या फिर अपना
जहाँ बताओ
जंतर मंतर जादू
टोना
छान लिया धरती
का कोना
भीड़ भरे इस
कोलाहल में
नहीं दिखा वो
रूप सलोना
गांव गांव और
शहर शहर में
जंगल बीहड़ नगर
नगर में
निष्ठुर बन कर
बैठे हो तुम
गुमनामी की किसी
डगर में
चमन से और
बहार से पूछा
फूलों की कतार
से पूछा
जंगल के सैलाब
से पूछा
नदिओं की हर
धार से पूछा
धरा के हर
कण कण में
देखा
खंडहर के
अम्बार से पूछा
निशा दिवस में
कहीं नहीं थे
सावन की फुहार
से पूछा
थक कर बोझिल
मन से आखिर
निर्मोही संसार से पूछा
मायूसी के झंझावात
में
क्यों जकड़े हो
मुझे बताओ बताओ
कहाँ हो तुम
अब आ भी
जाओ
या फिर अपना
जहाँ बताओ
बर्फीला गिरिराज पुकारे
गुमसुम जो
सांज पुकारे
वन उपवन सब अलसाये
हैं
घायल सा
ऋतुराज पुकारे
फूलों में वो
बात कहाँ है
गीतों में जज्बात
कहाँ है
बिना तुम्हारे लिख पाऊं
मैं
ऐसे भी हालात
कहाँ हैं
उम्र बह रही
पानी जैसे
रोक सकूँ औकात
कहाँ है
झुलसा रही है
विरह वेदना
भादों की बरसात
कहाँ है
बीते दिन महीने
साल
पर तुमको कुछ कहाँ
मलाल
सर्द हवाएँ
चुभती हैं अब
बेगाने से
झरने, ताल
हरे भरे इस
मौसम में भी
पतझड़ सा है
दिल का हाल
रिम झिम रिम झिम करता
सावन
बहुत रुलाता है हर
साल
कर लूँगा पहचान तुम्हारी
प्यार का कोई गीत सुनाओ
कहाँ हो तुम
अब आ भी
जाओ
या फिर अपना
जहाँ बताओ
काश अभी गर तुम आजाते
पुनः प्रीत की रीत निभाते
नए भाव स इस धरती पर
एक नया आकाश बनाते
धूप का एक छोटा सा
टुकड़ा
अंजुली भर बस छाँव
बिछाते
नफरत की भीषण आंधी
में
अमर प्रेम का दीप जलाते
प्रीत पहनते प्रीत ओढ़ते
प्रीत को एक आधार बनाते
अपमानित हो रही प्रीत
को
ऊँचे शिखरों तक पहुँचाते
प्राण फूंकदे पत्थर
में जो
मिलकर ऐसे गीत बनाते
आँहें भरती मंद हवाएं
वन उपवन भी व्यथा सुनाते
तेरे मेरे सब के दुःख
में
तरूवर भी जब अश्रु
बहाते
भ्रमित होती आस्थाओं
में
एक नया विश्वास जगाते
तुम होते जो साथ हमारे
जाने हम क्या क्या
कर जाते
मुक्त करो उन कुंठाओं
को
एक नया इतिहास बनाओ
कहाँ हो तुम
अब आ भी
जाओ
या फिर अपना
जहाँ बताओ
भगवान सिंह रावत (सर्वाधिकार सुरक्षित )
भगवान सिंह रावत (सर्वाधिकार सुरक्षित )

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