मूल क्रांति का बीज
क्या पाया हम लोगों ने ,जो देश हुआ आज़ाद |
आँहें आज भी कर रही है ,कुर्सी से फ़रियाद |
भूल गए हम उनको, जिनको जकड़े थी जंजीर |
नया ज़माना दिखा रहा है, अलग ही कुछ तश्वीर |
तरुण कुलांचे भर रहा ,गा डिस्को का गान |
गीतकार तो गलियों मैं, खाक रहा है छान |
नाम थे जिनके जन सेवक, आज बने अधिकारी |
हड़प गए मिल बाँट कर ,प्रजा की हिस्सेदारी |
अपनी हालत देख कर ,सिसक रहा इतिहास |
वाणी मैं वो जोश कहाँ ,कलम है बहुत उदास |
स्विस बैंकों मैं अरबों खरबों ,पैसों का बनापहाड़ आम आदमी ढून्ढ रहा है , रोटी का जुगाड़ |
पैसे की खातिर बिक रहा ,हर फन और हर चीज |
कैसे आये देश में ,मूल क्रांति का बीज |
प्रभाकर प्रचंड हुआ ,जलधि गया बौराय |
थर थर काँप रही है धरती , कौन करेगा न्याय
सिंघासन को कौन हिलाए ,कौन करे सुरुआत |
पहरा देते उड़ रहे, बाज़ लगाए घात |
बाज का जो मस्तक फिरा,बना कबूतर ग्रास \
ना तो बिजली ही गिरी ,और ना टूटा आकाश |
ऐसा नहीं कि नहीं मिलेगा ,यहाँ कभी इन्साफ |
प्रजा जो भड़की अगर ,तो नहीं करेगी माफ़ |
भगवान सिंह रावत (स्वरचित)

Nice poetry
ReplyDelete