वह लम्बे लम्बे डग भरता ढाबे की ओर तेज़ी से बढ़ता जा रहा था ,हाथ में दूध का डोल
लिये | वह हाल ही में पहाड़ से आया था |पांचवी तक पढने के बाद वो पढ़ नहीं पाया | कैसे पढता ? घर में गुजारा किसी तरह चल रहा था |पहाड़ की खेती कर बाप खों खों कर घुटने छाती से लगा बैठा था
माँ बेचारी सूख कर कांटा हो गई थी| तब कोई गाँव का अपने साथ ले आया शहर में ,और चिपका दिया ढाबे में |अचानक उसकी नजर खम्बे पर टंगे पोस्टर पर पड़ी "बाल वर्ष " बल वर्ष के दौरान बच्चों सुविधाएँ दी जाएगी ,वो उन सुविधाओं को पढ़ ही रहा था , तभी आवाज़ आई ,ओये अबे क्या पढ़ रहा है इतनी सुबह ,अं चल भाग|उसने देखा पुलिस वाला पीछे
खड़ा था| कौन है बे.... काम धन्दा नहीं है क्या चल भाग वो डर के मारे वहां से चल पड़ा ढाबे की तरफ |देर भी हो गई थी काफी ,वो मन मे सोच रहा था क्या बाल वर्ष में बचों को इतनी सुविधा मिलती है ,क्या उसे भी ये सुविधाएँ मिलेगी ? वगेरा वगेरा ..
तभी वो ढाबे पर पहुंचा| अन्दर पहंचते ही गद्दी पर बैठा मोटे पेट लिए हुए ढाबे का मालिक चीख पड़ा ,अबे ओ गधे कहाँ कम्पनी बाग़ में सैर करने गया था क्या ,साले कब से गया हुआ अब आया है
काम क्या तेरा बाप करेगा , वो सहम गया ,उसकी भयंकर आवाज़ किसी शैतान से कम नहीं थी |चल जाकर बर्तन धो ,ग्राहक नास्ते को आते होंगे |वो चुपचाप अन्दर गया ,उसने देखा जूठे बर्तनों का ढेर लगा था ,
उसे पोस्टर पर लिखी बातें याद आयी ,सच ही तो है ये जूठे बर्तनों का ढेर बालवर्ष मेंनै उपलब्धी तो है ,और भी बहुत सुविधाएं हैं बाल वर्ष में ग्राहकों को नास्ता कराना है वगेरा .वगेरा .. वह फीकी हंसी हंसा और जूठे बर्तनों के ढेर से जूझने लगा |
No comments:
Post a Comment