ख़ामोशी
पानी की तरह शीतल है तू
हवावों सा मदहोश है तू
वर्षों से जिसे ठुकराया गया
ये प्यार मेरे खामोश है तू
नदिया के दोनों छोरों सा
चंदा और चकोरों सा
कान्हा और राधा के जैसा
मुरली और ग्वाल के छोरों सा
इस युग मैं तेरी कद्र नहीं
उस युग का विजय घोष है तू पानी की तरह......
जेष्ठ की तपती धूप है तू
सावन में मेघ का रूप है तू
बसंती रंग मैं रंगा रंगा
उज्वल वसुधा का रूप है तू
सहज है सम्पूर्ण है तू
सम्मानित है संतोष है तू पानी की तरह.......
प्रेम तो है एक राज यहाँ
गूंजती है आवाज यहाँ
अभिनय तो सारे करते हैं
पर सारे सौदेबाज यहाँ
अहसास है आशक्ति है
आलिंगन है आगोश है तू पानी की तरह.......
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