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Thursday, May 26, 2016

खामोश

              खामोशी


पानी की तरह शीतल है तू
हवाओं सा मदहोश है तू
वर्षों से जिसे ठुकराया गया
ये प्यार मेरे खामोश है तू ।
नदिया के दोनों छोरों सा
चंदा और चकोरों सा
कान्हा और राधा के जैसा
मुरली और ग्वाल के छोरों सा
इस युग में तेरी कद्र नहीं
उस युग का विजय घोष है तू ।
पानी की तरह शीतल है तू
हवाओं सा मदहोश है तू
वर्षों से जिसे ठुकराया गया
ये प्यार मेरे खामोश है तू ।
जेठ की तपती  धुप है तू
सावन में मेघ का रूप है तू
बसंती रंग में रंगा रंगा
वसुधा का रूप अनूप है तू
सहज है सम्मानित है
संम्पूर्ण है संतोष है तू ।
पानी की तरह शीतल है तू
हवाओं सा मदहोश है तू
वर्षों से जिसे ठुकराया गया
ये प्यार मेरे खामोश है तू ।
प्रेम तो बस एक राज यहां
गूंजती है आवाज यहां
अभिनय तो अच्छा करते हैं
पर सारे सौदे बाज़ यहां
अहसास है अशक्ति है
आलिंगन है आगोश है तू ।
पानी की तरह शीतल है तू
हवाओं सा मदहोश है तू
वर्षों से जिसे ठुकराया गया
ये प्यार मेरे खामोश है तू ।


                             (भगवान सिंह रावत)   सर्वाधिकार सुरक्षित                           

Saturday, May 14, 2016

एक दिन

एक दिन
एक सा हश्र सबका होना है एक दिन
चेहरे पर सादगी भीतर से रोना है एक दिन
जज्बात टूट कर बिखर ना जांयें 
अश्क कही पलकों से उतर न जाएँ
शब्दों का हार पिरोना है एक दिन
बनाते रहो महल, कागज़ के शहर में
रात और दिन सुबह दोपहर में
एक पल मैं बहुत कुछ होना है एक दिन
रेशम और मखमल से गहरा क्यों नाता है
दुनिया के बैभव पर कितना इतराता है
कुदरत के साये मैं सोना है एक दिन
अपने झमेले में उलझा है हर कोई
खुद को उलझाने उलझा है हरकोई
सलीब खुद अपना ढोना है एक दिन
कहाँ तक छिपाएगा अपने उस डर को
कुछ तो समझले कुदरत के दर को
होगा तो वही जो होना है एक दिन
साथ नहीं जायेगा हाथ नहीं आएगा
कितना भी जोर हो पकड़ नहीं पाएगा
ये सच उजागर होना है एक दिन
एक सा हश्र सबका होना है एक दिन
चेहरे पर सादगी भीतर से रोना है एक दिन

( भगवान सिंह रावत )

Monday, September 21, 2015

मैं गीत बनाता जाऊंगा


       मैं गीत बनाता  जाऊंगा











मैं गीत बनाता  जाऊंगा मन मीत  बनाता जाऊंगा
काँटों से आहत उपवन में मैं  फूल उगाता  जाऊंगा
सदियों  से खामोश हो पर इकरार कभी तो होगा ही
मौसम  जब जब बदलेंगे इजहार कभी तो होगा ही
फूनों की रुत मैं मिलने का त्यौहार कभी तो होगा ही
बिरहा में जो अश्रु बहे सीने में छुपाता जाऊंगा
मैं गीत बनता जाऊंगा मन मीत  बनाता जाऊंगा
प्रीत छुपी मन में  ऐसे सीप मैं जैसे मोती
घोर भयावह अन्धकार मैं दीप की जैसे ज्योति
तरह तरह के फूलों को ये एक माला में  पिरोती
न्योछावर, नतमस्तक हों वो रीत बन|ता जाऊंगा
मैं गीत बनाता  जाऊंगा मन मीत  बनाता जाऊंगा
कुदरत ने ने प्रीत को  जन्म दियाकुदरत ही इसकी जाती है
धर्म कर्म सब कुदरत है कुदरत के गीत सुनाती है
भटक रही मानवता को ये सच्ची राह दिखाती है
कुदरत और मानव के मध्य सेतु बनाता जाऊंगा
मैं  गीत बनाता जाऊँगा मन मीत  बनता जाऊँगा
आज नहीं तो कल सही ऐसा भी युग आएगा
पुष्प गाएंगे गीत प्रीत के मनु संगीत सजाएगा
स्वर पंछी के सम्मलित होंगे और चमन मुश्कुरायेगा
बोल उठेंगे पत्थर भी वो आकाश बनाता जाऊँगा
मैं  गीत बनाता जाऊँगा मन मीत  बनता जाऊँगा
काँटों से आहत उपवन में मैं  फूल उगाता  जाऊंगा



                                          भगवान सिंह रावत



Friday, March 13, 2015

मेरे पहाड़ आना


अंदर से जब टूट जाओ ,तब मेरे पहाड़ आना ।
क्या जीवन का अर्थ है दुनिया को समझाना ।
पूछने पर सरलता से बताया जाता है ,
अथिति देवो भव। जताया जाता है ।
रोटी की कोई कीमत नहीं अंकता ,
बस रोज भूख  को हराया जाता है।
आदत में हर किसी की शामिल है ,
सत्कार में आँखें बिछाना ।
अंदर से जब टूट जाओ ,तब मेरे पहाड़ आना ।
क्या जीवन का अर्थ है दुनिया को समझाना ।
दूर जहाँ तक नजर जाती है ,
मेहनत की दीवानगी नजर आती है ।
दोपहर की धूप  थोड़ी चुभेगी,
पेड़ की छांव आँचल सी लहराती है ।
घने जंगलों के सैलाब में देखोगे ,
पंछियों का चहकना गुनगुनाना ।
अंदर से जब टूट जाओ ,तब मेरे पहाड़ आना ।
क्या जीवन का अर्थ है दुनिया को समझाना ।
जज्बातों की कद्र ,भावना का सम्मान है ,
इंसान से भी ऊपर एक और इंसान है ।
कवि की कल्पना साकार दिखेगी ,
प्रकृति का यहां अध्भुत ज्ञान है ।
मैं भी बिखरा  मिलूंगा कहीं पर तुम्हें
पहचान सको तो आँख न चुराना ।
अंदर से जब टूट जाओ ,तब मेरे पहाड़ आना ।
क्या जीवन का अर्थ है दुनिया को समझाना ।
देवों का गढ़ आस्थाओं का आयाम है ,
तृष्णा क्रोध ईर्ष्या इन सब का विराम है ।
हे मानवता की रक्षक देव शक्ति ,
सत सत मेरा तुम्हे प्रणाम है ।
अर्पण करदे अपना सब कुछ ,
सब संदर्प  संताप मिटाना  ।
अंदर से जब टूट जाओ ,तब मेरे पहाड़ आना ।
क्या जीवन का अर्थ है दुनिया को समझाना ।


                          भगवान  सिंह रावत


Thursday, January 29, 2015

प्यार तुम्हारा


प्यार तुम्हारा 

तुम साथ मेरे नहीं तो क्या ,
प्यार तुम्हारा आज भी है। 
फूल सी कोमल बाँहों का
वो हार तुम्हारा आज भी  है ।
लुकती छिपती धुप छाँव सी ,
तेरी मेरी प्रीत सही ।
विरह वेदना से तड़पते ,
तेरे मेरे गीत सही ।
दकियानूसी  सोच निभाती,
दुनिया की ये रीत सही ।
मेरे दिल की धड़कन पर ,
अधिकार तुम्हारा आज भी है । 
तुम साथ मेरे नही तो क्या
प्यार तुम्हारा आज भी है। 
मुस्किल के उस दौर में तुमने ,
जीना मुझे सिखाया था ।
दुनिया के हर आडम्बर का ,
चेहरा मुझे दिखाया था ।
नफरत की तेज हवाओं में ,
प्यार का दीप  जलाया था ।
उस दीपक से  जगमगाता,
संसार तुहारा आज भी है ।
 तुम साथ मेरे नही तो क्या  
प्यार तुम्हारा आज भी है।
उम्र ढूंढती तरस रही है 
प्यार तुम्हारा पाने को ।
प्यार का तो अहसास बहुत है ,
मरने को मिट जाने को  
कुछ भी नहीं इस धरा पर ,
यूँ तो दिल लगाने को
मेरे इस दीवानेपन को,
इन्तजार तुम्हारा आज भी है
तुम साथ मेरे नही तो क्या 
प्यार तुम्हारा आज भी है ।  
फूल सी कोमल बाँहों का
वो हार तुम्हारा आज भी  है  

                               भगवान सिंह रावत  दिल्ली 
                                        (स्वरचित)

Monday, December 29, 2014

आदमी

                                                                                  आदमी

इस जीवन में अपनी खातिर ,
कब जी पाता  है आदमी
सच्चे दिल से पूछके देखो ,
आँख चुराता है आदमी
बचपन में बडों कi डर ,
अव्वल आने की फिकर ,
कहना सुनना दूर की बात ,
कम क्यूं आये हैं नंबर
क्या कहे क्या कहे ,
बस हकलाता है आदमी
इस जीवन में अपनी खातिर ,
कब जी पाता  है आदमी।
उम्र बढ़ी तो जागे सपने ,
कुछ उम्मीदें लगी पनपने ,
तभी  कहर कुछ ऐसा बरपा ,
लगे मानाने मेरे अपने
फेरों के बंधन में जाने ,
कब बंध  जाता है आदमी ,
इस जीवन में अपनी खातिर ,
कब जी पाता  है आदमी।
कब बीता ये प्यारा बचपन
जाने कब आगई   जवानी ,
दरिया पर जो बाँध लगा तो।
उम्मीदों पर फिर गया पानी
दिखता सबको जिन्दा है पर
खुद मर जाता है आदमी ,
इस जीवन में अपनी खातिर ,
कब जी पाता  है आदमी।
जरूरतों के बोझ तले
समस्याओं  से घिरा हुआ  ,
मन की बात समझे कोई
और  कहे शरफिरा हुआ
अपने सा  मिल जाये कहीं तो ,
रो रो जाता है आदमी ।  
इस जीवन में अपनी खातिर ,
कब जी पाता  है आदमी।
            भगवान  सिंह रावत (स्वरचित)

Thursday, September 18, 2014

जिंदगी ।

             जिंदगी

चेहरो पर मुखौटे हैं इनको क्या देखें ,
भीतर कुछ और ही होती  जिंदगी
रात के अंधेरों में जागती रहती है ,
पल भर भी नहीं सोती है जिंदगी
दुनिआ के मेले में  झंझट झमेले  में,
बिलकुल अकेली ही होती है जिंदगी
भीतर के जख्मो को कब किसने बांटा है ,
खुद अपना सलीब ढोती है जिंदगी
बैभव समेटने को उम्र कम पड़ती है ,
बदले में  कितना कुछ खोती है जिंदगी |
जीवन के उपवन मैं माया के  बंधन   में,
 रिश्तों के मोती पिरोती है जिंदगी  |
खुद के गुनाहों को कुदरत के घावों को ,
आस्था की गंगा मे धोती है जिंदगी |
खुद में  जब झाँका और दोषी पाया ,
करुणामय  होकर  रोती  है जिंदगी |
चेहरे बदलते हैं इन पर मत जाओ ,
भीतर कुछ और ही होती  जिंदगी

            भगवान सिंह  रावत  (स्वरचित)