जख्म मिले हैं तो सीना सीखले।
दर्द को भी खुद पीना सीखले।
तेरे आंसुओं का कुछ मोल नही यहां।
झूटी हंसी दिखा कर जीना सीख ले।
मिलते हैं शैतान यहां साधुओं के वेश में।
नफरत छुप कर बैठी है एक झूठे परिवेश में।
मोम का दिल लेकर तू चला कहाँ पगले ।
कोई नहीं पिघलता यहां पत्थरों के देश में
हंस लेता हूँ कभी दीवानों की तरह।
जिंदिगी का हर पन्ना है अफसानों की तरह।
यूं तो कहने कोअपनो के बीचमें हूँ।
रहता हूँ अक्सर बेगानों की तरह।
निराशाओं से जूझता रहा
जख्मों को सीता रहा।
नाउम्मीदियो के साये में
कुंठाओं को पीता रहा।
जिंदगी तुझे जीने के लिए
जिंदगी भर यूं ही। जीता रहा।
भगवान सिंह रावत
स्वरचित
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