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Sunday, July 23, 2023

दहशत


 

आठ बजकर तीस मिनट का समय था ,

जंगल का रास्ता , घुप्प अंधेरा , एक पथिक की पदचाप जंगल की खामोशी में बिघ्न  डाल रही थी और उनका पथ आलोकित करती एक छोटे से टोर्च की रोशनी । बीच बीच मे जंगल की निस्तब्धता को भंग करता हुआ उल्लू काअचानक डरावना स्वर उभरने  से डर के मारे उसका हलक सूख रहा था ।
और बीच बीच मे चूहों के बिलों से गिरती मिट्टी की आवाज भी उसको विचलित कर रही थी । वह उस बुरे समय को कोस रहा था जब अंधेरा होने पर उसने  गोविंद से चलने की जिद की थी ,बहुत कहा था गोविंद ने अरे मान सिंह रुक जा देर हो गई है सुबह जाना  पर वही नही माना , रुक जाता तो ठीक रहता  । पर अब क्या हो सकता था अब तो वह चल पड़ा है , वापस भी जाना अपनी बेइज्जती करवाने जैसा है । जो होगा अब देखा जाएगा । अकेले में  भयभीत मन को निडर बनाना कितना मुश्किल है ये उसे आज पता चल गया  था , दूसरा अगर समझाएं तो आदमी एक बार समझने की कोशिश कर सकता है  परन्तु अकेले में आदमी  खुद के समझये कभी नही समझ सकता , क्योंकि डर पैदा करने वाले विचार उस पर तेजी से हावी होते  रहते है , तभी सामने एक घना पेड़ उसे दिखाई दिया , अंधेरे में उसे पेड़ तो दिख तो गया ,मगर वह ठिठका और गौर से देखने लगा उसके नीचे कोई उसे बैठा दिखाई दिया , इतनी रात को कौन होगा जो इतने आराम से बैठा है , जैसे कोई धूप से बचने को बैठता है , किसी अनहोनी  आशंका से वह भयभीत हो गया ,डर के मारे एक बार तो वह उल्टे पैरों भागने को हुआ , पर कुछ सोच कर वह रुक गया , तभी उसे छोटी टोर्च का ध्यान आया उसने टोर्च की रोशनी में देखा तो दंग रह गया पेड़ के नीचे से ऊपर तक किसी ने तीन बड़े पत्थर रखे हुए थे जो कि अंधेरे में किसी बैठे हुए आदमी की तरह  दिख  रहे थे  । ओह ...... उसके मुह से निकला ,फिर उसने तेज चलती हुई सांसो पर काबू पाया ,कितना डर गया था वह , आस्वस्थ हो कर उसनेआगे कदम बढ़ाया , दो कदम चल कर वह फिर रुक गया और फिर से उस पेड़ की तरफ देखने लगा , इस आशय से कि वह दुबारा वैसे ही दिखेगा या उसके  भ्रमित मन की वजह से उसे ऐसा दिखा था ,ज्यो ही उसने नजर घुमाई अब की बार उसे अंधेरे में भी दो बड़े पत्थर ही दिखे , तो क्या मनुष्य का मन ही प्रेत को जन्म देता है , वह इस बात पर विचार कर ही रहा था कि तभी अचानक वह तीनों  पत्थर  धड़ाम से पेड़ के तने से फिसल कर इस तरह गिरे जैसे किसी आदमी के गिरने की आवाज आती है , और फिर खड़ खड़ की आवाज के साथ एक और आवाज हुई जैसे कोई व्यक्ति जख्मी हो कर कराह रहा हो । ये देख कर  मान सिंह के होश उड़ गए  । वह हड़बड़ा कर तेजी से चलने को हुआ , और अंधेरे में  उसका पैर रास्ते से बाहर की तरफ किसी झाड़ी में फंस गया , वह पैर वापस खींचने लगा , तभी उसने ध्यान से सुना तो उसे किसी महिला की सुबकने की आवाज आई , रह रह कर वह महिला सुबक रही थी , मगर कही कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा था , अब महिला सुबकते सुबकते रोने लगी थी , अत्यधिक भय के कारण मान सिंह के पैरों तले की जमीन खिसक गई  । अब क्या होगा , क्या ये कोई औरत ही है, और इतनी रात गए इस जंगल मे क्यों रो रही है , मान सिंह दूसरे पहलू पर विचार करने लगा ,पर वह जानता था कि ये सच तो हो नही सकता ,किसी तरह झाड़ी से पैर निकाल कर मान सिंह  आगे बढ़ने लगा , तब उस महिला की आवाज फिर से आने लगी , अब वह रोते रोते कह रही थी , " रुक जाओ ,रुक जाओ "  जैसे घायल अवस्था मे कोई मदद के लिए पुकारता है , इस तरह उसकी आवाज सुनाई पड़ रही थी , मान सिंह दहशत में तो था , मगर वह जल्दी जल्दी चलने की कोशिश कर गांव की परिधि में पहुंचना चाहता था , उसके मष्तिस्क की सोच अब बिल्कुल बन्द हो चुकी थी , बस उसे अपने कुल देव का मन मे ध्यान हो आया था , बार बार अपने कुल देवता का स्मरण करते वह  डर को एक तरफ कर बस फटा फट चलता जा रहा था । तभी पीछे से उसी महिला की आवाज सुनाई पड़ी , " रुक जा अरे रुक जा " ,और उसके अगल बगल कुछ छोटे पत्थर और रोड़ियाँ गिरने की आवाज आई ,मगर उसे लगी नहीं , अब उस  आवाज  में भारीपन था , मानो वह अधिकार पूर्वक कह रही हो , " अरे रुक जा ना  सुन " और उसे लगा जैसे उसके पीछे वह आवाज आती जा रही हो ,प्रेत भी कितने छद्म रूप बना लेता है वह सोच रहा था , पत्थर और रोड़ियाँ का उसके अगल बगल गिरना जारी था । तभी उसे दूर से कोई टार्च की रोशनी दिखी " ये कौन हो सकता है ,  कहीं दुसरी मुसीबत तो नही है " पर उसका साहस थोड़ा बढ़ा , उसके अपने गाँव भिंवाली  की सीमा आने वाली थी , कोइ आदमी ही लगता है , तभी उस महिला का अट्टहास भरा स्वर उसे सुनाई पड़ा , " तेरी किस्मत आज अच्छी है , बच गया तू " तब तक टार्च की रोशनी पास आ गई थी ।
"अरे मान सिंह तू कहां गया था रात में " ,वह व्यक्ति बोला , वह ज्ञान चंद था " अरे चाचा क्या बताऊँ बस कोट गाँव तक गया था गोविंद के पास " ,  " अरे तो वही रुक जाता , रात में चलने की क्या जरूरत थी ,चल "  और उसने मान सिंह को आगे कर खुद उसके पीछे चलने लगा , ' रास्ते मे डर तो नही लगा , मैंने देख लिया था दूर से टोर्च की रोशनी को , समझ गया था कि कोई तो अकेला आ रहा है , इस लिए चला आया "  ,मान सिंह ने उसे कुछ नही बताया  ।मान सिंह का घर गांव के छोर पर ही था , सो ज्ञान चंद उसे वहां छोड़ अपने घर चला गया । रात के दस बज चुके थे , उसकी पत्नी और उसकी वृद्ध माँ उसे देख घबरा गए " अरे मानू इतनी रात हमने तो सोचा था कि सुबह आओगे " , " नहीं माँ बस यूं ही चल पड़ा वहां से "  , और फिर मान सिंह ने एक एक कर सारी घटना माँ को बताई , उसकी माँ  ने तुरंत कुछ चावल कटोरी में रख उसके सिर के चारों ओर घुमाए और फिर बाहर आकर चारों तरफ फेंक दिए । फिर अंदर आकर एक टीका चावल का मान सिंह के माथे पर लगा दिया । फिर बोली " बेटा तुम्हे रात में नही चलना चाहिए , आज हमारे कुल देवता ने तुम्हारी रक्षा की है , तुम्हे याद है अभी चार पांच महीने पहले हमने पूजा की थी , तब ज्ञान चंद पर जब देवता अवतरित हुए तब क्या बोले थे ,टीका लगाते बोले थे मैं हर समय तुम्हारे साथ रहूंगा जहां भी तुम याद करोगे " । "  हाँ याद आया " मान सिंह बोला । " हाँ माँ जैसे ही मैंने याद किया  वैसे ही मेरा डर खत्म हो गया था "  , तब उसने कहा " माँ वो कौन है जो रो कर मुझे डरा रही थी , सबके साथ ही होता है क्या वहॉं पर रात में "  , "  ये एक पुरानी कहानी है बेटा "  उसकी माँ बोली , " लगभग दस बारह साल पहले की बात है कोट गाँव की एक जवान औरत उस जंगल मे घास काटने गई थी , हरा पेड़ देखकर वह उस पर चढ़ गई, और उसका पैर फिसल गया , और वहीं पर उसकी मृत्यु हो गई  , तब से उसकी आत्मा वहॉं भटक रही है , और आने जाने वालों को परेशान करती है " ।
ये सुनकर मान सिंह आश्चर्यचकित हो गया  ।  तब उसकी माँ बोली बेटा एक और बात बताऊं , " क्या "  वह बोला "  बेटा तुम बता रहे थे ज्ञान चंद तुम्हे लेने गया था , तुम्हे शायद यह पता नही है ज्ञान चंद पिछले तीन दिन से यहाँ नही है  रिश्तेदारी में शादी में गया है "  ।  " क्या ......मान सिंह अचानक चौंक गया ,तो क्या वह हमारे कुल देवता थे "  ।  " हाँ बेटा कुलदेवता की कभी भूलना मत , हमेशा याद करते रहना " । मान सिंह के मन मे कुल देवता के प्रति श्रद्धा का भाव उत्पन्न हो गया , लाख लाख धन्यवाद कर मन ही मन वह कुल देवता को स्मरण करने लगा ।
                                 भगवान सिंह रावत 
                                               दिल्ली। 

Thursday, July 6, 2023

गीत बनाता हू ।

 


धूप से मुरझाए फूलों  को सीने से लगाता हूँ ।
यादों के सैलाब मे जाकर अक्सर गीत बनाता हूँ ।
जी उठता हूँ रोज सुबह नई उम्मीद को लेकर
व्यथा वेदना के घेरे में साँझ को फिर मर जाता हूँ 
यादों के सैलाब मे जाकर अक्सर गीत बनाता हूँ ।
लौट सको तो देखना आकर मेरा ये दीवानापन
पत्थर दिल की खातिर मैं पत्थर पर फूल चढ़ाता हूँ ।
यादों के सैलाब मे जाकर अकसर गीत बनाता हूँ ।
वन उपवन खामोश हैं गुमसुम है नदिया का पानी
एक कंकड़ उछाल पानी मे  मैं हलचल मचाता हूँ ।
यादों के सैलाब मे जाकर अक्सर गीत बनाता हूँ ।
वक्त कहाँ रुकता है बोलो उम्र बहे पानी सी
उम्मीदों के अरमानों के जबरन बाँध लगाता हूँ
यादों के सैलाब मे जाकर अकसर गीत बनाता हूँ ।
बेरहमी के इस परिवेश में कहाँ छुपे बैठे हो
टूट के बिखर ना जाऊं तेरी यादों से जुड़ जाता हूँ ।
यादों के सैलाब मे जाकर अक्सर गीत बनाता हूँ ।
धूप सेअलसाये फूलों  को सीने से मैं लगाता हूँ ।
यादों के सैलाब मे जाकर अक्सर गीत बनाता हूँ ।

                           भगवान सिंह रावत  (दिल्ली)

पैसा आये कहां से


 

बात आज से लगभग चालीस साल पुरानी है
उस जमाने मे मंदी का दौर था ,एक रुपये किलो दूध डेरी वाला अपने सामने निकाल कर देता था   उस जमाने में ब्लैक एंड व्हाइट टीवी भी सिर्फ अमीर और बड़ी कोठी वालों के यहां  दिखता था ,यही कोई सातवीं या आठवीं में पढ़ता हूंगा । हम लोग एक बैंक हाउस में बने क़वाटरों में रहते थे , हमारे कंपाउंड की दीवार के तरफ दूसरी गली जाती थी , वहाँ बड़ी बडी कोठियां थी और काफी धनाड्य वर्ग के लोग रहते थे , जिनके पास गाड़ियां होती थी , नौकर चाकर होते थे,उस बीस फुटि रोड में कोई समारोह या कोई हलचल होती तो हमे पता लग जाता था बस दिखाई नही पड़ता था , सो बिजली के खंभे से अर्थ की दो तारो पर बंदरो की तरह छलांग लगा कर पंद्रह फुटि दीवार पर चढ़ जाते और मजे से आती जाती बारात को देखते ,  या फिर क्या ही रहा है ये पता करते ।आस पास में थोड़ी दूर पर कुछ गरीब तबके की बस्तियां भी थी , जिनके बच्चे अक्सर उस सड़क पर साइकल के टायर को डंडी से मार मार कर दौड़ाते नजर आजाते थे , या फिर एक दूसरे को आवाज देते हुए अशिष्ट शब्दों का प्रयोग करते थे ।
उस दिन शाम के छह बजे थे हमे गली में कुछ हलचल सुनाई पड़ी , बस फिर क्या था हम दो तीन बच्चे फट से दीवार पर चढ़ गए , देखा तो दूर से एक बारात आ रही थी , तब कंपाउंड की दो तीन महिलाएं और बच्चे भी बारात देखने सीढ़ी लगाकर ऊपर चढ़ कर बारात देखने को हुई ।
थोडा सा अंधेरा हो चला था , धीरे धीरे बारात नजदीक आने लगी , बारात में पहले बैंड बाजे चल रहे थे , और उनके साथ सिर पर गैस मेन्टल लैम्प   उठाये लोग भी थे उस जमाने मे शादी व्याह में गैस मेन्टल लैंप ही उजाला करने के लिए इस्तेमाल होती थी , सबसे आगे दो ढोल बजाने वाले पटर पटर ढोल बजाते नाचने वालों को अपनी ओर आकर्षित कर रहे थे , नाचने वाले फिल्मी धुन पर बैंड की धुन पर नाच रहे थे , और कुछ मुह में पांच या दस रुपये का नोट फसाकर ढोल वाले के आगे नाच रहे थे , नाचने वालों में महिलाएं भी थी ,दूल्हा घोड़ी पर सवार था , बारात दुल्हन के घर जा रही थी । घोड़ी के साथ चलता एक आदमी बीच बीच मे एक थैले में से कुछ रेजगारी निकालता और दूल्हे के ऊपर उछाल देता ,उन सिक्कों को जमीन तक आने से पहले ही गली मोहल्ले के बच्चे उन्हें फट से लपक लेते थे कुछ नीचे गिर जाते तो उन पर झपटा झपटी हो जाती जो कि गाली गलौच तक पहुंच जाती , फिर एक आदमी उन्हें हड़काता और घोड़े से दूर कर देता । एक दो मिनट के लिए बच्चे भाग जाते मगर फिर दुबारा घोड़े के इर्द गिर्द मंडराते नजर आते थे । इधर ढोल वाला अपने हुनर को दिखाता बड़ी तेजी से ढोल बज रहा था नाचने वाले के मुह से नोट खींचना उसके हुनर की सार्थकता थी ,  यों तो कई नोट खींच चुका था अब तक वो मगर इस बार अजिब आदमी से पाला पड़ा था उसका ,जैसे ही वह मुह के पास हाथ ले जाता फट्ट से वह अपना चेहरा घुमा  लेता , नाचने वाला मानो उसे परेशान करने पर आमादा था । हम सब लोग बारात को गौर से देख रहे थे , कंपाउंड की महिलाएं और बच्चे भी आनंद उठा रहे थे तरह तरह की फिल्मी धुन पर लोग थिरक रहे थे ,तभी ढोली ने ढोल बजाते बजाते अचानक नाचने वाले के मुह से नोट छीन  लिया , झटके से खींचने के चक्कर मे पांच का नोट ढोली के हाथ से छिटक कर जमीन पर गिर गया , उस नोट पर किसी और कि भी नजर थी , ढोली ने जैसे ही नोट जमीन से उठाने को हाथ नीचे कर नोट उठाना चाहा गैस मेन्टल लैंप वाले ने फट्ट से अपना भारी भरकम जूता उसके ऊपर रख दिया , ढोल वाले कि उंगलियाँ दब गई ,वह दर्द से चीखा और अपनी उंगली को सहलाता गैस वाले को गालियां बकने लगा ,और अपनी ढोल वाली डंडी से जोर से उसके हाथ पर मारा जिससे उसने सिर पर लैंप पकड़ रखा था ,वह बिलबिला उठा , उसके पास बदला लेने का कोई विकल्प नही था क्योंकि गैस मेन्टल लैंप दोनो हाथों से पकड़ा जाता था ,सो उसने गुस्से में वह गैस की चिमनी ढोल वाले पर गिरा दी जिससे वह जमीन पर गिर गया ,उसका साथी ढोल वाला लड़ने को आगे आया तब लैंप  पकड़ने वाले का साथी भी आगे आया और एक दूसरे के गरेबान पकड़े धक्का देने लगे इस चक्कर मे दूसरा गैस मेन्टल लैंप भी फट्ट से नीचे गिरा , दो चिमनियां फुट चुकी थी , हो हल्ला मच गया लोग तीतर बितर हो गए ,हम सब लोग ऊपर दीवार से सब देख रहे थे  हड़कंप मच गया था ,दोनो ढोल वालों को गैस मेन्टल लैंप  वाले मिलकर पीटने लगे , क्यों कि वह बैंड बाजे वालों के साथ होते है इस लिए उनकी संख्या ज्यादा होती है , थोड़ी दे बाद चार पांच आदमी आगे आये वह शायद बारातियों के खास थे , बड़ी मुश्किल से उन्होंने उनको अलग किया , गैस लैंप  की चिमनियों के टूटने से आपस में चोटे बहुत आई थी कांच सड़क पर फैल गया था , बारात नजदीक पहुंच गई थी इस लिए सब धीरे धीरे दुल्हन के घर की तरफ चल पड़ी , चिमनी वाला और ढोल वाला दोनो घायल थे , लोग पकड़ कर उन्हें ले जा रहे थे, वह पांच रुपये का नोट ना तो लैंप वाले के हाथ लगा और न ढोल  वाले के , उसे कोई और ही ले गया होगा , क्योंकि सब के जाने के बाद वहां पर कुछ भी नही बचा था  ।  पैसा आये कहां से , पैसा जाए कहाँ रे  ।
                         
                         भगवान सिंह रावत (दिल्ली)