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Wednesday, April 25, 2012

"बाल वर्ष "




वह लम्बे लम्बे डग भरता ढाबे की ओर तेज़ी से बढ़ता जा रहा था ,हाथ में दूध का डोल
लिये | वह हाल ही में पहाड़ से आया  था |पांचवी तक पढने के बाद वो पढ़ नहीं पाया | कैसे पढता ?  घर में गुजारा किसी तरह चल रहा था |पहाड़ की खेती कर बाप खों खों कर घुटने छाती से लगा बैठा था 
माँ बेचारी  सूख कर कांटा हो गई थी| तब कोई गाँव का  अपने साथ ले आया शहर में ,और चिपका दिया ढाबे में |अचानक उसकी नजर खम्बे पर टंगे पोस्टर पर पड़ी "बाल वर्ष " बल वर्ष के दौरान बच्चों सुविधाएँ दी जाएगी ,वो उन सुविधाओं को पढ़ ही रहा था , तभी आवाज़ आई ,ओये अबे क्या पढ़ रहा है इतनी सुबह ,अं   चल भाग|उसने देखा पुलिस वाला पीछे 
खड़ा था| कौन है बे.... काम धन्दा नहीं है क्या चल भाग वो डर के मारे वहां से चल पड़ा ढाबे की तरफ |देर भी हो गई थी काफी ,वो मन मे सोच रहा था क्या बाल वर्ष में बचों को इतनी सुविधा मिलती है ,क्या उसे भी ये सुविधाएँ मिलेगी ? वगेरा वगेरा ..
तभी वो ढाबे पर पहुंचा| अन्दर पहंचते ही गद्दी पर बैठा मोटे पेट लिए हुए ढाबे का मालिक चीख पड़ा ,अबे   गधे कहाँ कम्पनी बाग़ में सैर करने गया था क्या ,साले कब से गया हुआ अब आया है   
काम क्या तेरा बाप करेगा , वो सहम गया ,उसकी भयंकर आवाज़ किसी शैतान  से कम नहीं थी |चल जाकर बर्तन धो ,ग्राहक नास्ते को आते होंगे |वो चुपचाप अन्दर गया ,उसने  देखा जूठे बर्तनों का ढेर लगा था ,
उसे  पोस्टर पर लिखी बातें याद आयी ,सच ही तो है ये जूठे बर्तनों का ढेर बालवर्ष मेंनै उपलब्धी तो है ,और भी बहुत सुविधाएं हैं बाल वर्ष में ग्राहकों को नास्ता कराना है वगेरा .वगेरा .. वह फीकी हंसी हंसा और जूठे बर्तनों के ढेर से जूझने लगा |  

Sunday, April 15, 2012

कैसे आये देश में ,मूल क्रांति का बीज |



मूल क्रांति का बीज

क्या पाया हम लोगों ने ,जो देश हुआ आज़ाद |
आँहें आज भी कर रही है ,कुर्सी  से फ़रियाद |
              भूल गए हम उनको, जिनको जकड़े थी जंजीर |
              नया ज़माना दिखा रहा है, अलग ही कुछ तश्वीर |
तरुण कुलांचे भर रहा ,गा डिस्को का गान |
गीतकार तो गलियों मैं, खाक रहा है छान |
                नाम थे जिनके जन सेवक, आज बने अधिकारी |
                हड़प गए मिल बाँट कर ,प्रजा की हिस्सेदारी  |
अपनी हालत देख कर ,सिसक रहा इतिहास |
वाणी मैं वो जोश कहाँ ,कलम है बहुत उदास |
                   स्विस बैंकों मैं अरबों खरबों ,पैसों का बनापहाड़                      आम आदमी ढून्ढ रहा है , रोटी का जुगाड़ |
पैसे की खातिर बिक रहा ,हर फन और हर चीज |
कैसे आये देश में ,मूल क्रांति का बीज
                     प्रभाकर प्रचंड हुआ ,जलधि  गया बौराय |
                      थर थर काँप रही है धरती , कौन करेगा न्याय 
सिंघासन को कौन हिलाए ,कौन करे सुरुआत |
पहरा देते उड़ रहे, बाज़ लगाए घात |
                     बाज का जो मस्तक फिरा,बना कबूतर ग्रास \
                     ना तो बिजली ही गिरी ,और ना टूटा आकाश |
ऐसा नहीं कि नहीं मिलेगा ,यहाँ कभी इन्साफ |
प्रजा जो भड़की अगर ,तो नहीं करेगी माफ़ |

                   भगवान सिंह रावत (स्वरचित)

Thursday, March 15, 2012

आदमी अकेला है


आदमी अकेला है 

भीड़ भरी दुनिया में आदमी अकेला है
अस्थाई डेरों में,बंदिशों के घेरों में, 
दिखावटी निमंत्रण ,बनावटी चेहरों में, 
चुभते उजालों में उफनते अंधेरों में, 
खबर पल की नहीं फिर भी है पहरों में, 
भाग रहा हर कोई गांव ,गांव शहरों में,
जीवन है कोई या कोई मेला है
भीड़ भरी दुनिया में आदमी अकेला है|
नीरसता छाई है ,करुणा भर आई है ,
हर अपनी चीज लगती पराई है |
कोई नहीं साथ ,बस एक परछाई है |
त्रासदी के भंवर में किसने धकेला है |
भीड़ भरी दुनिया में आदमी अकेला है|
जीवन जीवन नहीं ,ये तो एक ध्वंद है ,
अपने ढंग से जीने में ,हर कहीं प्रतिबन्ध है |
झूट दौड़ जीत रहा ,सच की गति मंद है |
सज्जन खामोश ,दुर्जन स्वछन्द है |
जन नायक आज भी पुस्तकों में बंद है |
खेल अटपटा सा किसने ये खेला है |
भीड़ भरी दुनिया में आदमी अकेला है|
प्रबंधन खोटा है,सोने सा खरा नहीं,
मनमानी होती है, डर बिलकुल जरा नहीं|
हर साल फूंकते हैं पर ,दशानन मरा नहीं |
कलम को देख कर दुष्ट कभी डरा नहीं ,
कलम का सिपाही आज भी अकेला है |
भीड़ भरी दुनिया में आदमी अकेला है|
गलत को गलत कहे किसकी ये मिशात है
टूट गया आदमी मेहनत से दिन रात है 
शोर कितना ही मचे , ढाक के तीन पात है ।
कुछ देर बवंडर उठा ,फिर झील जैसे शांत है
रात के बाद दिन है या दिन के बाद रात है ।
उलझा है जीवन कैसा ये झमेला है|
भीड़ भरी दुनिया में आदमी अकेला है|

                  भगवान सिंह रावत(स्वरचित)