोशी की भी अलग पहचान होती है।

यूँ ही नहीं आजाती बहार गुलशन में

दर्द में भी उनके चेहरे पे मुस्कान होती है।

वक़्त भले ही उम्र पर अपनी छाप छोड़ दे

जिद्द उनकी हमेशा जवान होती है।

विमुख ना होना अपने लक्ष्य से कभी

सत्कर्मों की सोच  हमेशा महान होती है।

मुश्किलों का सैलाब तेरे कदम रोकेगा

कांटो  भरी राहें कब आसान होती हैं।

झूठ बिना पैर के दौड़ने लग जाता है

सच्चाई अक्सर लहू लुहान होती है।

तराशने  का हुनर हो तो बोल उठती है

कोई भी चीज जो बेजुबान होती है।


                     भगवान सिंह रावत

                            (स्वरचित)

जीना सीख ले

 जख्म मिले हैं तो सीना सीखले।

दर्द को भी खुद  पीना  सीखले।

तेरे आंसुओं का कुछ मोल नही यहां।

झूटी हंसी दिखा कर जीना सीख ले।


मिलते हैं शैतान यहां साधुओं के वेश में।

नफरत छुप कर बैठी है एक झूठे परिवेश में।

मोम का दिल  लेकर तू चला कहाँ  पगले ।

कोई नहीं पिघलता यहां पत्थरों के देश में


हंस  लेता हूँ कभी दीवानों की तरह।

जिंदिगी का हर पन्ना है अफसानों की तरह।

यूं तो कहने कोअपनो के बीचमें  हूँ।

 रहता हूँ अक्सर बेगानों की तरह।


निराशाओं से जूझता रहा

जख्मों को सीता रहा।

नाउम्मीदियो  के साये में

कुंठाओं को पीता रहा।

जिंदगी तुझे जीने के लिए

जिंदगी भर यूं ही। जीता रहा।


                             भगवान सिंह रावत

                                     स्वरचित

Friday, April 24, 2020

भीड़ भरे इस कोलाहल से

भीड़ भरे इस कोलाहल से
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भीड़ भरे इस कोलाहल से
दूर कहीं चलते हैं
चल दूर कहीं चलते हैं।
चित परिचित व्यवहार भी देखे
चेहरे पर संस्कार भी देखे 
संघर्षों से टूट चुके जो
बहुतेरे लाचार भी देखे                                                      झूटी शान दिखाने वाले
भीतर से बीमार भी देखे
सच का गला दबाने वाले
झूठ के पहरेदार भी देखे
ईर्ष्या ध्वेष और घृणा देखी
नफरत के बाजार भी देखे
आस्थाओं में छुप कर बैठे
झूठे और मक्कार भी देखे
स्वार्थ के इस सैलाब मे लोग
नित नित अक्स बदलते हैं। 
दूर कहीं चलते हैं।

गांव उजड़ कर शहर बन गए
ये कैसा विकाश  हुआ।
संस्कारों की जली चिताएं
परंपरा का नाश हुआ।
अपने सभी हो गए पराये
परदेशी पर खास हुआ।
सच से दूर हुए हैं अक्सर
झूठ पे झट विस्वास हुआ।
अयोग्यता को मान मिला
प्रतिभा का परिहास हुआ।
परिश्रम से विमुख आदमी
और वैभव का दास हुआ।
गलियारे तो चीख रहे हैं
महल में हर्षोल्लास हुआ।
मानवता की धरती पर क्यों
अंतर इतना खास हुआ।
बंद किताबों के नायक क्यों
बाहर नही निकलते हैं।
चल दूर कहीं चलते हैं।

नकली चेहरे पहन के होता
अतिथि का सम्मान यहां
बिकी हुई दीक्षा से करते
सब गुरुओं का मान यहां
बंटी हुई श्रद्धा से होता
ईश्वर का गुणगान यहां
बैभव भरे पात्र में अक्सर
बरस रहा है दान यहां।
समृद्धि के बल पर पलते
हैं नकली भगवान यहां।
भ्रष्ट व्यवस्था मे कैसे हो
असली की पहचान यहां।
साधू की टोली मे छुपकर
बैठा है शैतान यहां।
भ्रष्ट चपल अधम से ऊपर
आज नही इंसान यहाँ।
करुणा दया भाव देखकर
पत्थर नही पिघलते हैं।

चल दूर कहीं चलते हैं
भीड़ भरे इस कोलाहल से
दूर कहीं चलते हैं।
चल दूर कहीं चलते हैं।

                        भगवान सिंह रावत
                       (सर्वाधिकार सुरक्षित)

Tuesday, August 8, 2017

चल दूर कहीं चलते हैं |

चल दूर कहीं चलते हैं  
जहाँ रात नहीं होती है 
दिन कभी नहीं ढलते हैं  | 
जहाँ अन्न का कोई तोल  नहीं 
रोटी का कोई मोल नहीं 
दिलों में सरहद पैदा करदे 
ऐसा कोई भूगोल नहीं 
नफरत का सैलाब  नहीं 
प्यार के दिए जलते हैं  | चल दूर कहीं। ..... | 
जहाँ दुविधा में  इंसान नहीं  
बिका हुआ ईमान नहीं 
साधु के चोले  में कोई 
छिपा हुआ शैतान  नहीं 
वक्त भले ही बदले लेकिन 
चेहरे नहीं बदलते हैं   चल दूर कहीं। ..... | 
सुविद्या से लाचार  नहीं 
मन से कोई बीमार नहीं 
उजले स्वेत वस्त्रों के पीछे 
कोई काली सरकार नहीं 
बिना गबन घोटालों के जहाँ 
रोज अख़बार निकलते हैं   चल दूर कहीं। ..... | 
जहाँ कोई कहीं गुरूर नहीं 
धर्म दया से दूर नहीं 
मद मैं आकर प्रतिभाएं 
वैभव में कहीं चूर नहीं 
करुणा से संताप मिटाकर 
हर्ष के अश्रु निकलते हैं  | 
चल दूर कहीं चलते हैं 
जहाँ रात नहीं होती है 

 दिन कभी नहीं ढलते हैं 

चल दूर कहीं चलते हैं | 
                                भगवान सिंह रावत  (सर्वाधिकार सुरक्षित )


Sunday, April 9, 2017

अब आ भी जाओ

कहाँ हो तुम अब भी जाओ
या फिर अपना जहाँ बताओ
जंतर मंतर जादू टोना
छान लिया धरती का कोना
भीड़ भरे इस कोलाहल में
नहीं दिखा वो रूप सलोना
गांव गांव और शहर शहर में
जंगल बीहड़ नगर नगर में
निष्ठुर बन कर बैठे हो तुम
गुमनामी की किसी डगर में
चमन से और बहार से पूछा
फूलों की कतार से पूछा
जंगल के सैलाब से पूछा
नदिओं की हर धार से पूछा
धरा के हर कण कण में देखा
खंडहर के  अम्बार से पूछा
निशा दिवस में कहीं नहीं थे
सावन की फुहार से पूछा
थक कर बोझिल मन से आखिर
निर्मोही संसार से पूछा 
मायूसी के झंझावात में
क्यों जकड़े हो मुझे बताओ बताओ
कहाँ हो तुम अब भी जाओ
या फिर अपना जहाँ बताओ
बर्फीला गिरिराज  पुकारे
गुमसुम जो  सांज पुकारे
वन उपवन सब  अलसाये हैं
घायल  सा ऋतुराज पुकारे
फूलों में वो बात कहाँ है
गीतों में जज्बात कहाँ है
बिना तुम्हारे लिख पाऊं मैं 
ऐसे भी हालात कहाँ हैं
उम्र बह रही पानी जैसे
रोक सकूँ औकात कहाँ है
झुलसा रही है विरह वेदना
भादों की बरसात कहाँ है
बीते दिन महीने साल
पर तुमको कुछ कहाँ मलाल
सर्द  हवाएँ चुभती हैं अब
बेगाने  से झरने, ताल
हरे भरे इस मौसम में  भी
पतझड़ सा है दिल का हाल
रिम झिम रिम झिम करता सावन
बहुत रुलाता है हर साल
कर लूँगा पहचान तुम्हारी
प्यार का कोई गीत सुनाओ
कहाँ हो तुम अब भी जाओ
या फिर अपना जहाँ बताओ
काश अभी गर  तुम आजाते
पुनः प्रीत की रीत  निभाते
नए भाव स इस धरती पर 
एक नया आकाश  बनाते
धूप का एक छोटा सा टुकड़ा
अंजुली भर बस छाँव बिछाते
नफरत की भीषण आंधी में
अमर प्रेम  का दीप जलाते
 प्रीत पहनते प्रीत  ओढ़ते
प्रीत को एक आधार बनाते
अपमानित हो रही प्रीत को 
ऊँचे शिखरों तक पहुँचाते
प्राण फूंकदे पत्थर में जो
मिलकर ऐसे गीत बनाते
आँहें भरती मंद हवाएं
वन उपवन भी व्यथा सुनाते
तेरे मेरे सब के दुःख में
तरूवर भी जब अश्रु बहाते
भ्रमित होती आस्थाओं में
एक नया विश्वास  जगाते
तुम होते जो साथ हमारे
जाने हम क्या क्या कर जाते
मुक्त करो उन कुंठाओं को
एक नया इतिहास  बनाओ  
कहाँ हो तुम अब भी जाओ
या फिर अपना जहाँ बताओ

भगवान सिंह रावत      (सर्वाधिकार सुरक्षित )