
तैरती परछाइयां
अब केवल हम हैं और ये तन्हाइयां
कुछ दिन पहले यहाँ कुछ सपने थे
कुछ पराये थे पर कुछ अपने थे
सांसें थी आहे थी उज्वल निगाहें थी
बाधाओं को चीरती गंतव्य भरी राहें थी
बचपन था जवानी थी अदाएं दीवानी थी
गलियों मैं विचरती अगणित कहानी थी
उमंग और उन्माद था हर्ष और उल्लाश था
कर्म था जीवन था दर्द और अहसास था
जिनगी हंसती थी बजती थी शहनाइयाँ
उभरती इस झील मैं तैरती परछाइयां
वक्त जैसे थम गया हर सक्श जैसे जम्म गया
झील के सौंदर्य मैं हर कोई अब राम गया
बंद दरिया के किनारे अब सभी ख़ामोश हैं
और मौजों के वो धारे बस झील का आगोश है
याद ही बस रह गयी है सब कहानी बह गयी है
दूर तक जाती निगाहें अब जबानी रह गयी है
भोर और दोपहर आई और फिर दिन ढल गया
हर तरफ विकाश का एक पहिया चल गया
भूल बैठे हम हमारे पूर्वजों की साख को
याद रखने को है बस अब झील की सच्चाइयां
उभरती इस झील मैं तैरती परछाइयां
अब केवल हम हैं और ये तन्हाइयां
भगवान सिंह रावत (स्वरचित)
परछाईं जब करती हैं परछाईं से बात
ReplyDeleteतब नहीं होती है समझ लें मुलाकात