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Saturday, May 14, 2016

एक दिन

एक दिन
एक सा हश्र सबका होना है एक दिन
चेहरे पर सादगी भीतर से रोना है एक दिन
जज्बात टूट कर बिखर ना जांयें 
अश्क कही पलकों से उतर न जाएँ
शब्दों का हार पिरोना है एक दिन
बनाते रहो महल, कागज़ के शहर में
रात और दिन सुबह दोपहर में
एक पल मैं बहुत कुछ होना है एक दिन
रेशम और मखमल से गहरा क्यों नाता है
दुनिया के बैभव पर कितना इतराता है
कुदरत के साये मैं सोना है एक दिन
अपने झमेले में उलझा है हर कोई
खुद को उलझाने उलझा है हरकोई
सलीब खुद अपना ढोना है एक दिन
कहाँ तक छिपाएगा अपने उस डर को
कुछ तो समझले कुदरत के दर को
होगा तो वही जो होना है एक दिन
साथ नहीं जायेगा हाथ नहीं आएगा
कितना भी जोर हो पकड़ नहीं पाएगा
ये सच उजागर होना है एक दिन
एक सा हश्र सबका होना है एक दिन
चेहरे पर सादगी भीतर से रोना है एक दिन

( भगवान सिंह रावत )

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