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Saturday, February 19, 2011

आदमी

आदमी

आदमी उदंड सा ,आदमी घमंड सा
वसुधा के प्रांगण में कंकड़ के खंड सा 
 मुश्किलों से डरता सा वैभव को चरता  सा
तन मन से खोकरा.फिर भी दम भरता सा
डसता हुआ नाग सा, बेसुरा राग सा ,
वसुधा के माथे पर कलंक सा ,दाग सा ,
बेवजह रोता सा, पर कांटे बोता सा ,
अर्थहीन जीवन को काँधे पर ढोता सा ,
लम्बी सी आयु का भुगत रहा दंड सा ,,,,,,आदमी उदंड .
वीभत्स कुरूप सा जीर्ण हुआ कूप सा ,
देवों की पंक्ती में निशाचरस्वरुप सा ,
वाणी से क्रूर सा अपनों सा दूर सा ,
अहित कहीं करने को बाध्य सा मजबूर सा ,
कभी राणा सांघा और कभी जयचंद सा ,
खूब सूरत काव्य में अनावश्यक छंद सा ,
शुष्क सा वक्र सा बंजर भूखंड सा .........आदमी उदंड

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