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Sunday, April 15, 2012

कैसे आये देश में ,मूल क्रांति का बीज |



मूल क्रांति का बीज

क्या पाया हम लोगों ने ,जो देश हुआ आज़ाद |
आँहें आज भी कर रही है ,कुर्सी  से फ़रियाद |
              भूल गए हम उनको, जिनको जकड़े थी जंजीर |
              नया ज़माना दिखा रहा है, अलग ही कुछ तश्वीर |
तरुण कुलांचे भर रहा ,गा डिस्को का गान |
गीतकार तो गलियों मैं, खाक रहा है छान |
                नाम थे जिनके जन सेवक, आज बने अधिकारी |
                हड़प गए मिल बाँट कर ,प्रजा की हिस्सेदारी  |
अपनी हालत देख कर ,सिसक रहा इतिहास |
वाणी मैं वो जोश कहाँ ,कलम है बहुत उदास |
                   स्विस बैंकों मैं अरबों खरबों ,पैसों का बनापहाड़                      आम आदमी ढून्ढ रहा है , रोटी का जुगाड़ |
पैसे की खातिर बिक रहा ,हर फन और हर चीज |
कैसे आये देश में ,मूल क्रांति का बीज
                     प्रभाकर प्रचंड हुआ ,जलधि  गया बौराय |
                      थर थर काँप रही है धरती , कौन करेगा न्याय 
सिंघासन को कौन हिलाए ,कौन करे सुरुआत |
पहरा देते उड़ रहे, बाज़ लगाए घात |
                     बाज का जो मस्तक फिरा,बना कबूतर ग्रास \
                     ना तो बिजली ही गिरी ,और ना टूटा आकाश |
ऐसा नहीं कि नहीं मिलेगा ,यहाँ कभी इन्साफ |
प्रजा जो भड़की अगर ,तो नहीं करेगी माफ़ |

                   भगवान सिंह रावत (स्वरचित)

Thursday, March 15, 2012

आदमी अकेला है


आदमी अकेला है 

भीड़ भरी दुनिया में आदमी अकेला है
अस्थाई डेरों में,बंदिशों के घेरों में, 
दिखावटी निमंत्रण ,बनावटी चेहरों में, 
चुभते उजालों में उफनते अंधेरों में, 
खबर पल की नहीं फिर भी है पहरों में, 
भाग रहा हर कोई गांव ,गांव शहरों में,
जीवन है कोई या कोई मेला है
भीड़ भरी दुनिया में आदमी अकेला है|
नीरसता छाई है ,करुणा भर आई है ,
हर अपनी चीज लगती पराई है |
कोई नहीं साथ ,बस एक परछाई है |
त्रासदी के भंवर में किसने धकेला है |
भीड़ भरी दुनिया में आदमी अकेला है|
जीवन जीवन नहीं ,ये तो एक ध्वंद है ,
अपने ढंग से जीने में ,हर कहीं प्रतिबन्ध है |
झूट दौड़ जीत रहा ,सच की गति मंद है |
सज्जन खामोश ,दुर्जन स्वछन्द है |
जन नायक आज भी पुस्तकों में बंद है |
खेल अटपटा सा किसने ये खेला है |
भीड़ भरी दुनिया में आदमी अकेला है|
प्रबंधन खोटा है,सोने सा खरा नहीं,
मनमानी होती है, डर बिलकुल जरा नहीं|
हर साल फूंकते हैं पर ,दशानन मरा नहीं |
कलम को देख कर दुष्ट कभी डरा नहीं ,
कलम का सिपाही आज भी अकेला है |
भीड़ भरी दुनिया में आदमी अकेला है|
गलत को गलत कहे किसकी ये मिशात है
टूट गया आदमी मेहनत से दिन रात है 
शोर कितना ही मचे , ढाक के तीन पात है ।
कुछ देर बवंडर उठा ,फिर झील जैसे शांत है
रात के बाद दिन है या दिन के बाद रात है ।
उलझा है जीवन कैसा ये झमेला है|
भीड़ भरी दुनिया में आदमी अकेला है|

                  भगवान सिंह रावत(स्वरचित)
                                 

Tuesday, February 21, 2012

आदमी

आदमी 

इस धरा से लुप्त हो किधर गया  है आदमी |
लगता है ऐसे कि जैसे मर  गया है आदमी |
नज़र  भी  धोका  खा  गई  पहचान करने में,
टुकड़ों मैं जैसे कहीं बिखर गया है आदमी |
शैतान की भी आँख में थोड़ी सी शर्म है,
उन हदों को भी पार कर गया है आदमी |
सराल औऱ सीधे सच्चे  लोग अब बचे कहां,
‘पागल’ क़रार उनको कर गया है आदमी ।
हर  तरफ  जंगल   कटे और महल बन गए ,
सामान  अपनी मौत का कर गया है आदमी |
फसल क्यों कर अब उगेगी तामसी  जमीन पर
आग ,तोप,गोले बो कर  गया है आदमी |
कौन है जो घूमता बेफिक्र सा होकर यहाँ 
अक्स जिसका  देखकर  डर गया है आदमी |

                    भगवान सिंह रावत (स्वरचित)

Friday, December 30, 2011

मैं तो गीत बनाता हूँ


जीवन की राहों पर चलते 
जब  दुविधा से घिर जाता हूँ
 कलम से लिख कर कागज पर 
अपने भाव जताता हूँ 
मैं तो गीत बनाता हूँ |   मैं तो गीत बनाता हूँ
 नीरसता छा जाती है 
जब कुंठाएं घिर आती है 
नई नई बाधाएँ आकर 
अपना पता बताती है 
वक्त के हाथों छीन के कुछ पल 
अपने लिए बचाता  हूँ |  मैं तो गीत बनाता हूँ
कहीं शोक संताप  कहीं 
छाया पश्चाताप कहीं 
कहीं वेदना उमड़  रही है 
दुख और दर्द विलाप कहीं 
करुण काव्य लिखने  से पहले 
खुद को बहुत रुलाता हूँ |  मैं तो गीत बनाता हूँ
ये वैमनस्य और ये अलगाव 
ताजे हों जब बासी घाव 
गर्म मिजाज के मौसम में 
मद और क्रोध का हो टकराव 
नफरत की भीषण आंधी में 
प्रेम के दीप जलाता हूं|  मैं तो गीत बनाता हूँ
जीने का दम भरते लोग 
सच से कितना डरते लोग 
जीने के लिए दौड़ लगाते 
फिर भी कितने मरते लोग 
थककर चूर न हो जाऊं 
इतनी ही दौड़ लगता हूं |   मैं तो गीत बनाता हूँ 
प्रेम का जो वरदान मिले 
पत्थर के इन्सान मिले 
जुड़े दिलों को तोड़ तोड़ दे 
ऐसे भी शैतान मिले 
काँटों के बीहड़ में जाकर 
मैं तो फूल उगाता हूं 
मैं तो गीत बनाता हूँ   मैं तो गीत बनाता हूँ