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Saturday, October 1, 2011

ख़ामोशी

                 ख़ामोशी 
पानी की तरह शीतल है तू 
हवावों  सा मदहोश है तू 
वर्षों से जिसे ठुकराया  गया 
ये प्यार मेरे खामोश है तू 
नदिया के दोनों छोरों सा 
चंदा और चकोरों सा 
कान्हा और राधा के जैसा 
मुरली और ग्वाल के छोरों सा 
इस युग मैं तेरी कद्र नहीं 
उस युग का विजय घोष है तू   पानी की तरह .......
जेष्ठ की तपती धुप है तू 
सावन में मेघ का रूप है तू 
बसंती रंग मैं रंगा रंगा 
उज्वल वसुधा का रूप है तू 
सहज है सम्पूर्ण  है तू 
सम्मानित है संतोष है तू        पानी की तरह .......   
प्रेम तो है एक राज यहाँ 
गूंजती है आवाज यहाँ 
अभिनय तो सारे करते हैं 
पर सारे  सौदेबाज यहाँ
अहसास है अशक्ति है 
आलिंगन है आगोश है तू        पानी की तरह .......  

ख़ामोशी

            ख़ामोशी 
पानी की तरह शीतल है तू 
हवावों  सा मदहोश है तू 
वर्षों से जिसे ठुकराया  गया 
ये प्यार मेरे खामोश है तू 
नदिया के दोनों छोरों सा 
चंदा और चकोरों सा 
कान्हा और राधा के जैसा 
मुरली और ग्वाल के छोरों सा 
इस युग मैं तेरी कद्र नहीं 
उस युग का विजय घोष है तू   पानी की तरह......

जेष्ठ की तपती धूप  है तू 
सावन में मेघ का रूप है तू 
बसंती रंग मैं रंगा रंगा 
उज्वल वसुधा का रूप है तू 
सहज है सम्पूर्ण  है तू 
सम्मानित है संतोष है तू      पानी की तरह.......
प्रेम तो है एक राज यहाँ 
गूंजती है आवाज यहाँ 
अभिनय तो सारे करते हैं 
पर सारे  सौदेबाज यहाँ
अहसास है आशक्ति है 
आलिंगन है आगोश है तू      पानी की तरह.......

Saturday, March 26, 2011

उत्तराखंडी वीर


जाग उत्तराखंडी वीर  जाग जाग और जगा
विपत्ति मै पहाड़ है विजय ध्वजा उठा उठा
रंगों का उत्सव नहीं ये तो रक्त फाग है
प्रेम की बंसी पे छिड़ा मौत का ये राग है
शत्रु  तेरे सामने तुणीर ओ तरकश उठा .....जाग उत्तराखंडी वीर
अमन ओ चैन हो यहाँ तू भेद भाव तोड़ दे
सब को सब समझ सकें तू दिलों को जोड़ दे
नफरतों की आँधियों मै प्यार के दीपक जला ....जाग उत्तराखंडी वीर
सपूत है धरा तू धरा के गीत गाये जा
जान की बाजी लगे तो हंस के तू लगाये जा
पुजारी हैं हम प्रेम के सबको  तू बता बता 
जाग उत्तराखंडी वीर  जाग जाग और जगा
विपत्ति मै पहाड़ है विजय ध्वजा उठा उठा.

Wednesday, March 9, 2011

आदमी



            आदमी

आदमी उदंड सा ,आदमी घमंड सा
वसुधा के प्रांगण में कंकड़ के खंड सा 
 मुश्किलों से डरता सा वैभव को चरता  सा
तन मन से खोकरा.फिर भी दम भरता सा
डसता हुआ नाग सा, बेसुरा राग सा ,
वसुधा के माथे पर कलंक सा ,दाग सा ,
बेवजह रोता सा, पर कांटे बोता सा ,
अर्थहीन जीवन को काँधे पर ढोता सा ,
लम्बी सी आयु का भुगत रहा दंड सा ,,,,,,आदमी उदंड .
वीभत्स कुरूप सा जीर्ण हुआ कूप सा ,
देवों की पंक्ती में निशाचरस्वरुप सा ,
वाणी से क्रूर सा अपनों सा दूर सा ,
अहित कहीं करने को बाध्य सा मजबूर सा ,
कभी राणा सांघा और कभी जयचंद सा ,
खूब सूरत काव्य में अनावश्यक छंद सा ,
शुष्क सा वक्र सा बंजर भूखंड सा .........आदमी उदंद

                     भगवान सिंह रावत (स्वरचित)

Saturday, February 19, 2011

आदमी

आदमी

आदमी उदंड सा ,आदमी घमंड सा
वसुधा के प्रांगण में कंकड़ के खंड सा 
 मुश्किलों से डरता सा वैभव को चरता  सा
तन मन से खोकरा.फिर भी दम भरता सा
डसता हुआ नाग सा, बेसुरा राग सा ,
वसुधा के माथे पर कलंक सा ,दाग सा ,
बेवजह रोता सा, पर कांटे बोता सा ,
अर्थहीन जीवन को काँधे पर ढोता सा ,
लम्बी सी आयु का भुगत रहा दंड सा ,,,,,,आदमी उदंड .
वीभत्स कुरूप सा जीर्ण हुआ कूप सा ,
देवों की पंक्ती में निशाचरस्वरुप सा ,
वाणी से क्रूर सा अपनों सा दूर सा ,
अहित कहीं करने को बाध्य सा मजबूर सा ,
कभी राणा सांघा और कभी जयचंद सा ,
खूब सूरत काव्य में अनावश्यक छंद सा ,
शुष्क सा वक्र सा बंजर भूखंड सा .........आदमी उदंड

Monday, January 24, 2011

टिहरी की झील पर एक कविता

तैरती परछाइयां  

उभरती इस झील
में तैरती  परछाइयां 
अब केवल हम हैं और ये  तन्हाइयां 
              कुछ  दिन पहले यहाँ  कुछ सपने थे 
              कुछ पराये थे पर  कुछ अपने थे 
सांसें थी आहे थी उज्वल निगाहें थी 
बाधाओं को चीरती गंतव्य भरी राहें थी 
                बचपन था जवानी थी अदाएं दीवानी थी 
                गलियों मैं विचरती अगणित कहानी थी 
उमंग और उन्माद था हर्ष और उल्लाश था 
कर्म था जीवन था  दर्द और अहसास था 
                 जिनगी हंसती थी बजती थी शहनाइयाँ 
                 उभरती इस झील मैं तैरती परछाइयां 
वक्त जैसे थम गया हर  सक्श जैसे जम्म गया 
झील के सौंदर्य मैं हर कोई अब राम गया 
                    बंद दरिया के किनारे अब सभी ख़ामोश हैं
                   और  मौजों के वो धारे बस झील का आगोश है 
याद ही बस रह गयी है सब कहानी बह गयी है 
दूर तक जाती निगाहें अब जबानी रह गयी है 
                   भोर और दोपहर आई और फिर दिन ढल गया 
                      हर तरफ विकाश का एक पहिया चल गया 
भूल बैठे हम हमारे पूर्वजों की साख को 
याद रखने को है बस अब झील की  सच्चाइयां 
                       उभरती इस झील मैं तैरती  परछाइयां 
                       अब केवल हम हैं और ये  तन्हाइयां

                              भगवान सिंह रावत (स्वरचित)