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Sunday, February 26, 2023

मजबूर सी जिंदगी

 


माया सुबह उठी तो उसे अपनी तबियत ठीक नही लगी ,पिछले एक हफ्ते से वह महसूस कर रही थी ,थकान और कमजोरी जैसे उसका पीछा नही छोड़ रही थी । अगल बगल में उसके दो बच्चे राजू और पिंकी सो रहे थे ,दुर दूसरी चारपाई पर उसका पति किशन लाल सो रहा था ,
किशन लाल सीधे स्वभाव का व्यक्ति था , वह  कपड़े की एक बड़ी दुकान पर सेल्स मैन का काम करता था ।आमदनी कुछ खास नही थी किसी तरह घिस पिट कर महीना पार हो जाता था
दो बच्चों की पढ़ाई का खर्च ,  कमरे का किराया , गांव में बूढ़े मां बाप उनको भी कुछ न कुछ चाहिए होता था । एक जान और सौ मुसीबत ,माया भी इसी उधेड़बुन में रहती थी कि इस सीमित कमाई में कैसे घर को चलाएं ।
उसने देखा सुबह के छह बजे चुके है ,वह उठी चाय बनाई और एक कप किशन को देकर खुद पीने लगी  । 'सुनो जी मुझे आज कल क्या हुआ है बहुत कमजोरी महसूस हो रही है " ,माया बोली
"क्यों क्या हुआ" ,किशन बोला
"बस थकान सी रहती है ,जरा सा काम करते ही बदन टूट जाता है कभी कभी आंखों के आगे अंधेरा छा जाता है " ,माया ने कहा ।
"डॉक्टर को दिखा दो' , और क्या ,किशन बोला
"हाँ जाती हूँ " आज ,और उसने बच्चों को जगाया , राजू ,पिंकी " बेटा उठो ,स्कूल को तैयार हो जाओ" और माया नास्ता बनाने में जुट गई , बच्चे स्कूल भेजने के बाद माया ने किशन के लिए टिफिन तैयार किया और बोली ,ये लो  कुछ पैसे देना डॉक्टर के जाऊंगी , 'कितने  चाहिए " , " देदो पांच सौ तो लगेंगे ही दो सौ तो फीस ही है उसकी ।फिर दवाइयां भी ....." ।
जेब मे से  पैसे निकालते किशन बोला , "ये लो जरा ध्यान से खर्च करो यार अभी महीना बहुत दूर है "अपनी परेशानी जताते किशन बोला ।माया किशन की मजबूरी समझती थी ,मगर क्या करे , पंद्रह हजार  तनखा में से चार तो किराए को चले जाते है , बाकी बचे ग्यारह उनमे बच्चों की फीस  और घर का राशन दूध वाला बिजली का बिल एक एल आई सी   की क़िस्त  वगेरह  सब मिला कर पैसे कम ही पड़ जाते थे । काम निबटा कर वह  नुक्कड़ पर डॉक्टर के क्लीनिक पर चली गई , डॉक्टर ने चेकअप करके कहा ,  "आप मेडम अपने खाने पीने का ध्यान रखिए आयरन की बहुत कमी है , चक्कर भी आते होंगे ",   "जी कभी कभी वह बोली " , "ये मैं कुछ दवाइयां लिख रही हूं  दस दिन की  दुबारा दिखा देना और आप अपने खाने में दूध और अंडे अवश्य खाये , वजन भी कम है नॉनवेज खा सकती हैं तो जरूर खाएं "।ये कह कर उसने एक पर्चा उसे थमा ढिया ,दोसौ उसे देकर माया वहीं बाहर दवाई की दुकान पर आई ,और पर्चा देकर बोली  " भैया ये दवाई देना "  ।दवाई लिफाफे में रख कर उसने बिल देखा तो वह चौंक गई, छह सौ पचास ......। ओह .....इतनी महंगी । अच्छा हुआ जो वह पांच सौ और साथ मे धर लाई थी नही तो बेइज्जती हो जाती ,वह दवाई लेकर घर आ गई , अब शाम को किशन को बताऊंगी तो  उछल पड़ेगा ,पर बताना तो है ही
किशन ने तबियत के बारे में पूछा तो उसने सब बताया तब किशन बोला ,ठीक है " अपने लिए और थोड़ा ज्यादा दूध ले आया करो ,सेहत तो पहले है '।
इसी तरह  खींच तान कर गाड़ी चल रही थी ।
उज्वल भविष्य  की उम्मीद में माया को लग रहा था जैसे वो और किशन खपते जा रहे हैं , हर महीने कुछ ना कुछ उधार रह ही जाता था ।
एक दिन रात को खाना खा रहे किशन का अचानक फोन बज उठा , 'हेलो कौन " उधर से आवाज आई  "मैं बोल रहा हूँ  बेटा कासी राम ', " ओह बाबू जी ,प्रणाम कैसे हो बाबू जी " , " मैं तो ठीक  हूँ बेटा पर तुम्हारी माँ की तबियत कुछ ठीक नहीं है " ,उधर से आवाज आई
" क्यों क्या हुआ मां को " किशन बोला , " बेटा पिछले महीने से सांस लेने में दिक्कत हो रही थी ,दवा भी दिलवाई मगर तबियत में सुधार नही हुआ,डॉक्टर कहता है भर्ती करना  पड़ेगा  सारे टेस्ट होंगे तब पता चलेगा , बेटा तू एक बार यहां आकर देख जा मेरे बस का भागना दौड़ना नही है " ।
" ठीक है बाबू जी में कल आ रहा हूँ ,आप चिंता मत करो " ,किशन बोला ।
" ठीक है बेटा " वहां से आवाज आई ।
किशन ने फोन रख दिया " माया ....मां की तबियत खराब है सुबह मुझे जाना होगा " , ' ठीक है जाओ ,मैंने सुन लिया " , " लो एक और खर्चा सिर पर आ गया "  किशन बोला और चादर ओढ़कर लेट  गया , माया भी सोने की किशिस करने लगी ,मगर नींद आंखों से कोसों दूर थी ,उसका ध्यान बार बार किशन की पंद्रह हजार की तनखा पर चल जाता था , और जोड़ तोड़ सुरु हो जाता था ,मगर मजाल है जो हिसाब किताब कही बैठने को तैयार हो ।
किशन अगले दिन सुबह बस में बैठ निकल पड़ा गांव तीन चार घंटे का रास्ता था ,लगभग दो बजे किशन घर पहुंचा तो माँ की हालत सच मे खराब थी,किशन चिंतित हो गया ,और सोच में पड़ गया।काफी देर बाद वह बोला " बाबू जी मैं मां को अपने साथ ले जा रहा हूँ जो भी होगा वहीं देख लूंगा ,दूर रह कर मैं भी चिंता में रहूंगा " ।
" जैसी तुम्हारी मर्जी बेटा जाओ ध्यान रखना अपनी मां का " काशी राम बोले ,किशन लाल अपनी मां को साथ ले कर वापस दिल्ली आ गया  ।
अस्पताल में भर्ती कर अपनी माँ के सारे टेस्ट करवाये , तीन चार दिन तक हस्पताल के चक्कर लगते रहे , पैसा भी आने जाने में काफी खर्च हो गया , किसी से कुछ उधार लेकर किशन मा का इलाज करवाता रहा मां को देखने कभी माया भी जाति रही कभी किशन ,दोनों की चक्कर घिन्नी बनी रही । वो तो  अच्छा हुआ लाक डाउन की वजह से काम कुछ खास नही था इस लिए छुट्टी मिल गई  वार्ना इतनी छुट्टी कहाँ मिलती है ।अगले महीने जिससे उधर लिया था उसे भी वापस देना होगा,खर्चे की बैंड बज  गई थी ,माया सोचती तो सोच में ही डूब जाती , पति से कुछ सलाह मशविरा भी करना चाहती तो कैसे करती और कहां करती एक कमरे में सबके सामने , पति के साथ प्यार मनुहार और रोमांस तो बहुत दूर की बात है ,सारा समय काम मे और सोचने में ही निकल जाता है ,किशन भी कभी इस तरफ रुचि नही लेता था । माया सोचती  क्या जिंदगी है हमारी ,कितनी बेबस और मजबूर ।
एक हफ्ते तक अस्पताल में किशन की माँ का इलाज होता रहा , तब जाकर कही तबियत सुधरी ।माया उसी उधार के बारे में सोच रही थी जो सर पर चढ़ गया तथा । एक शाम माया बोली "  सुनो जी में सोच रही हूं ,माजी तो अब ठीक हैं,बच्चों की देख भाल वो कर लेगी , मैं कुछ काम पकड़ लेती हूं । खर्च आराम से निकल जायेगा ' । तब किशन कुछ रुक कर बोला
" माया ठीक कहती हो वैसे भी अब ये तो करना ही पड़ेगा ,मजबूरी है " किशन बोला ।
" ऐसा क्यों कह रहे  हो क्या मजबूरी " ।माया बोली
" तुम जानती हो लोक् डाउन चल रहा है , हमारे मालिक ने भी सबकी तरह सबकी सैलरी आधी देने का फैसला कल सुना दिया है ,उनका कहना है कि जब ग्राहक ही नही आएगा , सेल नही होगी तो सैलरी कहां से आएगी " ।
क्या.......माया का मुह खुला का खुला राह गया ,
है  भगवान एक और मुसीबत , अब क्या होगा , दोनों एक दूसरे का चेहरा ताकने लगे , मानो एक दूसरे से पूछ रहे हों , ये सब मुसीबतें हमारे लिए ही हैं क्या ।
"अब क्या करेंगे " माया ने कहा
" करेंगे क्या एल आई सी की क़िस्त रोकनी पड़ेगी बाद में कुछ पेनाल्टी भरकर रिन्यू करवा लेंगे  , और क्या करे , उधारी तो दिन ब दिन बढ़ती ही रहेगी "।
माया जानती थी एल आई सी रिन्यू नही हो पाएगी
वह विदड्रा ही होगी , सोते समय उसकी आँखों से नींद भाग चुकी थी ,कैसी जिंदगी है ये सपने बुनने पर भी अपना हक नही है । काम तो पकड़ लुंगी मगर क्या जिंदगी का ये ही रंग होता है , इसी तरह अपनी आकांक्षाओं का दमन होता रहेगा, हमेशा निराशाओं से जूझना पड़ेगा कितने संघर्षों से दो चार होना  पड़ेगा......?
उसके अंदर एक ध्वन्द चल रहा था ,आंखे बंद होते हुए भी वह बहुत कुछ देख रही थी । उसे कुछ पंक्तियाँ याद आई जो उसने कहीं पढ़ी थी ,
"निराशाओं से जूझता रहा,जख्मों को सीता रहा
नाउम्मीदी के साये में कुंठाओं को पीता रहा
जिंदगी जीने के लिए जिंदगी भर यूँ हीजीता रहा" ।
और तब वह और कुछ भी ना सोच सकी उसने अपने आपको नींद के हवाले कर दिया ,सुबह से उसे नए संघर्ष की तैयारी भी करनी थी ।
                           
                                भगवान सिंह रावत (दिल्ली)



Monday, February 6, 2023

आपानी अपनी किस्मत है

 


कमला ने दीवार पर टंगी पुरानी घड़ी पर नजर डाली तो वह झट से उठ बैठी ,"ओह.... सात बजने वाले है ,साढ़े सात बजे मुझे  कोठी पर पहुंचना है ,देर हो गई "वह अपने मे ही बुदबुदाई ।और जल्दी से उठ कर मुह हाथ धोए , बगल में दस साल का उसका लड़का चंदू सो रहा था ।उसने चंदू को उठाया और कहा "चंदू उठ जा देर हो गई है  चल जल्दी मुह हाथ धो ,में चाय बनाती हूं तब तक "और उसने केतली में पानी  डाल चूल्हे पर चढ़ाया । रात की बची रोटी और कुछ शब्जी चंदू को परोसती वह बोली ,"चंदू ले खा पीकर स्कूल चले जाना ,और घर मे ही रहना ,आवारागर्दी मत करना ,दो बजे आकर में खाना बना दूंगी ,अभी में जा रही हूँ "और तेज कदमों से वह चल पड़ी , आज फिर देर हो गई ,शालिनी मेम साब डाँटेगी ,बिट्टू बाबा के लिए नाश्ता बनाना है, और खाना बनाना है ,और बाबू जी को खिला कर तब दूसरी जगह झाड़ू पोछा । उफ ... बड़ा झंझट है ,पर क्या कर सकते हैं ,जो पैसे देगा काम भी लेगा , साहब तो घर मे कम ही दिखते है ,आये दिन बाहर ही रहते है ,घर मे केवल तीन प्राणी है ,शालिनी मेंम साब उनका लड़का बिट्टू बाबा , जो कि पंद्रह साल का था उसके चंदू की उम्र का मगर क्या मोटापा था ,लगता था जैसे पच्चीस साल का हो , और  शालिनी मेंम साब के ससुर बड़े बाबू जी ,बाबू जी अक्शर बीमार ही रहते हैं , उनकी बड़ी देखभाल करनी पड़ती है , उधर शालिनी मेमसाब बहुत सख्त मिजाज की थी ,बाबू जी को नास्ते में, खाने में क्या देना है,बिटटू बाबा को क्या खाना है ,ये सब वही देखती थी ,कमली गेट खोलती अंदर पंहुंचीं तो शालिनी बोली "आज फिर देर कर दी कमली  टाइम से आया करो " जल्दी से साड़ी का पल्लू कमर में खोंस कमली अपने काम मे जुट गई । सबका नास्ता तैयार कर टेबल पर लगा कमली एक तरफ बैठ गई ,नास्ता कर बिट्टू बाबा स्कूल चले गए बाबू जी अपने कमरे में चले गए , फिर सारे बर्तन समेत कर सिंक में लेजाकर उन्हें धोने के बाद कमली बोली " मेमसाब मैं चलूं "
"हाँ जाओ ठीक टाइम से आया करो "। "जी मेमसाब" और कमली वहाँ से चल पड़ी दूसरी जगह झाड़ू पोछा कर कमली को डेड बज गए ।और घर आते आते दो बजे गए  । वह थक चुकी थी ,अपनी रोज की इस दिनचर्या से ,चंदू और अपने लिए खाना बना कर वह चारपाई पर पसर गई ।
काश चंदू के बाबा साथ होते तो ये सब अकेले उसे ना झेलना पड़ता । उसे याद आया तीन साल पहले की तो बात है ,अचानक चंदू के बाबा बीमार पड़ गए,
बीमार ऐसे कि खाट जब पकड़ी तो बस चार कंधों पर ही उठे । क्या वक़्त था । खैराती अस्पताल के चक्कर काटते काटते पैर घिस गए मगर चंदू के बाबा की हालत नही सुधरी ,आखिर वही हुआ ,चंदू के बाबा उन दोनों को छोड़ कर चल बसे ।बस फिर समस्या वही घर कैसे चले,कमली कोई पढ़ी लिखी तो थी नही ,सो दो घरों में काम पकड़ लिया ,और गृहस्थी की गाड़ी खींचने में लग गई ।तभी उसे टन टन की आवाज  ने चौंक ढिया ।उसकी नींद उचट गई उसने देखा दीवार पर लगी घड़ी तीन बजने की घोषणा कर रही थी ,हर घंटे पर वह बज उठती थी ।वह उठ बैठी , ।रंजना मेम साब की दी हुई पुरानी घड़ी थी जो दीवार पर टंगी वक़्त हिसाब किताब रखती थी,जब चंदू आया तो दोनों ने मिल कर खाना खाया ।दो तीन घंटे आराम करके फिर शाम को भी शालिनी मेम साब के यहां बर्तन करने जाना था । बस कमली की यही दिनचर्या थी ,किसी तरह गुजारा चल रहा था ,बड़े और ऊंचे सपने देखना अब उसके नसीब में नही था ऐसा वह सोचती थी ।
अगले दिन सुबह शालिनी मेमसाब के घर पर उसने नास्ता तैयार कर मेज पर लगाया ,और खुद दूर एक स्टूल पर बैठ कर चाय पीने लगी शालिनी ने उसे कुछ बिस्किट खाने को दिए ।बाबू जी और बिट्टू बाबा आकर बैठ गए ,शालिनी भी नास्ता करने बैठ गई । नास्ते में आमलेट ब्रेड और मख्खन और हलवा रखा था ।कमली सोच रही थी काश वह भी अपने परिवार के साथ ऐसे ही नास्ता करने बैठती,बिट्टू बाबा की तरह चंदू भी बैठा होता ,आमलेट और हलवे की सुगंध उसके नथुनों तक पहुंच रही थी,जमाना हो गया था ऐसे व्यंजन को घर पर बनाये ,और खाये हुए , रोटी शब्जी और दाल चावल मिल जाये इतना ही बहुत है ।
बिट्टू बाबा ने ब्रेड पर छुरी से मख्खन लगाया और खाने को हुए तभी शालिनी गुस्से में बोली " बिट्टू....। ये  क्या कर रहे हो" , "क्या मम्मा " वह बोला , आपको पता है ना आपको फैट वाली चीज नही खानी , " मम्मा इतने से क्या होता है"  वह बोला और मुह में ले जाकर ब्रैड खाने लगा ,नही..नहीं......।वह गुस्से से बोली और उठकर उनके मुह से आधा ब्रेड खींच लिया ।" अपना वजन देखा है पता है ,डॉक्टर को भी दिखाने में पैसा लगता है वह बोली तबियत खराब होगी वो अलग" ,ये कह कर उसने उस बचे टुकड़े को कूड़े दान में डाल दिया । बिट्टू का चेहरा रुआंसा सा हो गया वह कुछ बोल नही पाया ,और चुप चाप सुखी ब्रेड चबाने लगा ये देख कर कमली की आंखों में आंसू आ गए ।उसे लगा उसके बेटे चंदू के मुह से किसी ने ब्रेड छीन ली हो ,और उसका चंदू रोने लगा हो , बिट्टु बाबा के चेहरे की जगह उसे अपने चिंटू का चेहरा दिख रहा था मायूस सा ,कितना बड़ा पाप है किसी के मुह से आधा खाना छीनना ।
और वह भावावेश में रो पड़ी उसके मुह से निकला "नही मेम साब नही........। मत छीनो  , मुह से निवाला छीनना पाप होता है "। सब एक दम स्तब्ध रह गए । कुछ छण तक मौन छाया रहा ।
"तुम्हे क्या हुआ कमली" शालिनी बोली ",क.. क... कुछ नहीं बस ऐसे ही" ,कमली जैसे तंद्रा से जागी ।और सामान्य होने की कोशिश में लग गई ।
कमली  ने जल्दी जल्दी काम निपटाया और वापस घर आ गई ।अपनी इस भावुकता पर कमली हैरान थी । और शर्मिंदगी महसूस कर रही थी ।उसने फटा फट खाना बनाया ,चंदू भी स्कूल से आ गया ।दोनों खाना खाने लगे , चंदू की तरफ देखती कमली बोली ," चंदू बेटा खाना अच्छा बना है ना' ?
"हाँ मां बहुत अच्छा "।
कमली ने  उसके गाल पर चूम लिया , और प्यार से सर पर हाथ फिराया ,"खा खा शाबाश' ,चंदू मां के इस अप्रत्याशित  व्यवहार से  आश्चर्य में आ गया ।फिर खाना खा कर झट बाहर खेलने दौड़ गया ।कमली उसे देखती रही चंदू की वह क्या बताए कि वह उसे लेकर कैसे कैसे सपने देखती है ,वह सोच रही थी  अपनी अपनी किस्मत है । कोई होते हुए भी नही खा सकता किसी को मिलता ही नही है । इस लिए नही खा सकता ।उसके मष्तिस्क में ध्वन्द चल रहा था , और कुछ देर बाद उसे नींद आ गई ।
                            भगवान सिंह रावत (स्वरचित)