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Saturday, October 1, 2011

ख़ामोशी

            ख़ामोशी 
पानी की तरह शीतल है तू 
हवावों  सा मदहोश है तू 
वर्षों से जिसे ठुकराया  गया 
ये प्यार मेरे खामोश है तू 
नदिया के दोनों छोरों सा 
चंदा और चकोरों सा 
कान्हा और राधा के जैसा 
मुरली और ग्वाल के छोरों सा 
इस युग मैं तेरी कद्र नहीं 
उस युग का विजय घोष है तू   पानी की तरह......

जेष्ठ की तपती धूप  है तू 
सावन में मेघ का रूप है तू 
बसंती रंग मैं रंगा रंगा 
उज्वल वसुधा का रूप है तू 
सहज है सम्पूर्ण  है तू 
सम्मानित है संतोष है तू      पानी की तरह.......
प्रेम तो है एक राज यहाँ 
गूंजती है आवाज यहाँ 
अभिनय तो सारे करते हैं 
पर सारे  सौदेबाज यहाँ
अहसास है आशक्ति है 
आलिंगन है आगोश है तू      पानी की तरह.......

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