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Sunday, April 9, 2017

अब आ भी जाओ

कहाँ हो तुम अब भी जाओ
या फिर अपना जहाँ बताओ
जंतर मंतर जादू टोना
छान लिया धरती का कोना
भीड़ भरे इस कोलाहल में
नहीं दिखा वो रूप सलोना
गांव गांव और शहर शहर में
जंगल बीहड़ नगर नगर में
निष्ठुर बन कर बैठे हो तुम
गुमनामी की किसी डगर में
चमन से और बहार से पूछा
फूलों की कतार से पूछा
जंगल के सैलाब से पूछा
नदिओं की हर धार से पूछा
धरा के हर कण कण में देखा
खंडहर के  अम्बार से पूछा
निशा दिवस में कहीं नहीं थे
सावन की फुहार से पूछा
थक कर बोझिल मन से आखिर
निर्मोही संसार से पूछा 
मायूसी के झंझावात में
क्यों जकड़े हो मुझे बताओ बताओ
कहाँ हो तुम अब भी जाओ
या फिर अपना जहाँ बताओ
बर्फीला गिरिराज  पुकारे
गुमसुम जो  सांज पुकारे
वन उपवन सब  अलसाये हैं
घायल  सा ऋतुराज पुकारे
फूलों में वो बात कहाँ है
गीतों में जज्बात कहाँ है
बिना तुम्हारे लिख पाऊं मैं 
ऐसे भी हालात कहाँ हैं
उम्र बह रही पानी जैसे
रोक सकूँ औकात कहाँ है
झुलसा रही है विरह वेदना
भादों की बरसात कहाँ है
बीते दिन महीने साल
पर तुमको कुछ कहाँ मलाल
सर्द  हवाएँ चुभती हैं अब
बेगाने  से झरने, ताल
हरे भरे इस मौसम में  भी
पतझड़ सा है दिल का हाल
रिम झिम रिम झिम करता सावन
बहुत रुलाता है हर साल
कर लूँगा पहचान तुम्हारी
प्यार का कोई गीत सुनाओ
कहाँ हो तुम अब भी जाओ
या फिर अपना जहाँ बताओ
काश अभी गर  तुम आजाते
पुनः प्रीत की रीत  निभाते
नए भाव स इस धरती पर 
एक नया आकाश  बनाते
धूप का एक छोटा सा टुकड़ा
अंजुली भर बस छाँव बिछाते
नफरत की भीषण आंधी में
अमर प्रेम  का दीप जलाते
 प्रीत पहनते प्रीत  ओढ़ते
प्रीत को एक आधार बनाते
अपमानित हो रही प्रीत को 
ऊँचे शिखरों तक पहुँचाते
प्राण फूंकदे पत्थर में जो
मिलकर ऐसे गीत बनाते
आँहें भरती मंद हवाएं
वन उपवन भी व्यथा सुनाते
तेरे मेरे सब के दुःख में
तरूवर भी जब अश्रु बहाते
भ्रमित होती आस्थाओं में
एक नया विश्वास  जगाते
तुम होते जो साथ हमारे
जाने हम क्या क्या कर जाते
मुक्त करो उन कुंठाओं को
एक नया इतिहास  बनाओ  
कहाँ हो तुम अब भी जाओ
या फिर अपना जहाँ बताओ

भगवान सिंह रावत      (सर्वाधिकार सुरक्षित )

 


 










Sunday, February 19, 2017

जाग उत्तराखंडी जाग

जाग उत्तराखंडी जाग ,जाग जाग और जगा
विपत्ति में पहाड़ है  विजय ध्वज उठा उठा
रंगों का उत्सव नहीं ये तो रक्त फाग है
प्रेम की बंसी पे छिड़ा मौत का ये राग है
शत्रु  तेरे सामने है तूणीर औ तरकश उठा
जाग उत्तराखंडी जाग ,जाग जाग और जगा
विपत्ति में पहाड़ है  विजय ध्वज उठा उठा
अमन ओ चैन हो यहां तू भेद भाव तोड़ दे
सबको सब समझ सकें दिलों को दिल से जोड़ दे
नफरतों की आँधियों में प्यार के दीपक जला
जाग उत्तराखंडी जाग ,जाग जाग और जगा
विपत्ति में पहाड़ है  विजय ध्वज उठा उठा
सपूत है धरा का तू धरा के गीत गए जा
जान की बाजी लगे तो हंस के तू लगाए जा
पुजारी हैं हम प्रेम के सब ये बता बता
जाग उत्तराखंडी जाग ,जाग जाग और जगा
विपत्ति में पहाड़ है  विजय ध्वज उठा उठा


       भगवान् सिंह रावत  (सर्वाधिकार सुरक्षित )

Saturday, December 17, 2016

आदमी


         आदमी 

आज के युग में क्यों हो गया खुद से इतना दूर आदमी
हित  की बात को छोड़ के कांटे बोने  को मजबूर आदमी
सचाई से विमुख रहे झूटे  को हमराज बनाये
पल भर मैं ही जुबान से फिसले बे सर पैर  की बात बताये
चेहरे से चेहरा ढकने को दुनिया मैं मशहूर आदमी
आज के युग में क्यों हो गया खुद से इतना दूर आदमी
अपना कुछ सहयोग नहीं व्यवस्थाओं पर दोष लगाए
अपने अंदर कभी न झांके आसमान को सर पे उठाये
खुद बदलाव के मुद्दे पर कभी न हो मंजूर आदनी
आज के युग में क्यों हो गया खुद से इतना दूर आदमी
जहरेली मुस्कान बिखेरे वैभव को बस चरता  जाये
खुद निरर्थक होकर वो सार्थकता के पाठ पढाये
तन स कोमल होकर भी मन से कितना क्रूर आदमी
आज के युग में क्यों हो गया खुद से इतना दूर आदमी
मनकी बात न समझ में  आयी और पीटता  रहा लकीर
बनते जुड़ते रहे काम सब और टूटता  रहा जमीर
आहित  की बात को छोड़ के कांटे बोने  को मजबूर आदमी
आडंबरों  को ढोते ढोते थक कर हो गया चूर आदमी
आज के युग में क्यों हो गया खुद से इतना दूर आदमी

           भगवान सिंह रावत  (सर्वधिकार सुरक्षित )
             

Thursday, November 3, 2016

याद

अब मुझे  तुम्हारी बहुत याद आने लगी है
सावन और बदली पास पास है
धुप छाँव में कुछ तो ख़ास है
चांदनी भी  चाँद से शरमाने लगी है
कविताओं के शहर   में
दोहों के नगर में
गीत  बहने लगे है
हर किसी प्रहर में
गीत उजले  उजले हैं
कहानियां गले लगाती हैं
मुश्कुराकर हर ग़ज़ल
किताब में छुप जाती है
मुक्क्तक छणिकायें  भी
नए अर्थ बताने लगी हैं
अब मुझे  तुम्हारी बहुत याद आने लगी है
फूल खिले हैं भँवरे रहे हैं
अपनी मस्ती में गुनगुना रह हैं
बाग़ का हर पत्ता हर शाख
बेवजह मुश्कुरारहे हैं
बाहर चमन में आचुकी है
हवा के झोंके बता रह हैं
हरियाली भी अपना रंग दिखाती है
बेल भी तने से लिपट लिपट जाती है
पत्तियां आज फूलों का पता बताने लगी है
अब मुझे  तुम्हारी बहुत याद आने लगी है
मन  को महकाती नूतन  सी भोर है
दूर कहीं जंगल मैं पंछियों का शोर है
वादियों में अजीब सी महक रही है
हरियाली दिखती है  वृक्ष  लहराते हैं
अपने अंदाज़ मैं हवाएं गुनगुनाती हैं
नदिया की लहरें शोर मचाती हैं
तीतर बटेर विचरते हैं
बया प्यार से देखती है
कोयल गीत सुनाती है
एक मुस्कान उभरती है जब
शुखद स्वप्न आते हैं
ख्याबों के क्या कहने
क्या क्या  थमा जाते हैं
उम्मीदें सच को मानाने लगी हैं
अब मुझे  तुम्हारी बहुत याद आने लगी है
सावन और बदली पास पास है
धुप छाँव में कुछ तो ख़ास है
चांदनी भी  चाँद से शरमाने लगी है




                          भगवान् सिंह रावत       (  सर्वाधिकार   सुरक्षित   ) 

Wednesday, August 3, 2016

तुम्हारी याद

अब मुझे तुम्हारी बहुत याद आने लगी है
जीवन से  उम्मीद का नाता टूट गया है
कसमों ,वादों का साथ छूट गया है
साँझ के दिए की लौ टिमटिमाने लगी है
अब मुझे तुम्हारी बहुत याद आने लगी है
दूर दूर तक गहरी ख़ामोशी छा  रही है
इठलाती बलखाती निशा
उजाले को चिढ़ाती
संध्या से बतियाती
अन्धकार के आगोश मैं जा रही है
हार जीत का पारम्परिक युद्ध होने लगा है
हौसले, इरादे  दूर खड़े हैं
आस ,उमंग बेसुध पड़े हैं
साहस हताश हो डरकर रोने लगा है
सच  खामोश हो गया है
झूट जाने कहाँ खो गया है
अजीब स्तिथि है ये सबको क्या हो गया है
सब जैसे मुह छिपा रहे हैं
इधर उधर दौड़ते ,भागते
अजीब तरह का अपना व्यवहार दर्शा रहे हैं
दूर छितिज़ से अब लालिमा भी जाने लगी है 
अब मुझे तुम्हारी बहुत याद आने लगी है ।
कितना रंग बदलेगी ये दुनिया
हर शख्स उसी रास्ते पर निकल जाता है
चार सीढ़ियां चढ़कर पहली सीढ़ी को भूल जाता है
 अपना पुराना  चेहरा हटाकर नया चेहरा लगाता है
गैर खता करे तब भीअपनों का दिल जरूर दुखाता है
क्या नहीं सहा उस बेचारे ने अपने सीने पर                      मगर अक्सर पत्ता पेड़ को ही दोषी बताता है
तुमने तो  अभिलेख गढ़ दिया
किसी और का दोष किसी और के सर मढ़  दिया
वर्तमान ने किस कदर अपने ही इतिहास के
मुह पर तमाचा जड़ दिया ।
अनुभव से सबने नाता तोड़ दिया है
प्रतिभाओं का स्वाभाव बदल गया है
वक्त खुद से आगे निकल गया है
आश्रीवाद ने आडंबरों से खुद को जोड़ लिया है
प्यार के फूल उगाये थे हमने जिंदगी मैं
ये काँटों की फसल कौन उगाकर चला गया 
हमने जरा नजर क्या घुमाई
झमेलों  में थोड़ी देर क्या लगाई
बातों बातों में कोई नफरत थमाकर चला गया
भूले से प्यार भी दिखाओ तो जिंदगी नफरत जताने लगी है
अब मुझे तुम्हारी बहुत याद आने लगी है
बाबाओं के इस देश में झूठ के परिवेश में
हर कोई अपने आप को भगवान बताता है
इंसान भी कस्तूरी की खोज में,भागता चला जाता है
जीते जी कोई  नहीं पूछेगा,मरने पर  रोयेगा पछतायेगा 
कभी बात की नहीं की चाह कर,बाद मैं गरुड़ पुराण बिठायेगा
आदमी अनचाही आस्था को ढ़ोने में लगा है
हित के लिए बने हाथों से,कांटे  बोने लगा है
अबला से किये पापों को,असहाय से मिले श्रापों को
गंगा के तट में डुबकी लगाकर धोने लगा है
पता नहीं क्या क्या कहाँ जोड़ने लगा है
पत्थर को  खुश करने के लिए फूल तोड़ने लगा है
ये कौन सी सुबह है,कौन सा सूरज निकल रहा है
अच्छाई मायूस है,बुराई को बल मिल रहा है
बुराई अच्छाई को अब पाठ पढ़ाने लगी है
अब मुझे तुम्हरी बहुत याद आने लगी है

       भगवान सिंह रावत   ( सर्वाधिकार सुरक्षित ) 




Thursday, May 26, 2016

खामोश

              खामोशी


पानी की तरह शीतल है तू
हवाओं सा मदहोश है तू
वर्षों से जिसे ठुकराया गया
ये प्यार मेरे खामोश है तू ।
नदिया के दोनों छोरों सा
चंदा और चकोरों सा
कान्हा और राधा के जैसा
मुरली और ग्वाल के छोरों सा
इस युग में तेरी कद्र नहीं
उस युग का विजय घोष है तू ।
पानी की तरह शीतल है तू
हवाओं सा मदहोश है तू
वर्षों से जिसे ठुकराया गया
ये प्यार मेरे खामोश है तू ।
जेठ की तपती  धुप है तू
सावन में मेघ का रूप है तू
बसंती रंग में रंगा रंगा
वसुधा का रूप अनूप है तू
सहज है सम्मानित है
संम्पूर्ण है संतोष है तू ।
पानी की तरह शीतल है तू
हवाओं सा मदहोश है तू
वर्षों से जिसे ठुकराया गया
ये प्यार मेरे खामोश है तू ।
प्रेम तो बस एक राज यहां
गूंजती है आवाज यहां
अभिनय तो अच्छा करते हैं
पर सारे सौदे बाज़ यहां
अहसास है अशक्ति है
आलिंगन है आगोश है तू ।
पानी की तरह शीतल है तू
हवाओं सा मदहोश है तू
वर्षों से जिसे ठुकराया गया
ये प्यार मेरे खामोश है तू ।


                             (भगवान सिंह रावत)   सर्वाधिकार सुरक्षित                           

Saturday, May 14, 2016

एक दिन

एक दिन
एक सा हश्र सबका होना है एक दिन
चेहरे पर सादगी भीतर से रोना है एक दिन
जज्बात टूट कर बिखर ना जांयें 
अश्क कही पलकों से उतर न जाएँ
शब्दों का हार पिरोना है एक दिन
बनाते रहो महल, कागज़ के शहर में
रात और दिन सुबह दोपहर में
एक पल मैं बहुत कुछ होना है एक दिन
रेशम और मखमल से गहरा क्यों नाता है
दुनिया के बैभव पर कितना इतराता है
कुदरत के साये मैं सोना है एक दिन
अपने झमेले में उलझा है हर कोई
खुद को उलझाने उलझा है हरकोई
सलीब खुद अपना ढोना है एक दिन
कहाँ तक छिपाएगा अपने उस डर को
कुछ तो समझले कुदरत के दर को
होगा तो वही जो होना है एक दिन
साथ नहीं जायेगा हाथ नहीं आएगा
कितना भी जोर हो पकड़ नहीं पाएगा
ये सच उजागर होना है एक दिन
एक सा हश्र सबका होना है एक दिन
चेहरे पर सादगी भीतर से रोना है एक दिन

( भगवान सिंह रावत )